जड़ों की पुकार

दीनानाथ जी की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। आकाश और विकास ने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छुए। आकाश ने रुंधे हुए गले से कहा, “हमें माफ कर दीजिए बाबूजी। हम भूल गए थे कि पेड़ चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, अगर उसकी जड़ें कट जाएं, तो वह हरा-भरा नहीं रह सकता। हमारी जड़ें आप हैं, यह परिवार है।” विकास ने सुमित्रा जी के आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ, अब इस घर में कभी कोई दीवार नहीं बनेगी। हमने अपनी दौलत से दीवार तो बना ली थी, लेकिन उस दीवार ने हमारी खुशियां ही छीन ली थीं।”

शहर के बीचों-बीच बसा वह पुराना लेकिन शानदार पुश्तैनी मकान, जिसे सब ‘आशीर्वाद भवन’ कहते थे, अब एक अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए था। इस घर की नींव दीनानाथ जी और उनकी पत्नी सुमित्रा ने अपनी खून-पसीने की कमाई और असीमित प्रेम से रखी थी। उनके दो बेटे थे, बड़े का नाम था आकाश और छोटे का विकास। दोनों बेटे अपनी-अपनी जिंदगी में बेहद कामयाब थे। आकाश एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था, जबकि विकास का अपना एक फलता-फूलता कंस्ट्रक्शन का बिजनेस था। घर में दो बहुएं भी आ चुकी थीं, रश्मि और कविता। बाहर से देखने पर यह परिवार किसी भी आम इंसान के लिए एक आदर्श परिवार था—पैसा, रुतबा, बड़ा घर, सब कुछ तो था। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे रिश्तों की डोर धीरे-धीरे घिस रही थी।

वक्त के साथ-साथ आकाश और विकास की व्यस्तता बढ़ती गई। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों भाइयों के बीच हफ्तों तक ठीक से बात नहीं हो पाती थी। बहुओं के बीच भी रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों पर असहमतियां जन्म लेने लगी थीं। कभी किचन के काम को लेकर, कभी बच्चों की परवरिश के तरीकों को लेकर, तो कभी एक-दूसरे के लाइफस्टाइल को लेकर। घर का वह बड़ा सा आंगन, जहाँ कभी दोनों भाई क्रिकेट खेलते थे और दीनानाथ जी आराम कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ते हुए मुस्कुराते थे, अब एक खामोश रणभूमि बन चुका था। सुमित्रा जी रसोई से आती हुई बर्तनों की खटपट और बहुओं की दबी-दबी तानों की आवाजें सुनतीं तो उनका दिल बैठ जाता। दीनानाथ जी सब कुछ देखते, समझते, लेकिन यह सोचकर चुप रह जाते कि शायद बदलते वक्त के साथ परिवारों का यही हश्र होता है।

एक दिन बात इतनी बढ़ गई कि घर के बंटवारे का फैसला मेज पर आ गया। बात सिर्फ कमरों के बंटवारे की नहीं थी, बल्कि दिलों के बंटने की थी। आकाश का तर्क था कि चूंकि उसका रहन-सहन और काम करने का समय अलग है, इसलिए घर के बीचों-बीच एक दीवार खींच दी जाए ताकि दोनों परिवारों को अपनी-अपनी ‘प्राइवेसी’ मिल सके। विकास भी अपने अहंकार में आकर इस बात के लिए तुरंत राजी हो गया। उस रात आशीर्वाद भवन में किसी ने ठीक से खाना नहीं खाया। सुमित्रा जी रात भर अपने कमरे में सिसकती रहीं और दीनानाथ जी अपनी बूढ़ी आँखों से छत को घूरते रहे। उन्होंने इस घर को ईंट-गारे से नहीं, बल्कि अपने सपनों से बनाया था। आज उनके जीते जी उन सपनों पर हथौड़ा चलने वाला था।

