अवनि छत के एक कोने में अपनी पूजा की थाली लिए जड़वत खड़ी थी। उसकी छलनी हाथ में थी, पर उसकी आँखें पूरी तरह बंद थीं। पलकों की कोर से गर्म आँसू ढुलक कर उसके गालों पर सज चुके सिंदूर को भिगो रहे थे। वह उस आसमानी चाँद को कैसे देखती? उसका अपना चाँद, उसका विक्रम, न जाने किस हाल में था, कहाँ था, सुरक्षित भी था या नहीं। जब जीवन का आधार ही अंधकार में खोया हो, तो आसमान की रोशनी भी आँखों में चुभने लगती है।
जयपुर के पुराने परकोटे वाले इलाके में स्थित एक हवेलीनुमा घर की मुंडेर पर शाम की ठंडी हवाएं आहिस्ता-आहिस्ता दस्तक दे रही थीं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी आने में अब केवल अड़तालीस घंटे बाकी थे। बाज़ारों में सुहागिनों की चहल-पहल, खनकती चूड़ियों की आवाज़ और मेंहदी की भीनी खुशबू से पूरी फिज़ा महक रही थी। लेकिन उस घर के एक कोने में बैठी अवनि का मन किसी अनजाने डर और अंतहीन सन्नाटे से घिरा हुआ था।
अवनि के विवाह को अभी महज़ अठारह महीने ही बीते थे। उसके पति, कैप्टन विक्रम सिंह, भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट में तैनात थे और उनकी मौजूदा पोस्टिंग कश्मीर के अत्यंत दुर्गम, बर्फीले अग्रिम मोर्चे पर थी। अवनि की गोद में इस समय उनका चार महीने का नन्हा बेटा, आरव, शांत सोया हुआ था। आरव की मासूम आँखें और नैन-नक्श बिल्कुल अपने पिता पर गए थे। अवनि बार-बार अपने मोबाइल स्क्रीन को देखती, जहाँ ‘नो सर्विस’ या ‘स्विच ऑफ’ का वही बेजान संदेश चमक उठता था, जिसने पिछले तीन दिनों से उसकी रातों की नींद छीन रखी थी।
“अवनि! अरे ओ अवनि, ज़रा इधर तो आ!” दरवाज़े की चौखट से उसकी बचपन की सहेली और चचेरी देवरानी, राधिका ने हँसते हुए प्रवेश किया। राधिका के हाथों में मेंहदी के नए-नए डिज़ाइन की तस्वीरें थीं। “परसों करवा चौथ है और तू अभी तक सुस्त बैठी है? इस बार तो भैया भी छुट्टी आने वाले थे न? क्या तय किया फिर, लाल वाली बनारसी साड़ी पहनेगी या वो जो भैया ने श्रीनगर से कश्मीरी कढ़ाई वाला सूट भेजा था?”
राधिका की बातों ने अवनि के सीने में छिपे दर्द को कुरेद दिया। उसने अपनी कंपकंपाती पलकों को झुका लिया ताकि आँखों में तैर आया आँसुओं का सैलाब बाहर न छलक पड़े। अपने गले में अटके रुंधे स्वर को संभालते हुए उसने कहा, “राधिका, विक्रम से पिछले तीन दिनों से कोई संपर्क नहीं हो पाया है। मेरा दिल किसी भारी पत्थर की तरह डूबता जा रहा है। मैंने कल बेस कैंप के हेल्पलाइन नंबर पर भी फोन किया था, पर वहाँ से सिर्फ इतना ही कहा गया कि मौसम खराब है और कुछ तकनीकी कारणों से संपर्क टूटा हुआ है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”
राधिका का खिलखिलाता चेहरा एकदम से गंभीर हो गया। वह आगे बढ़कर अवनि के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, “अवनि, तू एक फौजी की जीवनसंगिनी है। तू जानती है न कि सरहद पर मौसम कब करवट बदल ले, कोई नहीं कह सकता। कई बार भारी बर्फबारी में सिग्नल हफ्तों गायब रहते हैं। तूने माँ जी को तो कुछ नहीं बताया न?”
