कब तक चुप रहोगे – डॉ आभा माहेश्वरी

शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा घर था। घर की खिड़की पर बैठकर हर शाम सत्तर वर्षीय शारदा देवी सड़क को निहारती रहती थीं। उनके चेहरे पर उम्र की झुर्रियाँ थीं, लेकिन आँखों में अब भी किसी का इंतज़ार ठहरा हुआ था।

उनका इकलौता बेटा निखिल शहर से दूर नौकरी करता था। महीने में एक बार फोन कर लेता और हर बार यही कहता, “माँ, जल्दी आऊँगा।”

शारदा मुस्कुरा देतीं—“हाँ बेटा, अपना ख्याल रखना।”

लेकिन फोन कटते ही उनकी आँखें दरवाजे पर टिक जातीं।

एक दिन पड़ोस की बारह वर्षीय राधा उनके पास आई। राधा अक्सर स्कूल से लौटते हुए उनके घर रुक जाती थी। उस दिन उसके चेहरे पर उदासी थी।

“दादी, आज स्कूल नहीं जाना था मुझे।”

शारदा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “क्यों बेटी?”

राधा चुप रही।

“कुछ हुआ है?”

उसकी आँखों से आँसू बह निकले। धीमे से बोली, “स्कूल में कुछ लड़कियाँ मुझे रोज चिढ़ाती हैं। मेरा बैग छिपा देती हैं, मेरी कॉपियाँ फाड़ देती हैं। मैंने मैडम को बताया था, पर उन्होंने कहा—‘बच्चों की छोटी-मोटी बातें हैं, खुद सुलझा लो।’”

शारदा देवी कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर उन्होंने राधा का हाथ थाम लिया।

“तुमने घर पर बताया?”

“नहीं… पापा कहते हैं कि शिकायत करने से मैं कमजोर लगूँगी।”

शारदा की आँखों में अचानक अतीत उतर आया।

उन्हें याद आया, जब उनके पति के निधन के बाद रिश्तेदारों ने उनकी जमीन हड़पने की कोशिश की थी। उन्हें मालूम था कि अन्याय हो रहा है, लेकिन उन्होंने परिवार की इज्जत के नाम पर चुप्पी साध ली थी। वर्षों तक वे यही सोचती रहीं कि समय सब ठीक कर देगा।

समय ने कुछ ठीक नहीं किया।

उसने बस उनकी चुप्पी को और गहरा कर दिया।

शारदा ने राधा की ओर देखा और पूछा, “बेटी, अगर तुम्हारे साथ गलत हो रहा है और तुम चुप रहती हो, तो क्या गलत करने वाला रुक जाएगा?”

राधा ने सिर झुका लिया।

“नहीं।”

“तो फिर कब तक चुप रहोगी?”

राधा ने पहली बार उनकी आँखों में सीधे देखा।

अगले दिन शारदा स्वयं उसके साथ स्कूल गईं। उन्होंने प्रधानाचार्य से बात की। शुरुआत में बात टालने की कोशिश हुई, लेकिन शारदा पीछे नहीं हटीं।

“बच्चों की छोटी बात कहकर किसी बच्चे का डर छोटा नहीं हो जाता,” उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा। “आज राधा है, कल किसी और की बारी होगी। चुप रहकर हम समस्या को खत्म नहीं करते, उसे बढ़ने देते हैं।”

उनकी आवाज सुनकर कुछ और अभिभावक भी आगे आए। पता चला कि कई बच्चे लंबे समय से इसी तरह परेशान थे।

स्कूल ने जाँच की। दोषी बच्चों को समझाया गया, अभिभावकों को बुलाया गया और विद्यालय में शिकायत की सुरक्षित व्यवस्था बनाई गई।

राधा की आँखों में उस दिन चमक थी।

वह शारदा से बोली, “दादी, अगर आप भी चुप रहतीं तो?”

शारदा मुस्कुराईं।

“तो शायद मैं फिर वही गलती करती, जो जिंदगी भर करती आई हूँ।”

कुछ दिनों बाद निखिल घर आया। माँ को देखते ही उसने उन्हें गले लगा लिया।

“माँ, आपने मुझे कभी अपनी परेशानी क्यों नहीं बताई?”

शारदा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि मुझे लगता था, माँ को दुख सहना चाहिए, बताना नहीं।”

निखिल की आँखें भर आईं।

“माँ, अब ऐसा मत करना।”

शारदा ने मुस्कुराकर कहा, “अब समझ गई हूँ बेटा—हर सहनशीलता महान नहीं होती। कभी-कभी चुप रहना भी अन्याय को ताकत देता है।”

खिड़की के बाहर राधा बच्चों के साथ खेल रही थी। उसकी हँसी पूरे आँगन में गूँज रही थी।

शारदा ने उसे देखते हुए धीरे से कहा—

“जहाँ आवाज उठाना जरूरी हो, वहाँ मौन कोई गुण नहीं।

गलत के सामने पहला सवाल यही होना चाहिए—

कब तक चुप रहोगे?”

लेखिका: डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ

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