प्रीत का नया रंग

 प्रज्ञा ने जो रूप धरा था, उसे देखकर आंगन में बैठी हर औरत दंग रह गई। प्रज्ञा ने कोई नई भारी भरकम लाल साड़ी नहीं पहनी थी। उसने वही गहरे लाल और सुनहरे गोटे वाली पुरानी बनारसी साड़ी पहन रखी थी, जो पैंतीस साल पहले विश्वंभर जी ने उर्मिला को उनकी पहली करवाचौथ पर दी थी। और प्रज्ञा के हाथ में एक सुंदर सी थाली थी, जिसमें एक चटक गुलाबी रंग की चंदेरी साड़ी, कांच की खनकती लाल चूड़ियां, बिंदी और सिंदूर रखा हुआ था।

ग्वालियर के पुराने इलाके में स्थित उस दोमंज़िला पुश्तैनी मकान की खिड़कियों से आज सुबह से ही हल्की गुलाबी धूप छनकर आ रही थी। कार्तिक मास की चतुर्थी का दिन था और घर में एक अलग ही तरह की चहल-पहल थी। आज घर की बड़ी बहू प्रज्ञा का पहला करवाचौथ था। पिछले कई दिनों से घर में इसी बात की तैयारियां चल रही थीं। सास उर्मिला सुबह से ही रसोई से लेकर पूजा के कमरे तक के चक्कर काट रही थीं। उनके चेहरे पर एक हल्की सी चमक थी, लेकिन आंखों के कोनों में एक अनकहा सूनापन भी तैर रहा था।

प्रज्ञा अभी पिछले साल ही इस घर में ब्याह कर आई थी। उर्मिला का बेटा अनिमेष एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर था और प्रज्ञा एक स्कूल में शिक्षिका थी। दोनों की जोड़ी को देखकर मोहल्ले वाले कहते थे कि जैसे राम-जानकी की मूरत हो। प्रज्ञा सिर्फ पढ़ी-लिखी और संस्कारी ही नहीं थी, बल्कि उसका स्वभाव इतना कोमल था कि उसने पहले ही महीने में उर्मिला के अकेलेपन को अपनी ममता और अपनत्व से भर दिया था। उर्मिला अक्सर सोचती थीं कि भगवान ने उनके जीवन से जो सबसे बड़ा संबल छीना था, शायद प्रज्ञा के रूप में उसी की भरपाई करने की कोशिश की थी।

दोपहर के करीब बारह बज रहे थे। उर्मिला अपने कमरे में तख्त पर बैठी पूजा के बर्तनों को चमकाने के लिए पीतांबरी निकाल रही थीं। तभी पायल की रुनझुन के साथ प्रज्ञा कमरे में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर उत्साह साफ झलक रहा था। उसने आकर उर्मिला के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और चहकते हुए बोली, “मां जी! अभी-अभी अनिमेष का फोन आया था। कह रहे थे कि आधे घंटे में ऑफिस से निकल रहे हैं। मुझे तैयार रहने को कहा है, हम दोनों सरगी की बाकी खरीदारी और शाम की पूजा के सामान के लिए बाज़ार जा रहे हैं।”

उर्मिला ने मुस्कुराते हुए प्रज्ञा के माथे पर हाथ फेरा, “यह तो बहुत अच्छी बात है बहूरानी। तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। देर मत करना, शाम को बाज़ार में बहुत भीड़ हो जाती है।”

प्रज्ञा ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, “मां जी, अनिमेष कह रहे थे कि आप भी हमारे साथ चलिए। बाज़ार में थोड़ी ताज़ा हवा लग जाएगी और आपकी पसंद की मिठाई भी ले लेंगे।”

उर्मिला ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया और अपनी नजरें नीचे झुकाते हुए बोलीं, “नहीं बेटा, मेरा बाज़ार में अब क्या काम? तुम दोनों जाओ, हंसी-खुशी घूमो। मुझे अभी यहां घर पर बहुत काम है। शाम की पूजा के लिए पंडिताइन जी और पड़ोस की सभी सुहागिन औरतों को बुलावा भेजना है। सब आएंगी तो आंगन में कथा होगी। सुनो प्रज्ञा, बाज़ार जाओ तो सभी के लिए सुहाग पिटारी के छोटे-छोटे उपहार ज़रूर ले लेना। पहली बार का व्रत है, खाली हाथ किसी को विदा नहीं करते। और हां, मैंने तुम्हारी मां से भी बात कर ली है, उन्होंने जो कपड़े भेजे थे, वो मैंने पूजा की थाली के पास सहेज कर रख दिए हैं।”