“नहीं राधिका, माँ जी का दिल पहले से ही कमज़ोर है। पिछले साल बाबूजी के जाने के बाद विक्रम ही उनका इकलौता संबल हैं। अगर उन्हें ज़रा भी भनक लग गई कि विक्रम का फोन तीन दिन से बंद है और हेडक्वार्टर वाले भी टालमटोल जवाब दे रहे हैं, तो वो घबराकर बीमार पड़ जाएँगी। मैं उनके सामने मुस्कुराने का ढोंग कर रही हूँ, पर अंदर से मेरी आत्मा कांप रही है।” अवनि के सब्र का बाँध टूट गया और दो बूँद आँसू आरव के गाल पर गिर पड़े।
राधिका ने तुरंत अवनि को गले से लगा लिया और उसका हौसला बँधाते हुए कहा, “हिम्मत रख अवनि। करवा चौथ का यह पावन पर्व केवल सोलह श्रृंगार और उपवास का नाम नहीं है, यह एक स्त्री के उस अटूट विश्वास की परीक्षा है जो यमराज के द्वार से भी अपने सुहाग को लौटा लाने की शक्ति रखता है। तू माँ भगवती पर भरोसा रख। विक्रम भैया शेर हैं, वे तिरंगे की शान भी हैं और तेरी माँग का मान भी। वे ज़रूर लौटेंगे। चल, अब आरव को दूध पिला और मन में कोई बुरा विचार मत ला।”
अगले दिन करवा चौथ की पूर्व संध्या थी। अवनि की सास, कल्याणी देवी, पूजा की तैयारियाँ बड़े चाव से कर रही थीं। उन्होंने अवनि के लिए सुंदर सरगी सजाई थी, जिसमें सूखे मेवे, फल, पारंपरिक मठरी और नई चूड़ियाँ रखी थीं।
“बहू, ज़रा इधर बैठ,” कल्याणी देवी ने अवनि के सिर पर ममता से हाथ फेरते हुए कहा। “विक्रम का फोन आया था क्या रे? वो कह रहा था कि करवा चौथ की शाम तक सीधे घर पहुँचेगा। इस बार आरव के साथ उसका पहला करवा चौथ है, उसका मन तो यहीं अटका होगा। तूने पूछा कि वह किस ट्रेन या फ्लाइट से आ रहा है?”
अवनि की ज़बान जैसे तालू से चिपक गई। उसने नज़रें चुराते हुए, अपने होंठों पर एक झूठी मुस्कान ओढ़ी और बोली, “हाँ माँ जी… कल दोपहर में हल्की सी बात हुई थी। कह रहे थे कि सफ़र लंबा है, नेटवर्क मिले न मिले, पर वे समय से पहुँचने की पूरी कोशिश करेंगे। आप चिंता मत कीजिए, वे आ जाएँगे।”
झूठ बोलकर अवनि कमरे से बाहर निकल आई। उसका कलेजा फटा जा रहा था। भगवान के सामने जलते अखंड दीपक के आगे बैठकर उसने हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। ‘हे ईश्वर, मेरे सुहाग की रक्षा करना। मुझे कोई आभूषण नहीं चाहिए, कोई नया परिधान नहीं चाहिए, मुझे सिर्फ मेरा सिंदूर सलामत चाहिए,’ यही एक प्रार्थना उसके मन में गूँज रही थी।
