दहलीज का दायरा

 मनोज ने तुरंत खड़े होकर अपने सूटकेस की चेन खींची और बनावटी गंभीरता ओढ़ते हुए कहा, “हाँ भैया, सारिका बिल्कुल ठीक कह रही है। और वैसे भी, भाभी इतनी बीमार हैं, इस हालत में हमारा यहाँ रुकना आप पर अतिरिक्त बोझ ही बनेगा। हम तो सोच रहे हैं कि अभी इसी वक्त कैब बुक करते हैं और पास के किसी होटल में चले जाते हैं। सुबह होते ही हम पहली फ्लाइट या ट्रेन से वापस निकल जाएंगे। शॉपिंग तो फिर कभी हो जाएगी।”

पुणे की मखमली शाम की ठंडी हवा बालकनी से छनकर ड्राइंग रूम में आ रही थी, लेकिन रसोई के भीतर का माहौल किसी भट्टी से कम नहीं था। पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें स्वाति की कनपटी से फिसलकर उसकी गर्दन पर जमा हो रही थीं। वह पिछले तीन घंटों से लगातार खड़ी थी। एक चूल्हे पर कड़ाही में गाजर का हलवा धीमी आंच पर भुन रहा था, दूसरे पर तीखी पनीर की ग्रेवी खदबद कर रही थी और बगल में कुकर अपनी तीसरी सीटी देने की तैयारी में था। हाथ की कलाई की घड़ी इशारा कर रही थी कि रात के साढ़े आठ बज चुके हैं। स्वाति ने अपनी उँगलियों से माथे की बिखरी लटें पीछे कीं और एक गहरी, थकी हुई सांस छोड़ी।

“स्वाति, अरे सुनती हो! फूफाजी कह रहे हैं कि हलवे में काजू जरा ज्यादा डालना और हाँ, मलाई कोफ्ता बना रही हो तो उसमें चीनी मत डालना, उन्हें तीखा पसंद है।” ड्राइंग रूम से आलोक की खनकती, रौबदार आवाज गूंजी।

सोफे पर पैर पसारे बैठे फूफाजी अपने हाथ में पकड़ा टीवी का रिमोट बेतरतीब तरीके से चला रहे थे और उनके बारह साल के सुपुत्र चिंटू ने ड्राइंग रूम के कालीन पर चिप्स का चूरा बिखेर रखा था। आलोक सोफे के कोने पर बैठा बड़े ही गर्व से अपनी नई पदोन्नति और अपनी ‘दरियादिली’ के किस्से बघार रहा था।

स्वाति ने थाली में गर्मागर्म स्नैक्स सजाए और बाहर आई। जैसे ही उसने सेंटर टेबल पर प्लेट रखी, फूफाजी ने एक टुकड़ा मुँह में डाला और तुरंत भौंहें सिकोड़ लीं, “अरे बहू, पनीर के पकोड़ों में चाट मसाला छिड़कना भूल गई क्या? थोड़ी सी हरी चटनी भी तीखी कम लग रही है। तुम्हारे ससुर जी के घर जब हम जाते थे, तो क्या आवभगत होती थी! शहर में आकर तुम लोग थोड़ा कंजूस हो गए लगते हो।”

आलोक ने झेंप मिटाने के लिए तुरंत हंसते हुए कहा, “अरे नहीं फूफाजी, स्वाति अभी दूसरी चटनी पीस देती है। आप संकोच मत कीजिए, आपका अपना ही घर है।”

स्वाति का मन किया कि वह वहीं थाली पटक दे, लेकिन उसने अपने होठ भींच लिए और खामोशी से मुड़कर दोबारा रसोई में चली गई। यह दृश्य उसके लिए कोई नया नहीं था। पिछले छह महीनों से हिंजेवाड़ी का यह खूबसूरत, थ्री-बीएचके फ्लैट किसी सराय या मुफ्त की धर्मशाला में तब्दील हो चुका था। कभी किसी दूर के चाचा के साले का मेडिकल चेकअप शहर के बड़े अस्पताल में होना होता, तो कभी आलोक के गाँव के किसी परिचित के बच्चों का कॉलेज एडमिशन या प्रतियोगी परीक्षा का सेंटर पुणे में पड़ता। हर हफ्ते एक नया जत्था आता, अटैचियाँ खुलतीं, गंदे कपड़े वाशिंग मशीन में ठूँस दिए जाते और स्वाति की जिंदगी एक बिना पगार वाली बावर्ची और दासी जैसी होकर रह जाती।

