सोने का कंगन

आलोक ने तुरंत सुहासिनी को सहारा देकर उठाया और अपने सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में सारे शिकवे, सारी कड़वाहट और सारा खोखलापन धुल गया। सुहासिनी ने छलनी उठाई, पहले बादलों के बीच चमकते पूनम के चांद को देखा और फिर उसी छलनी की छांव में अपने जीवन के सबसे बड़े सत्य—अपने पति आलोक के मुखड़े को निहारा। आलोक ने अपनी कांपती उंगलियों से सुहासिनी को पानी का घूंट पिलाकर उसका व्रत पूर्ण कराया और फिर बड़े प्यार से उसके हाथों में वह कंगन पहना दिया। सुहासिनी ने अपनी सजल आँखों से पति के चरण स्पर्श किए।

भोपाल के उपनगरीय इलाके में स्थित रेलवे कॉलोनी की उस संकरी गली में कार्तिक के महीने की गुनगुनी धूप उतर रही थी। करवा चौथ आने में अब केवल दो ही दिन शेष थे, और पूरे मोहल्ले की हवा में एक अजीब सी हलचल, त्योहार की महक और उल्लास घुला हुआ था। हर आँगन से खनकती हँसी, चूड़ियों की झनकार और सिलबट्टे पर पिसती ताज़ा मेंहदी की खुशबू उठ रही थी। कोई अपने पुराने रेशमी लहंगे को धूप दिखा रही थी, तो कोई बाजार से मँगाए गए गोटेदार दुपट्टे पर नई लेस टांक रही थी। इस साधारण सी मध्यमवर्गीय रेलवे कॉलोनी में रहने वाले परिवारों के पास दौलत की कोई बड़ी विरासत नहीं थी, न ही उनके घरों में विदेशी कालीन या झूमर लटके थे। वे सभी क्लर्क, टेक्नीशियन और लोको शेड में काम करने वाले सीधे-सादे कर्मचारियों के परिवार थे, जिनका संसार सीमित तनख्वाह, बच्चों की स्कूल फीस और महीने के तय बजट के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। फिर भी, जब कोई त्योहार आता, तो लगता जैसे सारी दुनिया की खुशी इन्हीं छोटे-छोटे दो कमरों वाले क्वार्टरों के बरामदों में सिमट आई हो।

लेकिन इसी कतार के मकान नंबर बयालीस में पसरा हुआ सन्नाटा बाहर की चहल-पहल से एकदम अलग था। इस घर की बाशिंदा सुहासिनी पिछले दो दिनों से कमरे के परदे गिराए, माथे पर हाथ धरे पलंग पर गुमसुम बैठी थी। सुहासिनी का विवाह आलोक से हुए अभी मुश्किल से डेढ़ वर्ष ही बीता था। आलोक रेलवे के डिजाइन विभाग में एक जूनियर इंजीनियर था—मेहनती, सीधा, कर्तव्यनिष्ठ और अपनी पत्नी को जान से ज्यादा चाहने वाला। आलोक की परवरिश एक बेहद संस्कारी और सादगी पसंद परिवार में हुई थी, जहाँ रिश्तों को सहेजने के लिए त्याग करना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती थी। किंतु सुहासिनी का स्वभाव इससे बिल्कुल विपरीत था। वह एक ऐसे खाते-पीते और दिखावे को तवज्जो देने वाले परिवार से आई थी जहाँ इंसान की कद्र उसके कपड़ों, गहनों और बैंक बैलेंस से आंकी जाती थी। अपनी सहेलियों के सोशल मीडिया पोस्ट, उनके पतियों द्वारा दिए गए महंगे तोहफे और ब्रांडेड साड़ियों की तस्वीरें देखकर सुहासिनी के मन में एक अंतहीन असंतोष की आग धधकती रहती थी।

वह हर बात पर आलोक के सीधेपन का उपहास उड़ाती। कॉलोनी के बाकी पुरुष जब अपनी पत्नियों के साथ स्कूटर पर बैठकर सब्जी मंडी से लौटते, तो सुहासिनी खिड़की की ओट से देखकर मुँह बिचका लेती। उसके भीतर यह ग्रंथि बैठ चुकी थी कि वह इस साधारण सी जिंदगी के लिए नहीं बनी है। आलोक उसकी हर छोटी-बड़ी फरमाइश पूरी करने की भरसक कोशिश करता। अपनी चाय का खर्च काटकर, ऑफिस पैदल जाकर, यहाँ तक कि अपने पुराने जूतों को बार-बार सिलवाकर भी वह सुहासिनी के लिए कभी पसंदीदा मिठाई तो कभी रेशमी साड़ियाँ ले आता था। मगर सुहासिनी के चेहरे पर कभी तृप्ति की मुस्कान नहीं खिलती थी। उसे लगता था कि पति पर दबाव बनाकर, रूठकर और अपनी शर्तें मनवाकर ही वह अपनी अहमियत साबित कर सकती है।

