चूल्हे की पहली महक

  हर दिन की तरह, कौशल्या जी की आँखें बिना किसी अलार्म के खुल गईं। उम्र के पैंसठवें पड़ाव पर पहुंचकर शरीर में जोड़ों का दर्द और थकान तो आम बात हो गई थी, लेकिन दशकों पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ छूटती हैं। वे धीरे से बिस्तरे से उठीं, अपनी सूती साड़ी का पल्लू संभाला और अपने पैरों की आहट को दबाते हुए कमरे से बाहर निकलीं।

कौशल्या जी ने अपने चलने की गति इतनी धीमी कर रखी थी कि फर्श पर उनकी चप्पलों की ज़रा सी भी आवाज़ न गूंजे। कारण बिल्कुल साफ था। आंगन के उस पार वाले बड़े कमरे में उनकी बहू, अनुराधा, गहरी नींद में सो रही थी। अनुराधा पूरे चार साल बाद लंदन से अपनी डॉक्टरेट की रिसर्च और नौकरी के लंबे सिलसिले के बाद कल शाम ही घर लौटी थी। चौबीस घंटे का लंबा सफर, जेटलैग, विदेशी माहौल की बेतहाशा थकान और अपनी मिट्टी में लौटने का सुकून—कौशल्या जी भली-भांति जानती थीं कि बच्ची को इस समय कितनी गहरी नींद की जरूरत होगी। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि आज किसी भी कीमत पर अनुराधा की नींद में खलल नहीं पड़ने देंगी।

कौशल्या जी ने अपने कमरे का पल्ला बहुत आहिस्ता से भिड़ाया और रसोई की ओर कदम बढ़ाए। वे मन ही मन सोच रही थीं कि बिना कोई बर्तन खड़काए, चुपचाप गैस जलाकर अपने लिए काली मिर्च और तुलसी वाली चाय बना लेंगी, ताकि घर के किसी कोने में आवाज़ न जाए। वे हमेशा से सूर्योदय से पूर्व उठकर ही अपनी दिनचर्या शुरू करती थीं—पहले एक कप गर्म चाय, फिर तुलसी के पौधे को जल, उसके बाद स्नान और फिर ठाकुर जी की सेवा। यह क्रम पिछले चालीस सालों से बिना रुके चला आ रहा था।

जैसे ही कौशल्या जी ने रसोई के दरवाजे के करीब पहुंचकर चिक हटाई, उनकी नज़रें सामने के दृश्य पर टिक गईं और उनके पैर वहीं चौखट पर जम गए। अंदर का नजारा देखकर वे स्तब्ध रह गईं।

रसोई में मध्यम पीली रोशनी जल रही थी। चूल्हे पर पीतल की छोटी सस्पैन चढ़ी हुई थी, जिसमें पानी, पिसी हुई सोंठ, कुटी हुई इलायची और चायपत्ती मिलकर धीमी आंच पर खदबदा रहे थे। खुशबू हवा में तैर रही थी। और चूल्हे के सामने अपनी सादे कॉटन के कुर्ते में बालों का ढीला जूड़ा बांधे अनुराधा खड़ी थी, जो एक हाथ से चम्मच हिलाते हुए चाय के रंग को परख रही थी।

“अरे… अनुराधा! बेटा, तुम?” कौशल्या जी के मुंह से एक धीमी, हैरान आवाज़ निकली। उन्होंने अपनी चश्मा ठीक करते हुए कहा, “इतनी भोर में तू क्यों जग गई? अभी तो चार ही बजे हैं। तू कल इतनी थकी-हारी आई थी। आज के जमाने के पढ़े-लिखे नौजवान तो सुबह आठ-नौ बजे से पहले सोकर उठते नहीं, और फिर तू तो विलायत से आई है। चल, जाकर सो जा, मैं सब संभाल लूंगी।”

अनुराधा ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था, बल्कि एक अजीब सा सुकून और अपनेपन की चमक थी। उसने चूल्हे की आंच हल्की की, एक प्यारी सी मुस्कान बिखेरी और बोली, “माँ जी, प्रणाम। आप हमेशा भूल जाती हैं कि मैं भले चार साल सात समंदर पार रहकर आई हूँ, लेकिन आपकी आदतें कभी नहीं भूली। मुझे अच्छी तरह याद है कि आपके दिन की शुरुआत इस ब्रह्ममुहूर्त में एक कप गरमा-गरम कड़क चाय के बिना नहीं हो सकती। आप यह चाय पीती हैं, फिर अपने ध्यान-पूजा में बैठती हैं।”

