आँधी में जलती मशाल

शारदा अपनी बेटियों से हमेशा एक बात कहती थी, “मेरी बच्चियों, समाज कहेगा कि लड़की की असली मंजिल उसकी शादी है। लेकिन मैं कहती हूँ कि लड़की की पहली मंजिल उसकी आत्मनिर्भरता है। जब तुम्हारे हाथ में अपनी कलम और अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत होगी, तो दुनिया का कोई भी तूफान तुम्हें डिगा नहीं पाएगा। किसी के रहम पर जीने से बेहतर है कि अपने वजूद से अपनी पहचान बनाई जाए।”

कानपुर के पुराने इलाके शास्त्री नगर की तंग गलियों में वह दो कमरों का पुराना मकान आज भी मौजूद है। कभी इस घर की देहरी पर लोगों की हमदर्दी के नाम पर ताने और खोखली नसीहतें बिखरी रहती थीं। बात अस्सी के दशक की है, जब पूरे मोहल्ले में सन्नाटा खींचने वाली एक अनहोनी घटी। डाक विभाग में एक छोटे पद पर कार्यरत देवेन्द्र नाथ चतुर्वेदी का अचानक तेज बुखार और फेफड़ों के संक्रमण से देहांत हो गया। पीछे छूट गई उनकी बत्तीस वर्षीय पत्नी शारदा और उनकी चार मासूम बेटियाँ—सबसे बड़ी निधि जो मुश्किल से नौ साल की थी, उससे छोटी राशि सात साल की, तीसरी महक पाँच साल की और गोद में खेलती नन्हीं पाखी जिसकी उम्र मात्र दो वर्ष थी।

जिस दिन देवेन्द्र जी की तेरहवीं बीती, उसी दिन से रिश्तेदारों और पड़ोसियों के रंग बदलने लगे। कुछ दूर के रिश्तेदारों ने जमा होकर शारदा को सलाह दी, “शारदा बहू, तुम्हारा पूरा जीवन आगे पड़ा है। चार-चार बेटियाँ हैं, कोई बेटा तो है नहीं जो आगे चलकर कुल का नाम रौशन करे या सहारा बने। तुम ऐसा करो, बच्चियों को किसी अनाथालय या दूर के रिश्तेदारों में बाँट दो और तुम अपने मायके लौट जाओ। इतना बड़ा बोझ अकेले कैसे खींचोगी? बेटियों की शादी करते-करते तुम्हारी हड्डियाँ गल जाएँगी।”

शारदा सफेद सूती साड़ी के पल्लू में अपनी नन्हीं पाखी को छुपाए कोने में बैठी थी। उसकी आँखों से आँसू तो नहीं गिरे, लेकिन उस पल उसके भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल गया। उसने अपनी चारों बच्चियों के मुरझाए चेहरों को देखा, जो भूख और डर से सहमी हुई अपनी माँ के आँचल से चिपकी थीं। शारदा ने सिर उठाया और भारी, लेकिन बेहद दृढ़ आवाज़ में कहा, “ये मेरी बेटियाँ हैं, कोई बोझ नहीं जिन्हें मैं सड़क पर छोड़ दूँ। मेरे पति भले चले गए हों, लेकिन मेरे हाथ-पैर सलामत हैं। जब तक मेरे सीने में एक भी साँस बाकी है, मेरी बच्चियाँ न किसी के आगे हाथ फैलाएँगी और न ही किसी की दया की मोहताज बनेंगी।”

यह कहना आसान था, लेकिन उस ज़माने में एक कम पढ़ी-लिखी, विधवा औरत के लिए समाज के बीच खड़े होकर चार बेटियों को पालना किसी दहकते अंगारों पर नंगे पाँव चलने जैसा था। शारदा ने केवल दसवीं तक पढ़ाई की थी। देवेन्द्र जी की जगह पर डाक विभाग में उसे अनुकंपा के आधार पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यानी चपरासी की नौकरी मिल गई। वेतन बेहद मामूली था—इतना कम कि महीने के पंद्रह दिन बीतते-बीतते घर में दाल की जगह पानी जैसा सूप पकने लगता था।

