बद्रीप्रसाद जी की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। उन्होंने थरथराते हुए हाथ उठाकर देवाशीष के कंधे पर रख दिए और रोते हुए बोले, “बेटा, मैंने दौलत के नशे में अंधा होकर हीरे को कंकड़ समझ लिया था। मैंने हमेशा इंसानियत को पैसों से तौला, लेकिन आज मेरे पास न वह दौलत बची है और न वह झूठा घमंड। मेरे अपने बेटे ने मुझे बेसहारा छोड़ दिया, और तुम… तुम जिसे मैंने ज़लील किया था, आज मेरे आगे सिर झुकाए खड़े हो। मुझे माफ़ कर दो बेटा, मुझे माफ़ कर दो।”
हमारे कस्बे की सबसे चौड़ी सड़क के मोड़ पर एक विशाल हवेलीनुमा मकान था, जिसे पूरा शहर ‘दीवान निवास’ के नाम से जानता था। उसके मालिक थे सेठ बद्रीप्रसाद। बद्रीप्रसाद जी गल्ला मंडी और सीमेंट के बहुत बड़े कारोबारी थे। उनके ऊपर धन-वैभव की मानों साक्षात वर्षा होती थी। उनकी ऊँची चहारदीवारी के भीतर फैला मखमली हरा लॉन, पोर्च में हमेशा चमकती रहने वाली दो विदेशी गाड़ियाँ और मुख्य द्वार पर पीतल के तमगे वाली वर्दी पहने खड़ा दरबान—ये सब मिलकर एक ऐसा अभेद्य किला बनाते थे जहाँ कोई साधारण व्यक्ति कदम रखने की सोच भी नहीं सकता था। सुबह की धूप जब लॉन की घास पर बिखरती, तो बद्रीप्रसाद जी और उनकी पत्नी विमला देवी छतरीदार मेज़ पर बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेते दिखते। वहीं बैठकर वे मुंशी को हिसाब-किताब समझाते, नौकरों पर रौब झाड़ते और चाय के घूँट के साथ अपने रसूख की नई सीमाएँ तय करते। दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा अभिजात्य दर्प छाया रहता था, जो किसी भी आम इंसान को अपने से कोसों दूर रखने के लिए काफी था।
उस वैभवशाली परिवार में दो संताने थीं। बड़ा बेटा समीर मुंबई में रहकर डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था, जबकि छोटी बेटी रोहिणी मेरे साथ नौवीं कक्षा में पढ़ती थी। अचरज की बात यह थी कि जिस घर में अहंकार की दीवारें आसमान छूती थीं, उसी घर में खिली रोहिणी को घमंड छू तक नहीं गया था। वह किसी ताज़े खिले कमल की तरह पावन और निश्छल थी। हिरनी जैसी बड़ी-बड़ी आँखें, जिनमें हर पल एक संकोच और अपनत्व तैरता रहता, लंबी घनी जुल्फ़ें जो दो सादी चोटियों में बँधकर उसके कंधों पर झूलती रहती थीं। रोहिणी और मेरी मित्रता स्कूल के पहले ही दिन से हो गई थी। हम दोनों क्लास में एक ही बेंच पर बैठते और लंच से लेकर छुट्टी तक साथ रहते।
मेरा परिवार बद्रीप्रसाद जी के परिवार से ठीक उलट था। मेरे बाबूजी रेलवे में एक छोटे से क्लर्क थे। हम तीन भाई-बहन थे और माँ बड़ी मुश्किल से सीमित तनख्वाह में घर की गाड़ी को खींचती थीं। महीने के आखिरी दिनों में जब रसोई का डिब्बा खाली होने लगता, तो बाबूजी के माथे की सिलवटें गहरी हो जाती थीं। हमारे लिए स्कूल के फाटक पर खड़े चाट और कुल्फी के ठेले किसी सपने की तरह थे। माँ ने बचपन से ही हमें आत्मसम्मान और सब्र का पाठ पढ़ाया था, इसलिए हम कभी ललचाई नज़रों से उन ठेलों की तरफ देखने की