कौशल्या जी कुछ बोलने ही वाली थीं कि अनुराधा ने उन्हें धीरे से पकड़कर रसोई के कोने में रखी लकड़ी की छोटी चौकी पर बैठा दिया। उसने दो कपों में छननी से चाय छानी। चाय का रंग गाढ़ा बादामी था और उससे उठती इलायची की भाप पूरे माहौल को महका रही थी।

अनुराधा ने एक कप कौशल्या जी के कांपते हाथों में थमाया और खुद उनके चरणों के पास नीचे फर्श पर बैठ गई। उसने चाय की चुस्की ली और कौशल्या जी की ओर देखते हुए बहुत भावुक स्वर में कहना शुरू किया, “माँ जी, जब सात साल पहले मेरी शादी होकर इस घर में आई थी, मैं सिर्फ चौबीस साल की अल्हड़ लड़की थी। नई नवेली बहू बनकर जब इस विशाल घर में कदम रखा था, तो दिल में कितनी घबराहट और अनजाना डर था। मायके में तो माँ हमेशा डांटकर उठाया करती थी, लेकिन यहाँ पहले ही दिन जब मेरी आँख सुबह सात बजे खुली, तो मैं थर-थर कांप रही थी कि सासू माँ क्या कहेंगी। पर जब मैं कमरे से बाहर आई, तो आपने मुझे डांटने के बजाय मुस्कराते हुए कहा था—’जा मुंह धो आ, मैंने तेरे लिए अदरक वाली मीठी चाय बना दी है।’ सच कहूं माँ, उस दिन मुझे लगा था कि भगवान ने मुझे सास नहीं, दूसरी माँ दे दी है।”

कौशल्या जी चुपचाप अपनी बहू का चेहरा देख रही थीं। पुरानी यादें उनकी आँखों के आगे तैरने लगीं।

अनुराधा ने आगे कहा, “शादी के तीन साल कैसे बीते, पता ही नहीं चला। सुबह ब्रश करते ही हाथ में गरमा-गरम चाय मिल जाना, मेरे उठने से पहले नाश्ते की तैयारी हो जाना… मुझे तब यह सब बहुत सामान्य और आसान लगता था। मुझे लगता था कि घर के काम तो बस यूं ही हो जाते हैं। उस सुख और आराम की असली कीमत, माँ जी, मुझे तब समझ में आई जब मैं आगे की रिसर्च के लिए विदेश गई।”

अनुराधा की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, “लोग कहते हैं कि सास बहू को आगे नहीं बढ़ने देती। लेकिन जब मेरा चयन लंदन की यूनिवर्सिटी में हुआ था, तब पड़ोस और रिश्तेदारों ने कितने ताने मारे थे—’बहू को इतनी दूर अकेले भेजने की क्या तुक है? घर-परिवार छूट जाएगा।’ उस दिन आपने डटकर सबका मुंह बंद किया था। आपने कहा था, ‘अगर मेरा बेटा अपने सपनों के लिए दुनिया के किसी भी कोने में जा सकता है, तो मेरी यह बेटी क्यों नहीं? इसकी पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आएगी।’ माँ, उस दिन मेरा मन किया था कि आपके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोऊं और आपको गले लगा लूं। लेकिन संकोच, झिझक और अदब के चलते मैं सिर्फ सिर झुकाकर मुस्कुरा दी थी।”

चाय का कप पकड़े कौशल्या जी की उंगलियां हल्की सी कांपीं। वे एकटक अनुराधा की बातें सुन रही थीं।

“विदेश की उस चमचमाती जिंदगी में, माँ, बाहर से सब बड़ा सुहावना दिखता है,” अनुराधा ने ठंडी सांस लेते हुए कहा। “पर वहां की कड़वी सच्चाई यह है कि वहां न कोई कामवाली बाई होती है, और न ही सुबह की चाय बनाकर सिर पर हाथ फेरने वाली आप जैसी ममतामयी माँ। हाड़ कंपाने वाली ठंड में जब सुबह पांच बजे अलार्म बजता था, तो खुद उठकर बर्फ जैसा ठंडा पानी छूना पड़ता था, बर्तन धोने पड़ते थे, अपने लिए एक कप चाय तक खुद उबालनी पड़ती थी। कभी-कभी लैब की थकान के बाद जब मैं भूखे पेट और सिरदर्द के साथ बिस्तर पर गिरती थी, तो आपकी बहुत याद आती थी। तब मुझे अहसास हुआ कि एक औरत का पूरा जीवन दूसरों की सेवा में बिना किसी छुट्टी के कैसे खप जाता है। सुबह की उस एक प्याली चाय के पीछे कितना त्याग, कितना प्रेम और कितना समर्पण छुपा होता है, यह बात मुझे उस अजनबी देश में समझ आई।”