सुबह के चार बजे जब पूरा शहर गहरी नींद में सोता था, शारदा के घर का चूल्हा जल उठता था। वह चारों बच्चियों के लिए खाना बनाती, उनके कपड़े धोती, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करती और फिर खुद पुराने सूती ब्लाउज और सादे कुर्ते में पैदल ही पाँच किलोमीटर दूर डाकघर की ओर निकल पड़ती। दफ्तर में अफसरों की मेजों की धूल साफ करना, फाइलें इधर से उधर पहुँचाना, और चाय के बर्तन धोना उसकी दिनचर्या बन गया। कई बार कुछ संकीर्ण सोच वाले सहकर्मी उसकी लाचारी का फायदा उठाने या व्यंग्य कसने की कोशिश करते, “अरे शारदा, क्यों इतना मर रही हो? सरकारी नौकरी है, थोड़ा काम करो बाकी छोड़ो। और लड़कियों को इतना पढ़ाकर क्या कलेक्टर बनाओगी? किसी तरह चूल्हा-चौका सिखाओ और हाथ पीले करके छुट्टी पाओ।”

शारदा कभी किसी के ताने का जवाब ज़ुबान से नहीं देती थी। वह अपनी आँखें नीची रखती और मन ही मन एक ही संकल्प दोहराती—”मेरी बेटियाँ समाज की इस सड़ी-गली सोच की शिकार नहीं बनेंगी। मैं उन्हें सिर्फ रोटी नहीं दूँगी, मैं उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत दूँगी।”

दफ्तर की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए शारदा को जल्दी ही समझ आ गया कि इस मामूली चपरासी के वेतन से चार बेटियों की उच्च शिक्षा, किताबें और भविष्य की जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं हो सकतीं। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति बदलनी है, तो उसे खुद अपनी हैसियत बदलनी होगी। इसके लिए पदोन्नति जरूरी थी और पदोन्नति के लिए चाहिए थी डिग्री। उसने देखा कि विभाग में क्लर्क और प्रशासनिक पदों के लिए विभागीय परीक्षाएँ होती हैं, लेकिन उनके लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक थी।

एक दिन शारदा ने घर आकर अपनी सबसे बड़ी बेटी निधि से कहा, “निधि, कल से तुम और तुम्हारी बहनें रात को जब पढ़ाई करोगी, तो मेरे लिए भी मेज पर एक जगह बना देना। तुम्हारी माँ भी अब पढ़ेगी।”

शारदा के इस फैसले पर घर के बाहर खूब हँसी उड़ी। पड़ोस की औरतें पानी भरते समय बातें बनातीं, “देखो तो, उम्र ढलने को आई, चार जवान होती बेटियों की माँ अब बस्ता लेकर पढ़ाई करेगी! जमाना उलटा आ गया है।” लेकिन शारदा ने दुनिया के लिए अपने कान बंद कर लिए थे। उसने राज्य मुक्त विश्वविद्यालय से बारहवीं का फॉर्म भरा। दिन भर दफ्तर की दौड़धूप, शाम को बच्चियों की देखभाल और रात को जब चारों बेटियाँ सो जातीं, तब लालटेन की मद्धिम रोशनी में शारदा अपनी पुरानी, फटी किताबों के पन्ने पलटती।

कई रातें ऐसी आतीं जब थकान से उसकी आँखें जलने लगतीं, सिर दर्द से फटने लगता। लेकिन जब भी उसकी हिम्मत टूटती, वह जमीन पर सो रही अपनी चारों बेटियों के मासूम चेहरों को देख लेती। उनका भविष्य ही शारदा की नींद चुराने के लिए काफी था। उसने बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद उसने बीए (बैचलर ऑफ आर्ट्स) में प्राइवेट दाखिला ले लिया।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। बेटियाँ भी अपनी माँ के संघर्ष को बहुत गहराई से महसूस कर रही थीं। उन्होंने कभी नए कपड़ों, महँगे खिलौनों या सैर-सपाटे की ज़िद नहीं की। बड़ी बेटी निधि ने अपनी माँ का हाथ बँटाना शुरू कर दिया। वह अपनी छोटी बहनों को पढ़ाती, घर की सफाई करती और माँ के दफ्तर से लौटने से पहले चाय बनाकर रखती। चारों बहनों में पढ़ाई को लेकर एक अनोखी लगन पैदा हो गई थी। वे जानती थीं कि उनकी किताबें केवल कागज के पन्ने नहीं हैं, बल्कि उनकी माँ के पसीने की एक-एक बूँद की कीमत हैं।