करवा चौथ का दिन आ पहुँचा। सुबह सूर्योदय से पहले अवनि ने कल्याणी देवी के आशीर्वाद के साथ सरगी ग्रहण की। सारा दिन उसने निर्जला उपवास रखा। न अन्न का एक दाना मुँह में डाला, न जल की एक बूँद। दिन का एक-एक पल सदियों जैसा लंबा लग रहा था। घड़ी की सुइयाँ मानो थम सी गई थीं। मोहल्ले की अन्य औरतें सज-धज कर गीत गा रही थीं, ढोलक की थाप पर पारंपरिक करवा चौथ के गीत गूँज रहे थे, लेकिन अवनि के कानों में केवल सरहद पर चलने वाली गोलियों की काल्पनिक गूँज और सन्नाटा तैर रहा था।
शाम ढलते ही कल्याणी देवी ने आवाज़ लगाई, “अवनि, अरे लाली, अब तैयार भी हो जा। देख, आसमान में लाली बिखरने लगी है। विक्रम कभी भी दरवाज़ा खटखटा सकता है। एक फौजी की पत्नी को हमेशा सज-धज कर अपने वीर का स्वागत करना चाहिए।”
अवनि ने भारी मन से वही लाल कश्मीरी सूट निकाला जिसे विक्रम ने बहुत प्यार से भेजा था। उसने कांपते हाथों से माँग में सिंदूर भरा, कलाई में लाल चूड़ियाँ पहनीं और आँखों में काजल लगाया, जो बार-बार आंसुओं से धुल जाने को आतुर था। दर्पण में अपना अक्स देखते हुए उसने सोचा—’क्या मेरा यह श्रृंगार आज अपने गंतव्य को पा सकेगा? क्या मेरा चाँद उस आसमानी चाँद से पहले मेरे आँगन में उतरेगा?’
रात के आठ बज चुके थे। हवेली की खुली छत पर सभी सुहागिनें अपनी-अपनी पूजा की थालियाँ, छलनी और लोटे में जल भरकर एकत्र होने लगी थीं। कल्याणी देवी नन्हे आरव को गोद में खिला रही थीं और बार-बार सीढ़ियों की तरफ देख रही थीं। “अवनि, विक्रम का कुछ पता चला? अब तो चाँद निकलने का समय भी हो गया। इतनी देर तो कभी नहीं करता था वो।”
“माँ जी, शायद रास्ते में जाम लगा होगा। बस आते ही होंगे,” अवनि ने अपने कांपते गले से किसी तरह शब्द बाहर निकाले।
तभी छत पर मौजूद महिलाओं में से किसी ने ज़ोर से कहा, “अरे देखो-देखो, पूरब की दिशा में चाँद निकल आया! करवा चौथ का चाँद निकल आया!”
चारों तरफ शंख और घंटियों की मधुर ध्वनियाँ गूँज उठीं। औरतें छलनी की ओट से पहले चाँद को अर्घ्य देने लगीं, फिर छलनी में दीया रखकर अपने पतियों के चेहरे का दीदार करने लगीं। उनके चेहरों पर तृप्ति और अनुराग की आभा खिली हुई थी।
अवनि छत के एक कोने में अपनी पूजा की थाली लिए जड़वत खड़ी थी। उसकी छलनी हाथ में थी, पर उसकी आँखें पूरी तरह बंद थीं। पलकों की कोर से गर्म आँसू ढुलक कर उसके गालों पर सज चुके सिंदूर को भिगो रहे थे। वह उस आसमानी चाँद को कैसे देखती? उसका अपना चाँद, उसका विक्रम, न जाने किस हाल में था, कहाँ था, सुरक्षित भी था या नहीं। जब जीवन का आधार ही अंधकार में खोया हो, तो आसमान की रोशनी भी आँखों में चुभने लगती है।
“अवनि… क्या मुझे छलनी से देखे बिना ही अपना व्रत तोड़ लेगी?”