स्वाति खुद एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी। सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक लैपटॉप की स्क्रीन पर दिमाग खपाने के बाद, उसका दूसरा ‘फुल टाइम’ काम शुरू हो जाता था—मेहमानों की तीमारदारी। उसका आठ साल का बेटा आरव अपनी किताबों का बस्ता लिए माँ के इर्द-गिर्द घूमता रहता कि माँ कब उसे होमवर्क कराएगी, लेकिन स्वाति के हाथ रोटियाँ बेलने से खाली ही नहीं होते थे।

उस रात जब फूफाजी और उनका परिवार खा-पीकर एसी कमरों में खर्राटे भरने लगा, तो स्वाति ने बेडरूम का दरवाजा धीरे से बंद किया। उसकी कमर में असहनीय दर्द था और पैरों के तलवे सुन्न पड़ चुके थे।

“आलोक, मुझे तुमसे बात करनी है,” स्वाति की आवाज में एक दबा हुआ आक्रोश और बेइंतहा थकान थी।

आलोक तकिए के नीचे हाथ दबाकर मोबाइल स्क्रॉल कर रहा था। उसने बिना नजरें उठाए कहा, “हाँ बोलो, क्या हुआ? खाना बहुत स्वादिष्ट था, फूफाजी तृप्त हो गए।”

“मुझे अपनी तारीफों का टोकरा नहीं चाहिए आलोक,” स्वाति ने सीधे उसके हाथ से फोन खींचकर साइड टेबल पर रख दिया। “मैं अब और नहीं झेल सकती। यह सिलसिला कब थमेगा? पिछले हफ्ते तुम्हारे मौसाजी का परिवार सात दिन रहकर गया, उनके जाते ही तुम्हारे बचपन के दोस्त का परिवार पिकनिक मनाने आ धमका, और अब फूफाजी। यह घर है आलोक, कोई मुसाफिरखाना नहीं! मेरा दम घुट रहा है इस माहौल में। मेरी भी एक नौकरी है, मेरी सेहत है, हमारा एक बच्चा है जिसे हम हफ्तों से ढंग से वक्त नहीं दे पाए हैं। हमारी कोई निजी जिंदगी बची भी है या नहीं?”

आलोक का चेहरा तमतमा गया। उसने उठकर बैठते हुए अपनी आवाज धीमी लेकिन सख्त की, “स्वाति, तुम हमेशा इतना तिल का ताड़ क्यों बनाती हो? गाँव से कोई पहली बार तो शहर आता है। अगर हम अपने ही रिश्तेदारों को दो दिन आसरा नहीं देंगे, तो समाज में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी? आज गाँव में हर कोई मेरी मिसाल देता है कि आलोक कितना मिलनसार और मददगार है। लोग कहते हैं कि पुणे जाओ तो बस आलोक के यहाँ रुको, कोई तकलीफ नहीं होगी। इसे बड़प्पन कहते हैं।”

“इसे बड़प्पन नहीं, अंधापन कहते हैं आलोक!” स्वाति की आँखें भर आईं। “वे आपकी शराफत की तारीफ नहीं करते, बल्कि आपकी दी हुई मुफ्त की रोटी, एसी कमरे और मुफ्त की गाड़ी की सुविधाओं को भुनाते हैं। आप जिसे ‘रिश्तेदारी’ और ‘सम्मान’ समझ रहे हैं, वह दरअसल मेरा और आपके संसाधनों का बेरहम शोषण है। जिस दिन हम पर कोई विपत्ति आएगी, इनमें से कोई आपका हाल भी नहीं पूछेगा।”