एक दौर ऐसा भी आया जो इस परिवार के इतिहास का सबसे भावुक और अनोखा पन्ना बन गया। वह साल था जब बड़ी बेटी निधि शहर के एक नामी डिग्री कॉलेज में बीए अंतिम वर्ष की नियमित छात्रा थी, और उसी वर्ष शारदा भी दूरस्थ शिक्षा माध्यम से अपने बीए अंतिम वर्ष की परीक्षा दे रही थी।

परीक्षा के दिनों में वह दृश्य देखने लायक होता था। घर के छोटे से कमरे में एक तरफ माँ बैठी इतिहास और राजनीति विज्ञान के नोट्स दोहरा रही होती थी, और दूसरी तरफ बेटी समाजशास्त्र के सिद्धांतों को रट रही होती थी। दोनों एक-दूसरे से सवाल पूछतीं, एक-दूसरे की गलतियाँ सुधारतीं। जब कभी शारदा को अंग्रेजी के कठिन शब्दों में उलझन होती, तो निधि एक शिक्षिका की तरह अपनी माँ को समझाती। और जब निधि परीक्षा के तनाव से घबराने लगती, तो माँ अपनी ममता का आँचल उसके सिर पर रखकर कहती, “डर मत बेटी, मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। हमने जो पसीना बहाया है, वह हमारी तकदीर का नया रंग बनकर उभरेगा।”

उस वर्ष जब परीक्षा परिणाम घोषित हुआ, तो केवल मोहल्ला ही नहीं, बल्कि पूरा डाक विभाग स्तब्ध रह गया। माँ और बेटी दोनों ने प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। जिस दिन शारदा के हाथ में डिग्री का प्रमाण पत्र आया, वह अपनी चारों बेटियों को गले लगाकर फूट-फूट कर रो पड़ी। वे आँसू किसी लाचारी के नहीं, बल्कि समाज की रूढ़ियों और परिस्थितियों पर मिली एक ऐतिहासिक जीत के आँसू थे।

डिग्री मिलते ही शारदा ने डाक विभाग की आंतरिक विभागीय परीक्षा दी और अपनी योग्यता के दम पर वह सीधे क्लर्क के पद पर पदोन्नत हो गई। अब घर की माली हालत पहले से काफी बेहतर हो चुकी थी। लेकिन शारदा रुकी नहीं। उसने अपनी बेटियों को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि पिता के न होने से उनके सपनों की कोई सीमा होनी चाहिए।

निधि ने सिविल सेवा और राज्य प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। दूसरी बेटी राशि ने वाणिज्य की पढ़ाई पूरी कर बैंकिंग क्षेत्र की राह पकड़ी। तीसरी बेटी महक को विज्ञान और शोध में रुचि थी, इसलिए उसने जैव प्रौद्योगिकी में दाखिला लिया, जबकि सबसे छोटी पाखी ने कानून की पढ़ाई करने की ठान ली। घर में पैसों की तंगी जब भी सिर उठाती, शारदा अपने गहने गिरवी रख देती या भविष्य निधि से कर्ज ले लेती, लेकिन कभी किसी बेटी की फीस या किताब में रुकावट नहीं आने दी।

शारदा अपनी बेटियों से हमेशा एक बात कहती थी, “मेरी बच्चियों, समाज कहेगा कि लड़की की असली मंजिल उसकी शादी है। लेकिन मैं कहती हूँ कि लड़की की पहली मंजिल उसकी आत्मनिर्भरता है। जब तुम्हारे हाथ में अपनी कलम और अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत होगी, तो दुनिया का कोई भी तूफान तुम्हें डिगा नहीं पाएगा। किसी के रहम पर जीने से बेहतर है कि अपने वजूद से अपनी पहचान बनाई जाए।”