त्योहार की सुबह जब आलोक ड्यूटी जाने के लिए तैयार हो रहा था, तभी सुहासिनी ने चाय का कप मेज पर पटकते हुए अपना फरमान सुना दिया था, “आलोक, इस करवा चौथ पर मुझे मोहल्ले की औरतों की तरह वह पीतल और तांबे के पानी चढ़े गहने नहीं पहनने। वर्मा जी ने अपनी पत्नी को पूरे तीन तोले का सोने का कंगन दिलवाया है। अगर शाम को घर लौटते वक्त तुम्हारे हाथ में मेरे लिए सोने का कंगन नहीं हुआ, तो समझ लेना कि इस चौखट के अंदर तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।”

आलोक स्तब्ध रह गया था। उसने हाथ जोड़कर बहुत विनम्रता से समझाने की कोशिश की थी, “सुहासिनी, तुम जानती हो कि अभी माँ के घुटने के ऑपरेशन का कर्ज चुकता कर रहा हूँ। बैंक की ईएमआई कटने के बाद घर खर्च के लिए भी पाई-पाई का हिसाब रखना पड़ता है। इतने कम समय में, इस सीमित तनख्वाह पर मैं डेढ़ लाख का कंगन कहाँ से ला पाऊँगा? थोड़ा सब्र रखो, आने वाले बोनस के समय मैं तुम्हें कुछ अच्छा दिला दूँगा।”

लेकिन सुहासिनी का अहंकार सातवें आसमान पर था। उसने तिनक कर कहा था, “मुझे कोई बहाना नहीं सुनना। तुम बस अपनी माँ और अपने खानदान का रोना रोते रहो। मेरे अरमानों का तो तुम्हारे आगे कोई वजूद ही नहीं है। अगर कंगन नहीं ला सकते, तो इस घर का मुँह भी मत देखना। भूखे पेट रहूँगी, पर तुम्हारी इस फकीरी का तमाशा पूरी दुनिया के सामने नहीं बनने दूँगी।”

आलोक ने गहरी सांस ली, उसकी आँखें नम हो गईं, लेकिन स्वाभिमानी आलोक ने पलटकर कोई कटु शब्द नहीं कहा। वह बिना नाश्ता किए, भूखे पेट ही अपना टिफिन मेज पर छोड़कर ऑफिस के लिए निकल गया। उसके जाते ही सुहासिनी ने पलंग पर गिरकर तकिए में मुँह छुपाकर रोने का ढोंग रचा, पर जैसे ही बाहर से सन्नाटा गहराया, उसने रसोई में जाकर अपने लिए गरमा-गरम पराठे सेंके, मजे से खाए और फिर से मुँह फुलाकर लेट गई। उसे पूरा यकीन था कि उसका सीधा-सादा पति शाम तक अपनी किसी जमा-पूँजी को तोड़कर या किसी दोस्त से उधार माँगकर उसकी जिद के आगे घुटने टेक ही देगा।

दोपहर ढलते ही कॉलोनी के सामुदायिक भवन में मेंहदी लगवाने का सिलसिला शुरू हुआ। पड़ोस की बड़ी-बूढ़ी और सखियाँ एक-एक करके जुटने लगीं। जब सुहासिनी काफी देर तक नहीं पहुँची, तो पड़ोस में रहने वाली सरला चाची और दो अन्य युवतियाँ उसे बुलाने आ पहुँचीं।

“अरे बहुरानी! इतनी देर हो गई, सब तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं। आज के दिन ऐसे कमरे में मुँह छिपाकर क्यों बैठी हो? चलो, बाहर आकर मेंहदी रचाओ।”

सुहासिनी ने नखरे दिखाते हुए कहा, “नहीं चाची, मेरा मन ठीक नहीं है। मुझे नहीं लगवानी मेंहदी।”

मगर औरतों का प्रेम ऐसा था कि वे उसकी एक न सुनते हुए उसे हाथ पकड़कर बाहर खींच ही ले गईं।

सामुदायिक भवन का नजारा देखकर सुहासिनी का मन भीतर ही भीतर सुलग उठा। वहाँ किसी भी स्त्री के बदन पर कोई बेशकीमती आभूषण नहीं थे। किसी ने पुरानी शिफॉन की साड़ी पहनी थी, तो किसी के हाथों में केवल कांच की हरी और लाल चूड़ियाँ थीं। पर उनके चेहरों पर जो तेज, अपनापन और संतोष था, वह किसी भी हीरे-जवाहरात से कहीं अधिक दमक रहा था। वे सब मिलकर पारंपरिक लोकगीत गा रही थीं, एक-दूसरे की हथेली पर खूबसूरत मांडने सजा रही थीं और हंसी-मजाक का दौर चल रहा था। सुहासिनी ने भी भारी मन से अपने दोनों हाथों पर मेंहदी रचवा ली। बातचीत और माहौल की गर्माहट में कुछ देर के लिए उसका तनाव कम हुआ, और धीरे-धीरे उसके मन में आलोक का ख्याल कौंधने लगा।

