कुछ नहीं जाता साथ – शुभ्रा बैनर्जी 

घर की बड़ी बेटी थी अपर्णा।वैसे तो एक बड़ा भाई था,जो डेढ़ साल बड़ा था उससे,पर घर में राज उसी का चलता था।पिता ने हमेशा उसे लाड़ करते हुए यही कहा था “मेरी मां आई है।” और वो उसे मां कहकर ही बुलाते थे।अपनी छोटी बहन सुपर्णा के अलावा शायद ही वह किसी और को प्यार करती थी।

बचपन से मायके में उसकी पसंद के चादर, सोफे के कवर और उसी की पसंद का खाना ही बनता था।बड़े भाई की भी हिम्मत नहीं थी कि वह उसे कुछ कह सके।घर वालों के लिए यह साधारण सी बात थी।बी ए सैकेंड इयर में ही शादी तय कर दी थी मां ने। एक्साइज विभाग में था लड़का, सो जल्दी ही शादी करवा दी मां ने।

ससुराल में सास और एक बड़ी ननद,तीन देवर थे।ससुराल पहुंचते ही अपर्णा को अपने पैरों तले की जमीन खिसकती दिखाई देने लगी।अपने घर पर सदा रौब जमाने वाली बेटी के साथ ससुराल में नौकरों जैसा बर्ताव होता।सास जब -तब हुकुम चलाती।खाने के लिए भी उसी का बनाया हुआ खाना बचाकर नहीं रखा जाता था।

पहली बार मायके आकर अपने ससुराल की आपबीती बताने लगी ,तो मां रो पड़ी।मां को रोता देखकर अपर्णा उन्हीं के सर पर चढ़ते हुए बोली”अब क्यों रो रही हो तुम?तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि मैं तकलीफ में हूं।

बचपन से हमें अपने मन का कभी कुछ करने नहीं दिया। ग्रैजुएशन पूरी भी नहीं हो पाई और तुमने ही बाबा पर जोर डालकर मेरी शादी करवा दी।अब तुम्हें भी भुगतना तो पड़ेगा।” 

मां का मन छलनी हो गया।भाई ने तब चिढ़कर कहा”ऐसा क्यों बोल रही है मां को?वो तेरा बुरा कभी चाहेंगी भला?अगर पढ़ाई में भी अच्छे नंबर लाती,तो ठीक था।तुझसे तो पढ़ाई में भी मन नहीं लगाया गया।ससुराल में ऐसी ही जली-कटी बातें सुनाएगी,तो वो लोग तुझे और परेशान करेंगे।तू इस घर की लाड़ली बेटी है।हम तुझे कभी तकलीफ में रहने नहीं देंगे।” 

तब से शुरू हुआ किसी ना किसी बहाने से उसे पैसे भेजने का सिलसिला।जाने पहचान वाले यदि जाते उस तरफ तो ,मिठाई के डिब्बे में पालीथीन में बांधकर पैसे भेजते बाबा और बड़ा भाई।सभी यही कोशिश करते कि उसे किसी चीज की तकलीफ़ ना हो।उन पैसों का हिसाब भी कभी किसी ने नहीं रखा।

अपर्णा के लिए यह सब महत्वपूर्ण बात नहीं थी।उसका रवैया वैसा ही रहा।जब भी आती घर,किसी ना किसी बहाने से पैसे ले जाती।यह सब ऐसा ही चलता रहा सालों से।अपनी बेटी -बहन को देने में कौन पिता और भाई पीछे हटेगा?

अब बड़े भाई की शादी तय हुई।मां,बाबा,छोटी बहन और भाई ने देख ली थी लड़की।ससुराल में कुछ परेशानी की वजह से अपर्णा नहीं आ पाई थी।उसने अपने ससुराल से ही सीधे पति के साथ जाकर भाई की होने वाली पत्नी को देखा और मिलकर आई।जिस लड़की को घर वालों ने पसंद किया था,वह तो एक छोटे से कस्बे की रहने वाली थी।

