कौशल्या देवी ने बहुत ही गंभीर, मगर स्पष्ट और बुलंद आवाज में कहा, “कांति बहन, तुम हमारी समवयस्क हो, इसलिए तुम्हारी बात का मान रखते हुए बड़े प्यार से एक बात पूछना चाहती हूं। जब कोई बच्चा अपनी मां के गर्भ में नौ महीने पलता है, तो क्या उस मां का खून, उसकी हड्डियां और उसकी सांसें इस बात का फर्क करती हैं कि पेट में पलने वाला बेटा है या बेटी?”
कांति चाची सकपका गईं, “नहीं… वो तो…”
“तो फिर जब विधाता ने मां की कोख में कोई भेद नहीं रखा, ममता के अमृत में कोई अंतर नहीं किया, तो हम और आप इंसानों द्वारा बनाए गए इन खोखले बंधनों से उस ममता का बंटवारा करने वाले कौन होते हैं?” कौशल्या देवी की आवाज में एक अलौकिक दृढ़ता थी।
कार्तिक मास की गुलाबी ठंड ने हवेली की ऊंची दीवारों को अपनी आगोश में लेना शुरू कर दिया था। भोर की पहली किरण अभी पूरब के आसमान पर ठीक से फैली भी नहीं थी कि मालती रसोईघर में चाय की पतीली चढ़ाए खामोश खड़ी थी। चूल्हे से उठती नीली आंच पर उसका ध्यान कम और भीतर चल रहे विचारों के बवंडर पर ज्यादा था। कल अहोई का पावन दिन था, तारों को अर्घ्य देकर संतानों की लंबी उम्र और सलामती मांगने का पर्व। मालती का मन एक अजीब सी बेचैनी, झिझक और पुरानी टीस के बीच झूल रहा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी सास, जिन्हें पूरा घर और खानदान ‘बड़ी अम्मा’ कहकर बुलाता था, उनके सामने अपनी इच्छा कैसे रखे।
कौशल्या देवी का हवेली में ऐसा रुतबा था कि उनके एक इशारे पर परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। कड़क मिजाज, उसूलों की पक्की और पुरानी रवायतों को ढोने वाली समझी जाने वाली कौशल्या देवी के कदमों की आहट पाते ही मालती हड़बड़ा गई।
“अरी बहू! चाय की पत्ती उबल-उबल कर काली पड़ गई, तेरा ध्यान किस दुनिया में भटक रहा है?” कौशल्या देवी ने अपने कंधे पर पशमीने की शॉल ठीक करते हुए रसोई में कदम रखा। उनकी भारी और गंभीर आवाज ने सन्नाटे को तोड़ दिया।
मालती ने घबराकर गैस की आंच धीमी की और आंचल संभालते हुए नजरें झुका लीं, “कुछ नहीं माजी… बस यूं ही। लीजिए, आपकी अदरक वाली चाय।”
कौशल्या देवी ने चाय की गर्म प्याली हाथ में ली और एक घूंट भरकर मालती के चेहरे को बहुत बारीकी से देखा। एक मंझी हुई गृहिणी की पारखी नजरों से बहू के चेहरे पर छाई असमंजस की लकीरें छिप न सकीं। वे तनिक सहज होकर बोलीं, “मुंह से कुछ फूटेगी भी या दिन भर ऐसे ही सहमी-सहमी सी चूल्हे के इर्द-गिर्द चक्कर काटेगी? क्या बात है? मायके से कोई खबर आई है या मन कहीं और उलझा है?”