“बस करो स्वाति! तुम्हारी यही संकीर्ण और स्वार्थी सोच मुझे पसंद नहीं है। तुम शहर में पली-बढ़ी हो, तुम्हें संयुक्त परिवार और आतिथ्य सत्कार का मोल क्या पता? चुपचाप सो जाओ, सुबह जल्दी उठकर फूफाजी के लिए नाश्ता भी तैयार करना है, उन्हें सुबह नौ बजे मंदिर दर्शन के लिए निकलना है,” आलोक ने यह कहते हुए चादर सिर तक खींच ली और दूसरी तरफ मुँह फेर लिया।

स्वाति की आँखों से आँसू छलककर तकिए में जज्ब हो गए। आलोक की संवेदनाएँ जैसे सामाजिक वाहवाही की अंधी दौड़ में कहीं खो चुकी थीं।

अगले दो दिन में फूफाजी रवाना हुए, लेकिन स्वाति को राहत का एक सांस भी नसीब नहीं हुआ। शाम को आलोक जब दफ्तर से लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी।

“स्वाति, सुनो! खुशखबरी है। मेरे चचेरे भाई मनोज और उसकी पत्नी सारिका कल आ रहे हैं। सारिका को यहाँ के बड़े मॉल से शादी की भारी शॉपिंग करनी है और मनोज को अपनी गाड़ी की सर्विसिंग करानी है। वे कह रहे थे कि होटल में बेकार पैसे क्यों लुटाना, जब अपने भाई का इतना बड़ा बंगला-सा फ्लैट खाली पड़ा है। मैंने कह दिया कि बेझिझक आ जाओ, घर तो तुम्हारा ही है।”

स्वाति स्तब्ध रह गई। उसने आलोक की आँखों में देखा, जहाँ उसके दर्द के लिए कोई जगह नहीं थी। “आलोक, मेरी कल से एक बहुत अहम प्रोजेक्ट रिलीज़ है। मुझे चौदह-चौदह घंटे काम करना होगा। मैंने तुमसे कहा था कि मुझे इस हफ्ते थोड़ा आराम और एकांत चाहिए। तुमने फिर वही किया?”

“अरे, तो तुम अपना काम करना, वे कौन सा तुम्हारे सिर पर बैठेंगे। थोड़ा-बहुत नाश्ता-खाना तो तुम वैसे भी बनाती ही हो, थोड़ा ज्यादा बना लेना,” आलोक ने बात को ऐसे उड़ा दिया जैसे यह कोई मामूली बात हो।

लेकिन नियति की योजना कुछ और ही थी। मनुष्य जब सीमाओं को लांघने की जिद करता है, तो कुदरत उसे सबक सिखाने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती है।

अगले दिन दोपहर को मनोज और सारिका तीन बड़े-बड़े सूटकेस लेकर आ धमके। घर में आते ही उन्होंने अपने जूते हॉल में फेंक दिए और फरमाइशों का दौर शुरू हो गया। स्वाति ने सिरदर्द की एक गोली खाई और लैपटॉप गोद में रखकर किसी तरह रात के खाने की तैयारी में जुट गई। लेकिन रात होते-होते उसका बदन तवे की तरह तपने लगा। हाथ-पैर बुरी तरह कांपने लगे और उसकी रीढ़ की हड्डी में जैसे तीखे कांटे चुभने लगे।

रात के दस बजे स्वाति गश खाकर रसोई के फर्श पर ही गिर पड़ी। बर्तन गिरने की तेज आवाज सुनकर आलोक दौड़ता हुआ रसोई में आया। स्वाति अचेत पड़ी थी और उसका शरीर भयंकर रूप से तप रहा था। घबराकर आलोक ने उसे उठाया और बेडरूम में लिटाया। थर्मामीटर लगाया तो पारा 104 डिग्री पार कर चुका था।