भीड़ के शोर के बीच से अचानक एक जानी-पहचानी, गंभीर और अपनत्व से भरी मर्दाना आवाज़ अवनि के कानों में पड़ी।
अवनि का शरीर सिहर उठा। उसे लगा कि शायद यह उसके व्याकुल मन का कोई भ्रम है। उसने सहमी हुई अवस्था में धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं और सामने देखा। उसके सामने, थके हुए चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान लिए, सेना की वर्दी में कैप्टन विक्रम सिंह खड़े थे।
“विक्रम!” अवनि के मुँह से केवल इतना ही निकला और थाली हाथ से छूटते-छूटते बची। विक्रम ने तुरंत आगे बढ़कर थाली को थामा और अवनि के कांपते हाथों को सहारा दिया।
“पागल, आँखें बंद करके रो रही थी? अपने फौजी पर इतना भी भरोसा नहीं था कि वह अपने वादे का पक्का है?” विक्रम ने अवनि की आँखों के आँसू अपने अँगूठे से पोंछते हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा।
“आप सच में आ गए… आप ठीक हैं ना?” अवनि फफक पड़ी।
“पहले अपने इस चाँद को देख, चाँद को अर्घ्य दे और अपना व्रत पूरा कर। बाकी सारी बातें बाद में,” विक्रम ने स्नेह से डांटते हुए कहा।
अवनि ने कांपते हाथों से छलनी उठाई। पहले आकाश के शीतल चाँद को देखा, उसे जल अर्पित किया, और फिर उसी छलनी के घेरे में अपने सुहाग, अपने विक्रम के चेहरे को निहारा। उस क्षण अवनि को ऐसा लगा जैसे संसार का सारा वैभव, सारी खुशियाँ और सारा सुकून उस छलनी के भीतर सिमट आया हो। विक्रम ने अपने हाथों से लोटे का जल अवनि के होंठों से लगाया और एक मीठा टुकड़ा खिलाकर उसका चौबीस घंटे का निर्जला व्रत पूरा करवाया।
कल्याणी देवी ने जब अपने बेटे को देखा, तो उनकी आँखों में भी ममता के आँसू छलक आए। “अरे विक्रम! तू आ गया मेरे बच्चे! कितनी देर कर दी।” विक्रम ने झुककर माँ के चरण स्पर्श किए और फिर अपनी बाहों में नन्हे आरव को उठा लिया, जो अपने पिता की वर्दी के पीतल के बटनों को देखकर किलकारियाँ मारने लगा था।
जब छत पर पूजा संपन्न हुई और सब लोग नीचे बैठक में आए, तब अवनि की नज़र कमरे की तेज़ रोशनी में विक्रम पर पड़ी। उसने देखा कि विक्रम की वर्दी दाहिने कंधे और बांह के पास से फटी हुई थी, उसकी कलाई पर गहरा घाव था जिस पर सेना की प्राथमिक पट्टी बँधी थी और चेहरे पर चोटों के नीले निशान उभरे हुए थे।
अवनि का कलेजा काँप गया। वह दौड़कर उसके पास पहुँसी और उसकी बांह को छूते हुए घबराकर बोली, “विक्रम, ये सब क्या है? ये चोटें… ये खून के धब्बे? आपको क्या हुआ था? आप तीन दिन से कहाँ थे? मुझे सच-सच बताइए, मेरा दिल बैठा जा रहा है!”