मालती ने अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में भींच लिया। कलेजे में धड़कनें तेज हो गईं। उसने बहुत हिम्मत बटोरकर, धीरे से कहा, “माजी… कल अहोई का व्रत है। ननद जी, रागिनी दीदी, तो हर साल अपने दोनों बेटों के लिए निर्जला रखती ही हैं। मैं… मैं सोच रही थी कि क्या इस बार…”
उसकी आवाज वहीं अटक गई। शब्द जैसे गले में ही सूख गए।
कौशल्या देवी ने अपनी भौहें थोड़ी सिकोड़ीं, “क्या इस बार? पूरी बात बोल, पहेलियां मत बुझा।”
“माजी, क्या मैं भी कल का व्रत रख सकती हूं?” मालती ने डरते-डरते अपनी आंखें ऊपर उठाईं, यह सोचकर कि शायद अभी डांट पड़ेगी या कोई कठोर ताना सुनने को मिलेगा।
कौशल्या देवी के चेहरे पर आई गंभीरता एक पल के लिए खिंची, फिर उनके होंठों के कोनों पर एक हल्की, तृप्त मुस्कान उभर आई। उन्होंने चाय की प्याली स्लैब पर रखी और सहज भाव से बोलीं, “अरी पगली! इसमें मुझसे इजाजत मांगने और इतना थर-थर कांपने की क्या बात है? रागिनी मेरी बेटी है, वो अपने बच्चों के लिए रखेगी। तू इस घर की कुलवधू है, तेरी गोद में भी तो भगवान का दिया एक फूल खिला है। तू नहीं रखेगी तो कौन रखेगा? पूरी तैयारी कर, शाम को कथा की चौकी भी सजेगी और तू भी अपनी बेटी के लिए तारों को करवे से जल देगी।”
माजी की यह बात सुनकर मालती की आंखें सजल हो उठीं। उसने झुककर सास के पैर छुए, लेकिन उसका मन वर्तमान की उस रसोई से फिसलकर तीन साल पीछे, अपने मायके के आंगन में जा पहुंचा।
मायके का वह मंजर आज भी मालती के सीने पर किसी जलते अंगारे की तरह रखा हुआ था। तब उसकी शादी को ज्यादा वक्त नहीं हुआ था और वह अहोई के पर्व पर अपने मायके आई हुई थी। मालती की बड़ी भाभी, विनीता, जिनका ब्याह हुए चार बरस बीत चुके थे और जिनकी गोद में दो प्यारी-प्यारी नन्ही बेटियां, गुड़िया और चिंकी चहकती थीं, वह भी उस दिन बड़ी श्रद्धा से लाल चुनरी ओढ़कर आई थीं।
विनीता भाभी ने मालती की मां, यानी अपनी सास से बड़े दबे स्वर में कहा था, “मां जी, पंडित जी कह रहे थे कि शाम को चार बजे से पूजा का मुहूर्त है। मैंने सारा सामान मंगा लिया है, मैं भी आज का निर्जला व्रत रख रही हूं।”
उस वक्त मालती की मां के चेहरे पर जो तल्खी आई थी, वह मालती आज तक नहीं भूल पाई थी। मां ने हाथ में ली हुई पूजा की थाली को एक झटके से पीढ़े पर पटका था। उनकी त्योरियां चढ़ गई थीं और आंखें लाल हो उठी थीं।
“तू व्रत रखेगी? किस मुंह से व्रत रखेगी विनीता?” मां की तीखी आवाज ने पूरे दालान को दहला दिया था। “तुझे इतना भी ज्ञान नहीं कि अहोई माता का व्रत कुल के दीपक के लिए, वंश को आगे बढ़ाने वाले बेटों के लिए रखा जाता है! तेरे आंगन में तो दो-दो पराया धन किलकारियां मार रहा है। बेटियों के लिए कभी किसी ने निर्जला उपवास रखे हैं भला? शास्त्र और समाज की मर्यादाएं भूल गई क्या?”
विनीता भाभी का चेहरा फक पड़ गया था। उनकी दोनों मासूम बच्चियां अपनी मां का पल्लू पकड़कर सहमी खड़ी थीं। भाभी ने रोते हुए हाथ जोड़े थे, “मां जी, मेरी कोख से जन्मी हैं तो क्या हुआ? संतान तो मेरी ही हैं ना। मां का कलेजा तो बेटी के लिए भी उतना ही धड़कता है जितना किसी बेटे के लिए। भगवान ने मुझे ये दो अनमोल रतन दिए हैं, मैं इनकी लंबी उम्र की दुआ क्यों न मांगूं?”
