दो घरों का आंगन

 अवंतिका की बंद आंखों के कोरों से आंसू बह निकले। उसे लगा जैसे उसकी अपनी मां उसके सिरहाने बैठी हो। वही स्पर्श, वही ममता, वही बेकरारी जो केवल एक मां के सीने में अपनी औलाद के दर्द को देखकर उठती है।

शाम को जब डॉक्टर आए और उन्होंने दवाइयां दीं, तब जाकर बुखार थोड़ा कम हुआ। समीर जब भागता हुआ घर पहुंचा, तो उसने देखा कि उसकी मां अवंतिका के पैर दबाते-दबाते वहीं कुर्सी पर सिर टिकाए सो गई थीं और अवंतिका चुपचाप जागकर नम आंखों से अपनी सास के चेहरे को निहार रही थी।

मनाली की बर्फीली हवाओं के बीच जब होटल की खिड़की से दूर-दूर तक सफेद चादर जैसी जमी बर्फ दिखाई दे रही थी, तब सोफे पर बैठी अवंतिका का पूरा ध्यान सिर्फ अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर टिका था। शादी को महज एक हफ्ता बीता था और उसका पति समीर उसके लिए गुनगुने पानी का गिलास लेकर आया था। अवंतिका को पिछले दो दिनों से सर्दी और हल्के बुखार ने जकड़ रखा था, लेकिन उसका चेहरा केवल एक ही समय खिलता था—जब उसके हाथ में फोन होता और स्क्रीन पर उसकी मां का नाम उभरता।

“समीर, मुझे मां से बहुत सारी बातें करनी हैं। शादी की थकान के बाद अब जाकर मुझे फुर्सत मिली है, वहां घर पर अभी भी कुछ मेहमान ठहरे होंगे, मां अकेली सारा काम संभाल रही होंगी,” अवंतिका ने तकिए का सहारा लेते हुए कहा।

समीर ने उसके माथे पर हाथ रखकर बुखार का जायजा लिया और मुस्कुराते हुए बोला, “अवंतिका, तुम पहले अपनी तबीयत का ख्याल रखो। बाकी बातें बाद में भी हो सकती हैं। मां को फोन लगाओ और कम से कम यह बता दो कि तुम अब पहले से बेहतर महसूस कर रही हो।”

“नहीं, बिल्कुल नहीं! प्लीज, उन्हें मेरी तबीयत के बारे में भनक भी मत लगने देना, वरना वे सब कुछ छोड़कर पहली फ्लाइट से यहीं चली आएंगी। मैं अपनी मां को बहुत अच्छी तरह जानती हूं, वे मेरे बिना एक पल भी चैन से नहीं रह पातीं,” अवंतिका की आंखों में अपनी मां के प्रति अगाध प्रेम और साथ ही एक ऐसा गर्व झलक रहा था, मानो दुनिया में केवल उसकी मां ही ममता का साक्षात रूप हों।

समीर ने देखा कि जैसे ही मां का जिक्र आया, अवंतिका अपनी सारी कमजोरी, सिरदर्द और बदन दर्द भूलकर चहकने लगी। वह अपनी सहेलियों की बातें, बचपन के किस्से और मायके की दिनचर्या में इतनी मग्न हो गई कि समीर को भी उसके चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने के लिए घंटों केवल उसके मायके की ही बातें करनी पड़ीं। लेकिन इस पूरे हफ्ते में समीर के दिल में एक हल्की सी टीस भी उभर रही थी। पूरे सात दिनों के सफर में अवंतिका ने एक बार भी समीर के माता-पिता, उसके छोटे भाई या ससुराल के रीति-रिवाजों के बारे में जानने की रत्ती भर कोशिश नहीं की थी। उसके लिए समीर के परिवार का अस्तित्व सिर्फ उस शादी के मंडप तक ही सीमित था, जहां रस्में पूरी होते ही सब कुछ खत्म मान लिया गया हो।

सफर के आखिरी दिन जब वे दोनों टैक्सी से हवाई अड्डे की ओर बढ़ रहे थे, तो अवंतिका ने अचानक खिड़की से बाहर देखते हुए बेहद रूखे स्वर में पूछा, “समीर, हमें भोपाल में कितने दिन रुकना पड़ेगा?”