हिम्मत नहीं करते थे। लेकिन रोहिणी के आते ही यह सब बदल जाता। उसके बटुए में रोज़ जेबखर्च के भरपूर पैसे होते। वह न केवल खुद खाती, बल्कि ज़िद करके मुझे और हमारी दूसरी सहेलियों को भी खिलाती। जब मैं झिझकती, तो वह मेरी आँखें देखकर कहती, “शिखा, अगर तू नहीं खाएगी तो मैं भी नहीं खाऊँगी। दोस्ती में यह तेरा-मेरा कब से होने लगा?” उसकी इस निश्छल ज़िद के आगे मेरा संकोच हमेशा हार जाता था।
समय अपनी गति से बीतता रहा और हम नौवीं कक्षा की अर्द्धवार्षिक परीक्षा की दहलीज़ पर पहुँच गए। परीक्षाओं के परिणाम घोषित हुए तो एक अनहोनी घटी। रोहिणी, जो बाकी विषयों में तो ठीक-ठाक थी, विज्ञान और गणित के संयुक्त पर्चे में बुरी तरह अनुत्तीर्ण हो गई। सेठ बद्रीप्रसाद के लिए यह बात किसी सामाजिक अपमान से कम नहीं थी। उनके घर में कोई बच्चा फेल हो जाए, यह उनकी प्रतिष्ठा के खिलाफ था। उन्होंने उसी सप्ताह बेटी को पढ़ाने के लिए शहर के डिग्री कॉलेज से एक होनहार छात्र को बतौर होम ट्यूटर रख लिया। उस लड़के का नाम था देवाशीष।
देवाशीष एक बेहद स्वाभिमानी, मेधावी परंतु बेहद गरीब परिवार का युवक था। वह भौतिक विज्ञान में परास्नातक कर रहा था। उसके पिता एक छोटे से किसान थे, जो कर्ज़ में डूबे थे। देवाशीष अपनी कॉलेज की फीस, हॉस्टल का खर्च और किताबों का इंतज़ाम करने के लिए शाम को दो-तीन ट्यूशन पढ़ाया करता था। उसका व्यक्तित्व शांत, आवाज़ में ठहराव और आँखों में ज्ञान की गहरी चमक थी। उसने रोहिणी को केवल रटाना शुरू नहीं किया, बल्कि गणित और विज्ञान के जटिल सिद्धांतों को इतनी सरलता से जीवन के उदाहरणों से जोड़कर सिखाया कि रोहिणी का डर धीरे-धीरे गायब होने लगा।
देवाशीष की अथक मेहनत का परिणाम यह हुआ कि वार्षिक परीक्षा में रोहिणी ने पूरे स्कूल में विज्ञान वर्ग में दूसरा स्थान प्राप्त किया। पूरे स्कूल में उसकी प्रशंसा हुई। सेठ बद्रीप्रसाद ने भी देवाशीष की पीठ थपथपाई और उसे दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए भी ट्यूटर बनाए रखा। अब देवाशीष रोज़ शाम पाँच बजे ठीक समय पर उस बड़ी हवेली में आता और रोहिणी को पढ़ाता।
लेकिन इसी बीच मैंने एक अजीब सा बदलाव महसूस करना शुरू किया। वह रोहिणी जो स्कूल की घंटी बजते ही चहकने लगती थी, जिसके उन्मुक्त ठहाके पूरी क्लास में गूँजते थे, अब धीरे-धीरे खामोश रहने लगी थी। कभी-कभी जब आधी छुट्टी में हम सब मिलकर बातें करते, तो वह शून्य में आँखें गड़ाए कुछ सोचती रहती। उसकी आँखों में एक अनजाना सपना, एक अनकही बेचैनी तैरने लगी थी। मैंने जब भी उससे पूछा, “रोहिणी, तू इतनी गुमसुम क्यों रहती है? क्या तबीयत ठीक नहीं है?” तो वह चौंक पड़ती और बात टालते हुए कहती, “अरे कुछ नहीं शिखा, बस बोर्ड की परीक्षा का थोड़ा तनाव है।” लेकिन मेरा मन जानता था कि बात सिर्फ पढ़ाई की नहीं है।
