कंक्रीट के जंगल में खिली धूप

 सुजाता ने हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों से बेबसी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने सिसकते हुए कहा, “अंकल जी, आप जो डांटेंगे, मैं सिर झुकाकर सुन लूंगी। लेकिन मेरी मजबूरी तो समझिए। मेरे पति एक निजी कंपनी में हैं और मैं एक बैंक में। इस महंगे शहर में घर का लोन, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्चे पूरे करने के लिए हम दोनों का कमाना मजबूरी है। बच्चों के लिए डे-केयर सेंटर का इंतजाम किया था

गांव की पगडंडियों, लहलाहाते हरे-भरे खेतों और नीम की ठंडी छांव में उम्र के सत्तर बसंत बिताने वाले देवेन्द्र जी के जीवन की सबसे मजबूत डोर उस दिन टूट गई थी, जब उनकी जीवनसंगिनी जानकी उन्हें हमेशा के लिए अकेला छोड़कर चली गईं। जानकी के जाने के बाद गांव की वह पुश्तैनी हवेली, जिसका एक-एक कोना कभी हंसी और बातों से गूंजता था, अचानक देवेन्द्र जी को काटने दौड़ने लगी थी। बेटा निशांत और बहू रचना शहर से आए और हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गए। निशांत की एक ही रट थी—”बाबूजी, अब आप वहां अकेले नहीं रह सकते। अगर आपकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा। आपको हमारे साथ शहर चलना ही होगा।” देवेन्द्र जी ने बहुत बहाने बनाए, कभी फसलों की कटाई का हवाला दिया तो कभी चौपाल के पुराने साथियों की दुहाई दी। लेकिन बेटे की भीगी आंखें और बहू की मनुहार के आगे एक पिता की जिद आखिरकार हार गई। भारी मन से, अपने बक्से में जानकी की कुछ पुरानी यादें और गांव की मिट्टी की सौंधी खुशबू समेटकर वे महानगर के लिए रवाना हो गए।

शहर क्या था, कंक्रीट की ऊंची-ऊंची दीवारों और धुएं का एक विशाल भूलभुलैया था। निशांत जिस बहुमंजिला सोसाइटी में रहता था, उसका नाम ‘ग्रीन वैली हाइट्स’ था, पर दूर-दूर तक हरियाली के नाम पर सिर्फ बालकनियों में रखे प्लास्टिक के गमले ही नजर आते थे। देवेन्द्र जी का कमरा चौदहवीं मंजिल पर था। सुबह जब वे बालकनी में आकर नीचे देखते, तो चक्कर सा आ जाता था। नीचे धरती तो जैसे गायब हो चुकी थी; उसकी जगह सिर्फ चिकनी डामर की सड़कें, पार्किंग में करीने से खड़ी गाड़ियां और सीमेंट के बने फुटपाथ ही दिखते थे। दूर क्षितिज के पास एक कोने में बच्चों के खेलने का एक छोटा सा कृत्रिम पार्क जरूर दिखता था, जिस पर नजर टिकाकर वे गांव की खुली अमराइयों को याद करके अपनी बेचैन आत्मा को थोड़ी तसल्ली दे लेते थे। दिन भर बंद एसी वाले फ्लैट में टीवी के रिमोट से जूझना, बहू-बेटे के दफ्तर जाने के बाद उस खामोशी को घूरना और शाम को उनके लौटने पर औपचारिक बातचीत करना—यही उनकी नियति बन चुका था। देवेन्द्र जी को लगता था कि वे किसी आलीशान पिंजरे में बंद ऐसे परिंदे हैं, जिसके पर भले न कटे हों, पर आसमान ही छीन लिया गया हो।

एक दोपहर जब पूरा परिसर सन्नाटे में डूबा हुआ था, देवेन्द्र जी बालकनी में खड़े होकर नीचे पार्क में उड़ते दो कबूतरों को निहार रहे थे। तभी अचानक ऊपर की किसी मंजिल से एक भयानक चीख और गाली-गलौज जैसी तीखी आवाज उनके कानों में पड़ी।

“छोड़ मुझे! नीचे फेंक दूंगा तुझे… देख कैसे तू रोता है!”

“अरे छोड़, मैं गिर जाऊंगा! मम्मी…!”

