दहलीज़ का देवदूत

 साधना जी ने कुणाल के सिर पर हाथ रखा और बहुत ही दृढ़ स्वर में बोलीं, “बेटा, अगर यह सौ प्रतिशत झूठ है और कोई मुझे ठग भी रहा है, तो मेरे पंद्रह सौ रुपये चले जाएंगे। इससे मेरे घर का चूल्हा बंद नहीं होगा और न ही हम सड़क पर आ जाएंगे। लेकिन सोच, अगर इसमें एक प्रतिशत भी सच्चाई हुई, और सचमुच किसी पिता की गोद में उसकी बीमार बच्ची तड़प रही हुई… तो हम चंद रुपयों की खातिर उस बच्ची की सांसें छीनने के गुनहगार बन जाएंगे। किसी को धोखेबाज मानकर मदद से पीछे हटने से बेहतर है कि किसी ज़रूरतमंद के लिए धोखा खा लिया जाए। तू पैसे भेज, जो होगा मैं देख लूंगी।”

गर्मियों की एक आलस भरी दोपहर थी। सूरज की किरणें छत पर अंगारे बरसा रही थीं और पूरे मोहल्ले में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसे शांत माहौल में साधना जी अपने बैठक कक्ष में आरामकुर्सी पर बैठी रामायण का पाठ कर रही थीं। उनके बाल चांदी जैसे सफेद हो चुके थे, लेकिन चेहरे पर बरसों की साधना, ममता और सादगी की चमक साफ झलकती थी। पति के निधन के बाद से वे अपने सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त बेटे आलोक और बहू नीलिमा के साथ उसी शांत उपनगर वाले दो मंजिला मकान में रहती थीं। बेटा और बहू दोनों दिन के समय अपने-अपने दफ्तर में व्यस्त रहते थे, और पोता कुणाल अपनी कॉलेज की पढ़ाई में उलझा रहता था। इस दोपहर के सन्नाटे में घर की रखवाली और शांति की साथी सिर्फ साधना जी ही होती थीं।

अचानक मुख्य दरवाजे की घंटी टन-टना उठी। घंटी की तीखी आवाज उस दोपहर की खामोशी में किसी लहर की तरह गूंज गई। साधना जी ने रामायण को मेज पर सहेज कर रखा, चश्मा नाक पर टिकाया और धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए मुख्य द्वार की ओर बढ़ीं। उन्होंने सोचा कि शायद कोई डाकिया होगा, या फिर पड़ोस की शांति बहन कुछ पूछने आई होंगी। लेकिन जब उन्होंने लकड़ी का भारी कपाट खोला, तो बाहर बरामदा पूरी तरह खाली पड़ा था। दूर-दूर तक सड़क पर कोई नजर नहीं आ रहा था, सिवाय सूखे पत्तों के, जो गर्म हवा के झोंकों से गोल-गोल घूम रहे थे।

“कौन था भला? क्या बच्चे शरारत करके भाग गए?” वे बुदबुदाईं और दरवाजा बंद करने ही वाली थीं कि उनकी नजर चौखट के पास रखे पायदान पर पड़ी। पायदान के एक कोने पर एक सफ़ेद लिफाफा दबा हुआ था। हवा से उड़ न जाए, इसलिए उस पर एक छोटा सा कंकड़ रखा गया था।

साधना जी ने झुककर वह लिफाफा उठाया। लिफाफे पर कोई डाक टिकट नहीं थी और न ही किसी भेजने वाले का नाम या पता लिखा था। जब उन्होंने लिफाफे को खोला, तो भीतर एक कॉपी का फटा हुआ पन्ना मुड़ा हुआ था। उस पन्ने पर नीली स्याही से, कांपते हुए हाथों से सिर्फ एक ही पंक्ति लिखी गई थी—”कृपया हमारी मदद कीजिए, हम बहुत लाचार हैं!”