गर्मी की दो महीने की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थीं। स्कूल बंद था, इसलिए हमारी मुलाक़ातें कम हो गई थीं। मैं कभी-कभार ही उससे मिलने जा पाती, क्योंकि उस बड़े घर के फाटक पर खड़ा दरबान मुझे अजीब सी शक की नज़रों से देखता था। एक दिन दोपहर के वक्त रोहिणी अचानक मेरे घर आई। उसकी आँखें लाल थीं, मानो वह रात भर सोई न हो। उसने मुझे कसकर गले लगा लिया और फफक कर रो पड़ी।
माँ ने उसे पुचकार कर पानी पिलाया और जब माँ अंदर कमरे में गई, तब रोहिणी ने मुझसे अपने दिल का वह राज़ खोला जिसने मेरी रूह कँपा दी। रोहिणी ने बताया कि वह देवाशीष के ज्ञान, उसकी सादगी और उसके संघर्षशील व्यक्तित्व के प्रति पूरी तरह समर्पित हो चुकी है। देवाशीष ने कभी कोई मर्यादा नहीं लांघी थी, लेकिन रोहिणी की आँखों में छिपे प्रेम और आदर को वह भी समझ चुका था। कल शाम जब हवेली के पुस्तकालय में पढ़ाई के दौरान रोहिणी ने अपनी एक डायरी में लिखी कविता देवाशीष की किताब में रख दी थी, तभी अचानक बद्रीप्रसाद जी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने वह पन्ना देख लिया जिसमें रोहिणी ने देवाशीष के प्रति अपने निश्छल प्रेम का इज़हार किया था।
उसके बाद उस हवेली में जो हुआ, वह किसी भयानक तूफ़ान से कम नहीं था। बद्रीप्रसाद जी का अभिजात्य घमंड आगबबूला हो उठा। उन्होंने न केवल देवाशीष को निर्दयता से अपमानित किया, बल्कि उस पर अपनी हैसियत भूलकर अमीर घर की लड़की को बरगलाने का झूठा आरोप लगाते हुए धक्के मारकर घर से निकाल दिया। देवाशीष ने एक शब्द भी नहीं कहा, बस अपनी किताबें उठाईं, आँखें झुकाईं और स्वाभिमान के साथ उस चौखट से बाहर निकल गया। इसके बाद बद्रीप्रसाद जी ने रोहिणी पर पाबंदियाँ लगा दीं। उसका घर से निकलना बंद कर दिया गया और तय किया गया कि दसवीं की परीक्षा जैसे-तैसे प्राइवेट दिलाकर उसकी शादी किसी बड़े ज़मींदार या व्यापारी के खानदान में कर दी जाएगी।
रोहिणी काँपते हुए मुझसे बोली, “शिखा, मेरे पिता को लगता है कि पैसा ही सब कुछ है। वे किसी इंसान की मेहनत, उसकी नीयत और उसके चरित्र को पैसे के तराजू में तौलते हैं। देवाशीष जी गरीब ज़रूर हैं, पर उनका चरित्र मेरे पिता के सोने-चाँदी से कहीं अधिक उज्ज्वल है। मुझे इस बात का गम नहीं कि पिता ने मुझे डांटा, गम इस बात का है कि उन्होंने एक बेकसूर और सच्चे इंसान का आत्मसम्मान पैरों तले रौंद दिया।”
मैंने रोहिणी को ढांढस बँधाया, “रोहिणी, अभी तू बहुत छोटी है और देवाशीष जी का भी भविष्य दांव पर है। इस वक्त कोई भी गलत कदम तुम दोनों की ज़िंदगी तबाह कर देगा।”
रोहिणी ने अपनी भीगी आँखें पोंछीं और दृढ़ता से कहा, “मैं कोई गलत कदम नहीं उठाऊँगी शिखा। मैं घर से भागने जैसी कायरता कभी नहीं करूँगी। लेकिन मैं अपने आत्मसम्मान और अपने प्रेम से भी समझौता नहीं करूँगी। मैं खुद को साबित करूँगी।”
उस दिन के बाद रोहिणी अपने घर लौट गई। इधर बद्रीप्रसाद जी को अपनी जीत का पूरा भरोसा था। उन्हें लगा कि उन्होंने एक झटके में उस मामूली ट्यूटर की औकात दिखा दी और अपनी बेटी के सिर से बचपने का भूत उतार दिया। देवाशीष शहर छोड़कर जा चुका था। किसी को खबर नहीं थी कि वह कहाँ गया।