विक्रम ने अवनि के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और उसे तसल्ली देते हुए सोफे पर बिठाया। “शांत हो जाओ अवनि, सब ठीक है। अब मैं बिल्कुल सुरक्षित अपनी ज़मीन और अपने परिवार के बीच हूँ। सुनो, तीन दिन पहले हमारी फॉरवर्ड पोस्ट के पास भारी बर्फबारी के बीच सीमा पार से कुछ हथियारबंद घुसपैठियों ने भारतीय सीमा में दाखिल होने की नापाक कोशिश की थी। हमें तुरंत गश्त और तलाशी अभियान का आदेश मिला।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। कल्याणी देवी और राधिका भी सांस रोके सुनने लगीं।
विक्रम ने आगे बताया, “जंगलों और पथरीली खाइयों में हमारी उनसे सीधी मुठभेड़ हुई। गोलीबारी के दौरान उनका एक कमांडर हमारी सीमा के काफी अंदर भागने लगा। मैं और मेरी टीम के दो जवान उसका पीछा करते हुए एक बीहड़ नाले में जा पहुँचे। अचानक हुए आईईडी के छोटे धमाके और भूस्खलन के कारण हमारा रास्ता कट गया और मेरा वायरलेस सेट तथा सैटेलाइट फोन मलबे में दबकर पूरी तरह नष्ट हो गए। हम तीन दिनों तक बिना किसी संचार संपर्क के उस बर्फीली घाटी में डटे रहे।”
“हे भगवान!” कल्याणी देवी ने छाती पर हाथ रख लिया।
“माँ, डरने की कोई बात नहीं थी। आपके बेटे की रगों में एक हिंदुस्तानी सिपाही का खून दौड़ रहा है। हमने न केवल उन सभी घुसपैठियों को मार गिराया, बल्कि उनके नापाक मंसूबों को भी पूरी तरह खाक में मिला दिया। कल रात बैकअप टीम हम तक पहुँच गई। रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होते ही कमांडिंग ऑफिसर ने मुझे तुरंत अस्पताल में रुकने को कहा, पर मुझे याद था कि आज करवा चौथ है। मुझे पता था कि अगर मैं आज रात इस घर की दहलीज़ पर कदम नहीं रखूँगा, तो मेरी अवनि बिना पानी की एक बूँद पिए अपने प्राण संकट में डाल लेगी। इसलिए मैंने सिर्फ बेसिक ड्रेसिंग करवाई और बेस से सीधे जीप पकड़कर तुम्हारे पास चला आया।”
विक्रम की आँखों में अपनी पत्नी के प्रति गहरा आदर और प्रेम छलक रहा था। उसने अवनि से कहा, “मुझे माफ़ कर देना अवनि, मैं तुम्हें समय पर खबर नहीं दे सका और तुम्हें इतने भयानक मानसिक तनाव से गुज़रना पड़ा।”
अवनि ने तुरंत अपनी उँगली विक्रम के होंठों पर रख दी। उसकी आँखों में अब डर के नहीं, बल्कि गर्व और कृतज्ञता के आँसू थे। उसने रुंधे गले से कहा, “कैसी माफ़ी मांग रहे हैं आप? एक फौजी की पत्नी होने का गर्व आज मुझे समझ आया है। आपने देश की रक्षा भी की और अपने सिंदूर के मान की भी। मेरे लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा कि मेरा पति सरहद पर भारत माँ की ढाल है और इस घर की छत भी। आपकी सलामती ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है।”
उस रात हवेली के आँगन में चाँद की शीतल चाँदनी बिखरी हुई थी। उस चाँदनी में एक सैनिक के अदम्य साहस और एक भारतीय नारी के अडिग विश्वास का एक ऐसा संगम दिखाई दे रहा था, जो हर आँधी और तूफ़ान से टकराने का हौसला रखता था। प्रेम, समर्पण और विश्वास की डोर जब इतनी पक्की हो, तो मौत भी ज़िंदगी के रास्ते से पीछे हट जाया करती है।
दोस्तों, करवा चौथ केवल एक परंपरा या रीति-रिवाज नहीं है, बल्कि यह उस निस्वार्थ प्रेम, अटूट विश्वास और मानसिक शक्ति का प्रतीक है जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी एक सुहागिन को संबल प्रदान करती है। हमारे देश के उन वीर जवानों के लिए और उनके परिवारों के लिए, जो हर पल सरहद पर अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर हमारे त्योहारों को सुरक्षित बनाते हैं, आपके दिल में क्या भावनाएँ हैं? अपनी राय हमें ज़रूर बताएं।
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