देवकी जी के झुर्रीदार गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली। रुंधे हुए गले से उन्होंने बताया कि आकाश दुबई में एक नई बहुराष्ट्रीय कंपनी शुरू करना चाहता है और इसके लिए उसे करोड़ों रुपयों की सख्त जरूरत है। आकाश ने उन्हें फोन करके एक तरह का अल्टीमेटम दे दिया था कि ‘आनंदमयी’ जैसे बड़े और प्राइम लोकेशन वाले घर को बेचकर उसे पैसे भेजे जाएं। आकाश की योजना थी कि घर बिकने के बाद वह अपनी माँ को शहर के किसी छोटे और सस्ते फ्लैट में शिफ्ट करवा देगा या फिर किसी अच्छे ‘ओल्ड एज होम’ (वृद्धाश्रम) में उनका दाखिला करवा देगा।
श्रीमती देवकी नारायण के लिए लखनऊ के गोमती नगर स्थित उनका पुश्तैनी मकान ‘आनंदमयी’ केवल एक निवास स्थान नहीं था; यह उनकी पूरी दुनिया, उनका तीर्थ और उनके अस्तित्व का इकलौता प्रमाण था। सत्तर बसंत पार कर चुकीं देवकी जी एक प्रसिद्ध और सम्मानित कॉलेज से हिंदी साहित्य की प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। उनके पति, स्वर्गीय डॉ. विश्वनाथ, अपने समय के जाने-माने लेखक और समाज सुधारक थे। उन दोनों ने मिलकर अपने जीवन की सारी जमा-पूंजी इस घर को बनाने और सँवारने में लगा दी थी। ‘आनंदमयी’ के विशाल प्रांगण में आज भी विश्वनाथ जी की लगाई हुई पारिजात और चमेली की महक तैरती थी। घर के भीतर एक बहुत बड़ा पुस्तकालय था, जहाँ विश्वनाथ जी ने दुनिया भर की अनमोल किताबें सहेज कर रखी थीं। देवकी जी की सुबह उसी पुस्तकालय में किताबों पर से धूल हटाने और अपने पति की आरामकुर्सी के पास बैठकर पुरानी यादों को ताजा करने से शुरू होती थी। उनके जीवन की ज़रूरतें बेहद सीमित थीं—सुबह की अदरक वाली चाय, दो वक्त का सादा भोजन, और शाम को बरामदे में बैठकर ढलते सूरज को देखना।
उनका इकलौता बेटा, आकाश, जो बचपन में इसी आँगन में दौड़-दौड़ कर बड़ा हुआ था, अब दुबई में एक बहुत बड़ा इन्वेस्टमेंट बैंकर बन चुका था। उसकी दुनिया अब पाउंड और दिरहम में मापी जाती थी। आकाश की पत्नी, श्रुति, एक आधुनिक विचारों वाली महिला थी, जिसे भारत की धूल और पुराने मकानों की सीलन से हमेशा शिकायत रहती थी। देवकी जी भले ही शरीर से थोड़ी कमजोर हो गई थीं, लेकिन उनकी आत्मा की ताकत उनके आस-पास रहने वाले लोगों से जुड़ी थी। घर के कामों में मदद के लिए एक पुरानी सहायिका, कांता बाई थीं, जो साये की तरह उनके साथ रहती थीं।
देवकी जी का अधिकांश समय अपनी स्मृतियों के पन्नों को पलटने में बीतता था। जब भी उन्हें अकेलेपन का अहसास घेरने लगता, तो पड़ोस में रहने वाला एक युवा, समीर, उनके पास चला आता। समीर एक स्थानीय अखबार में पत्रकारिता करता था और साहित्य में उसकी गहरी रुचि थी। वह अक्सर देवकी जी के पुस्तकालय में किताबें पढ़ने आता और घंटों उनके साथ विश्वनाथ जी की रचनाओं पर चर्चा करता। समीर उनके लिए किसी बेटे से कम नहीं था। वह अक्सर उनके लिए बाजार से फल और दवाइयां ले आता और उनके पैरों के पास बैठकर कहता, “अम्मा, आप इस बड़े से घर में खुद को अकेला मत समझा कीजिए। विश्वनाथ बाबू जी की ये किताबें और मैं—हम सब तो आपके ही हैं। और फिर, इस मोहल्ले की जो रौनक आपके होने से है, वह और कहीं कहाँ?” समीर की इन बातों से देवकी जी का मुरझाया हुआ चेहरा खिल उठता। वे उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहतीं, “तू सच कहता है रे समीर। ये जो खून के रिश्ते होते हैं ना, ये तो दूरियों के साथ अक्सर धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन जो रिश्ते मन से जुड़ते हैं, उनकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। आकाश तो अब विदेशी हवाओं का आदी हो गया है, पर तुम जैसे बच्चों ने मुझे कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि मेरा अपना अंश मुझसे दूर है।”