दिन, महीने और साल बीतते चले गए। रोहिणी ने दसवीं की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों से पास की। इसके बाद उसने चुपचाप अपनी पढ़ाई जारी रखी। उसने अपने पिता के आगे न कभी कोई फरमाइश रखी, न कभी किसी बात पर बहस की। वह दिन-रात केवल अपनी किताबों में डूबी रहती। उसने अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ को अपनी ताक़त बना लिया था। बद्रीप्रसाद जी समझते रहे कि बेटी उनकी आज्ञाकारिणी बन चुकी है, परंतु असल में वह भीतर ही भीतर एक चट्टान की तरह मज़बूत हो रही थी। उसने कॉलेज में अर्थशास्त्र की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गई।
उधर समय का पहिया हमेशा एक सा नहीं रहता। लगभग सात साल बाद, सेठ बद्रीप्रसाद के जीवन में अंधकार के बादल घिरने लगे। उनके बड़े बेटे समीर ने विदेश जाकर वहीं एक विदेशी लड़की से शादी कर ली और माता-पिता से सारे संबंध तोड़ लिए। वह वापस कभी लौटकर नहीं आया। उसी दौरान व्यापार में बद्रीप्रसाद जी के एक बेहद करीबी साझीदार ने करोड़ों का गबन कर लिया। कर्ज़ का बोझ इतना बढ़ा कि गल्ला मंडी की दुकानें और अंत में वह विशाल हवेली भी बैंकों और साहूकारों के निशाने पर आ गई। जिस दरबान, जिन गाड़ियों और जिस वैभव पर वे कभी घमंड करते थे, वे सब एक-एक करके उनका साथ छोड़ गए। बद्रीप्रसाद जी भीतर से टूट चुके थे, उनका दर्प मिट्टी में मिल गया था और वे दिल के मरीज़ बन चुके थे।
इसी कठिन दौर में एक दिन शहर के अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर एक खबर छपी, जिसने पूरे जिले को चौंका दिया। उस वर्ष की संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में हमारे ही शहर की बेटी रोहिणी दीवान ने ऑल इंडिया बारहवीं रैंक हासिल की थी और वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए चुनी गई थी। इतना ही नहीं, उस खबर के ठीक नीचे उसी जिले में नए नियुक्त हुए युवा और सख्त डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) का नाम और तस्वीर छपी थी। तस्वीर देखकर पूरे शहर के साथ-साथ बद्रीप्रसाद जी के भी होश उड़ गए—वह नया डीएम कोई और नहीं, बल्कि वही स्वाभिमानी युवक देवाशीष था, जिसे सात साल पहले धक्के मारकर हवेली से बाहर निकाला गया था।
देवाशीष ने उस अपमान को अपनी कमज़ोरी नहीं, अपनी मशाल बना लिया था। उसने दिन-रात एक करके सिविल सेवा परीक्षा पहले ही प्रयास में पास कर ली थी और अब वह एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के रूप में अपनी पहचान बना चुका था।
अगले ही दिन, ज़िला मुख्यालय से एक गाड़ी बद्रीप्रसाद जी के उस पुराने, अब लगभग जर्जर हो चुके मकान के सामने आकर रुकी। गाड़ी से रोहिणी उतरी, लेकिन वह अकेली नहीं थी। उसके साथ खाकी वर्दी में सुरक्षाकर्मी नहीं, बल्कि एक बेहद सादे लिबास में देवाशीष खड़े थे। बद्रीप्रसाद जी बरामदे में एक पुरानी कुर्सी पर बैठे काँपते हाथों से माला जप रहे थे। उनके चेहरे पर अब कोई दर्प नहीं था, केवल समय की मार और लाचारी की गहरी लकीरें थीं।
