ऐसी भाभी सबको मिले – डॉ आभा माहेश्वरी

घर के आँगन में आज फिर वही चहल-पहल थी। माँ के चेहरे पर वर्षों बाद इतनी रौनक दिखाई दे रही थी। छोटे बेटे निखिल की शादी थी। रिश्तेदारों का आना-जाना लगा था और घर की सबसे बड़ी बहू इंद्रा सबकी जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठाए बिना थके इधर-उधर दौड़ रही थी।

इंद्रा इस घर में पंद्रह वर्ष पहले दुल्हन बनकर आई थी। पति अमित से दो वर्ष छोटी देवरानी-ननदों की तरह नहीं, बल्कि पूरे परिवार को अपना मानकर उसने घर संभाल लिया था। सास-ससुर, पति और एक छोटा देवर—यही उसका संसार था।

अमित की नौकरी साधारण थी। घर की आमदनी सीमित थी, लेकिन इंद्रा ने कभी किसी चीज की शिकायत नहीं की।

निखिल पढ़ाई में बहुत तेज था। इंद्रा ने उसके भीतर छिपी प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना था।

“निखिल, तुम खूब पढ़ो। तुम्हारी फीस की चिंता मत करना,” वह अक्सर कहती।

निखिल हँसकर कहता, “भाभी, आप मेरी माँ थोड़े ही हैं!”

इंद्रा मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रख देती।

“माँ नहीं हूँ, पर माँ जैसा प्यार तो कर सकती हूँ।”

समय बीतता गया। निखिल ने पढ़ाई पूरी की, नौकरी लग गई और फिर उसकी शादी रिया से तय हो गई।

शादी के बाद रिया जब पहली बार घर आई तो उसके मन में एक अनजाना भय था। उसे अपनी सहेलियों से ससुराल की अनेक कहानियाँ सुनने को मिली थीं—सास की रोक-टोक, ननद की शिकायतें और जेठानी की ईर्ष्या।

लेकिन इंद्रा ने उसके डर को पहले ही दिन पहचान लिया।

कमरे में जाते हुए उसने रिया का हाथ पकड़कर कहा, “डर क्यों रही हो?”

रिया ने सकुचाकर कहा, “बस… नया घर है न भाभी।”

सुमन हँसी।

“नया घर तुम्हारा है, मैं पुरानी हूँ। इसलिए तुम्हें मेरा साथ देना है, मेरी जगह नहीं लेनी।”

रिया की आँखें भर आईं।

कुछ महीनों तक सब ठीक चला। फिर एक दिन निखिल और रिया में किसी छोटी-सी बात को लेकर मनमुटाव हो गया। रिया मायके जाने की जिद करने लगी।

इंद्रा ने उसे रोकने के बजाय चुपचाप उसका सामान बाँधने में मदद की।

रिया हैरान होकर बोली, “भाभी, आप मुझे रोकेंगी नहीं?”

“रिश्ते रोकने से नहीं, समझने से बचते हैं,” इंद्रा ने शांत स्वर में कहा, “जाओ, मन शांत कर लो। लेकिन एक बात याद रखना—गुस्से में लिया फैसला अक्सर दिल को बाद में दुखाता है।”

रिया मायके चली गई।

उस रात निखिल बहुत परेशान था। वह बोला, “भाभी, रिया को आपने जाने क्यों दिया?”

भाभी ने कहा, “क्योंकि अगर मैं उसे रोकती तो उसे लगता कि यह घर उसकी बात नहीं समझता। कभी-कभी अपनेपन का अर्थ पकड़कर रखना नहीं, थोड़ा-सा स्थान देना होता है।”

तीन दिन बाद रिया वापस आ गई।

दरवाजे पर खड़ी होकर उसने सबसे पहले भाभी के पैर छुए।

“भाभी, मुझे माफ कर दीजिए।”

भाभी ने उसे गले लगा लिया।

“माफी कैसी? घर में रूठना भी तो अपनेपन की निशानी है।”

वक्त अपनी गति से चलता रहा।

एक दिन अचानक अमित की नौकरी चली गई। घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। निखिल ने तुरंत कहा, “भैया, आप चिंता मत कीजिए। मैं संभाल लूँगा।”

अमित ने संकोच से कहा, “बेटा, तुम्हारे अपने खर्चे हैं।”

तभी इंद्रा ने बीच में कहा, “घर में कमाने वाला एक नहीं, सबका हौसला होता है। हम मिलकर संभाल लेंगे।”

उसने अपनी वर्षों से बचाई हुई रकम निकालकर घर के खर्च में लगा दी।

रिया को यह देखकर पता चला कि भाभी ने अपनी कितनी इच्छाएँ दबाकर परिवार को सँभाला था।

कुछ दिनों बाद रिया ने भाभी से कहा, “भाभी, आपने कभी अपने लिए क्यों नहीं सोचा?”

भाभी मुस्कुराई।

“सोचा था। लेकिन मुझे खुशी तब मिलती है जब मेरे अपनों के चेहरे पर मुस्कान होती है।”

समय ने फिर करवट ली।

भाभी की तबीयत अचानक खराब रहने लगी। जाँच के बाद पता चला कि उसे आराम और इलाज की जरूरत है। घर में चिंता छा गई।

इस बार रिया ने सबकी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली।

सुबह की चाय से लेकर ससुर की दवा, माँजी के भोजन और घर के काम तक उसने सब सँभाल लिया।

एक दिन भाभी ने धीमे से कहा, “बहू, इतना काम मत करो।”

रिया ने उसका हाथ थाम लिया।

“भाभी, आपने मुझे बहू नहीं, बेटी समझकर इस घर में जगह दी थी। अब मेरी बारी है।”

भाभी की आँखों से आँसू बह निकले।

निखिल यह दृश्य देखकर भावुक हो गया। उसने रिया से कहा, “तुम्हें पता है, मेरी जिंदगी में भाभी का क्या स्थान है?”

रिया मुस्कुराई।

“हाँ, अब मैं समझ गई हूँ। कुछ रिश्ते खून से नहीं, त्याग से बनते हैं।”

कुछ समय बाद भाभी स्वस्थ होकर घर लौटी। आँगन में पूरा परिवार उसका इंतजार कर रहा था।

ससुर ने कहा, “बहू, तुमने इस घर को घर बनाया है।”

माँजी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटी, तू बहू बनकर आई थी, बेटी बनकर रह गई।”

रिया ने आगे बढ़कर भाभी को गले लगा लिया।

“भाभी, सच कहूँ तो मुझे अब एक ही प्रार्थना करनी है—हर घर को आपके जैसी भाभी मिले।”

सुमन की आँखें नम थीं।

उसने सबको देखा और कहा—

“घर बड़ा होने से परिवार बड़ा नहीं होता। दिल बड़ा होने से परिवार बड़ा होता है।”

आँगन में सन्नाटा था, लेकिन हर आँख में अपनापन था।

उस दिन निखिल को लगा कि उसने सिर्फ पत्नी नहीं पाई, बल्कि एक ऐसा परिवार पाया है जहाँ रिश्ते अधिकार से नहीं, प्रेम और विश्वास से निभाए जाते हैं।

और सचमुच, ऐसी भाभी सबको मिले—जो रिश्तों में दीवार नहीं, पुल बनकर आए; जो घर में अपना स्थान बनाने के बजाय सबके दिल में स्थान बना ले।

लेखिका:

डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ 

#ऐसी भाभी सबको मिले

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