उस एक वाक्य में इतनी पीड़ा और बेबसी झलक रही थी कि साधना जी के हाथ अपने आप कांपने लगे। उन्होंने एक बार फिर अपनी गर्दन घुमाकर लोहे के गेट के बाहर झांका, पर सड़क सूनी पड़ी थी। वे पत्र लेकर अंदर आ गईं और अपने सोफे पर बैठ गईं। उनके मन में अजीब सी उथल-पुथल शुरू हो गई। यह कैसी गुहार थी? कौन हो सकता है ऐसा, जो सीधे सामने आकर मदद मांगने के बजाय इस तरह चुपचाप चिट्ठी छोड़ गया?

शाम को जब बेटा आलोक और बहू नीलिमा दफ्तर से लौटे, तो चाय की मेज पर साधना जी ने वह पत्र उनके सामने रख दिया। उन्होंने अपनी शंका साझा करते हुए कहा, “आलोक, देखो तो बेटा, दोपहर में कोई यह दरवाजा खटखटाकर छोड़ गया है। लिखावट किसी बहुत परेशान इंसान की लगती है।”

आलोक ने उस कागज को देखा और लापरवाही से मुस्कुराते हुए एक तरफ सरका दिया, “अरे माँ, आप भी किन चक्करों में पड़ जाती हैं। आजकल शहर में फ्रॉड और ठगी के नए-नए तरीके चल पड़े हैं। कोई असामाजिक तत्व होगा, जो यह देखने आया होगा कि दोपहर में घर में कौन रहता है। या फिर मोहल्ले के किसी आवारा लड़के ने मज़ाक किया होगा। आप इसे कूड़ेदान में फेंकिए और दरवाजा बंद रखा कीजिए।”

नीलिमा ने भी आलोक की बात का समर्थन करते हुए कहा, “हाँ माँ जी, आजकल जमाना बहुत खराब है। सीधे-सादे लोगों को फंसाने के लिए लोग ऐसी झूठी लाचारी का नाटक करते हैं। आप किसी अनजान के ऐसे पत्रों पर ध्यान मत दीजिए।”

परिवार की बातों ने साधना जी को शांत तो कर दिया, पर उनका मन नहीं माना। रामायण की चौपाइयों को जीवन भर अपने आचरण में ढालने वाली साधना जी का अंतर्मन कह रहा था कि यह केवल कोई मज़ाक नहीं है। कोई इंसान जब अपनी सारी मर्यादा और संकोच को ताक पर रखकर इस तरह गुहार लगाता है, तो उसके पीछे कोई गहरी मजबूरी ही होती है।

रात को जब सब सो गए, तो साधना जी ने अपनी मेज से एक कागज़ और कलम उठाई। उन्होंने उस पर साफ अक्षरों में लिखा—”बेटा या बेटी, तुम जो कोई भी हो, ईश्वर पर भरोसा रखो। तुम्हें किस तरह की सहायता चाहिए और मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूँ? बेझिझक साफ-साफ बताओ।”

अगली सुबह, जब दूधवाला दूध देकर गया, तो साधना जी ने चुपके से वह पर्चा उसी पायदान के नीचे एक छोटे पत्थर से दबाकर रख दिया, जहाँ पहला लिफाफा मिला था।

दो दिन बीत गए, फिर चार दिन बीते, पर उस पत्र का कोई जवाब नहीं आया। पायदान के नीचे वह कागज़ जस का तस दबा रहा। साधना जी को लगने लगा कि शायद उनके बेटे और बहू की बात सच थी, कोई शरारती तत्व ही रहा होगा जो एक बार शरारत करके भूल गया। एक हफ्ते बाद जब कोई हलचल नहीं हुई, तो साधना जी भी अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गईं और धीरे-धीरे वह बात उनके ज़हन से धुंधली पड़ने लगी।

लेकिन घटना के ठीक बारहवें दिन, जब घर में दोपहर की वही खामोशी छाई हुई थी, अचानक दरवाजे की घंटी फिर से बजी—एक बार, और फिर तुरंत सन्नाटा।