देवेन्द्र जी ने हड़बड़ाकर ऊपर की ओर गर्दन उठाई। उनका कलेजा हलक में आ गया। बारहवीं मंजिल की रेलिंग पर दो छोटे बच्चे—जिनकी उम्र मुश्किल से नौ और दस साल रही होगी—एक-दूसरे का कॉलर पकड़े गुत्थमगुत्था हो रहे थे। एक बच्चे का आधा शरीर बालकनी की पतली लोहे की ग्रिल से बाहर हवा में झूल रहा था। जरा सी चूक, एक कमजोर पकड़, और वह नन्हा सा शरीर सीधे चौदह मंजिल नीचे सीमेंट की सड़क पर बिखर जाता। देवेन्द्र जी के रोंगटे खड़े हो गए। वे अपनी उम्र, घुटनों का दर्द और सारी लाचारी भूल गए। उन्होंने तुरंत बालकनी से नीचे ग्राउंड फ्लोर पर गश्त कर रहे मुख्य सुरक्षाकर्मी को अपनी पूरी ताकत से आवाज लगाई, “सुरक्षाकर्मी भैया! दौड़ो! बारहवीं मंजिल के फ्लैट नंबर 1204 की बालकनी देखो! बच्चे गिर रहे हैं, जल्दी दरवाजा तोड़ो!”

देवेन्द्र जी की घबराई और बुलंद आवाज सुनकर सुरक्षाकर्मी ने ऊपर देखा तो उसके होश उड़ गए। उसने तुरंत अपने वॉकी-टॉकी पर साथी सुरक्षाकर्मियों को सतर्क किया और खुद लिफ्ट की तरफ भागा। देवेन्द्र जी भी बिना चप्पल पहने, हांफते हुए लिफ्ट की ओर दौड़े। जब तक वे बारहवीं मंजिल पर पहुंचे, गार्ड मास्टर-की और डंडों की मदद से दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल हो चुके थे। दोनों बच्चों को ऐन वक्त पर ग्रिल से खींचकर कमरे के भीतर गिराया गया। दोनों बच्चे थर-थर कांप रहे थे, उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। अगर दो मिनट की भी देर हो जाती, तो एक भयानक हादसा पूरे परिसर को दहला देता।

सोसाइटी के सेक्रेटरी, मिस्टर शर्मा, जो उसी विंग में रहते थे, खबर मिलते ही दौड़े चले आए। उन्होंने तुरंत बच्चों की प्रोफाइल खंगाल कर उनकी मां, सुजाता जी को फोन मिलाया। पंद्रह मिनट के भीतर सुजाता अपने दफ्तर से बदहवास हालत में दौड़ती हुई घर पहुंचीं। उनके बाल बिखरे थे और चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। अपने दोनों बेटों को सुरक्षित देखकर वे घुटनों के बल बैठ गईं और उन्हें सीने से चिपका कर फफक पड़ीं।

यह सब देखकर देवेन्द्र जी के भीतर का पुराना शिक्षक और एक संवेदनशील बुजुर्ग जाग उठा। वे अपने गुस्से और पीड़ा को रोक नहीं पाए और भरे गले से बोले, “बेटी, यह क्या पागलपन है? इतने छोटे-छोटे अबोध बच्चों को दिन भर इस कंक्रीट के बक्से में बाहर से ताला लगाकर बंद करके चली जाती हो? अगर आज ईश्वर की कृपा न होती और दो मिनट की देर हो जाती, तो क्या मुंह दिखाती दुनिया को? क्या तुम्हारी ये नौकरियां और यह धन-दौलत इन बच्चों की सांसों से ज्यादा कीमती हैं?”

सुजाता ने हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों से बेबसी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने सिसकते हुए कहा, “अंकल जी, आप जो डांटेंगे, मैं सिर झुकाकर सुन लूंगी। लेकिन मेरी मजबूरी तो समझिए। मेरे पति एक निजी कंपनी में हैं और मैं एक बैंक में। इस महंगे शहर में घर का लोन, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्चे पूरे करने के लिए हम दोनों का कमाना मजबूरी है। बच्चों के लिए डे-केयर सेंटर का इंतजाम किया था, लेकिन ये दोनों इतने चंचल और उपद्रवी हैं कि वहां हर रोज किसी न किसी बच्चे से मारपीट कर लेते थे। डे-केयर वालों ने हाथ जोड़कर इन्हें रखने से मना कर दिया। अब इन्हें घर में अकेला बंद करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था। मैं सोच रही थी कि जब तक ये आठवीं कक्षा पार न कर लें और शाम को कोचिंग जाने लायक न हो जाएं, तब तक जैसे-तैसे वक्त कट जाए… पर आज मुझे अपनी गलती समझ आ गई अंकल।”