जब देवाशीष ने आगे बढ़कर बद्रीप्रसाद जी के पैर छुए, तो बूढ़े सेठ की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनकी ज़ुबान से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था। वे शर्म और अपराधबोध से गड़े जा रहे थे। उन्हें लगा कि शायद यह नौजवान आज अपने पुराने अपमान का बदला लेने, अपनी सत्ता का रौब दिखाने आया है।
तभी देवाशीष ने बड़ी ही विनम्रता से कहा, “बाबूजी, मुझे पहचानते हैं न? मैं वही देवाशीष हूँ। सात साल पहले आपने मुझे मेरी औकात दिखाई थी। उस दिन अगर आपकी बातों ने मेरे स्वाभिमान को न झकझोरा होता, तो शायद मैं आज इस मुकाम तक नहीं पहुँच पाता। उस दिन आपने मुझे ठोकर नहीं मारी थी, बल्कि मुझे मेरे असली सामर्थ्य का अहसास कराया था।”
बद्रीप्रसाद जी की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। उन्होंने थरथराते हुए हाथ उठाकर देवाशीष के कंधे पर रख दिए और रोते हुए बोले, “बेटा, मैंने दौलत के नशे में अंधा होकर हीरे को कंकड़ समझ लिया था। मैंने हमेशा इंसानियत को पैसों से तौला, लेकिन आज मेरे पास न वह दौलत बची है और न वह झूठा घमंड। मेरे अपने बेटे ने मुझे बेसहारा छोड़ दिया, और तुम… तुम जिसे मैंने ज़लील किया था, आज मेरे आगे सिर झुकाए खड़े हो। मुझे माफ़ कर दो बेटा, मुझे माफ़ कर दो।”
रोहिणी ने आगे बढ़कर अपने पिता के आँसू पोंछे और कहा, “बाबूजी, सच्चा संस्कार अपमान का बदला लेना नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों से खुद को इतना ऊँचा उठाना होता है कि नफ़रत खुद-ब-खुद शर्मिंदा हो जाए। मैंने आपसे बगावत करके घर की मर्यादा कभी नहीं तोड़ी, लेकिन अपने प्रेम और अपनी निष्ठा को भी कभी मरने नहीं दिया। आज हम दोनों आपके सामने किसी शर्त के साथ नहीं, बल्कि आपके आशीर्वाद के लिए आए हैं।”
बद्रीप्रसाद जी ने रोहिणी और देवाशीष दोनों के हाथ अपने हाथों में ले लिए। उन्होंने उस दिन समझा कि किसी भी इंसान की असली पूँजी उसका बैंक बैलेंस या बड़ी गाड़ियाँ नहीं होतीं, बल्कि उसका चरित्र, उसकी मेहनत, उसकी शिक्षा और उसका बड़ा दिल होता है। उस दिन उस आँगन में न कोई अमीर था, न कोई गरीब; वहाँ केवल दो सच्चे इंसानों की तपस्या और एक पिता के पश्चाताप का संगम था। समाज की बनाई हुई खोखली सरहदें बिखर चुकी थीं और एक नई, गरिमामयी शुरुआत की किरणें पूरे परिवार को अपनी रोशनी से नहला रही थीं।
जीवन में कभी-कभी जिन लोगों को हम उनकी गरीबी या सादगी के कारण ठुकरा देते हैं, वे ही अपने संघर्ष और चरित्र के दम पर ऐसा इतिहास रचते हैं जो हमारी सोच को बदल कर रख देता है। क्या आपके अनुसार भी आज के दौर में पारिवारिक रिश्तों और विवाह में धन-दौलत से बढ़कर इंसान के चरित्र और उसकी शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? अपने विचार नीचे ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : कुसुम भार्गव