अगले कुछ हफ्तों में घर के आंगन के बीचों-बीच एक पक्की दीवार खड़ी कर दी गई। घर दो हिस्सों में बंट गया। अब ना तो बच्चों का शोरगुल एक से दूसरे हिस्से में जाता था, ना ही त्योहारों पर वह पुरानी वाली रौनक रही। दीवार क्या खिंची, दोनों भाइयों के बीच की बची-खुची बातचीत भी खत्म हो गई। दीनानाथ जी और सुमित्रा जी ने बड़े भारी मन से विकास के हिस्से में रहना स्वीकार किया, लेकिन उनका आधा दिल उस दीवार के पार आकाश के हिस्से में ही धड़कता था। अब वे दिन भर चुपचाप बैठे रहते। ना सुमित्रा जी के हाथों में बुनाई की सलाई दिखती, ना ही दीनानाथ जी का अखबार पढ़ने में मन लगता। घर की शांति अब सुकून नहीं, बल्कि श्मशान जैसी चुभने वाली लगने लगी थी।

महीने बीतते गए और दूरियां अपनी जड़ें और गहरी करती गईं। एक दिन शहर में अचानक मौसम बेहद खराब हो गया। तेज बारिश और तूफानी हवाओं ने पूरे शहर की बिजली गुल कर दी। इसी तूफानी रात में दीनानाथ जी को अचानक सीने में भयानक दर्द उठा। दर्द इतना तेज था कि वे बिस्तर से नीचे गिर पड़े। सुमित्रा जी की चीख सुनकर विकास और कविता दौड़े आए। दीनानाथ जी की हालत बहुत खराब थी, वे पसीने से लथपथ थे और उनकी सांसें उखड़ रही थीं। विकास ने घबराकर एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन तूफान के कारण शहर की सारी सड़कें जलमग्न थीं और एंबुलेंस का पहुंचना नामुमकिन था।

विकास को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसकी गाड़ी का टायर भी सुबह ही पंक्चर हो गया था जिसे वह बनवाना भूल गया था। सुमित्रा जी रो-रोकर बेहाल थीं। तभी कविता ने बिना कुछ सोचे-समझे दीवार के उस पार वाले दरवाजे को जोर-जोर से पीटना शुरू कर दिया। “भैया! भाभी! दरवाजा खोलिए, बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है!” उसकी आवाज में जो खौफ और बेबसी थी, उसने आकाश को गहरी नींद से जगा दिया। आकाश और रश्मि तुरंत भागकर आए। जब आकाश ने अपने पिता को उस हालत में देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। पिछले कई महीनों की सारी कड़वाहट, सारा अहंकार, सारी प्राइवेसी की बातें एक पल में उस दर्दनाक दृश्य के सामने धुंधली पड़ गईं।

“हमें बाबूजी को तुरंत अस्पताल ले जाना होगा,” आकाश ने विकास की तरफ देखते हुए कहा। दोनों भाइयों की आँखों में एक-दूसरे के लिए वही पुराना वाला डर और भरोसा था। आकाश ने अपनी गाड़ी निकाली। विकास ने अपने पिता को गोद में उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाया। सुमित्रा जी भी साथ बैठीं। तूफानी रात, जलमग्न सड़कें और घुप अंधेरे के बीच आकाश ने किसी तरह गाड़ी को अस्पताल तक पहुँचाया।

डॉक्टरों ने तुरंत दीनानाथ जी को आईसीयू में शिफ्ट किया। बाहर दोनों भाई, दीवार खींचने के बाद पहली बार, एक-दूसरे के साथ बेंच पर बैठे थे। दोनों के कपड़े भीगे हुए थे, लेकिन किसी को अपनी फिक्र नहीं थी। डॉक्टर ने बाहर आकर बताया कि दीनानाथ जी को सीवियर हार्ट अटैक आया है और उन्हें तुरंत बी-नेगेटिव ब्लड की जरूरत है, जो कि बहुत दुर्लभ है और अस्पताल के ब्लड बैंक में उपलब्ध नहीं है।

आकाश का ब्लड ग्रुप बी-नेगेटिव था। उसने तुरंत डॉक्टर से कहा, “मेरा ब्लड ग्रुप वही है, आप मेरा खून ले लीजिए, बस मेरे बाबूजी को बचा लीजिए।” खून देने के बाद जब आकाश कमजोरी महसूस करते हुए बाहर आया, तो विकास ने उसे सहारा दिया और पानी पिलाया। विकास की आँखों से आंसू बह रहे थे। “भैया, अगर आज आप नहीं होते, तो मैं शायद बाबूजी को खो देता। मैं कितना अंधा हो गया था अपने घमंड में।” आकाश ने अपने छोटे भाई को गले लगा लिया और कहा, “गलती सिर्फ तेरी नहीं थी मेरे भाई, मैं भी तो बड़ा होकर अपनी जिम्मेदारियां भूल गया था। दीवार ईंटों की नहीं, हमारी सोच की थी।”

