धुंध से परे का सवेरा

पंखुड़ी उठी, उसने झुककर मेरे माथे को चूमा और बोली, “मैं समर के साथ लिव-इन में इसलिए रह रही हूँ माँ, ताकि मैं अपने फैसले खुद ले सकूं। मैं आपकी तरह किसी डर के साए में घुट-घुट कर नहीं जीना चाहती। और हाँ… आलोक चाचा पिछले हफ्ते ही यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए हैं। वे आज भी अपने उसी पुराने घर में, अपनी किताबों के बीच बिल्कुल अकेले रहते हैं। कभी खिड़की से उस पार भी देख लिया करो माँ, शायद आज भी कोई आपके हाथ की चाय का इंतजार कर रहा हो।”

ड्राइंग रूम की खिड़की पर लगे हल्के जामुनी पर्दे को एक तरफ सरकाकर मैं भोपाल की उस सुहानी शाम को ढलते देख रही थी। बड़े तालाब से छूकर आती ठंडी हवा मेरे चेहरे को सहला रही थी, लेकिन मेरे भीतर का तापमान किसी दहकते अंगारे जैसा था। पास की मेज पर रखे चीनी मिट्टी के प्याले में अदरक वाली चाय अब पूरी तरह ठंडी होकर अपनी महक खो चुकी थी। पीछे गलियारे से पहियों वाले सूटकेस की घरघराहट की आवाज आ रही थी। वह आवाज मेरे कानों में किसी हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। मेरी छब्बीस साल की बेटी, पंखुड़ी, आज अपनी गृहस्थी का एक नया अध्याय शुरू करने जा रही थी। वह इस घर की दहलीज लांघकर अपने साथी, समर, के साथ एक नई दुनिया बसाने जा रही थी, बिना फेरे लिए, बिना किसी पंडित के मंत्रोच्चार के—एक ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में।

जब तीन दिन पहले पंखुड़ी ने डाइनिंग टेबल पर खाना परोसते हुए बड़ी सहजता से कहा था, “माँ, मैं और समर अरेरा कॉलोनी में एक फ्लैट ले रहे हैं और अगले महीने से साथ शिफ्ट हो रहे हैं,” तो मेरे हाथ से दाल की कटोरी छूटते-छूटते बची थी। मेरे भीतर सदियों पुरानी मर्यादाओं, संस्कारों और ‘लोग क्या कहेंगे’ के पहरेदारों ने फौरन बगावत कर दी थी। मैंने चिल्लाकर कहा था, “यह क्या पागलपन है पंखुड़ी? लोग बातें बनाएंगे। खानदान की कोई इज्जत है या नहीं? अगर तुम्हें समर पसंद है, तो हम रीति-रिवाज से तुम्हारी शादी तय कर देते हैं।”

लेकिन पंखुड़ी ने उस वक्त जरा भी गुस्सा नहीं दिखाया था। उसने बेहद ठहराव के साथ मेरे कांपते हाथों को थामा था और अपनी बड़ी-बड़ी, गहरी आँखों से मुझे देखते हुए कहा था, “माँ, शादी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। मैं किसी सामाजिक दिखावे या सिर्फ एक कानूनी कागज के टुकड़े के भरोसे पूरी जिंदगी का जुआ नहीं खेल सकती। मुझे और समर को एक ही छत के नीचे रहकर एक-दूसरे की कमजोरियों, आदतों और गुस्से को परखना है। अगर हम रोज़मर्रा की जिंदगी की कड़वाहटों के बीच एक-दूसरे का सम्मान बनाए रख पाए, तभी हम शादी के मंडप तक जाएंगे। क्या बिना समझे किसी रिश्ते में घिसटते रहना उस समाज के लिए ठीक है, जो हमारे रोने पर एक बूंद आंसू भी नहीं बहाता?”