पिता नहीं थे।लड़की अपने चार भाई बहनों और मां के साथ रहती थी।स्कूल में नौकरी करती थी।घर में घुसते ही मुआयना करते हुए अपर्णा ने अपने पति से कहा” मां भी ना,कैसे घर -परिवार की लड़की पसंद की है।ना कोई ज्यादा कमाई,भाई -बहन भी इतने छोटे।

दादा को तो शादी में पूरा एक परिवार मिल रहा है पालने को।” उनके पति ने भी हंसते हुए कहा”अच्छा ही है,जुबान कम चलाएगी।दादा की सारी अकड़ निकल जाएगी,ऐसी बीवी पाकर।

मां को बहुत घमंड था ना अपने बेटे पर।अब देखना बहू नाको चना चबवा देगी।” जिसे देखने गए थे,उसी ने ये सब बातें सुन ली थी।सुनकर भी चुप ही रही।अपनी ननद के बारे में असली परिचय तो उसने स्वयं ही दे दिया।ननदोई जी के मन को भी भांप चुकी थी वह लड़की।

तय तिथि में शादी संपन्न हुई।दहेज नहीं लेंगे,इसी शर्त पर उमा राजी हुई थी शादी के लिए।जिस दिन उनका परिवार आया था देखने,उसने लड़के की मां से अकेले में बात करने की अनुमति मांग ली थी।सभी अचंभित थे।पर लड़के की मां राजी हो गई थी।

तब उनके हांथों को अपने हांथ में लेकर अपना एक वचन सुनाया था उमा ने।उसे अपने भाई -बहनों का भी सहारा बनना है।इस जिम्मेदारी को निभाने में ससुराल के प्रति अपनी निष्ठा से कभी पीछे नहीं हटेगी।होने वाली बहू का निश्छल मन भा गया था मां को।बस एक सास और बहू ने जीवन भर एक निश्छल रिश्ते को निभाने में एक दूसरे की ढाल बनने का फैसला कर लिया था।

भाई की शादी के बाद शायद पहली बार असुरक्षित महसूस कर रही थी अपर्णा। बात-बात में भाभी के कामों में नुस्खे निकालती और भाभी की ग़रीबी का मज़ाक़ उड़ाया करती थी वह।मां ने पहली बार अपनी बड़ी बेटी की बात का विरोध किया”ऐसा मत बोला कर उमा को।पिता नहीं हैं सर के ऊपर।

स्वावलंबी है।आज भी अगर चाहे तो यहां नौकरी कर लेगी।अपने मां और भाई-बहनों के लिए कुछ करने की सोच कितनी लड़कियां रखती हैं?मेरा पूरा आशीर्वाद है इस पर।देखना यह दोनों परिवारों की जिम्मेदारी अच्छे से निभाएंगी। अपर्णा बेटा,कभी किसी की किस्मत खराब नहीं होती,बस वक्त खराब होता है।

वक्त एक जैसा भी रहता है भला कभी।वह तो घूमता रहता है।इसके मां और भाई-बहनों का भी वक्त बदलेगा जरूर एक दिन।अपने तानों से इसका दिल ना दुखाया कर बेटा।तेरे भाई की पत्नी है,बहुत स्नेह करती है तुम दोनों बहनों से।

” बस मां के यही वाक्य उसके दुश्मन बन गए।उल्टे मां को ही खरी-खोटी सुनाने लगी”हां-हां,खूब चढ़ाओ सर पर बहू को।जिस दिन धक्का देकर निकालेगी ना घर से,मेरे पास ही आना पड़ेगा।तब कहना वक्त एक सा नहीं रहता।” 

मां कुछ बोली नहीं,बस दो आंसू सबकी नजर बचाकर गालों पर लुढ़क गए थे।उमा ने भी उसी दिन प्रण लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए,मां को कभी दुखी नहीं करेगी।

ननदोई का ट्रांसफर मायके के पास ही हो गया था।बड़ी सूझ-बूझ से पति के साथ अपर्णा भी नए शहर आ गई,ससुराल से मुक्ति पाकर।अब यहां से हर सप्ताह मायके आना बहुत ही सहज हो गया था उसके लिए।उसके आने की खबर पाते ही खुशी के माहौल के साथ कर्फ्यू भी लग जाता था।