आलोक के हाथ-पांव फूल गए। उसने तुरंत अपने फैमिली डॉक्टर को फोन किया। रात के ग्यारह बजे डॉक्टर घर पहुंचे। जांच के बाद डॉक्टर का चेहरा गंभीर हो गया। “इन्हें गंभीर एक्यूट बैक्टीरियल और वायरल इन्फेक्शन हुआ है। अत्यधिक मानसिक और शारीरिक तनाव की वजह से इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बिल्कुल गिर चुकी है। इन्हें तुरंत पूर्ण विश्राम (strict bed rest) और सघन देखभाल की जरूरत है। यह संक्रमण हवा से दूसरों में भी फैल सकता है, इसलिए इन्हें कम से कम पाँच दिन बिल्कुल अलग कमरे में रखें और बच्चे को भी इनसे दूर रखें।”

डॉक्टर दवाइयाँ और इंजेक्शन देकर चले गए। स्वाति अर्धबेहोशी में कराह रही थी। आलोक का दिल बुरी तरह धड़क रहा था। उसने स्वाति के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखनी शुरू कीं। छोटा आरव रोने लगा तो आलोक ने उसे किसी तरह समझाया।

रात के बारह बज रहे थे। घर में किसी ने खाना नहीं खाया था। आलोक पसीने से भीगा हुआ ड्राइंग रूम में आया, जहाँ मनोज और सारिका टीवी की आवाज धीमी करके अपने मोबाइल में व्यस्त थे।

आलोक ने एक गहरी सांस ली और झिझकते हुए कहा, “मनोज, सारिका… तुम दोनों ने देखा ही, स्वाति की हालत बहुत नाजुक है। डॉक्टर ने कहा है कि उसे किसी भी पल अस्पताल ले जाना पड़ सकता है। मैं पूरी तरह अकेला पड़ गया हूँ। सारिका, क्या तुम थोड़ी देर स्वाति के सिरहाने बैठकर उसकी पट्टियाँ बदल दोगी? मैं रसोई में जाकर आरव के लिए थोड़ा दूध गर्म कर लूँ और तुम लोगों के लिए कुछ खिचड़ी जैसा बना दूँ? आज रात तुम लोग थोड़ी मदद कर दोगे तो मुझे बहुत बड़ा सहारा मिल जाएगा।”

आलोक की बात सुनते ही सारिका और मनोज के चेहरे का रंग उड़ गया। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ ऐसे देखा जैसे आलोक ने उनसे उनकी कोई कीमती जायदाद मांग ली हो।

सारिका ने तुरंत अपना पल्लू ठीक किया और पीछे हटते हुए बोली, “अरे भैया, डॉक्टर ने अभी-अभी क्या कहा, आपने सुना नहीं? यह इन्फेक्शन हवा में फैलता है! मेरी खुद की छाती में पिछले दो दिन से कफ जमा है, अगर यह बीमारी मुझे लग गई तो मेरी तो जान पर बन आएगी। और फिर, मुझे तो मरीजों की तीमारदारी करने की बिल्कुल आदत नहीं है, मुझे तो उल्टियाँ आने लगती हैं।”

मनोज ने तुरंत खड़े होकर अपने सूटकेस की चेन खींची और बनावटी गंभीरता ओढ़ते हुए कहा, “हाँ भैया, सारिका बिल्कुल ठीक कह रही है। और वैसे भी, भाभी इतनी बीमार हैं, इस हालत में हमारा यहाँ रुकना आप पर अतिरिक्त बोझ ही बनेगा। हम तो सोच रहे हैं कि अभी इसी वक्त कैब बुक करते हैं और पास के किसी होटल में चले जाते हैं। सुबह होते ही हम पहली फ्लाइट या ट्रेन से वापस निकल जाएंगे। शॉपिंग तो फिर कभी हो जाएगी।”

आलोक सन्न रह गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। “मनोज… तुम क्या कह रहे हो? आधी रात को? तुम लोग तो पूरे एक हफ्ते शॉपिंग के लिए रुकने वाले थे न? इस वक्त स्वाति बेसुध पड़ी है, मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। तुम मेरे सगे चचेरे भाई हो। क्या तुम दो दिन रुककर घर का थोड़ा काम या आरव को नहीं संभाल सकते?”

