समय का पहिया – खुशी

जानकीनाथ और रामप्रसाद दोनों भाई थे। जानकीनाथ ने एक कपड़े की दुकान पर काम किया। वहीं से उन्होंने कपड़े के व्यापार का काम सीखा और अपनी साइकिल पर छोटी-सी दुकान शुरू की। मेहनत, लगन और ईमानदारी से वह छोटी-सी दुकान धीरे-धीरे बढ़ती गई और कुछ ही वर्षों में जानकीनाथ एक मिल के मालिक बन गए।

वहीं दूसरी तरफ रामप्रसाद एक स्कूल अध्यापक थे। वह बच्चों को शिक्षा का ज्ञान देते और अपने सीमित वेतन में ही संतोषपूर्वक जीवन बिताते थे।

जानकीनाथ के परिवार में उनकी पत्नी कमला, दो बेटे विमल और अमन तथा एक बेटी गीता थी। रामप्रसाद के परिवार में उनकी पत्नी सीता और दो बेटियाँ मीना और शिखा थीं।

पहले दोनों भाई अपने परिवारों के साथ एक ही घर में रहते थे। घर लगभग 150 गज का था, जिसमें पाँच बड़े और पाँच बच्चे रहते थे। रामप्रसाद घर पर बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे। कमला ने भी दसवीं तक पढ़ाई की थी, इसलिए वह छोटे बच्चों को पढ़ा दिया करती थीं।

जब सब साथ रहते थे, तब सभी बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी रामप्रसाद ही संभालते थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि उनके भाई के बच्चे पढ़ाई में कमजोर हैं। लेकिन भाभी से यदि बच्चों की पढ़ाई को लेकर कुछ कह दिया जाता, तो उन्हें बुरा लग जाता।

समय बीता और जानकीनाथ की आर्थिक स्थिति तेजी से मजबूत होने लगी। पैसा आते ही बड़ी भाभी कमला को उस छोटे-से घर में घुटन महसूस होने लगी। उन्होंने बच्चों का हवाला देते हुए पड़ोस में तीन गज का प्लॉट खरीदा और वहाँ अपना घर बनवाकर अलग रहने लगीं।

जाते समय जानकीनाथ ने अपने छोटे भाई के लिए पुराने घर में उसका हिस्सा छोड़ दिया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि पैसा रिश्तों से बड़ा है।

कमला अलग घर में जाने के बाद अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए कोचिंग भेजने लगीं। कभी-कभी वह अपने मायके या पड़ोस में अपनी अमीरी और पैसे का दिखावा भी करतीं। रामप्रसाद की बेटियों मीना और शिखा को देखकर कहतीं—

“अब लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने की क्या जरूरत है? समय रहते इनके हाथ पीले कर दो। ज्यादा पढ़-लिखकर भी आखिर करना क्या है?”

रामप्रसाद और सीता चुप रह जाते। उन्हें अपनी बेटियों पर पूरा विश्वास था।

जो बच्चे कभी चाची के हाथ का खाना बड़े प्यार से खाते थे, वही अब कहते—“इस खाने में तो तेल की बदबू आ रही है।”

समय का पहिया घूमता रहा।

बच्चे बड़े हो गए। विमल और अमन ने ज्यादा पढ़ाई नहीं की। उन्होंने अपने पिता की मिल का काम संभाल लिया। गीता की बारहवीं के बाद एक खाते-पीते परिवार में शादी कर दी गई।

दूसरी ओर रामप्रसाद ने अपनी दोनों बेटियों को खूब पढ़ाया। उन्होंने अपनी सामर्थ्य से अधिक मेहनत की, कभी ट्यूशन पढ़ाई तो कभी अतिरिक्त काम किया, लेकिन बेटियों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।

मीना ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक अच्छी नौकरी हासिल कर ली और शिखा ने भी अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़े होने का फैसला किया।

एक दिन अचानक जानकीनाथ की मिल को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हो गया। व्यापार में घाटा हुआ और देखते ही देखते मिल पर कर्ज बढ़ता चला गया। विमल और अमन, जिन्हें पिता के व्यापार के अलावा किसी और काम का विशेष अनुभव नहीं था, परेशान हो गए।

जिस घर में कभी पैसे और संपत्ति की बातें होती थीं, वहाँ अब चिंता और खामोशी थी।

जानकीनाथ बहुत टूट गए। उन्हें अपने छोटे भाई की याद आई।

वह वर्षों बाद रामप्रसाद के घर पहुँचे। दरवाजे पर वही पुराना अपनापन था। रामप्रसाद ने भाई को देखा तो बिना कोई पुरानी बात याद दिलाए उन्हें गले लगा लिया।

जानकीनाथ की आँखों से आँसू निकल पड़े।

उन्होंने कहा,

“भाई, मैंने पैसे को बहुत बड़ा समझ लिया था। मुझे लगा था कि धन ही सब कुछ है। लेकिन आज समझ आया कि असली दौलत तो परिवार और संस्कार हैं।”

रामप्रसाद मुस्कुराए और बोले,

“भैया, भाई का रिश्ता हिसाब-किताब से नहीं चलता। आपने उस समय घर में मेरा हिस्सा छोड़ा था, आज मैं आपको अकेला कैसे छोड़ दूँ?”

उसी समय मीना और शिखा भी वहाँ आ गईं। उन्होंने अपने चाचा और भाइयों की परेशानी देखी और मदद करने का निर्णय लिया। मीना ने अपने संपर्कों से विमल के लिए नया काम ढूँढ़ने में मदद की और शिखा ने अमन को नया व्यवसाय शुरू करने के लिए मार्गदर्शन दिया।

जानकीनाथ की आँखें भर आईं।

जिन बेटियों को कभी “ज्यादा मत पढ़ाओ” कहा गया था, आज वही बेटियाँ अपने परिवार के लिए सहारा बन रही थीं।

कमला भी यह सब देख रही थीं। उन्हें अपनी कही हुई बातें याद आने लगीं। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने धन के घमंड में रिश्तों और शिक्षा की असली कीमत को कभी समझा ही नहीं था।

उन्होंने सीता से हाथ जोड़कर कहा—

“बहन, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी बेटियों की पढ़ाई का मजाक उड़ाया था। आज उन्हीं बेटियों ने हमें संभाला है।”

सीता ने उन्हें गले लगा लिया।

रामप्रसाद ने मुस्कुराकर कहा—

“समय का पहिया जब घूमता है ना भाभी, तो वह किसी को एक जगह नहीं रखता। इसलिए न धन पर घमंड करना चाहिए और न किसी की गरीबी या साधारण जीवन को छोटा समझना चाहिए।”

उस दिन दोनों परिवारों के बीच वर्षों से खड़ी दीवार गिर गई।

दोस्तों धन-संपत्ति जीवन में सुख-सुविधाएँ दे सकती है, लेकिन संस्कार, शिक्षा और रिश्ते ही मुश्किल समय में सच्चा सहारा बनते हैं।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी 

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