जाले,बिस्तर के चादर सभी साफ करने होते थे।उसे सफाई पसंद थी बहुत।आकर सीधे बाबा के कमरे में बैठती और उनसे ही बात करती।छोटी बहन मिजाज पुरसी में लग जाती।उमा अवांछित सदस्य की तरह अवहेलना ही पाती थी उनसे।पति (रघुनाथ)ख़ुद आगे बढ़कर बहन से बात करने की कोशिश करते,पर वह नजरअंदाज कर देती थी।

बड़ा ही अपमानजक था यह उमा के लिए।अपने घर में वह भी बड़ी थी।छोटे भाई -बहन बहुत सम्मान करते थे उसका।और यहां ननद उसे बेइज्जत करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।

सप्ताह भर रहकर फिर अपर्णा चली जाती।जाते समय विदाई पहले जैसी ही होती थी।अब धीरे-धीरे बाबा के रिटायरमेंट का पैसा भी साल के अंदर समाप्ति पर आ चुका था।छोटी ननद, सुपर्णा की शादी की बात चल रही थी।इसी बीच बाबा ने एक प्राइवेट गैस वैल्डिंग का बिजनेस शुरू किया था,घर से ही।काफी पैसा लगा गया था उसमें।शादी तय होते ही बड़ी बेटी दामाद को बुलवाया गया।दामाद अब प्रमोशन पाकर अफसर बन चुके थे।

बाबा ने अपनी जमा पूंजी का हिसाब सामने रखकर कहा अपर्णा से”देख बेटा,व्यापार में काफी पूंजी लग गई है।ज्यादा कुछ बचा है नहीं मेरे पास।तुम लोगों के भरोसे हां कर दी है लड़के वालों को।उधार समझ कर दे देना अभी,हम धीरे-धीरे साल भर के अंदर चुका देंगे।दादा को भी कहा है।वो सहमत हैं।” 

बाबा की बात काट तो नहीं पाए दोनों,पर चाल चल ही दी।शादी में जो-जो सहायता करने का भार लिया था,सभी सप्ताह भर पहले निरस्त कर दिए गए। अपर्णा के एक खत में सब खुलकर सामने आ गया”बाबा,हम लोग शर्मिंदा हैं बहुत।दामाद की चुनाव में ड्यूटी लगी है,तो वो आ नहीं पा रहे।पैसों का इंतजाम भी हो नहीं पाया ,तो मैं किस मुंह से आऊं? सुपर्णा को बहुत बुरा लगेगा,जानती हूं।मैं हताश हूं,असहाय महसूस कर रही हूं।” 

चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते बाबा रो पड़े थे।अब वो आंसू, बेटी के ना आने के थे, या मदद ना मिलने के, यह उमा नहीं समझ पाई।बस बाबा को रोता देख कर रहा नहीं गया, तो पास में जाकर कहा” छोटी की शादी की जिम्मेदारी उसके बड़े भाई और भाभी की है।शादी धूमधाम से ही होगी बाबा।जैसा आपने सोचा था, ठीक वैसे ही होगी।आप मन छोटा मत करिए।”

उमा की वचनबद्धता से रघुनाथ अनभिज्ञ नहीं थे।डरते और सकुचाते हुए बोले”ये जो बिना सोचे-समझे वचन पर वचन दिए जाती हो ना तुम,सोचा है कैसे पूरा करोगी।हमारे पास गहने तक नहीं बने हैं।और शादी के बाकी सारे खर्च!कहां से करोगी तुम पूरा।बिना सोचे-समझे बोलने से काम होते नहीं है,जग हंसाई करवाते हैं।तुम्हारा क्या है?हर बात में आगे बढ़ कर वचन देने की बीमारी है तुम्हें।” 

पति की चिंता स्वाभाविक थी।उमा ने अपने सारे गहने मां को पकड़ाए।रघुनाथ के साथ जाकर जान पहचान वालों से कर्ज भी ले लिया।शादी निर्विवाद संपन्न हो गई।वचन ने अपनी मर्यादा स्वयं ही रख ली मानो।