उसकी इस दलील के सामने मेरी बरसों से सहेजी गई पारंपरिक दलीलें तिनके की तरह बिखर गई थीं। मैं लाजवाब हो गई थी। मैं खिड़की के कांच में अपनी ही परछाई को देख रही थी—सफेद होते बाल, आँखों के नीचे झुर्रियों का जाल और उन झुर्रियों में दफन एक अनकही, अनसुलझी दास्तान। पंखुड़ी के सूटकेस की ज़िप बंद होने की ‘चर्र’ की आवाज ने मुझे अचानक वर्तमान से खींचकर ठीक बाईस साल पीछे, सन 2004 के उस भयावह मंजर में लाकर खड़ा कर दिया।

उस समय पंखुड़ी सिर्फ चार साल की थी। एक शाम जब पूरा शहर बारिश की बूंदों से भीग रहा था, पुलिस की एक जीप मेरे दरवाजे पर आकर रुकी थी। मेरे पति, मयंक, जो एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर थे, एक भीषण सड़क हादसे में हमेशा के लिए मुझे छोड़कर चले गए थे। उस दिन मेरी उम्र महज सत्ताईस साल थी। भरी जवानी में मांग का सिंदूर उजड़ जाना क्या होता है, यह वही औरत समझ सकती है जिसके सीने पर चार साल की मासूम बच्ची बिलख रही हो।

मयंक के जाने के बाद रिश्तेदारों ने कुछ हफ्तों तक हमदर्दी के घड़ियाली आंसू बहाए। फिर एक-एक करके सब अपनी व्यस्तताओं की आड़ लेकर किनारा कर गए। ससुराल वालों को लगा कि कहीं मैं जायदाद में हिस्सा न मांग लूं, इसलिए उन्होंने दूरी बना ली, और मायके में भाभियों की त्योरियां चढ़ने लगी थीं। मैं भोपाल के उसी छोटे से दो कमरों के मकान में पंखुड़ी को सीने से चिपकाए आंसुओं के समंदर में डूबती-उतराती रही। जीवन अंधकारमय हो चुका था।

ठीक उसी दौर में, हमारे सामने वाले मकान में रहने वाले प्रोफेसर आलोक वर्मा मेरी जिंदगी में एक मूक पहरेदार बनकर उभरे थे। आलोक जी स्थानीय विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक थे। बहुत ही धीर-गंभीर, कम बोलने वाले और संजीदा इंसान। उनकी पत्नी का देहांत एक असाध्य बीमारी के चलते बहुत पहले हो चुका था और उनकी कोई संतान नहीं थी। वे अपने विशाल पुस्तकालय और एकांत के साथ उस बड़े से घर में अकेले रहते थे।

शुरुआत में आलोक जी का दखल सिर्फ जरूरत तक सीमित था। कभी बिजली का बिल भरना हो, कभी राशन की भारी बोरी उठानी हो, या कभी आधी रात को पंखुड़ी को तेज बुखार चढ़ जाने पर अपनी पुरानी मारुति कार निकालकर बच्चों के अस्पताल ले जाना हो—आलोक जी हमेशा बिना मांगे हाजिर रहते थे। उन्होंने कभी मुझ पर कोई एहसान नहीं जताया, न ही कभी अपनी मौजूदगी का अहसास कराया। वे एक ऐसी छांव की तरह थे, जो धूप के तीखे होते ही अपने आप मेरे सिर पर तन जाती थी।

धीरे-धीरे समय बीतता गया। दुख की सांझ ढली और हमारे बीच एक बौद्धिक व भावनात्मक पुल बनने लगा। कभी शाम को चाय की प्याली के साथ बालकनी से होने वाली छोटी-मोटी बातचीत कब घंटों की चर्चाओं में बदल गई, पता ही नहीं चला। हम कबीर के दोहों से लेकर दुनिया के फलसफे तक पर बातें करते। आलोक जी के सान्निध्य में मुझे वह बौद्धिक सुकून मिलता था, जो मैंने अपनी पिछली जिंदगी में कभी महसूस नहीं किया था। उनके चेहरे की शांत मुस्कान मेरे भीतर के खालीपन को भरने लगी थी। पंखुड़ी तो उन्हें ‘आलोक चाचा’ कहते हुए उनके कंधे पर चढ़कर ही बड़ी हो रही थी। आलोक जी उसके लिए किताबें लाते, उसे कहानियां सुनाते और स्कूल के प्रोजेक्ट्स में उसकी मदद करते।

एक दिन जब पंखुड़ी पहली कक्षा में दाखिला ले चुकी थी, बाहर सावन की झड़ी लगी हुई थी। आलोक जी मेरे घर आए थे, पंखुड़ी के लिए रंगों का एक डिब्बा लेकर। पंखुड़ी दूसरे कमरे में अपनी ड्राइंग बुक में रंग भरने में मगन थी। आलोक जी ने अपनी चाय का घूंट भरा और बड़ी देर तक खामोश रहे। उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।

उन्होंने आहिस्ता से कहा, “रोहिणी, मैं पिछले कई महीनों से एक बात अपने दिल में दबाए बैठा हूँ। हम दोनों ही इस दुनिया के थपेड़ों से आहत हैं। हम दोनों का एकांत एक जैसा है। क्यों न हम इस अकेलेपन को एक साझा संबल बना लें?”