साधना जी का दिल ज़ोर से धड़का। उन्होंने तेजी से कदम बढ़ाए और तुरंत दरवाजा खोला। बाहर हमेशा की तरह कोई नहीं था, लेकिन पायदान पर साधना जी का पुराना पत्र गायब था और उसकी जगह एक नया, थोड़ा मुड़ा हुआ कागज रखा था।

साधना जी ने कांपती उंगलियों से उस कागज को उठाया। उनके भीतर की उत्सुकता और बेचैनी चरम पर थी। उन्होंने अंदर आकर कागज को खोला। इस बार पत्र थोड़ा बड़ा था। उसमें लिखा था—”माँ जी, आपका बहुत धन्यवाद कि आपने एक अजनबी की बात पर भरोसा किया। मैं आपके सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ क्योंकि मुझे अपनी गरीबी और इस लाचारी पर बेहद शर्म आती है। मेरी सात साल की छोटी बच्ची है, जिसे पिछले एक महीने से गंभीर फेफड़ों का संक्रमण है। मैं मजदूरी करता था, पर पिछले बीस दिनों से काम बंद है। उसके इलाज के लिए कुछ दवाइयां तुरंत चाहिए, जिसके बिना उसकी सांसें उखड़ रही हैं। मुझे किसी और चीज़ की चाहत नहीं, अगर हो सके तो सिर्फ दवाइयों के लिए थोड़ी मदद कर दीजिए। मैं अपनी इस मजबूरी के लिए आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगता हूँ।”

पत्र के अंत में उसने एक यूपीआई आईडी और बैंक का खाता नंबर लिख रखा था।

साधना जी का कलेजा मुँह को आ गया। एक बाप अपनी बच्ची की सांसों के लिए इस तरह दरवाजे-दरवाजे भटक रहा था और अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए सामने भी नहीं आ पा रहा था। उसी वक्त साधना जी ने ठान लिया कि चाहे दुनिया जो कहे, वे इस इंसान की मदद ज़रूर करेंगी।

शाम को जब पोता कुणाल अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था, तो साधना जी उसके पास गईं। उन्होंने कहा, “कुणाल बेटा, मुझे अपने फोन से एक काम करवा दे।”

कुणाल ने पूछा, “हाँ दादी, बताइए क्या करना है?”

साधना जी ने वह पर्चा कुणाल के सामने रख दिया और कहा, “इस खाते में या इस नंबर पर मेरी पेंशन वाले खाते से तुरंत पंद्रह सौ रुपये ट्रांसफर कर दे।”

कुणाल ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उसके कान खड़े हो गए। उसने चकित होकर कहा, “दादी! आप पागल हो गई हैं क्या? यह खुला फ्रॉड है। आजकल साइबर ठग इसी तरह की झूठी कहानियां बनाकर बुजुर्गों को भावनात्मक रूप से लूटते हैं। पापा को पता चलेगा तो वे बहुत नाराज होंगे। मैं यह बिल्कुल नहीं करूँगा।”

साधना जी ने कुणाल के सिर पर हाथ रखा और बहुत ही दृढ़ स्वर में बोलीं, “बेटा, अगर यह सौ प्रतिशत झूठ है और कोई मुझे ठग भी रहा है, तो मेरे पंद्रह सौ रुपये चले जाएंगे। इससे मेरे घर का चूल्हा बंद नहीं होगा और न ही हम सड़क पर आ जाएंगे। लेकिन सोच, अगर इसमें एक प्रतिशत भी सच्चाई हुई, और सचमुच किसी पिता की गोद में उसकी बीमार बच्ची तड़प रही हुई… तो हम चंद रुपयों की खातिर उस बच्ची की सांसें छीनने के गुनहगार बन जाएंगे। किसी को धोखेबाज मानकर मदद से पीछे हटने से बेहतर है कि किसी ज़रूरतमंद के लिए धोखा खा लिया जाए। तू पैसे भेज, जो होगा मैं देख लूंगी।”