अपर्णा के लिए यह अचंभे का विषय था।मां-बाबा के बार -बार कहने से शादी के एक दिन पहले आई थी वह,एक साड़ी लेकर।शादी की रात पति (ननदोई)भी पहुंचे खाली हांथ।शादी तो हो चुकी थी।कुछ कमी भी रही होगी शायद।उमा को सबसे ज्यादा खुशी इस बात की थी,कि मां खुश थी बहुत।

अब बहन की शादी में लिए कर्ज का बोझ रघुनाथ पर बढ़ता जा रहा था।उमा ने एक स्कूल में नौकरी कर ली ।दोनों ने मिलकर शादी का कर्ज उतारा। कर्ज उतारा तो,पर पांच साल‌ लग गए।इन पांच सालों में उमा भी दो बच्चों की मां बन चुकी थी।बच्चों को मिलने वाली खुशियों में कटौती कर -कर के ही कर्ज उतारा गया।इन सबके बीच अगर कुछ नहीं बदला ,

तो अपर्णा का स्वभाव।आना अब कम हो गया था उसका।शायद अब पहले जैसी आवभगत ना मिले,या आने से कहीं भाई या बाबा पैसे ना मांगने लगे।बाबा ने फिर से अपना व्यवसाय खड़ा करने की कोशिश की थी। अपर्णा के घर जाकर दामाद से दस हजार मांगे थे शायद,बस अपर्णा ने यह बात इतनी नकारात्मकता से बड़े भाई को बताई,कि बड़े भाई ने जीवन में कभी उससे कुछ भी ना लेने का फरमान जारी कर दिया।

आना -जाना कम ही होता था।बाबा का स्वास्थ्य दिन पर दिन बिगड़ने लगा। उम्र भी हो रही थी।लकवा हो गया बांये भाग में।दस साल बिस्तर पर रहे।मां और उमा की सेवा ने बेडसोर नहीं होने दिया।बाबा की बीमारी के बारे में जब भी बड़ा भाई बात करता,या आकर देख जाने को कहता, चिढ़कर कहती अपर्णा “रिटायरमेंट का पूरा पैसा तो तुमने ही लिया है।तुम्हारी शादी में जबरदस्ती के खर्च तुम्हारी वजह से ही हुए थे।

अब बाबा की बीमारी की बात सुनाकर क्या कहना चाहते हो?हम ले आएं अपने पास?दामाद के घर में रहेंगे,तो अच्छा लगेगा क्या?तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का फर्ज है यह,तो निभाओ।” उस दिन के बाद रघुनाथ ने फिर कभी फोन नहीं किया और ना ही आने को कहा।आखिरी बार एडमिट हुए थे जब, अकस्मात अपर्णा पति और बेटे के साथ आकर देखी,

कि बाबा को अब कुछ याद भी नहीं,ना ही बोल पा रहे हैं।तब छोटी बहन को भी बुलवा भेजा।दोनों बेटियां अपने बाबा के आखिरी समय में पहचानी ही ना जा सकी पिता के द्वारा।

बाबा की ऐसी हालत की जिम्मेदारी भी अपर्णा ने भाई-भाभी पर ही डाली।यदि अच्छे से ध्यान रखा जाता तो,बाबा की ऐसी हालत कभी नहीं होती।अब उमा चुप ही रहती। सुदर्शन से भी चुप रहने को कहा उसने।कुछ दिनों के अंदर बाबा चले गए।उनके जाने के बाद लगभग सात सालों तक अपर्णा घर नहीं आई।

उसे यह तकलीफ भी नहीं हुई कि इकलौता भाई किडनी की बीमारी से ग्रस्त हैं।आखिर रघुनाथ भी दुनिया से चले गए।तब सभी आए, रस्में निभाने।

अपर्णा के ससुराल में भी सास चल बसीं।देवर एक चल बसा। अपर्णा का स्वभाव पर नहीं बदला।हर समय सामने वाले को नीचा दिखाने में पता नहीं उसे कितना आनंद आता था।कभी किसी को कुछ देते नहीं देखा उमा ने।देवर के बच्चे यदि साथ आते कभी कभार बड़े पापा(अपर्णा के पति)से मिलने,तो अपर्णा बिस्कुट के डिब्बे तक छिपा देती थी।