“अरे भैया, आप तो भावुक हो रहे हैं,” मनोज ने जूता पहनते हुए बेरुखी से कहा। “बीमारी के मामले में कोई रिस्क नहीं लेता। हम यहाँ रहकर क्या करेंगे? उल्टा हमें भी इन्फेक्शन हो गया तो गाँव में माँ-बाप परेशान होंगे। आप भाभी का ध्यान रखिए, हम चलते हैं।”

पंद्रह मिनट के भीतर, मनोज और सारिका ने अपने तीनों सूटकेस समेटे। मुख्य दरवाजे की चौखट पार करते हुए सारिका ने मुँह पर दुपट्टा ढँकते हुए लापरवाही से कहा, “भैया, सुबह किसी को बुलाकर पूरा घर फिनाइल और डेटॉल से धुलवा लीजिएगा, बड़ी अजीब सी घुटन और बदबू हो रही है यहाँ।”

‘खट’ से दरवाजा बंद हो गया।

सन्नाटे की उस गूंज ने आलोक के सीने पर किसी हथौड़े की तरह वार किया। वह वहीं मुख्य दरवाजे के पास जमीन पर बैठ गया। उसके दिमाग की नसें फटने लगी थीं। उसके कान में स्वाति के वे शब्द बार-बार गूंज रहे थे—“वे आपकी शराफत की तारीफ नहीं करते, बल्कि आपकी दी हुई मुफ्त की सुविधाओं को भुनाते हैं… जिस दिन हम पर कोई विपत्ति आएगी, इनमें से कोई एक गिलास पानी भी नहीं पूछेगा।”

आलोक ने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसकी आँखों से पश्चाताप के खारे आँसू बह निकले। स्वाति शत-प्रतिशत सही थी। जिन तथाकथित ‘अपनों’ की झूठी वाहवाही और खोखली इज्जत के लिए उसने अपनी ही जीवनसंगिनी की खुशियों, उसकी सेहत और उसकी शांति को दांव पर लगा दिया था, वे ‘अपने’ एक रात की मदद करने के बजाय उसे एक छूत के मरीज की तरह बेसहारा छोड़कर भाग खड़े हुए थे।

वह उठकर भारी कदमों से बेडरूम में आया। स्वाति तेज बुखार में कांप रही थी और उसके सूखे होंठों से हल्की सी कराह निकल रही थी। आलोक ने उसके पैरों के पास बैठकर उसकी चादर ठीक की और गीले कपड़े से उसके तपते हुए माथे, हथेलियों और पैरों को पोंछने लगा।

अगले पाँच दिन आलोक के जीवन की सबसे कठिन परीक्षा के दिन थे। उसने ऑफिस से अनिश्चितकालीन छुट्टी ले ली। सुबह पाँच बजे उठकर बेटे के लिए दलिया बनाना, स्वाति को समय पर दवाइयाँ और काढ़ा देना, गंदे कपड़ों को गर्म पानी में धोना, झाड़ू-पोछा लगाना और फिर रात-रात भर जागकर स्वाति के तापमान पर नजर रखना। इन पाँच दिनों में उसकी पीठ अकड़ गई, आँखें सूजकर लाल हो गईं और हाथ बर्तन मांजते-मांजते खुरदरे हो गए।

और सबसे भयानक सच्चाई यह थी कि उन पूरे पाँच दिनों में, न तो फूफाजी का एक फोन आया, न मनोज का, और न ही गाँव के उन अनगिनत रिश्तेदारों का, जिनकी आवभगत में आलोक ने कभी अपनी जेब और स्वाति का खून-पसीना एक कर दिया था। हाँ, छठे दिन आलोक के एक मौसेरे भाई का फोन जरूर आया, लेकिन हाल पूछने के लिए नहीं, बल्कि यह कहने के लिए—”भैया, सुना है भाभी की तबीयत खराब थी, अब कैसी हैं? दरअसल मेरे एक दोस्त का बेटा पुणे इंटरव्यू देने आ रहा है, तो मैंने आपका पता दे दिया है, वह दो दिन आपके यहाँ रुक जाएगा।”