समीर थोड़ा असहज हो गया। उसने हैरान होकर पूछा, “अवंतिका, तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो? शादी को अभी मुश्किल से नौ-दस दिन हुए हैं, जिसमें से हम घर पर केवल दो दिन ही रुक पाए थे। मां-बाबूजी ने हमारे आने की ढेरों तैयारियां कर रखी होंगी। कम से कम दो हफ्ते तो हमें वहां रहना ही चाहिए।”

“दो हफ्ते? बिल्कुल नहीं, दो हफ्ते तक उस घर में पारंपरिक बहू बनकर घूंघट और कायदों में बंधे रहना मेरे बस की बात नहीं है। मैं ऐसी बनावटी जिंदगी नहीं जी सकती जहां हर कदम पर मुझे परखा जाए,” अवंतिका ने बेरुखी से मुंह फेर लिया।

समीर ने बेहद धैर्य से उसका हाथ थामते हुए कहा, “तुम गलत सोच रही हो। मेरी मां कोई रूढ़िवादी सास नहीं हैं। वे तुम्हें बहू नहीं, अपनी बेटी मानकर घर ला रही हैं। तुम उनके साथ कुछ दिन रहकर तो देखो, वे सच में बहुत सरल और ममतामयी हैं।”

अवंतिका ने तंज कसते हुए अपनी भौंहें सिकोड़ीं, “शादी वाले दिन तुम्हारी छोटी बहन रिया जिस तरह अपनी मां के सामने सहमी हुई खड़ी थी, उसे देखकर मुझे अच्छी तरह समझ आ गया था कि तुम्हारी मां बेटियों को कैसे रखती हैं। मुझे किसी से बेटी बनने का झूठा दिलासा नहीं चाहिए।”

समीर का दिल अवंतिका की इस पूर्वग्रह से भरी सोच पर आहत हुआ, लेकिन उसने रिश्ते की नई शुरुआत में कोई कड़वाहट नहीं आने दी। उसने बात को संभालते हुए बीच का रास्ता निकाला, “ठीक है, हम भोपाल में सिर्फ तीन दिन रुकेंगे। उसके बाद हम सीधे दिल्ली तुम्हारे माता-पिता के घर चलेंगे। फिर जब तक तुम्हारा मन कहेगा, तुम वहीं रहना।” अवंतिका ने भारी मन से यह समझौता स्वीकार कर लिया, मानो वह ससुराल जाकर किसी पर बहुत बड़ा अहसान कर रही हो।

भोपाल पहुंचते ही घर का माहौल एकदम अलग था। समीर के घर का दरवाजा खुलते ही उसकी मां, जानकी देवी, एक बड़ी सी थाली में आरती का दीया सजाए खड़ी थीं। उनके चेहरे पर नई बहू के स्वागत की ऐसी चमक थी जैसे कोई अपनी वर्षों से बिछड़ी संतान को गले लगाने को बेताब हो। रिया ने खुशी-खुशी अपनी नई भाभी के पैर छुए और सामान अंदर रखवाया। घर का हर कोना फूलों से महक रहा था। जानकी देवी ने अवंतिका के हल्के पीले पड़े चेहरे को देखकर तुरंत भांप लिया कि सफर और बदलते मौसम ने उसकी सेहत बिगाड़ दी है।

उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के अवंतिका का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनके हाथ की गर्माहट में एक अजीब सा अपनापन था। “अरे बेटा, तुम्हारा चेहरा तो बिल्कुल उतरा हुआ है। समीर, तूने मुझे फोन पर क्यों नहीं बताया कि बहू की तबीयत ठीक नहीं है?” जानकी देवी ने समीर को हल्की सी डांट पिलाई और तुरंत अवंतिका को उसके कमरे में ले जाकर आराम करने के लिए कहा।