देहरादून में बहुत बड़ा बंगला खरीदा था, पति के रिटायरमेंट के बाद।एक साल भी रह नहीं पाए वहां।वहां की ठंडी आबोहवा अपर्णा को रास नहीं आई, सो वह फिर लौट आई भोपाल।

भाई के जाने के बाद कभी -कभार भाभी से अब बात करती थी वह।उमा ने भी कभी बैर पाला ही नहीं।पति की अचानक स्ट्रोक से मौत हो गई।रह गया एकमात्र बेटा,जो शादी की उम्र पार कर रहा था। अपर्णा को डर था कि कहीं लड़की आकर उसे ना निकाल दे।उमा ने कई बार कहा कि अब बेटे की शादी कर ले।बहू के आने से रौनक आ जाएगी

घर में।वो कहां किसी की सुनने वाली।हर समय पति के संग रहने वाली अपर्णा,पति की मौत का सदमा सह नहीं पाई।शुगर कम होते-होते शरीर इतना कमजोर हो गया कि कुछ खा ही नहीं पाती।उमा ने , सुपर्णा ने बहुत बार कहा कि किसी तीर्थ स्थल में जाकर पूजा-पाठ दान-पुण्य कर लें।मन को शांति मिलेगी।वह भी उससे नहीं हुआ।

यहां तक कि बेटे की शादी में अड़चन दूर करने के उपाय स्वरूप जो पूजा पाठ करने को कहा गया था,वह भी नहीं कर पाई।कारण एक ही था, अविश्वास।

जब मन में किसी के लिए विश्वास ना हो,भगवान के प्रति आस्था ना हो।परिवार में सदस्यों से स्नेह ना हो,तो इंसान अकेला पड़ जाता है।बेटा होते हुए भी अकेली पड़ गई थी अपर्णा।सारा दिन बेटा अपने काम में रहता।रात घर आने पर वो जो चाहता ,वही बनाता।पूरी तरह से बेटे के ऊपर निर्भर हो गई थी अपर्णा।

अब भी जब मां से बात करती ,ताना देकर ही बात करती”तुमने ये नहीं किया मेरे लिए,तुमने ये करने नहीं दिया।” तानों और उलाहनों के बीच भी मां उसकी आवाज सुनने को बेताब रहती थीं।वक्त की कद्र कभी ना करने वाली अपर्णा,कभी किसी से सीधे मुंह बात ना करने वाली,और जरूरत पड़ने पर सशक्त होते हुए भी किसी की मदद ना करने वाली मार्च में,इस दुनिया से चली गई।जीवन के प्रति नकारात्मक विचारों ने उसे मरीज बना दिया।जिस संपत्ति और जमा -पूंजी का अभिमान रहा उसे जिंदगी भर,वह सब यहीं पड़ा रहा।करोड़ों की संपत्ति बेटे को सौंपकर अपर्णा अकाल मृत्यु के गाल में समा गई।

वक्त का पहिया अपनी गति से चलता रहता है।कभी एक जगह ठहरता नहीं।वक्त की इज्जत करना ही व्यक्ति की इज्जत करना है।हमारे रिश्तेदारों के बीच कितना भी मनमुटाव हो,पर मन में बैर नहीं पालना चाहिए।कभी किसी की आर्थिक स्थिति पर हंसना नहीं चाहिए।सबसे बड़ा सुख खुश और शांति से रहने में है।

खुशियां दूसरों के साथ साझा करने से बढ़ती हैं,दूसरों को खुशी देने से बढ़ती है।यह बात यदि वक्त रहते हम सीख जाएं,तो मोक्ष प्राप्त हुआ मानो।हमारे साथ सिर्फ हमारे कर्म और व्यवहार जाता है,बाकी सब यहीं रह जाता है।जो रह जाता है वह मिथ्या मोह है।वक्त का पहिया घूमते-घूमते यही सिखाता आया है,सदियों से और सिखा रहा है।

शुभ्रा बैनर्जी 

#वक्त का पहिया 

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