लेकिन, समय की नदी हमेशा एक सी शांति से नहीं बहती। पिछले कुछ हफ्तों से ‘आनंदमयी’ के वातावरण में एक अजीब सी उदासी और खामोशी पसर गई थी। देवकी जी अब बरामदे में नहीं बैठती थीं। उनका ज्यादातर समय बंद कमरे के भीतर, अपनी सूनी आँखों से छत को निहारते हुए बीतने लगा था। उन्होंने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया था और उनकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे। पारिजात के फूल अब बिना किसी के ध्यान दिए आंगन में गिरकर सूख जाते थे। समीर से उनका यह बदलाव सहन नहीं हुआ। वह एक शाम उनके कमरे में गया और उनके घुटनों के पास बैठकर उनके हाथ अपने हाथों में ले लिए। बहुत कुरेदने और मनुहार करने के बाद, देवकी जी के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया। उनके झुर्रीदार गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली।
रुंधे हुए गले से उन्होंने बताया कि आकाश दुबई में एक नई बहुराष्ट्रीय कंपनी शुरू करना चाहता है और इसके लिए उसे करोड़ों रुपयों की सख्त जरूरत है। आकाश ने उन्हें फोन करके एक तरह का अल्टीमेटम दे दिया था कि ‘आनंदमयी’ जैसे बड़े और प्राइम लोकेशन वाले घर को बेचकर उसे पैसे भेजे जाएं। आकाश की योजना थी कि घर बिकने के बाद वह अपनी माँ को शहर के किसी छोटे और सस्ते फ्लैट में शिफ्ट करवा देगा या फिर किसी अच्छे ‘ओल्ड एज होम’ (वृद्धाश्रम) में उनका दाखिला करवा देगा। श्रुति ने भी फोन पर साफ कह दिया था कि इतने बड़े घर की देखभाल करना अब देवकी जी के बस की बात नहीं है, इसलिए इसे बेच देना ही सबसे व्यावहारिक और समझदारी भरा कदम है। देवकी जी के लिए यह प्रस्ताव किसी मृत्युदंड से कम नहीं था। यह घर उनके लिए केवल ईंट, सीमेंट और लकड़ियों का ढांचा नहीं था; यह उनके और विश्वनाथ जी के प्रेम का पवित्र मंदिर था। इस घर के कोने-कोने में, हर एक दीवार में, विश्वनाथ जी की आवाज और उनकी हंसी रची-बसी थी। वे अपनी उन पवित्र स्मृतियों की नीलामी कैसे होने देतीं? उनके लिए ‘आनंदमयी’ से अलग होने का मतलब था अपने अस्तित्व को ही मिटा देना।
समीर यह सब सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे आकाश की संवेदनहीनता और स्वार्थ पर गहरा क्रोध आया, लेकिन उसने अपनी भावनाओं को काबू में रखा। उसने सोचा कि क्रोध और विवाद से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि देवकी जी का स्वास्थ्य और गिर जाएगा। उसे एक सकारात्मक और ठोस रास्ता निकालना था जिससे यह घर भी बच जाए और देवकी जी को भी जीवन का एक नया उद्देश्य मिल सके। समीर ने अगले दिन मोहल्ले के कुछ जागरूक युवाओं, कॉलेज के छात्रों और रिटायर्ड शिक्षकों की एक बैठक बुलाई। उसने सबको देवकी जी की समस्या बताई। सभी ने तय किया कि ‘आनंदमयी’ को किसी भी कीमत पर वीरान नहीं होने दिया जाएगा।
समीर ने देवकी जी के पास जाकर एक प्रस्ताव रखा। उसने कहा, “अम्मा, विश्वनाथ बाबू जी ने जीवन भर शिक्षा और साहित्य की लौ जलाई है। हम इस घर के इस विशाल पुस्तकालय और बड़े से प्रांगण को गरीब और जरूरतमंद बच्चों के लिए एक ‘निःशुल्क विद्यापीठ’ में क्यों नहीं बदल देते? आप उन्हें साहित्य पढ़ाएंगी, और हम सब बाकी विषय। इससे इस घर में फिर से जीवन आ जाएगा और कोई इसे बेजान संपत्ति कहने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।” पहले तो देवकी जी झिझकीं, लेकिन समीर के विश्वास और उत्साह ने उनमें एक नई ऊर्जा भर दी। देखते ही देखते मोहल्ले के लोगों ने मिलकर उस घर की सफाई की, कुर्सियां लगाईं और आस-पास की मलिन बस्तियों के उन बच्चों को वहां ले आए जो ट्यूशन का खर्च नहीं उठा सकते थे। कुछ ही दिनों में ‘आनंदमयी’ का वह शांत और उदास आंगन दर्जनों बच्चों की खिलखिलाहट, कविताओं के सस्वर पाठ और पढ़ाई की गूंज से आबाद हो गया। देवकी जी का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया। वे सुबह उठकर बच्चों के लिए खुद नाश्ता बनातीं और फिर उन्हें विश्वनाथ जी की किताबें पढ़ातीं। उनका चेहरा अब एक अलौकिक तेज और शांति से दमकने लगा था।