दादी के इस अडिग विश्वास और दृढ़ता के आगे कुणाल की एक न चली। उसने अनिच्छा से अपना मोबाइल उठाया। पहले उसने एक ऑनलाइन पेमेंट ऐप पर वह नंबर जांचा, पर वहां कोई नाम नहीं दिखा। फिर उसने दूसरे ऐप के जरिए उस खाते पर पंद्रह सौ रुपये ट्रांसफर कर दिए।

साधना जी ने कुणाल से कहकर उस ट्रांजैक्शन के साथ एक संदेश भी भिजवा दिया—”पैसे भेज दिए हैं बेटा। अपनी बच्ची की दवाइयां तुरंत लाओ। अगर और ज़रूरत हो, तो बिना संकोच के इसी तरह बता देना। भगवान तुम्हारी बच्ची को लंबी उम्र दे।”

रात को जब आलोक को इस बात की भनक लगी, तो उसने अपना माथा पकड़ लिया। उसने कहा, “माँ, आपने अपनी मेहनत की पेंशन के पैसे पानी में बहा दिए। अब देखिएगा, कभी कोई जवाब नहीं आएगा और वो नंबर भी बंद मिलेगा। आपने सीधे-सीधे उस ठग का हौसला बढ़ाया है।”

साधना जी चुप रहीं। उन्होंने कोई बहस नहीं की। उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। उन्होंने मन ही मन सोचा कि उन्होंने जो किया, वह अपनी अंतरात्मा और ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य के लिए किया। अगर सामने वाला गलत है, तो उसका हिसाब विधाता करेगा, पर उन्होंने अपना धर्म निभाया था।

उस रात के बाद से चार दिन बीत गए। घर में उस बात का ज़िक्र होना बंद हो गया था। आलोक और कुणाल अक्सर मुस्कुराकर कह देते थे कि दादी का पंद्रह सौ का दान हवा में उड़ गया।

लेकिन पांचवें दिन सुबह, जब धूप अभी सुनहरी ही थी और घर में सब नाश्ते की मेज पर बैठे थे, तभी दरवाजे की घंटी बजी।

कुणाल उठकर गया और उसने दरवाजा खोला। दरवाजे पर कोई इंसान नहीं था, लेकिन पायदान पर एक छोटा सा डिब्बा और उसके ऊपर एक सफेद लिफाफा रखा था।

कुणाल हैरान रह गया। वह तुरंत वह डिब्बा और लिफाफा उठाकर अंदर ले आया। उसने मेज पर रखते हुए कहा, “पापा… दादी… देखिए, बाहर फिर से कोई कुछ रखकर गया है।”

आलोक और नीलिमा भी चौंककर पास आ गए। साधना जी ने आगे बढ़कर सबसे पहले लिफाफा खोला। उस पत्र में वही नीली स्याही थी, लेकिन इस बार शब्दों के साथ आंसुओं के सूख चुके धब्बे भी कागज पर उभरे हुए थे।

पत्र में लिखा था—

“आदरणीय माँ जी,

चरण स्पर्श!

मैं जीवन भर आपका और आपके परिवार का यह कर्ज नहीं चुका पाऊंगा। आपके भेजे हुए उन पंद्रह सौ रुपयों से मैं उस दिन अस्पताल से अपनी बच्ची की जीवन रक्षक दवाइयां और ऑक्सीजन की किट खरीद पाया। डॉक्टर ने कहा था कि अगर उस रात दवाइयां न मिलतीं, तो मेरी बिटिया मुझे छोड़कर चली जाती। आज मेरी गुड़िया खतरे से बाहर है, वह धीरे-धीरे ठीक हो रही है और उसने आज पहली बार मुझे देखकर मुस्कुराया है।