शाम घिर आई, पर आलोक नहीं लौटा। सुहासिनी ने सोचा कि शायद वह बाजार में कंगन खरीदने के चक्कर में देर कर रहा होगा। रात के आठ बजे, फिर नौ, और देखते ही देखते रात के ग्यारह बज गए। सुहासिनी ने आलोक के मोबाइल पर फोन मिलाया, मगर फोन लगातार ‘कवरेज क्षेत्र से बाहर’ बताता रहा। कॉलोनी के सभी पुरुष अपने-अपने काम से लौट आए थे और अपनी पत्नियों के लिए पूजा की थालियाँ, फूल और पूजा की सामग्री सजाने में मदद कर रहे थे। सुहासिनी के घर के सामने का खंभा पूरी रात चुपचाप जलता रहा, पर उस दरवाजे पर आलोक की परछाई तक न पड़ी। पूरी रात सुहासिनी ने करवटें बदलते हुए काटी। कभी उसे गुस्सा आता, तो कभी एक अज्ञात सा डर उसके सीने में फन उठाने लगता।

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही करवा चौथ का मुख्य दिन शुरू हो गया। सुहासिनी ने यह सोचकर निर्जला उपवास शुरू किया कि शाम को जब आलोक लौटेगा, तो वह उसे अपनी निष्ठा दिखाकर शर्मिंदा करेगी और अपना कंगन भी हासिल कर लेगी। सुबह से दोपहर हो गई, दोपहर से तीसरी पहर बीत गई। आलोक का न कोई फोन आया, न ही ऑफिस से कोई खबर। सुहासिनी ने घबराकर आलोक के एक सहकर्मी के घर फोन किया, तो पता चला कि आलोक कल दोपहर ही ऑफिस से फील्ड इंस्पेक्शन का कहकर निकला था और उसके बाद किसी को नहीं दिखा।

अब सुहासिनी के पैरों तले से जमीन खिसकने लगी। दिन ढलते ही पूरी कॉलोनी एक दुल्हन की तरह सज चुकी थी। छत पर शामियाना लग चुका था, जहाँ सभी औरतें लाल, सुनहरी और गुलाबी साड़ियों में सजी-धजी एकत्र हो रही थीं। ढोलक की थाप पर करवा चौथ के मंगल गीत गूंज रहे थे। सुहासिनी ने भी अलमारी से अपनी सबसे भारी बनारसी साड़ी निकाली, कानों में भारी झुमके डाले, मांग में सिंदूर भरा और कांपते हाथों से पूजा की थाली सजाई। लेकिन जब उसने आईने में अपना अक्स देखा, तो उसे अपने ही चेहरे पर एक भयानक खालीपन नजर आया।

वह छत पर पहुँची। वहाँ का दृश्य उसकी आत्मा को झकझोर देने वाला था। शर्मा जी अपनी धर्मपत्नी के थके हुए पैरों को दबाने का उपक्रम कर रहे थे, तो लोको पायलट माथुर साहब अपनी पत्नी को बड़े लाड़ से पंखा झल रहे थे। किसी के पास सोने का कंगन नहीं था; किसी ने चांदी की एक साधारण सी अंगूठी पहन रखी थी, तो किसी ने अपनी शादी की पुरानी नथ संभाल रखी थी। पर उन दंपतियों की आँखों में एक-दूसरे के प्रति जो अगाध समर्पण, श्रद्धा और निष्कपट प्रेम बह रहा था, वह देखकर सुहासिनी की अंतरात्मा चीख उठी।

उसे अपने शब्द याद आने लगे—”इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है… इस फकीरी का तमाशा नहीं बनने दूँगी।”

सुहासिनी का मन ग्लानि के गहरे समंदर में डूब गया। उसने मन ही मन सोचा, “मैं कितनी अंधी, कितनी स्वार्थी और संवेदनहीन निकली। जिस इंसान ने मेरी एक मुस्कान के लिए अपनी हर ख्वाहिश कुर्बान कर दी, जिसने अपनी माँ की बीमारी में भी कभी मुझे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी, मैंने उसी सीधे, सच्चे इंसान को चंद तोले सोने के टुकड़े के लिए बेघर कर दिया? यदि आज आलोक को कुछ हो गया, यदि वह कभी वापस नहीं आया, तो मैं इन भारी कपड़ों, इन बेजान पत्थरों और इस झूठे दिखावे का क्या करूँगी? एक सुहागन का असली गहना तो उसके पति की सांसें हैं, उसका आदर है, उसकी सलामती है।”