देवेन्द्र जी ने एक गहरी सांस ली। उनका गुस्सा अब करुणा में बदल चुका था। उन्होंने सुजाता के सिर पर हाथ रखा और बोले, “बेटी, तुम लोग बच्चों को केवल गैजेट्स, खिलौने और महंगे कपड़े दे रहे हो, पर उनके कोमल मन को समझना ही भूल गए हो। बंद कमरे में बचपन कुंठित होता है, हिंसक बनता है। उन्हें प्यार, अनुशासन और दिशा की जरूरत है।” इतना कहकर देवेन्द्र जी भारी कदमों से नीचे पार्क की ओर निकल गए और काफी देर तक बेंच पर बैठकर पुरानी यादों और शहर की इस बेबसी पर सोचते रहे।

उस रात लगभग नौ बजे खाना खाने के बाद देवेन्द्र जी अपने कमरे में चारपाई पर लेटे जानकी की तस्वीर को एकटक देख रहे थे। तभी निशांत ने कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी।

“बाबूजी, आपसे कुछ लोग मिलने आए हैं,” निशांत की आवाज में एक अजीब सी संजीदगी थी।

देवेन्द्र जी चौंक पड़े। इस अजनबी शहर में, जहां पड़ोसी भी दूसरे पड़ोसी का नाम तक नहीं जानता, उनसे मिलने कौन आ सकता था? वे उठकर बाहर बैठक में आए। सामने का दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गए। सोफे पर और उसके आसपास सोसाइटी के चार-पांच दंपत्ति अपने हाथ जोड़े खड़े थे। उनमें दोपहर वाली सुजाता और उसके पति भी शामिल थे। साथ में सोसाइटी के सेक्रेटरी मिस्टर शर्मा भी मौजूद थे।

निशांत ने आगे बढ़कर अपने पिता का परिचय कराया, “बाबूजी, ये हमारे ही परिसर के अलग-अलग फ्लैटों में रहने वाले परिवार हैं। आज दोपहर की घटना के बाद मिस्टर शर्मा ने सोसाइटी के ग्रुप पर यह बात रखी। ये सभी कामकाजी माता-पिता हैं और अपने बच्चों की सुरक्षा, उनके अकेलेपन और बिगड़ती आदतों को लेकर बेहद चिंतित हैं।”

मिस्टर शर्मा ने आगे बढ़कर देवेन्द्र जी के हाथ थाम लिए और बहुत ही आदर से बोले, “अंकल जी, हमें निशांत से पता चला कि आप अपने गांव के इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को तराशने में लगा दी है। हमारे इस पूरे परिसर में सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि माता-पिता काम पर चले जाते हैं और बच्चे या तो बंद कमरों में मोबाइल-इंटरनेट की लत का शिकार हो रहे हैं या फिर आज जैसी घातक शरारतें कर रहे हैं। हम सब आपसे करबद्ध प्रार्थना करने आए हैं कि क्या आप दोपहर के समय कुछ घंटों के लिए इन बच्चों के संरक्षक बन सकते हैं? हमारी सोसाइटी का जो क्लब हाउस और उसके आगे का हरा-भरा खुला बरामदा है, सोसाइटी प्रबंधन वह पूरी जगह इस नेक काम के लिए खाली करने को तैयार है। आप वहां जो चाहें करें, बस इन बच्चों को अपनी छत्रछाया दे दीजिए।”

देवेन्द्र जी का हृदय इस अनपेक्षित प्रस्ताव से द्रवित हो उठा। उनकी आँखों की कोरें भीग गईं। उन्होंने सभी माता-पिताओं के चेहरों पर वही चिंता और उम्मीद देखी, जो कभी उनके अपने गांव के लोगों के चेहरों पर होती थी।

देवेन्द्र जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे भई, हाथ मत जोड़िए। बच्चों के बीच रहना तो मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी रहा है। मैं उन्हें केवल अकेलापन बिताने का सहारा ही नहीं दूंगा, बल्कि उन्हें गणित के बुनियादी सिद्धांत, हिंदी की मिठास, हमारी लोक कथाएं और सबसे बढ़कर इंसानियत और नैतिकता का पाठ भी पढ़ाऊंगा। लेकिन एक बात मैं पहले ही साफ कर दूं—मेरी अंग्रेजी थोड़ी कमजोर है। अगर आप लोग फैंसी अंग्रेजी माध्यम की उम्मीद करेंगे, तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा।”

सभी माता-पिता के चेहरे खिल उठे। सुजाता के पति भावुक होकर बोले, “अंकल जी, अंग्रेजी सिखाने के लिए तो बड़े-बड़े स्कूल और कंप्यूटर मौजूद हैं। हमें अपने बच्चों को सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि वे संस्कार और जीवन मूल्य सिखाने हैं जो केवल आपके जैसे अनुभवी और स्नेही बुजुर्ग ही दे सकते हैं।”