मैं चौंककर उनकी तरफ देखने लगी थी।

आलोक जी ने बहुत ही परिपक्वता से आगे कहा, “मैं जानता हूँ कि इस उम्र में दोबारा शादी का ढोंग रचना शायद हम दोनों के मिजाज के अनुकूल न हो। दुनिया वाले तरह-तरह के नाम देंगे, रस्में थोपेंगे। क्या ऐसा मुमकिन नहीं कि हम बिना किसी सामाजिक तमाशे के, एक ही छत के नीचे एक-दूसरे का सहारा बनकर रहें? एक लिव-इन पार्टनर की तरह। पंखुड़ी को एक सुरक्षित घर और पिता का प्यार मिलेगा, और हमें जीवन के इस ढलते सफर में एक सच्चा साथी। मुझे तुम्हारी रूह से लगाव है रोहिणी, किसी सामाजिक तमगे से नहीं।”

आलोक जी के वे शब्द मेरे कानों में किसी बम की तरह फटे थे। उस दौर में, यानी आज से करीब दो दशक पहले, एक छोटे शहर में एक विधवा औरत का किसी मर्द के साथ बिना शादी के रहना तो दूर, इस बारे में सोचना भी महापाप माना जाता था। मेरे भीतर की पारंपरिक औरत, जो समाज की तालियों और गालियों के तराजू पर अपनी जिंदगी तौलती थी, बुरी तरह डर गई।

मैंने घबराकर, लगभग कांपते हुए अपनी नजरें फेर ली थीं और कड़े शब्दों में कहा था, “यह आप क्या कह रहे हैं आलोक जी? क्या दिमाग खराब हो गया है आपका? अगर किसी को कानों-कान खबर भी हो गई, तो मेरा जीना हराम हो जाएगा। लोग मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालेंगे। और सबसे बढ़कर, मेरी पंखुड़ी… जब वह बड़ी होगी और समझेगी कि उसकी माँ किसी गैर मर्द के साथ बिना शादी के रह रही है, तो वह समाज में अपना सिर कैसे उठाएगी? मैं अपनी ममता को कलंकित नहीं होने दे सकती। प्लीज, आप चले जाइए और आइंदा कभी इस बात का जिक्र मत कीजिएगा।”

आलोक जी ने मेरी ओर देखा था। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा, असीम दर्द और बेबसी थी। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “रोहिणी, समाज कभी किसी के आंसुओं का हिसाब नहीं रखता। तुम जिस त्याग को ममता समझ रही हो, वह शायद सिर्फ तुम्हारा डर है। पर तुम्हारी मर्जी।”

उस शाम के बाद आलोक जी ने कभी उस विषय पर बात नहीं की। वे शहर छोड़कर नहीं गए, न ही उन्होंने पंखुड़ी की मदद करना बंद किया, लेकिन हमारे बीच एक अदृश्य, अभेद्य कांच की दीवार खिंच गई। वे औपचारिक हो गए। बालकनी की वो चाय की महकती शामें हमेशा के लिए सर्द हो गईं। मैंने अपने भीतर की सारी इच्छाओं, सारे अरमानों और अपनी स्त्री-सुलभ पहचान का गला घोंट दिया। मैंने खुद को केवल ‘पंखुड़ी की माँ’ के सांचे में ढाल लिया। मैंने खुद को यह तसल्ली दी कि मैंने अपनी बेटी के भविष्य के लिए एक महान बलिदान दिया है।

“माँ! कहाँ खो गई हो आप?”

पंखुड़ी की खनकती आवाज ने मेरे खयालों के ताने-बाने को एक झटके में तोड़ दिया। वह कमरे से बाहर आ चुकी थी। उसके एक हाथ में छोटा ट्रॉली बैग था और दूसरे हाथ में उसका हैंडबैग। उसने गहरे नीले रंग का कुरता पहन रखा था, जिसमें वह आत्मविश्वास से भरी हुई, बिल्कुल नई सदी की एक स्वतंत्र लड़की लग रही थी।

वह मेरे पास आकर सोफे पर बैठ गई और उसने मेरे ठंडे पड़ चुके दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में समेट लिया। उसने मेरी नम आँखों में झांकते हुए मुस्कुराकर पूछा, “क्या सोच रही हो माँ? यही न कि आपकी बेटी समाज की रीतियों को तोड़कर एक गलत रास्ते पर जा रही है?”