चांद निकलने का समय हो चुका था। बादलों की ओट से जब दूधिया रोशनी फूटने लगी, तो सभी स्त्रियाँ छलनी लेकर अपने-अपने पतियों के सामने खड़ी होने लगीं। मंत्रोच्चार होने लगा, अर्घ्य दिया जाने लगा। लेकिन सुहासिनी अकेली, छत के एक कोने में दीवार का सहारा लिए, छलनी हाथ में पकड़े फफक-फफक कर रो रही थी। उसका गला भूख और प्यास से सूख चुका था, पर उससे कहीं अधिक उसका हृदय पश्चाताप की भट्टी में जल रहा था।

“हे ईश्वर! मेरी नादानी की सजा मेरे पति को मत देना। मुझे मेरा कंगन नहीं चाहिए, मुझे कोई सोना-चांदी नहीं चाहिए। बस मेरे आलोक को सही-सलामत मेरी चौखट पर लौटा दो। आज मुझे समझ आया है कि पति का प्यार ही एक स्त्री का सबसे बड़ा मुकुट होता है।”

अचानक दुर्बलता, दिन भर के निर्जला उपवास और मानसिक आघात के कारण सुहासिनी का सिर चकराया और वह थाली समेत जमीन पर मूर्छित होकर गिर पड़ी। छत पर अफरा-तफरी मच गई। सरला चाची और अन्य औरतें उसकी तरफ दौड़ीं।

कुछ ही पलों बाद जब सुहासिनी ने धीरे-धीरे अपनी भारी पलकें खोलीं, तो उसने पाया कि उसका सिर किसी की गोदी में रखा था। उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे पड़ रहे थे। जब नजरें साफ हुईं, तो सामने आलोक का चेहरा था—धूल-धूसरित, आँखों के नीचे जागरण के काले घेरे, बिखरे हुए बाल और होठों पर वही चिर-परिचित बेपनाह फिक्र।

सुहासिनी को होश में आते देख आलोक की आँखों से आंसू की बूंदें टपक कर सुहासिनी के गाल पर गिर पड़ीं। आलोक ने अपनी जेब से एक छोटी सी मखमली डिब्बी निकालते हुए रुंधे गले से कहा, “सुहासिनी, मुझे माफ कर देना। मुझे आने में देर हो गई। कल दोपहर से ही शहर के तीन बड़े कारखानों में एक्स्ट्रा शिफ्ट की डबल ड्यूटी कर रहा था, अपने प्रोविडेंट फंड से कुछ पैसे निकालने के लिए दौड़ा-भागा… पर मैं केवल यह सोने का पानी चढ़ा हुआ चांदी का कंगन ही जुटा पाया। असली सोने का कंगन नहीं ला सका। मुझे माफ कर देना, पर प्लीज मुझसे नाराज मत होना।”

यह सुनते ही सुहासिनी का कलेजा फट पड़ा। वह उठकर बैठ गई और उसने दोनों हाथों से आलोक के पैरों को पकड़ लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी, “नहीं आलोक, नहीं! मुझे कोई कंगन नहीं चाहिए। मुझे माफ कर दीजिए। मैं लालच और अहंकार में अंधी हो गई थी। मुझे समझ नहीं आया कि इस दुनिया का सबसे कीमती कोहिनूर तो मेरे सामने खड़ा है। आपकी यह निष्ठा, आपका यह त्याग और आपका यह प्रेम ही मेरा सबसे बड़ा आभूषण है। अगर आप मेरे साथ हैं, तो मेरे हाथों की ये कांच की चूड़ियाँ भी सोने से ज्यादा अनमोल हैं।”

आलोक ने तुरंत सुहासिनी को सहारा देकर उठाया और अपने सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में सारे शिकवे, सारी कड़वाहट और सारा खोखलापन धुल गया। सुहासिनी ने छलनी उठाई, पहले बादलों के बीच चमकते पूनम के चांद को देखा और फिर उसी छलनी की छांव में अपने जीवन के सबसे बड़े सत्य—अपने पति आलोक के मुखड़े को निहारा। आलोक ने अपनी कांपती उंगलियों से सुहासिनी को पानी का घूंट पिलाकर उसका व्रत पूर्ण कराया और फिर बड़े प्यार से उसके हाथों में वह कंगन पहना दिया। सुहासिनी ने अपनी सजल आँखों से पति के चरण स्पर्श किए।

उस करवा चौथ ने केवल एक व्रत को पूरा नहीं किया था, बल्कि एक बिखरते हुए घर में समझदारी, त्याग, सम्मान और असीम प्रेम की नई नींव रख दी थी। दिखावे की झूठी चमक हार चुकी थी और सच्चे समर्पण की विजय हुई थी।

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