करीब छह महीने बीत गए। आकाश ने घर के सौदे के लिए एक बिल्डर से बात पक्की कर ली थी और कागजातों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए वह अचानक भारत आ पहुंचा। जब उसकी गाड़ी ‘आनंदमयी’ के दरवाजे पर रुकी, तो वह यह सोचकर आया था कि उसे एक वीरान, उदास और धूल खाती हुई हवेली मिलेगी, जिसमें एक बेबस और बीमार बुढ़िया उसका इंतजार कर रही होगी। लेकिन जैसे ही उसने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला, उसके कदम वहीं ठिठक गए।
जिस घर को वह एक मृत संपत्ति और एक बड़ा बोझ समझ रहा था, वह आज ज्ञान और जीवन का एक जीवंत मंदिर बन चुका था। आंगन में दर्जनों बच्चे गोल घेरे में बैठे थे। बीच में उसकी माँ, देवकी जी, एक कुर्सी पर बैठी थीं। उनके चेहरे पर वह चमक और मुस्कान थी, जो आकाश ने अपने पिता के निधन के बाद से कभी नहीं देखी थी। बच्चे एक सुर में किसी कविता का पाठ कर रहे थे और पूरे घर में एक सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी। तभी समीर आगे आया और उसने आकाश के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “आकाश भाई, एक मकान को घर उसकी दीवारें नहीं, बल्कि उसमें रहने वालों की आत्मा बनाती है। अम्मा को आपके पैसों या किसी आलीशान फ्लैट की नहीं, बल्कि अपनेपन और जीवन के इस उद्देश्य की जरूरत है। यह केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं है, यह विश्वनाथ बाबू जी की विरासत है।”
अपनी माँ की उस निश्छल मुस्कान, बच्चों के निस्वार्थ प्रेम और उस घर में गूंजती हुई पवित्र ध्वनि को देखकर आकाश के भीतर का वह कठोर, महत्वाकांक्षी व्यापारी टूट गया। उसे अपनी स्वार्थपरता, अपनी असंवेदनशीलता और अपने भौतिकवादी नजरिए पर गहरी आत्मग्लानि हुई। उसे याद आया कि कैसे इसी आंगन में उसके पिता ने उसे चलना और पढ़ना सिखाया था। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। उसने आगे बढ़कर उन बच्चों के बीच से रास्ता बनाया, अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा और रोते हुए उनके चरण स्पर्श किए। “मुझे माफ कर दीजिए माँ,” उसने रुंधे गले से कहा, “मैं रुपयों की चकाचौंध में यह भूल ही गया था कि मेरे जीवन की असली दौलत तो यहाँ, इस आंगन में बसती है।”
आकाश ने उसी वक्त बिल्डर को फोन करके सौदा रद्द कर दिया। उसने फैसला किया कि वह अपने नए बिजनेस के लिए बैंकों से और निवेशकों से लोन लेगा, मेहनत करेगा, लेकिन अपनी माँ की यादों और उनके इस नए परिवार के आंगन को कभी नहीं बिकने देगा। उसने यह भी वादा किया कि वह हर महीने इस निःशुल्क विद्यापीठ के लिए अपनी तरफ से आर्थिक मदद भेजेगा ताकि और भी बच्चे यहाँ पढ़ सकें। ‘आनंदमयी’ में एक बार फिर से पुरानी खुशियाँ और एक नया जीवन लौट आया था।
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दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के दौर में अपनी महत्वाकांक्षाओं और कॅरियर की उड़ान के लिए माता-पिता की भावनाओं, उनके घर और उनकी यादों को दांव पर लगाना सही है? क्या भौतिक सुख-सुविधाएं कभी उस सुकून की जगह ले सकती हैं जो अपनों के साथ से मिलता है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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लेखिका : नंदिता महाजन