मैंने भारी मन से अपनी गर्दन झुका ली और कहा, “गलत या सही का फैसला करने वाली मैं कौन होती हूँ बेटा? बस डर लगता है। यह दुनिया बड़ी बेरहम है पंखुड़ी। जब चार लोग पीठ पीछे बातें बनाते हैं, तो कलेजा छलनी हो जाता है। मैंने अपनी पूरी जवानी सिर्फ इसलिए अकेले काट दी ताकि तुम्हारी परवरिश पर, तुम्हारे नाम पर कोई आंच न आए। कोई उंगली न उठाए।”

पंखुड़ी ने एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे के भाव एकाएक बहुत गंभीर और भावुक हो गए। उसने बेहद आहिस्ते से कहा, “माँ, आज जब मैं जा रही हूँ, तो आपसे एक बात कहना चाहती हूँ… जो मैंने बरसों से अपने सीने में दबा रखी थी।”

मैंने चौंककर उसकी तरफ देखा।

पंखुड़ी की आँखों में नमी तैर आई, लेकिन उसकी आवाज में एक गजब की दृढ़ता थी। वह बोली, “माँ, आप जिसे अपना त्याग समझती हैं, वह असल में समाज के सामने आपकी हार थी। आप सोचती हैं कि मैं उस वक्त छोटी थी और कुछ नहीं समझती थी? माँ, बच्चे शब्दों से ज्यादा खामोशियों को पढ़ते हैं। मैंने देखा था कि आलोक चाचा की मौजूदगी में आपकी आँखों में कैसी चमक आ जाती थी। मैंने देखा था कि जब वे घर आते थे, तो आपके चेहरे की उदासी कैसे पल भर में गायब हो जाती थी। और मैंने वह शाम भी देखी थी, जब आपने रोते हुए उन्हें अपने कमरे से जाने के लिए कह दिया था।”

मेरे पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई। मेरे मुंह से एक शब्द नहीं निकला।

पंखुड़ी ने आगे कहा, “माँ, आपने अपनी खुशियों का गला सिर्फ मेरे नाम पर घोंट दिया? आपने कभी सोचा कि जब मुझे यह समझ आया कि मेरी वजह से मेरी माँ ने अपनी पूरी जिंदगी उस अकेलेपन की जेल में काट दी, तो मुझ पर क्या गुजरी? मुझे आपके उस तथाकथित बलिदान से कोई गर्व नहीं हुआ माँ, बल्कि मुझे हमेशा एक अपराधबोध रहा कि मेरी मौजूदगी आपकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी के आड़े आ गई। आपने मुझे दुनिया के डर से पाला, लेकिन जिंदगी जीना नहीं सिखाया। जिंदगी किसी के बनाए हुए खोखले नियमों पर घिसट-घिसट कर मरने का नाम नहीं है माँ। जिंदगी अपने हिस्से का सुख छीन लेने का नाम है।”

पंखुड़ी के हर एक शब्द ने मेरी आत्मा पर जमी बाईस साल पुरानी धूल को झाड़कर रख दिया था। जिस त्याग को मैं अपनी ढाल समझकर इतराती थी, वह असल में मेरी अपनी कायरता थी। मैंने अपनी कमजोरी का ठीकरा हमेशा अपनी मासूम बेटी के सिर फोड़ा था। नई पीढ़ी सचमुच हमसे कहीं ज्यादा समझदार और साहसी थी; वे पाखंड के आवरण को चीरकर सच को देखने का माद्दा रखते थे।

पंखुड़ी उठी, उसने झुककर मेरे माथे को चूमा और बोली, “मैं समर के साथ लिव-इन में इसलिए रह रही हूँ माँ, ताकि मैं अपने फैसले खुद ले सकूं। मैं आपकी तरह किसी डर के साए में घुट-घुट कर नहीं जीना चाहती। और हाँ… आलोक चाचा पिछले हफ्ते ही यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए हैं। वे आज भी अपने उसी पुराने घर में, अपनी किताबों के बीच बिल्कुल अकेले रहते हैं। कभी खिड़की से उस पार भी देख लिया करो माँ, शायद आज भी कोई आपके हाथ की चाय का इंतजार कर रहा हो।”