अगले दिन सुबह, अवंतिका जब सोकर उठी, तो उसके मन में वही पुरानी हिचक और रक्षात्मक रवैया बना हुआ था। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि चाहे कोई कितना भी अच्छा बनने का नाटक करे, वह इस पराए घर में ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं है। नाश्ते की मेज पर जब पूरा परिवार जुटा, तो सबने अवंतिका की पसंद की बनी चीजें उसके आगे रख दीं। लेकिन अवंतिका ने चाय का घूंट भरते ही समीर की तरफ देखा और मेज पर सबके सामने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, “मां जी, समीर और मैंने तय किया है कि हम कल सुबह की ट्रेन से दिल्ली निकल रहे हैं। वहां मम्मी-पापा मेरा इंतजार कर रहे हैं और मुझे वहां ज्यादा सहज महसूस होता है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर के पिता ने एक बार जानकी देवी की तरफ देखा और फिर खामोशी से अपनी चाय पीने लगे। रिया का चेहरा भी उतर गया। समीर ने शर्मिंदगी से नजरें झुका लीं, उसे उम्मीद नहीं थी कि अवंतिका इतनी जल्दी और इतने सीधे तरीके से सबका दिल तोड़ देगी। लेकिन जानकी देवी के चेहरे पर न तो कोई गुस्सा उभरा और न ही कोई नाराजगी। उन्होंने बहुत शांत भाव से मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, अगर तुम्हारा मन वहां जाने का है, तो बिल्कुल जाओ। मायके की याद आना बहुत स्वाभाविक है। शादी के बाद नई जगह पर मन रमने में वक्त लगता है। लेकिन आज का दिन तो तुम हमारे साथ हो, आज का दिन मुझे अपनी इस बेटी की सेवा करने दो।”

अवंतिका को लगा कि यह शायद सास का कोई नया पैंतरा है ताकि वह अपनी बात से पलट जाए। वह चुपचाप उठकर कमरे में चली गई और दिल्ली जाने की पैकिंग करने लगी। दोपहर ढलते-ढलते अवंतिका की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। मनाली की ठंड का असर अब जाकर गहरे बुखार में बदल चुका था। उसका शरीर तपने लगा, सिर में असहनीय दर्द होने लगा और ठंड के मारे उसके हाथ-पैर कांपने लगे।

समीर उस वक्त किसी जरूरी कागजी काम से बैंक गया हुआ था। अवंतिका बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी और चाहकर भी उठ नहीं पा रही थी। तभी कमरे का दरवाजा खुला और जानकी देवी अंदर आईं। अवंतिका को इस हालत में देखकर वे घबरा गईं। उन्होंने तुरंत डॉक्टर को फोन लगाया और खुद रसोई की तरफ दौड़ीं। कुछ ही पलों में वे गर्म पानी की थैलियां, तुलसी और अदरक का ताजा काढ़ा और गीली पट्टियां लेकर कमरे में लौट आईं।

अगले पांच घंटे अवंतिका के लिए एक धुंधले सपने की तरह थे, लेकिन उस सपने में जो स्पर्श था, वह पूरी तरह वास्तविक था। जानकी देवी एक पल के लिए भी उस कमरे से बाहर नहीं गईं। वे लगातार ठंडे पानी की पट्टियां अवंतिका के माथे पर रखती रहीं। जब अवंतिका ठंड से कांपती, तो वे उसके पैरों को अपने पल्लू से रगड़कर गर्म करतीं। बीच-बीच में वे चम्मच से उसे काढ़ा पिलातीं और उसके बिखरे बालों को सहलाते हुए धीरे से कहतीं, “घबरा मत मेरी बच्ची, सब ठीक हो जाएगा। मां बैठी है न तेरे पास।”

अवंतिका की बंद आंखों के कोरों से आंसू बह निकले। उसे लगा जैसे उसकी अपनी मां उसके सिरहाने बैठी हो। वही स्पर्श, वही ममता, वही बेकरारी जो केवल एक मां के सीने में अपनी औलाद के दर्द को देखकर उठती है।