प्रज्ञा ने उर्मिला के चेहरे को एकटक देखा। उसे लगा जैसे उस मुस्कान के पीछे कोई गहरा दर्द छिपने की नाकाम कोशिश कर रहा हो। पर उसने माहौल को हल्का रखते हुए कहा, “ठीक है मां जी, जैसा आप कहें। हम जल्दी लौट आएंगे।” इतना कहकर प्रज्ञा अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

प्रज्ञा के जाते ही कमरे में एक गहरा सन्नाटा पसर गया। उर्मिला ने कमरे की कुंडी अंदर से लगा ली और धीरे-धीरे चलकर दीवार पर टंगे एक पुराने, काले-सफेद फ्रेम के सामने जाकर खड़ी हो गईं। उस तस्वीर में उनके स्वर्गीय पति विश्वंभर मुस्कुरा रहे थे। चौड़ा माथा, आंखों में गहरा ठहराव और होठों पर वही जानी-पहचानी शरारत भरी मुस्कान, जो चालीस साल पहले उर्मिला का दिल जीत ले गई थी।

उर्मिला की पलकें भीग गईं। आज से ठीक एक साल पहले, करवाचौथ के ठीक एक महीने बाद एक अप्रत्याशित दिल के दौरे ने विश्वंभर को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया था। पैंतीस साल तक दोनों ने हर करवाचौथ एक साथ मनाया था। उर्मिला को वो सारे बीते बरस एक चलचित्र की तरह याद आने लगे।

“विश्वंभर… देखो न, आज घर कितना भरा-पूरा लग रहा है,” उर्मिला ने तस्वीर की कांच पर उंगली फेरते हुए फुसफुसाया। “तुम्हारी बहू का पहला करवाचौथ है। बिल्कुल वैसी ही है जैसी तुम चाहते थे—शांत, समझदार और सबको बांधकर रखने वाली। अनिमेष भी उसे बिल्कुल तुम्हारी तरह ही पलकों पर बिठाकर रखता है।”

उर्मिला की आंखों से आंसुओं की एक बूंद टपक कर कांच पर गिर पड़ी। पुरानी यादें उनके दिल को चीरने लगीं। विश्वंभर पूरे संयुक्त परिवार में एक ऐसे इंसान थे जो परंपराओं को मानते तो थे, लेकिन प्यार को किसी नियम में बांधने के सख्त खिलाफ थे। हर करवाचौथ पर वे चुपके से खुद भी व्रत रखते थे। उर्मिला मना करतीं कि ‘शास्त्रों में पतियों के व्रत रखने का कोई नियम नहीं है’, तो विश्वंभर हंसकर कहते थे, “शास्त्रों ने अगर प्रेम का अधिकार दोनों को बराबर दिया है, तो लंबी उम्र की प्रार्थना सिर्फ एक तरफ से क्यों होगी उर्मिला? अगर तुम मेरे बिना नहीं जी सकतीं, तो क्या मैं तुम्हारे बिना एक पल भी सांस ले पाऊंगा?”

पूरे परिवार में विश्वंभर को सब चिढ़ाते थे। देवरानी-जेठानी कहती थीं कि ‘भैया तो भाभी के पल्लू से बंधे रहते हैं।’ लेकिन विश्वंभर को कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। वे करवाचौथ से दस दिन पहले ही चोरी-छिपे नई-नई साड़ियां और चूड़ियां लाकर अपनी पुरानी संदूक में छिपा देते थे। और पूजा के बाद जब सब सो जाते, तो छत पर बनी मुंडेर के पास उर्मिला को ले जाकर घंटों बातें करते। उस रात वे दुनिया के सबसे बड़े प्रेमी बन जाते थे।