तब मालती की मां ने एक क्रूर और उपहास भरी हंसी हंसते हुए कहा था, “चल, ज्यादा ममता का ढोंग मत रच। रखना है तो रख ले, भूखी-प्यासी मरना तेरी मर्जी है। पर यह समझ ले कि यह व्रत इसलिए रख ताकि अहोई माता तुझ पर तरस खाएं और अगले बरस तेरे बांझ भाग्य को बदलकर कोई कुलदीपक, कोई बेटा तेरी झोली में डाल दें। वरना इन दो लड़कियों के ब्याह के बाद इस घर का नामलेवा भी कोई नहीं बचेगा।”
विनीता भाभी बिना कुछ कहे, आंसुओं का घूंट पीकर अपने कमरे में चली गई थीं और दिन भर तकिए में मुंह दबाकर रोती रही थीं। उस दिन मालती के मन में यह खौफ बैठ गया था कि समाज में एक स्त्री की ममता का मूल्य सिर्फ इस बात से तय होता है कि उसकी कोख से लड़का जन्मा है या लड़की। क्या बेटियां इतनी अभागिन होती हैं कि उनकी लंबी उम्र और रक्षा के लिए एक मां अपनी भूख-प्यास तक समर्पित नहीं कर सकती?
यही डर मालती के दिल में आज भी पैठा हुआ था। छह महीने पहले ही उसने एक बेहद खूबसूरत, चांद सी नन्हीं परी को जन्म दिया था, जिसका नाम उन्होंने ‘अवनि’ रखा था। जब अवनि पैदा हुई थी, तो मालती के मायके वालों के चेहरे उतर गए थे। फोन पर बधाइयों की जगह सांत्वना दी जा रही थी—”कोई बात नहीं, पहली बेटी हुई है, अगली बार बेटा हो जाएगा।” मालती को लगा था कि ससुराल में भी उसे वही सब झेलना पड़ेगा। उसे डर था कि अगर उसने अहोई का व्रत रखने की बात कही, तो कहीं सास यह न कह दें कि यह व्रत केवल लड़कों के लिए होता है, और उसकी नन्हीं अवनि के अस्तित्व को फिर किसी पुरानी रूढ़ि की भेंट चढ़ा दिया जाए।
लेकिन कौशल्या देवी के शब्दों ने उसके सीने पर रखे उस भारी पत्थर को एक झटके में हटा दिया था।
शाम ढलते ही हवेली का आंगन जगमगा उठा। आंगन के बीचों-बीच गेरू से अहोई माता का सुंदर चित्र उकेरा गया। उनके साथ स्याऊ माता और उनके बच्चों की आकृतियां बनाई गईं। दीपकों की कतार ने पूरे माहौल को एक पावन गरिमा से भर दिया। रागिनी दीदी अपने दोनों बेटों को नए कुर्ते-पाजामे पहनाकर पूजा के स्थान पर आ बैठी थीं।
मालती भी अपनी लाल बनारसी साड़ी पहनकर, मांग में सिंदूर सजाए, अवनि को गोद में लिए पूजा स्थल की ओर बढ़ी। लेकिन तभी पड़ोस से पूजा में शामिल होने आई दो-तीन बुजुर्ग औरतें आपस में फुसफुसाने लगीं।
उनमें से एक, कांति चाची, जो अपनी पुरानी और संकीर्ण सोच के लिए पूरे मोहल्ले में जानी जाती थीं, अपनी नजरें तिरछी करके बोलीं, “अरे कौशल्या बहन! यह हम क्या देख रहे हैं? तुम्हारी नई बहू मालती भी पूजा की थाली सजाए बैठ रही है क्या? अरे, इसके तो अभी छह महीने पहले ही पहली औलाद हुई है, और वो भी लड़की! अहोई का कठिन निर्जला व्रत तो कुल के वारिस, बेटों के सिर पर साया बनाए रखने के लिए होता है। इसे क्यों भूखा मार रही हो? अभी से बेटियों के लिए यह सब करने लगेंगी तो कुल की रीत का क्या होगा?”