सभी आगंतुक कृतज्ञता व्यक्त करते हुए चले गए। जब घर में सन्नाटा पसरा, तो देवेन्द्र जी ने अपने बेटे निशांत और बहू रचना को अपने पास बुलाया। उनके चेहरे पर एक गंभीर दृढ़ता थी।

“निशांत, रचना… तुम दोनों ने सुना कि उन लोगों ने मुझसे क्या उम्मीद की है। मैं शहर में रुकने और इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन मेरी एक अटल शर्त है,” देवेन्द्र जी ने सीधे निशांत की आँखों में देखा।

निशांत ने उत्सुकता से पूछा, “कैसी शर्त बाबूजी? आप जो कहेंगे, हम सिर आंखों पर रखेंगे।”

देवेन्द्र जी ने शांत स्वर में कहा, “शर्त यह है कि हर दो महीने के अंतराल पर, हम सबको कम से कम एक हफ्ते के लिए गांव चलना होगा। हमारे पुरखों के खेत भले ही बटाई पर दे दिए गए हों, लेकिन उन खेतों की माटी से हमारा रिश्ता कभी नहीं टूटना चाहिए। समय-समय पर उन फसलों को सहलाना, गांव की चौपाल पर बैठना और अपनी जड़ों को सींचना हमारा कर्तव्य है। अगर तुम यह वादा करो कि तुम मुझे मेरी जड़ों से पूरी तरह नहीं काटोगे, तभी मैं इस कंक्रीट के जंगल में रुककर इन नन्हे पौधों को सींचूंगा।”

निशांत और रचना ने एक-दूसरे की तरफ देखा और दोनों की आँखें भर आईं। निशांत ने आगे बढ़कर अपने पिता के चरण छुए और बोला, “बाबूजी, यह शर्त नहीं, आपका हम पर सबसे बड़ा उपकार है। हम तो अपनी भागदौड़ में यह भूल ही गए थे कि गांव हमारा असली घर है। आपका यह आदेश हमें हमेशा मंजूर रहेगा।”

अगले ही हफ्ते से सोसाइटी के क्लब हाउस का कायाकल्प हो गया। दोपहर दो बजते ही आठ-दस बच्चे अपनी-अपनी बस्ते और पानी की बोतलें लेकर देवेन्द्र जी के पास पहुंच जाते। देवेन्द्र जी उन्हें न केवल पढ़ाई में आने वाली कठिनाइयां हल करना सिखाते, बल्कि उन्हें मिट्टी के खिलौने बनाना, पेड़-पौधों की देखभाल करना, योग, ध्यान और रामायण-महाभारत की प्रेरक कहानियां भी सुनाते। बच्चे जो कभी घरों में कैदी की तरह चीखते-चिल्लाते थे, अब वे दोपहर का बेसब्री से इंतजार करने लगे थे। उनके भीतर का आक्रामक स्वभाव धीरे-धीरे एक शांत और अनुशासित नदी की तरह बहने लगा था।

वक्त का पहिया तेजी से घूमा। हर दो महीने बाद जब देवेन्द्र जी गांव जाने की तैयारी करते, तो अब वे अकेले नहीं होते थे। सोसाइटी के कुछ बच्चे और उनके माता-पिता भी छुट्टियों में उनके साथ गांव जाने की जिद करने लगे थे।

आज गांव की चौपाल पर बैठकर देवेन्द्र जी जब हवा के झोंकों को महसूस करते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनकी जानकी कहीं दूर नहीं गई, बल्कि उन बच्चों की खिलखिलाहट में मुस्कुरा रही है। गांव के खेतों में सुनहरी फसलें मंद-मंद हवा में गुनगुना रही हैं, और उधर शहर के उस बेजान कंक्रीट के जंगल में, आठ-नौ मासूम कलियां जिंदगी, प्यार और संस्कारों का सच्चा पाठ पढ़कर एक खूबसूरत इंसान बनने की राह पर महक रही हैं।

आज के इस भागदौड़ भरे आधुनिक युग में जहां दोनों माता-पिता आजीविका के संघर्ष में दिन-रात जूझ रहे हैं, वहीं हमारे घर के बुजुर्ग अकेलेपन की त्रासदी झेल रहे हैं और बच्चे स्क्रीन की दुनिया में कैद होकर अपने संस्कारों और बचपन से दूर होते जा रहे हैं। क्या हमारे समाज में बुजुर्गों के अनुभव और बच्चों की मासूमियत का यह संगम एक नई सामाजिक क्रांति नहीं ला सकता? यदि हर परिवार और हर सोसाइटी अपने बुजुर्गों को ऐसा ही सम्मान और जिम्मेदारी सौंपे, तो क्या हमारे शहरों की तस्वीर नहीं बदल सकती? इस संवेदनशील विषय पर आपके अपने क्या विचार और अनुभव हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।

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