उधर घर पर रश्मि और कविता भी एक साथ बैठी थीं। तूफानी रात में डर से कांपते बच्चों को दोनों ने मिलकर एक ही बिस्तर पर सुलाया था। रश्मि ने कविता के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “हम कितनी बेवकूफ थीं ना कविता? इस बड़े से घर को हमने अपनी छोटी सी सोच से कितना छोटा कर दिया था। आज अगर कुछ हो जाता, तो क्या हमारी यह ‘प्राइवेसी’ काम आती?” कविता भी रो पड़ी और दोनों ने एक-दूसरे से अपनी सारी गलतियों की माफी मांगी।

कुछ घंटों बाद डॉक्टर ने आईसीयू से बाहर आकर बताया कि दीनानाथ जी की जान अब खतरे से बाहर है। सही वक्त पर खून मिलने और परिवार के सही समय पर अस्पताल पहुंचने की वजह से उनकी जान बच गई थी। यह खबर सुनते ही दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को फिर से गले लगा लिया। सुमित्रा जी ने हाथ जोड़कर ईश्वर का धन्यवाद किया।

एक हफ्ते बाद जब दीनानाथ जी को अस्पताल से छुट्टी मिली और वे घर पहुंचे, तो उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिस पर उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। घर के आंगन के बीचों-बीच खड़ी वह मनहूस दीवार गायब थी। दोनों भाइयों ने मजदूरों को बुलाकर बाबूजी के आने से पहले ही उस दीवार को गिरवा दिया था। पूरा घर साफ-सुथरा था। रश्मि और कविता मिलकर बाबूजी की आरती उतारने के लिए दरवाजे पर खड़ी थीं। बच्चे पूरे आंगन में बेधड़क दौड़ रहे थे, बिना किसी बंदिश के।

दीनानाथ जी की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। आकाश और विकास ने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छुए। आकाश ने रुंधे हुए गले से कहा, “हमें माफ कर दीजिए बाबूजी। हम भूल गए थे कि पेड़ चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, अगर उसकी जड़ें कट जाएं, तो वह हरा-भरा नहीं रह सकता। हमारी जड़ें आप हैं, यह परिवार है।” विकास ने सुमित्रा जी के आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ, अब इस घर में कभी कोई दीवार नहीं बनेगी। हमने अपनी दौलत से दीवार तो बना ली थी, लेकिन उस दीवार ने हमारी खुशियां ही छीन ली थीं।”

उस दिन के बाद आशीर्वाद भवन में फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई। रश्मि और कविता ने घर की जिम्मेदारियों को मिलकर बांट लिया। दोनों भाइयों ने समझ लिया कि जीवन में पैसा और सफलता जरूरी हैं, लेकिन परिवार के बिना उनका कोई मोल नहीं। जब आप गिरते हैं, तो कोई बैंक बैलेंस आपको उठाने नहीं आता, आपके अपने ही आपको सहारा देते हैं। दीनानाथ जी और सुमित्रा जी अब हर शाम उसी आंगन में बैठकर अपने पोते-पोतियों को खेलते हुए देखते। घर में गूंजती हंसी की आवाजें इस बात का सबूत थीं कि जब टूटे हुए मोती फिर से एक धागे में पिरो दिए जाते हैं, तो माला और भी ज्यादा खूबसूरत हो जाती है।

यह कहानी हमें सिखाती है कि आधुनिकता और सफलता की दौड़ में हमें अपने पारिवारिक मूल्यों को कभी पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। परिवार ही वह एकमात्र ऐसा पेड़ है जो जीवन की हर आंधी और तूफान में हमें अपनी छांव देता है। आपसी बातचीत, थोड़ा सा समझौता और ढेर सारा प्यार, किसी भी दरकते हुए रिश्ते को फिर से मजबूत बना सकता है।

क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा है जिससे किसी छोटी सी बात पर अनबन चल रही है? अगर हाँ, तो आज ही पहल करें और उस दूरी को मिटा दें, क्योंकि वक्त कभी लौटकर नहीं आता, सिर्फ यादें और पछतावा ही बाकी रह जाते हैं।

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