“और आज देखो विश्वंभर…” उर्मिला की सिसकी निकल गई। “मेरी अलमारी आज भी तुम्हारे लाए उन चटकीले रंगों से भरी पड़ी है। लाल, धानी, संतरी, गुलाबी… तुमने कभी मुझे सादे या बेरंग कपड़े पहनने ही नहीं दिए। कहते थे कि उर्मिला, रंग तुम्हारे चेहरे पर खिलते हैं। पर अब? अब मैं इन रंगों को कैसे छू लूं? समाज कहता है कि सुहाग के बिना औरत का कोई रंग नहीं होता। मेरे पास तो एक भी ऐसी सादी सूती साड़ी नहीं है जो मैं इस मनहूसियत के साथ पहन सकूं। आज जब शाम को सब सुहागिनें सज-धज कर आंगन में बैठेंगी, तो मैं कहां बैठूंगी? कैसे देखूंगी उस चांद को, जिसे देखकर कभी मैं तुम्हारा चेहरा देखती थी? आज मुझे पानी पीने का भी मन नहीं कर रहा और प्यास से कंठ भी सूख रहा है। तुम चले गए और मुझे इस रीति-रिवाजों की सूखी ज़मीन पर अकेला छोड़ गए।”

उर्मिला दीवार से पीठ टिकाकर ज़मीन पर बैठ गईं और घुटनों में सिर छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगीं। उनके भीतर का वह खालीपन आज ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा था जिसे वे पिछले ग्यारह महीनों से समाज और बेटे के सामने दबाए बैठी थीं।

उधर बाज़ार में, अनिमेष और प्रज्ञा एक बड़ी साड़ियों की दुकान में बैठे थे। अनिमेष प्रज्ञा के लिए बनारसी और कांजीवरम साड़ियां दिखवा रहा था, पर प्रज्ञा का ध्यान कहीं और था। वह बार-बार फोन में समय देख रही थी और उसका चेहरा बुझा हुआ था।

“क्या बात है प्रज्ञा? तुम्हें कोई साड़ी पसंद नहीं आ रही क्या?” अनिमेष ने पूछा।

प्रज्ञा ने अनिमेष का हाथ पकड़ा और धीरे से बोली, “अनिमेष, क्या तुमने आज मां जी का चेहरा देखा था? जब हम निकल रहे थे, उनकी आंखों में सिर्फ सूनापन था। हम अपनी खुशियों की खरीदारी कर रहे हैं, पर उस घर की नींव, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस परिवार को सींचने में लगा दी, आज अपने ही कमरे में बंद होकर रो रही होंगी। क्या विधवा हो जाने से औरत का दिल धड़कना बंद कर देता है? क्या उनके व्रत का, उनके प्रेम का कोई वजूद नहीं रहा सिर्फ इसलिए क्योंकि पिता जी इस दुनिया में नहीं हैं?”

अनिमेष अवाक रह गया। वह अपनी मां के दुख को समझता तो था, पर कभी इस नज़रिए से सोच नहीं पाया था। उसने गहरी सांस ली, “प्रज्ञा, मैं जानता हूँ। पर हमारे समाज में… तुम जानती ही हो। मां खुद को किसी शुभ काम में आगे नहीं करतीं। पिता जी के जाने के बाद तो उन्होंने रंगीन कपड़े छूना भी छोड़ दिया है।”

“समाज हम से बनता है अनिमेष, हम समाज से नहीं,” प्रज्ञा की आंखों में एक दृढ़ संकल्प था। “पिता जी का प्रेम मां के लिए कभी ख़त्म नहीं हुआ, तो मां का प्रेम कैसे अधूरा हो सकता है? आज इस करवाचौथ पर हम सिर्फ रस्में नहीं निभाएंगे, आज हम उस प्रेम का सम्मान करेंगे जो इस घर की आत्मा है।”

प्रज्ञा ने दुकानदार से कुछ खास दिखाने को कहा। अनिमेष उसे देखता रहा, उसकी आंखों में अपनी पत्नी के लिए आदर और बढ़ गया था।

शाम के पांच बज चुके थे। सूरज ढलने की तैयारी में था। मोहल्ले की औरतें सज-धज कर, लाल-पीली साड़ियों में, हाथों में पूजा की थालियां लिए ओंकारेश्वर जी के घर पहुंचने लगी थीं। आंगन में एक सुंदर रंगोली सजाई गई थी। उर्मिला ने अपने आंसुओं को पोंछ लिया था। उन्होंने एक बहुत ही हल्की, मटमैले बादामी रंग की पुरानी सूती साड़ी पहन रखी थी। बाल सादे तरीके से बंधे थे, माथे पर न बिंदी थी, न मांग में सिंदूर। वे खामोशी से मेहमानों का स्वागत कर रही थीं, उन्हें बैठने के लिए आसन दे रही थीं और पानी पूछ रही थीं।