उस दिन आलोक के भीतर का सारा संकोच, सारा झूठा बड़प्पन हमेशा के लिए स्वाहा हो गया। उसने बिना एक पल गंवाए, बेहद सपाट और ठंडी आवाज में कहा, “नहीं, वह मेरे यहाँ नहीं रुक सकता। मेरा घर कोई होटल नहीं है। उसे कहिए किसी लॉज में कमरा ले ले।” और उसने पहली बार किसी रिश्तेदार का फोन उसके मुँह पर काट दिया।

सातवें दिन की सुबह, हल्की सुनहरी धूप बालकनी के पौधों से छनकर कमरे में बिखर रही थी। स्वाति का बुखार पूरी तरह उतर चुका था। कमजोरी अभी भी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक ताजगी लौट आई थी। वह सहारा लेकर उठी और धीरे-धीरे चलकर ड्राइंग रूम के सोफे पर आकर बैठ गई।

तभी रसोई से आलोक बाहर आया। उसके हाथ में एक ट्रे थी, जिसमें भाप उड़ता हुआ ताजे टमाटर और धनिए का सूप रखा था। आलोक का चेहरा उतरा हुआ था, दाढ़ी बढ़ चुकी थी और आँखों के नीचे काले घेरे साफ नजर आ रहे थे, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव और शांति थी।

उसने ट्रे को टेबल पर रखा और सूप की कटोरी स्वाति के हाथों में थमा दी। फिर वह बिना कुछ बोले, स्वाति के सामने फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया।

“आलोक, यह तुम क्या कर रहे हो? ऊपर बैठो,” स्वाति ने हैरान होकर कहा।

आलोक ने स्वाति के दोनों कमजोर हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और अपना सिर उसकी गोद में रख दिया। उसका विशाल कंधा आंसुओं के वेग से कांपने लगा।

“मुझे माफ कर दो स्वाति… मुझे अपनी जिंदगी में कभी माफ मत करना,” आलोक की आवाज रुंधे हुए गले से बमुश्किल निकली। “मैं कितना अंधा, कितना मूर्ख और आत्ममुग्ध इंसान था। मैं बाहर की दुनिया में झूठा दाता और मसीहा बनने का नाटक करता रहा, और उस नाटक की सबसे बड़ी कीमत तुम्हारी सेहत, तुम्हारी नींद और तुम्हारी गरिमा से चुकाता रहा। मैंने अपने ही हाथों से अपने स्वर्ग जैसे घर को दूसरों के स्वार्थ की भट्टी बना दिया था। जब तुम जिंदगी और मौत से लड़ रही थीं, तब मुझे समझ आया कि इस दुनिया में मेरा सच्चा संसार सिर्फ तुम और हमारा बच्चा है। जिन लोगों के लिए मैं तुम्हें रोज चोट पहुँचाता था, वे तो मुझे जलती हुई आग में अकेला छोड़कर तमाशा देखने चले गए।”

स्वाति ने अपने कमजोर हाथों से आलोक के आंसुओं को पोंछा। उसकी अपनी आँखों में भी पानी था, लेकिन यह पानी दर्द का नहीं, उस सुकून का था जो एक लंबे तूफ़ान के थमने के बाद आता है।

“आलोक, उठो,” स्वाति ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा। “तुम्हें अपनी गलती का अहसास हो गया, मेरे लिए यही बहुत है। रिश्ते निभाना गलत नहीं है आलोक, लेकिन जब रिश्ते सिर्फ एकतरफा सुविधा और शोषण बन जाएं, तो उन्हें ढोना मूर्खता होती है। किसी का सहारा बनना पुण्य है, लेकिन अपनी गृहस्थी की बलि देकर दूसरों के लिए सीढ़ी बन जाना सिर्फ दिखावा है। हमारा घर हमारी पनाहगाह है, यहाँ सुकून होना चाहिए, तनाव नहीं।”

आलोक ने सिर उठाकर स्वाति की आँखों में देखा। “तुमने सही कहा था स्वाति। आज के बाद इस घर की दहलीज पर एक अटूट मर्यादा होगी। कोई भी ऐसा व्यक्ति जो हमारा आदर नहीं करता, जो केवल अपनी सुविधाओं के लिए हमें याद करता है, उसके लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद रहेंगे।”