अनुराधा ने कौशल्या जी का दूसरा खाली हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी आँखें डबडबा गईं, “उसी दिन मैंने समंदर पार बैठकर यह प्रण लिया था कि जिस दिन मेरी पढ़ाई पूरी होगी और मैं अपने घर लौटूंगी, उस दिन के बाद से जब तक मैं इस घर में रहूंगी, सुबह की पहली चाय मैं अपनी माँ को बनाकर दूंगी। आज जब आपकी आँख खुली, उससे पहले ही मेरी नींद खुल गई थी। मैं आपको जगाना नहीं चाहती थी, बस यह चाहती थी कि आज चालीस साल बाद मेरी माँ को उठते ही अपने बिस्तर के पास कोई चाय का कप थमाए।”

रसोई के उस छोटे से कोने में जैसे समय ठहर गया था। कौशल्या जी के भीतर का मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने चाय का कप एक तरफ स्लैब पर रखा और दोनों हाथों से अनुराधा का चेहरा ऊपर उठाया। उनके पोरों से अनुराधा के गालों पर गिरे आंसुओं की बूंदें छू गईं। कौशल्या जी की अपनी आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह निकली।

उन्होंने अनुराधा को अपने सीने से लगा लिया। वर्षों की खामोशी, सास-बहू के रिश्ते की औपचारिकताएं और पीढ़ियों की दूरियां उस एक आलिंगन में पिघलकर बह गईं।

“मेरी बच्ची… मेरी रानी बेटी,” कौशल्या जी रुंधे गले से बोलीं, उनका हाथ अनुराधा की पीठ सहला रहा था। “तूने आज सिर्फ चाय नहीं बनाई, तूने आज इस बूढ़ी औरत की आत्मा को तृप्त कर दिया। लोग कहते हैं कि बहुएं पराए घर से आती हैं, वे कभी अपनी नहीं हो सकतीं। लेकिन सच तो यह है कि एक स्त्री के मौन समर्पण और उसके भीतर छिपी थकान को केवल वही समझ सकती है, जिसने खुद उस रास्ते पर कदम रखा हो। पुरुष भले ही बाहर की दुनिया जीत लें, लेकिन घर की दहलीज के भीतर एक औरत के मन में क्या चल रहा है, उसकी छोटी-छोटी खुशियां और उसकी छोटी-छोटी तकलीफें क्या हैं, यह सिर्फ एक संवेदनशील और समझदार औरत ही भांप सकती है।”

कौशल्या जी ने अनुराधा का माथा चूमा और नम आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, “तुझे विलायत भेजते वक्त मुझे लोगों ने बहुत डराया था कि पढ़-लिखकर बहुएं हाथ से निकल जाती हैं, संस्कार भूल जाती हैं। लेकिन आज मुझे गर्व है कि मेरी बेटी ने वहां सिर्फ डिग्रियां नहीं कमाईं, बल्कि अपने संस्कारों को और भी गहरा कर लिया। आज मुझे अपनी ममता पर, अपने फैसले पर नाज़ हो रहा है।”

भोर की लालिमा अब धीरे-धीरे खिड़की से छनकर रसोई में फैलने लगी थी। चूल्हे से उठती महक और दोनों के चेहरों पर तैरती मुस्कान ने उस पुराने घर के वातावरण को एक नए, पवित्र उजाले से भर दिया था। उस चौखट पर अब न कोई सास थी, न कोई बहू; वहां केवल दो औरतें थीं जो एक-दूसरे के त्याग का सम्मान कर रही थीं, दो आत्माएं थीं जो बिना किसी स्वार्थ के प्रेम के धागे में बंध चुकी थीं।

परिवार तब नहीं संवरता जब बड़ी-बड़ी बातें की जाएं, बल्कि परिवार तब स्वर्ग बनता है जब घर के सदस्य एक-दूसरे की छोटी-छोटी जरूरतों, बिन कहे दर्दों और अनकही कुर्बानियों को महसूस करना सीख जाते हैं। समझदारी और संवेदना का यह संगम ही रिश्तों की सबसे बड़ी पूंजी है।

रिश्तों में जब अधिकार की जगह सम्मान और अपेक्षा की जगह परवाह ले लेती है, तो घर का हर कोना मंदिर बन जाता है। क्या आज के दौर में सास और बहू के रिश्ते को इस नई और सकारात्मक दृष्टि से देखने की जरूरत नहीं है? आपके अपने विचार और अनुभव इस बारे में क्या कहते हैं, हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।

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