पड़ोस की एक बुजुर्ग चाची ने उर्मिला को देखकर व्यंग्य भरे स्वर में कहा, “अरे उर्मिला, बहू का पहला साल है, तुम ज़रा एक तरफ हो जाओ। सुहाग के काम में विधवा का साया पड़ना अच्छा नहीं माना जाता। तुम बस अंदर से सामान भिजवाती रहो।”

यह सुनकर उर्मिला का कलेजा छलनी हो गया। वे चुपचाप सिर झुकाकर रसोई की ओर मुड़ने ही वाली थीं कि तभी सीढ़ियों से प्रज्ञा नीचे उतरी।

प्रज्ञा ने जो रूप धरा था, उसे देखकर आंगन में बैठी हर औरत दंग रह गई। प्रज्ञा ने कोई नई भारी भरकम लाल साड़ी नहीं पहनी थी। उसने वही गहरे लाल और सुनहरे गोटे वाली पुरानी बनारसी साड़ी पहन रखी थी, जो पैंतीस साल पहले विश्वंभर जी ने उर्मिला को उनकी पहली करवाचौथ पर दी थी। और प्रज्ञा के हाथ में एक सुंदर सी थाली थी, जिसमें एक चटक गुलाबी रंग की चंदेरी साड़ी, कांच की खनकती लाल चूड़ियां, बिंदी और सिंदूर रखा हुआ था।

प्रज्ञा सीधी चलकर उर्मिला के पास आई। उसने सबके सामने उर्मिला के पैर छुए। उर्मिला घबरा गईं, “यह क्या कर रही हो प्रज्ञा? सब औरतें बैठी हैं, पूजा का समय हो रहा है।”

प्रज्ञा ने थाली उर्मिला के हाथों में थमा दी। आंगन में सन्नाटा छा गया। चाची ने टोकना चाहा, “अरे बहू, ये क्या पागलपन है? विधवा औरत को सुहाग का सामान…”

“रुकिए चाची जी!” प्रज्ञा की आवाज़ में न तो गुस्सा था और न ही असम्मान, बल्कि एक ऐसी शालीन दृढ़ता थी जिसने सबको चुप करा दिया। प्रज्ञा ने मुड़कर सभी औरतों की तरफ देखा, “आप सब यहां किसलिए बैठी हैं? अपने-अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए, अपने प्रेम की अखंडता के लिए व्रत रखने, सही ना? तो मुझे बताइए, क्या शरीर के छूट जाने से प्रेम छूट जाता है? मेरे ससुर जी आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन क्या मां जी के दिल से उनका अस्तित्व मिट गया है? क्या पैंतीस साल तक मां जी ने जो अखंड तपस्या की, जो प्रेम निभाया, वो आज एक झटके में अपशकुन बन गया?”

उर्मिला की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उनके होंठ कांप रहे थे।

प्रज्ञा ने उर्मिला के दोनों कांपते हाथों को थाम लिया, “मां जी, पिता जी ने आपको जीवन भर एक रानी की तरह रखा। उन्होंने आपको कभी रंगों से जुदा नहीं देखा। आज जब मैं अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत कर रही हूँ, तो मुझे किसी और के आशीर्वाद से पहले आपका वह रूप देखना है जिसमें पिता जी का सच्चा प्रेम झलकता हो। यह साड़ी अनिमेष और मैं आपके लिए लाए हैं। पिता जी आज सशरीर नहीं हैं, पर वे हम सबके दिलों में हैं, और सबसे ज्यादा आपके दिल में हैं। उनका दिया प्रेम कभी विधवा नहीं हो सकता।”

पीछे से अनिमेष आगे आया। उसने अपनी मां के कंधे पर हाथ रखा और भरभराई आवाज़ में कहा, “मां, प्रज्ञा सही कह रही है। बाबूजी अगर आज होते, तो क्या वे आपको उस सूने मटमैले कपड़े में देखकर खुश होते? वे तो खुद कहते थे कि उर्मिला ही मेरा सबसे बड़ा उत्सव है। हमारे लिए अपने उत्सव को मत मारो मां। अगर पिता जी का साया मुझ पर हमेशा है, तो उनका सुहाग आपके दिल में हमेशा अमर है।”