शाम को जब डॉक्टर आए और उन्होंने दवाइयां दीं, तब जाकर बुखार थोड़ा कम हुआ। समीर जब भागता हुआ घर पहुंचा, तो उसने देखा कि उसकी मां अवंतिका के पैर दबाते-दबाते वहीं कुर्सी पर सिर टिकाए सो गई थीं और अवंतिका चुपचाप जागकर नम आंखों से अपनी सास के चेहरे को निहार रही थी।

समीर ने धीरे से अपनी मां के कंधे पर हाथ रखा, तो जानकी देवी तुरंत हड़बड़ा कर उठ बैठीं, “अरे समीर, तू आ गया? देख तो जरा, बहू का बुखार अब पहले से कम है या नहीं? डॉक्टर ने कहा है कि रात को हल्का दलिया देना है, मैं अभी बनाकर लाती हूं।”

अवंतिका से अब और नहीं रुका गया। उसने कांपते हाथों से जानकी देवी का पल्लू पकड़ लिया और फफक कर रो पड़ी। “मां जी… आप इतनी देर से भूखी-प्यासी मेरे सिरहाने बैठी रहीं? आपने अपनी तबीयत की भी परवाह नहीं की?”

जानकी देवी ने उसके आंसू पोंछते हुए अपने सीने से लगा लिया, “पगली, मां भी कभी अपनी बेटी की तीमारदारी करते हुए अपनी सुध रखती है क्या? तू पराए घर से अपना सब कुछ छोड़कर हमारे भरोसे आई है। अगर मैं ही तुझे अपनी गोद का सुकून न दे सकी, तो मेरा मां होना बेकार है। तू मुझे सास समझकर डरती रही, पर मैंने तो जिस दिन तेरी तस्वीर देखी थी, उसी दिन तुझे रिया की तरह अपनी दूसरी बेटी मान लिया था।”

अवंतिका के मन में जमी सारी दीवारें, सारे पूर्वाग्रह और सास-बहू के रिश्तों को लेकर बनी कड़वाहट उस एक आलिंगन में बह गई। उसे समझ आया कि रिया अपनी मां के सामने सहमी नहीं रहती थी, बल्कि वह अपनी मां का इतना आदर करती थी कि उनकी बात कभी नहीं काटती थी। अवंतिका ने जिसे बंदिश समझा था, वह तो इस घर का अनुशासन और निस्वार्थ प्रेम था।

अगली सुबह जब धूप आंगन में फैली, तो समीर अवंतिका के पास आया और बोला, “अवंतिका, टैक्सी बाहर खड़ी है और दिल्ली की ट्रेन का समय हो रहा है। अगर तुम्हारी तबीयत संभल गई हो तो चलें?”

अवंतिका उठी, उसने समीर का हाथ थामा और मुस्कुराते हुए ना में सिर हिला दिया। वह कमरे से बाहर आई, जहां जानकी देवी नाश्ता तैयार कर रही थीं। अवंतिका ने आगे बढ़कर जानकी देवी के चरण छुए और फिर उनका हाथ पकड़कर बोली, “मां, क्या मैं दो हफ्ते और यहां अपने इस घर में अपनी मां के पास रुक सकती हूं? दिल्ली तो मैं बाद में भी जा सकती हूं, लेकिन इस आंगन में जो ममता मुझे मिली है, पहले मुझे उस प्यार को जी भर के जीना है।”

जानकी देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने अपनी बहू को माथे से चूम लिया और पूरे घर में एक नई सुबह की खुशबू बिखर गई। वह घर अब अवंतिका के लिए ससुराल नहीं था, वह उसका अपना आशियाना बन चुका था जहाँ दो पीढ़ियों का फासला प्यार के धागे से हमेशा के लिए मिट गया था।

शादी के बाद नए घर को अपनाना किसी भी लड़की के लिए आसान नहीं होता, लेकिन जब सास में मां की ममता और बहू में बेटी का समर्पण जाग जाए, तो हर घर स्वर्ग बन सकता है। आपके विचार में एक नए रिश्ते को मजबूत बनाने में सबसे बड़ी भूमिका किसकी होनी चाहिए—सास के धैर्य की या बहू के खुलेपन की? अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

error: Content is protected !!