वर्षों की यह तपस्या धीरे-धीरे फल देने लगी। सबसे पहले निधि का चयन राज्य प्रशासनिक सेवा में हुआ और वह डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त हुई। जिस दिन निधि नीली बत्ती वाली सरकारी गाड़ी से पहली बार अपने उसी पुराने शास्त्री नगर के मकान के सामने उतरी, उस दिन पूरा मोहल्ला छत पर आकर देख रहा था। वही पड़ोसी, जो कभी शारदा को बेटियों को अनाथालय भेजने की सलाह देते थे, आज हाथ जोड़े स्वागत में खड़े थे।

इसके बाद तो जैसे कामयाबियों की झड़ी लग गई। राशि ने राष्ट्रीयकृत बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर की परीक्षा पास कर ली। महक को एक बड़े रिसर्च इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिक के पद पर नियुक्ति मिली, और सबसे छोटी पाखी ने उच्च न्यायालय में एक सफल अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई।

जब चारों बेटियाँ अपने-अपने पैरों पर पूरी मजबूती से खड़ी हो गईं, तब शारदा ने अपनी दूसरी जिम्मेदारी की ओर कदम बढ़ाया। उसने समाज के किसी भी दकियानूसी दबाव में आए बिना, केवल सुशिक्षित, सुलझे हुए और बेटियों की योग्यता का सम्मान करने वाले परिवारों में उनकी शादियाँ तय कीं। किसी भी शादी में उसने दहेज का एक पैसा नहीं दिया, क्योंकि उसकी बेटियाँ खुद इतनी सक्षम थीं कि उनके सामने कोई भी भौतिक वस्तु तुच्छ थी। चारों दामाद ऐसे मिले जो न केवल अपनी पत्नियों की सफलता पर गर्व करते थे, बल्कि अपनी सास शारदा को किसी देवी की तरह पूजते थे।

समय अपनी गति से बहता गया और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब शारदा डाक विभाग में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के पद से पूरे मान-सम्मान के साथ सेवानिवृत्त हुई। विदाई समारोह में डाक विभाग के बड़े-बड़े अधिकारी उपस्थित थे। विभाग के प्रमुख ने अपने भाषण में कहा, “शारदा जी ने यहाँ एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कदम रखा था, लेकिन अपनी निष्ठा, अटूट परिश्रम और आत्म-सम्मान के बल पर वे आज जिस मुकाम से विदा ले रही हैं, वह इस पूरे विभाग के लिए एक मिसाल है।”

उस विदाई समारोह में शारदा के पीछे उसकी चारों बेटियाँ और चारों दामाद खड़े थे। जब शारदा को मंच पर शॉल और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया, तो उसने वह सम्मान अपनी चारों बेटियों के हाथों में सौंप दिया।

आज शारदा अपने उसी घर में, जिसे अब एक भव्य और सुंदर आशियाने का रूप दे दिया गया है, बड़े सुकून और आत्म-संतोष के साथ जीवन बिता रही हैं। चारों बेटियाँ हर हफ्ते, हर त्योहार पर अपनी माँ की देहरी पर खिंची चली आती हैं। कोई दामाद माँ के लिए बनारसी साड़ी लाता है, तो कोई उनके स्वास्थ्य की नियमित जाँच के लिए डॉक्टरों से समय लेता है। जिस घर को कभी लोगों ने ‘अभागिन का वीरान आँगन’ करार दे दिया था, आज वही घर खुशियों, नाती-पोतों की किलकारियों और असीम सम्मान से गूँजता है।

शारदा जब शाम को अपने आँगन में बैठकर ढलते सूरज को देखती हैं, तो उनके चेहरे पर झुर्रियों के बीच एक ऐसी मुस्कान तैर जाती है जो सदियों की थकान को एक पल में मिटा देती है। उन्होंने साबित कर दिया था कि एक अकेली माँ यदि ठान ले, तो वह न केवल अपनी संतानों की तकदीर बदल सकती है, बल्कि पूरे समाज की आँखों से रूढ़िवादिता की पट्टी भी उतार सकती है। नारी केवल कोमल या अबला नहीं होती; जब वक्त की कसौटी पर उसका इम्तिहान होता है, तो वह अपने बच्चों के लिए चट्टान बनकर पूरे संसार से टकराने का हौसला रखती है।

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