आंगन में बैठी कई औरतों की आंखें नम हो गईं। जो चाची अभी अपशकुन की दुहाई दे रही थीं, उन्होंने भी अपना सिर शर्म और अहसास से झुका लिया।

प्रज्ञा ने उर्मिला का हाथ पकड़ा और उन्हें अंदर कमरे में ले गई। दस मिनट बाद जब उर्मिला बाहर आईं, तो पूरा आंगन जैसे एक नई रोशनी से नहा उठा। उर्मिला ने वह गुलाबी चंदेरी साड़ी पहन रखी थी। उनके माथे पर एक हल्की सी लाल बिंदी थी और चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो आंसुओं के धुल जाने के बाद निखर आया था।

आंगन में कथा शुरू हुई। इस बार उर्मिला किसी कोने में नहीं बैठी थीं, बल्कि प्रज्ञा ने उन्हें अपने ठीक बराबर में बिठाया था। उर्मिला ने कथा सुनी, गेहूं के दाने हाथ में लिए और जब थाली घुमाने की रस्म आई, तो प्रज्ञा ने सबसे पहले अपनी थाली अपनी सास के हाथों से छुआ कर आशीर्वाद लिया।

रात के नौ बजे आसमान में चतुर्थी का चांद धीरे-धीरे बादलों की ओट से बाहर निकला। छत पर सभी सुहागिनें अपने-अपने पतियों के साथ खड़ी थीं। अनिमेष और प्रज्ञा भी छलनी और अर्घ्य का लोटा लिए खड़े थे। प्रज्ञा ने चांद को देखा, फिर छलनी की ओट से मुस्कुराते हुए अनिमेष का चेहरा देखा। अनिमेष ने पानी का घूंट पिलाकर प्रज्ञा का व्रत पूरा कराया।

व्रत खुलने के तुरंत बाद, प्रज्ञा ने एक दूसरी छलनी उठाई और उर्मिला के हाथों में थमा दी। उर्मिला समझ नहीं पाईं। प्रज्ञा ने धीरे से कहा, “मां जी, उस आसमान के चांद को देखिए… और फिर आंखें बंद करके अपने मन के उस चांद को देखिए जो कभी अस्त नहीं हो सकता।”

उर्मिला ने कांपते हाथों से छलनी उठाई। बादलों के पार चमकते चांद को देखा, और फिर जैसे ही उन्होंने छलनी के पार देखा, उन्हें उस चांदनी में विश्वंभर का मुस्कुराता हुआ चेहरा साफ नजर आया—वही शरारती मुस्कान, वही आंखों का गहरा प्यार, जैसे वे कह रहे हों, “उर्मिला, मैंने कहा था ना कि मैं कहीं नहीं जाऊंगा।”

उर्मिला की आंखों से दो बूंद आंसू गिरे, पर इस बार वे विलाप के नहीं, बल्कि तृप्ति और शांति के आंसू थे। अनिमेष ने आगे बढ़कर पानी का लोटा मां के होठों से लगाया, “मां, पानी पी लीजिए। आपका व्रत आज भी पूरा हुआ, और बाबूजी का प्यार आज भी जीत गया।”

उर्मिला ने पानी पिया। उन्होंने दोनों बच्चों को अपने सीने से लगा लिया। घर की छत पर आज सिर्फ एक रस्म पूरी नहीं हुई थी, बल्कि सदियों से चली आ रही एक संकीर्ण और अमानवीय सोच की दीवार भी ढह गई थी। प्रेम की कोई अंतिम तिथि नहीं होती, और न ही रिश्तों की गरिमा किसी के चले जाने से खत्म होती है। उस रात, ग्वालियर के उस पुराने मकान में, चांद की रोशनी पहले से कहीं ज्यादा उजली और पावन लग रही थी।

क्या एक स्त्री का अस्तित्व और उसके जीवन के रंग केवल किसी की शारीरिक उपस्थिति तक ही सीमित होने चाहिए? क्या किसी अपने के चले जाने के बाद प्रेम और सम्मान की भावनाएं खत्म हो जाती हैं? अगर आपको भी लगता है कि प्रज्ञा और अनिमेष का यह कदम समाज की सोच को एक नई और मानवीय दिशा देने वाला था, तो अपनी राय हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।

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