माँ जी, मैं कोई चोर या ठग नहीं हूँ। मैं पास की बस्ती में रहता हूँ। कई घरों की दहलीज़ पर गिड़गिड़ाया, पर सबने मुझे दुत्कार कर भगा दिया। जब उम्मीद की सारी राहें बंद हो गई थीं, तब आपकी ममतामयी दहलीज़ ने मुझे सहारा दिया। मैं आपके सामने आने की हिम्मत इसलिए नहीं जुटा पाया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं आप भी मुझे भिखारी समझकर भगा न दें। इस डिब्बे में मेरे हाथों से बनाए गए थोड़े से बेसन के लड्डू हैं, जो मेरी पत्नी ने अपनी कृतज्ञता के रूप में आपके लिए बनाए हैं। हम गरीब हैं, हमारे पास आपको देने के लिए धन नहीं है, पर हमारी हर सांस से आपके और आपके पूरे परिवार के लिए सिर्फ दुआएं निकल रही हैं। ईश्वर आपके घर को हमेशा खुशियों से भरा रखे।”

पत्र के साथ उस लिफाफे में एक छोटी सी सरकारी अस्पताल की पर्ची भी मुड़ी हुई रखी थी, जिस पर दवाइयों का बिल और डॉक्टर के दस्तखत थे।

कमरे में पूरी तरह सन्नाटा पसर गया था। किसी के मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था। आलोक की आँखें पश्चाताप के आंसुओं से भर आई थीं। वह सिर झुकाए खड़ा था। जिस लाचारी को वह ‘साइबर फ्रॉड’ और ‘ठगी’ समझ रहा था, वह दरअसल एक बेबस पिता की अपनी मरती हुई बच्ची को बचाने की अंतिम जंग थी। अगर उस दिन उसकी माँ ने अपनी ममता और विश्वास की आवाज़ न सुनी होती, तो आज एक मासूम जान हमेशा के लिए बुझ चुकी होती।

कुणाल की आँखें भी भीग गई थीं। उसने आगे बढ़कर अपनी दादी के पैर छू लिए और रुंधे गले से बोला, “दादी, मुझे माफ कर दीजिए। हम दुनियादारी और चालाकी की किताबों में इतने उलझ गए थे कि हमें इंसानियत पर से भरोसा ही उठ गया था। आपने साबित कर दिया कि दुनिया भले ही कितनी भी मतलबी हो जाए, लेकिन एक सच्चे दिल का विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता।”

आलोक ने अपनी माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए और बोला, “माँ, आज आपने हम सबको ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखा दिया। हम लोग केवल नफे-नुकसान की भाषा समझते थे, पर आपने बताया कि इंसानियत का गणित सबसे अलग होता है।”

साधना जी ने प्यार से डिब्बा खोला और उसमें से एक छोटा सा बेसन का लड्डू उठाकर अपने मुँह में रख लिया। उनके चेहरे पर जो सुकून और दिव्यता थी, वह संसार के किसी भी धन-दौलत से खरीदी नहीं जा सकती थी। उस लड्डू का स्वाद दुनिया की सबसे महंगी मिठाई से भी कहीं अधिक मीठा था, क्योंकि उसमें एक पिता के आंसुओं की कृतज्ञता और एक मासूम बच्ची की नई सांसों की महक घुली हुई थी।

उस दिन के बाद से जब भी साधना जी के घर के दरवाजे की घंटी बजती है, तो किसी के मन में कोई डर या झिझक नहीं होती। वह घंटी उस घर के लिए केवल किसी मेहमान के आने का संकेत नहीं, बल्कि इस बात की गवाह बन चुकी है कि इंसानियत आज भी ज़िंदा है। और साधना जी की दहलीज़ आज भी उस निस्वार्थ प्रेम और उम्मीद की पहचान बनकर मुस्कुरा रही है।

क्या आपको भी लगता है कि आज के इस अविश्वास और स्वार्थ से भरे दौर में भी किसी अजनबी की मजबूरी पर भरोसा करना और बिना किसी स्वार्थ के उसकी मदद करना ही सच्ची मानवता है? क्या आपने कभी किसी अनजान की ऐसी मदद की है जिसने आपके दिल को सुकून दिया हो? अपनी राय और अनुभव हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : रंजीता अवस्थी

शाहजहांपुर

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