दूसरी औरत ने भी सुर में सुर मिलाया, “हां जी, हमारे यहां तो जब तक पोते का मुंह न देख लें, बहुओं को यह व्रत उठाने नहीं दिया जाता। कहीं ऐसा न हो कि अहोई माता नाराज हो जाएं। रीति-रिवाज तो सदियों से चले आ रहे हैं, उन्हें ऐसे कैसे बदला जा सकता है?”
उन औरतों की इन बातों को सुनकर मालती के कदम वहीं ठिठक गए। उसके हाथ की पूजा की थाली कांपने लगी। उसकी आंखों में मायके का वही पुराना खौफ फिर से तैर गया। उसे लगा कि अब माजी भी समाज के इस दबाव के आगे झुक जाएंगी और उसे वहां से उठ जाने को कहेंगी। उसकी छाती में एक हूक सी उठी और उसने अवनि को अपनी छाती से और कसकर चिपटा लिया। मासूम बच्ची अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों से अपनी मां का चेहरा देख रही थी, इस बात से पूरी तरह अनजान कि इस समाज ने उसके जन्म से पहले ही उसके लिए सीमाएं तय कर रखी थीं।
तभी कौशल्या देवी अपनी जगह से उठीं। उनके चेहरे पर वही तेज था जो हवेली की नींव की तरह अडिग दिखता था। वे धीरे-धीरे चलकर कांति चाची के सामने आकर खड़ी हो गईं। पूरा आंगन शांत हो गया। रागिनी भी सहमकर चुप हो गई।
कौशल्या देवी ने बहुत ही गंभीर, मगर स्पष्ट और बुलंद आवाज में कहा, “कांति बहन, तुम हमारी समवयस्क हो, इसलिए तुम्हारी बात का मान रखते हुए बड़े प्यार से एक बात पूछना चाहती हूं। जब कोई बच्चा अपनी मां के गर्भ में नौ महीने पलता है, तो क्या उस मां का खून, उसकी हड्डियां और उसकी सांसें इस बात का फर्क करती हैं कि पेट में पलने वाला बेटा है या बेटी?”
कांति चाची सकपका गईं, “नहीं… वो तो…”
“तो फिर जब विधाता ने मां की कोख में कोई भेद नहीं रखा, ममता के अमृत में कोई अंतर नहीं किया, तो हम और आप इंसानों द्वारा बनाए गए इन खोखले बंधनों से उस ममता का बंटवारा करने वाले कौन होते हैं?” कौशल्या देवी की आवाज में एक अलौकिक दृढ़ता थी।
वे आगे बढ़ीं और उन्होंने मालती के कंधे पर अपना हाथ रखा। मालती ने सिहरकर अपनी सास को देखा।
कौशल्या देवी आंगन में बैठे सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहने लगीं, “संतान केवल कुल का नाम चलाने वाला कोई कागजी वारिस नहीं होती, संतान मां-बाप के जिगर का टुकड़ा होती है। क्या बेटी को बुखार आता है तो मां को दर्द नहीं होता? क्या बेटी की सांसों की हिफाजत के लिए मां की प्रार्थना में उतनी ताकत नहीं होती? यह अहोई माता का व्रत किसी एक लिंग की रक्षा का ठेका नहीं है, यह तो संतान की लंबी उम्र, उसके स्वास्थ्य और उसकी समृद्धि की कामना का पर्व है। और मेरी नजर में, संतान तो संतान होती है—चाहे वह बेटा हो या बेटी।”