उसी शाम, जब दोनों बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे, आलोक का फोन बजा। स्क्रीन पर उसके एक पुराने परिचित का नाम चमक रहा था, जो अक्सर पुणे आने पर आलोक की गाड़ी और घर का मुफ्त इस्तेमाल करता था।

आलोक ने फोन उठाया, स्पीकर ऑन किया ताकि स्वाति भी सुन सके।

“हाँ भाई आलोक! जय श्री राम। अरे, मैं अगले हफ्ते सपरिवार शिर्डी दर्शन के लिए निकल रहा हूँ। सोचा तीन दिन पुणे में तुम्हारे फ्लैट पर रुकूँगा, भाभी के हाथ के पराठे खाए बड़ा अरसा हो गया है। बच्चों को भी वाटर पार्क घुमाना है।”

आलोक के चेहरे पर कोई हिचकिचाहट या अपराधबोध नहीं था। उसने स्वाति की तरफ देखा, जिसने हौसला बढ़ाते हुए उसकी हथेली दबाई।

आलोक ने बेहद शांत, सधे हुए और दृढ़ लहजे में जवाब दिया, “जय श्री राम भाई साहब। आपकी यात्रा मंगलमय हो। लेकिन इस बार हमारे घर पर आपके ठहरने की व्यवस्था नहीं हो पाएगी। स्वाति का स्वास्थ्य अब ऐसा नहीं है कि वह किसी की मेजबानी का भार उठा सके, और मैंने तय किया है कि मेरा परिवार अब पूरी तरह अपने स्वास्थ्य और शांति पर ध्यान देगा। स्टेशन के पास कई बहुत अच्छे और किफायती पारिवारिक होटल्स हैं, अगर आप चाहें तो मैं आपको दो-तीन होटल्स के फोन नंबर और लिंक मैसेज कर सकता हूँ। आप वहाँ बुकिंग करा लीजिए। जब आप शहर आएँगे, तो किसी शाम किसी अच्छे रेस्तरां में मिलकर एक कप कॉफी जरूर पिएंगे।”

दूसरी तरफ कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। उस परिचित ने शायद सपने में भी आलोक से इस तरह के दो-टूक और स्पष्ट जवाब की उम्मीद नहीं की थी।

“अरे… अच्छा… ठीक है भैया, कोई बात नहीं, हम देख लेंगे,” कहकर सामने वाले ने औपचारिक लहजे में फोन काट दिया।

आलोक ने फोन टेबल पर रखा और एक लंबी, सुकून भरी सांस ली। ऐसा लगा जैसे उसके सीने से मनों भारी बोझ उतर गया हो। घर में कोई तेज आवाज में चलता हुआ टीवी नहीं था, सिंक में जूठे बर्तनों का अंबार नहीं था, और न ही किसी फरमाइश का तनाव था।

घर के कोने में जलती हुई अगरबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू पूरे कमरे में तैर रही थी। छोटा आरव ड्राइंग रूम के कालीन पर बैठकर खिलौनों से खेल रहा था और उसकी मासूम हंसी घर के सन्नाटे को एक संगीत में बदल रही थी। आलोक ने स्वाति के कंधे पर अपना हाथ रखा, और स्वाति ने अपना सिर उसके सीने पर टिका दिया।

घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन आज उस घर की चौखट पर आत्मसम्मान और समझदारी की एक ऐसी अदृश्य रेखा खिंच चुकी थी, जिसे कोई स्वार्थी हवा अब पार नहीं कर सकती थी। आलोक ने सीख लिया था कि अपनी खुशियों, अपने जीवनसाथी और अपने आशियाने की हिफाजत के लिए कभी-कभी ‘ना’ कहना दुनिया का सबसे बड़ा नैतिक और पवित्र काम होता है।

क्या आपने भी अपने जीवन में या आसपास ऐसे रिश्तेदार देखे हैं जो केवल अपनी सुख-सुविधा और स्वार्थ के लिए ‘रिश्तेदारी’ का मुखौटा पहनते हैं? क्या परिवार के सुकून की खातिर ऐसे लोगों को स्पष्ट रूप से ‘ना’ कहना सही है? अपनी राय और अनुभव हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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