पंखुड़ी ने अपना सूटकेस उठाया, मुड़कर एक बार हाथ हिलाया और लिफ्ट की तरफ बढ़ गई। मुख्य दरवाजा बंद होने की हल्की आवाज के साथ ही पूरे फ्लैट में एक गहरा सन्नाटा पसर गया। लेकिन आज उस सन्नाटे में घुटन नहीं थी; आज उसमें एक अजीब सी मुक्ति की गूंज थी।

मैं काफी देर तक सोफे पर बुत बनी बैठी रही। पंखुड़ी की बातें मेरे कानों में गूंज रही थीं—”जिंदगी अपने हिस्से का सुख छीन लेने का नाम है।”

मैंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, अपने चेहरे के आंसुओं को पोंछा और बालकनी में आकर खड़ी हो गई। ठीक सामने, सड़क के उस पार, गुलमोहर के दरख्तों के बीच आलोक जी का पुराना सफेद मकान दिख रहा था। उनकी पहली मंजिल के स्टडी रूम की बत्ती जल रही थी। खिड़की के कांच के पीछे एक परिचित, झुकी हुई परछाई किताबों की अलमारी के पास खड़ी दिखाई दे रही थी। वे आज भी वहीं थे, उसी एकांत में, उसी ठहराव के साथ।

बाईस साल पहले मैंने समाज के डर से जो दरवाजा बंद किया था, आज मेरी बेटी ने उस पर से लोक-लाज की सारी जंजीरें उतार फेंकी थीं।

मेरे कदम खुद-ब-खुद मुड़े। मैंने रसोई में जाकर गैस जलाई, दो कप पानी चढ़ाया, अदरक कूटी और इलायची के दाने डाले। चाय खौलने लगी, तो उसकी खुशबू ने पूरे घर को एक नई ताजगी से भर दिया। मैंने चाय को दो खूबसूरत प्यालों में छाना, उन्हें एक ट्रे में सजाया और एक प्लेट से ढक दिया।

मैंने आईने में देखा। मेरे चेहरे पर अब कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक नई शुरुआत का नूर था। मैंने अपने फ्लैट का ताला लगाया, सीढ़ियां उतरीं और सड़क पार करके आलोक जी के दरवाजे पर पहुंच गई।

कांपते हाथों से मैंने डोरबेल का बटन दबाया।

कुछ ही पलों में दरवाजा खुला। सामने आलोक जी खड़े थे। सफेद कुर्ते-पायजामे में, आंखों पर चश्मा चढ़ाए। उनके चेहरे पर वक्त ने झुर्रियों की कई लकीरें खींच दी थीं, लेकिन उनकी आँखों की वही सौम्यता आज भी बरकरार थी। मुझे हाथ में चाय की ट्रे लिए अपने दरवाजे पर खड़ा देखकर वे हक्के-बक्के रह गए। उनकी आँखों में अविश्वास और हैरत का समंदर उमड़ पड़ा।

मैंने अपनी जिंदगी की सबसे सच्ची और बेबाक मुस्कान के साथ उनकी आँखों में देखा और कहा, “आलोक जी, चाय ठंडी हो रही है… क्या आज इस चाय के साथ उस बाईस साल पुरानी बात को दोबारा शुरू किया जा सकता है?”

आलोक जी के चेहरे पर पहले तो हैरानी की लकीरें गहरी हुईं, और फिर धीरे-धीरे उनके होंठों पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान खिल उठी, जिसने सदियों की पतझड़ को एक ही पल में बहार में बदल दिया। उन्होंने दरवाजा पूरा खोल दिया और भरभराई आवाज में कहा, “अंदर आ जाओ रोहिणी… चाय कभी देर से नहीं होती।”

शाम का धुंधलका अब गहरा चुका था, लेकिन उस चौखट के भीतर एक नया, चमकीला सवेरा कदम रख चुका था। अपने हक की खुशियों को जीने के लिए कभी देर नहीं होती, बस एक कदम उस पार रखने का हौसला चाहिए होता है।

समाज की बंदिशें और ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर अक्सर हमें अपनों के ही सामने झूठा त्याग करने पर मजबूर कर देता है। क्या आपको भी लगता है कि अक्सर माता-पिता बच्चों की आड़ लेकर अपनी हिचक और सामाजिक डर को ‘बलिदान’ का नाम दे देते हैं? क्या रोहिणी का यह कदम उसकी उम्र के इस पड़ाव पर सही था? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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