कौशल्या देवी ने झुककर मालती की गोद से नन्हीं अवनि को अपने हाथों में ले लिया। उन्होंने बच्ची के माथे को चूमा और मुस्कुराकर बोलीं, “और रही बात कुल के चिराग की, तो मेरी यह पोती ही हमारे कुल का सबसे बड़ा उजाला है। यह पढ़ेगी, लिखेगी, अपने पैरों पर खड़ी होगी और इस हवेली का नाम उस मुकाम तक ले जाएगी जहां आज तक कोई बेटा भी नहीं ले जा पाया। अगर ईश्वर ने मुझे इतनी समझ दी है, तो मैं अपने जीते-जी अपनी बहू के मातृत्व का अपमान कभी नहीं होने दूंगी।”
सास के एक-एक शब्द मालती के अंतर्मन में अमृत बनकर घुल रहे थे। बरसों से जो घुटन, जो अपमान उसने अपने मायके में विनीता भाभी की आंखों में देखा था, आज वह सारा मलाल कौशल्या देवी के इन क्रांतिकारी विचारों ने धो दिया था।
कांति चाची और अन्य महिलाओं के पास कहने को कोई शब्द नहीं बचा था। उनके सिर शर्म और सम्मान के मिले-जुले भाव से झुक गए थे। कांति चाची ने अपनी गलती स्वीकारते हुए कहा, “कौशल्या… आज तूने मेरी भी आंखें खोल दीं। हम सचमुच पीढ़ियों पुरानी संकीर्णता की जंजीरों में जकड़े हुए थे। तेरी जैसी सास और ऐसी सोच हर घर में होनी चाहिए।”
कौशल्या देवी ने मालती की ओर देखा, उसकी आंखों से बहते आंसुओं को अपने पल्लू से पोंछा और बड़े स्नेह से कहा, “चल पगली, रोना बंद कर। शुभ मुहूर्त निकल रहा है। अपनी बच्ची को अपने पास बिठा और अहोई माता की कथा शुरू कर। आज का यह उपवास तेरी बेटी के उज्ज्वल भविष्य की नींव बनेगा।”
मालती ने भरे मन से सास के चरण छुए। इस बार उसके पैरों को छूते हुए उसके दिल में केवल सास के प्रति औपचारिकता नहीं, बल्कि एक मां से भी बढ़कर अगाध श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव था।
शाम की लालिमा पूरी तरह मिट चुकी थी और गहरे नीले गगन में टिमटिमाते तारे उभर आए थे। मालती ने अपनी नन्हीं अवनि को गोद में लेकर आकाश के तारों को देखा। उसने छलनी से तारों को निहारा और चांदी के लोटे से अर्घ्य दिया। हर एक बूंद जो जमीन पर गिर रही थी, वह समाज की पुरानी रूढ़ियों को तोड़ती हुई, एक नए, समतावादी और संवेदनशील भविष्य का निर्माण कर रही थी।
कौशल्या देवी ने आगे बढ़कर अपनी बहू के मुंह में पानी का घूंट डाला और उसे मीठा हलवा खिलाकर उसका निर्जला व्रत पूरा कराया। पूरे आंगन में अहोई माता के भजनों की मधुर ध्वनि गूंज रही थी। मालती ने महसूस किया कि घर सिर्फ ईंट-पत्थरों से नहीं बनता, बल्कि घर तब स्वर्ग बनता है जब वहां की औरतें दूसरी औरत के दुख, उसकी ममता और उसकी अस्मिता को समझकर उसके साथ ढाल बनकर खड़ी हो जाती हैं। उस रात हवेली की चौखट ने सचमुच एक नए युग में प्रवेश किया था, जहां बेटियों की सलामती भी उतनी ही पावन थी, जितनी बेटों की।
क्या आपको भी लगता है कि आज के आधुनिक दौर में भी हमारे त्योहारों और धार्मिक मान्यताओं को बेटे-बेटी के भेदभाव से पूरी तरह मुक्त करने की आवश्यकता है? कौशल्या देवी जैसी सासों के बारे में आपकी क्या राय है, जो पुरानी कुरीतियों को तोड़कर अपनी बहुओं और पोतियों के स्वाभिमान के लिए ढाल बनकर खड़ी होती हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।