“इस घर में पत्ता भी हिलेगा तो मेरी आज्ञा से! जो मैंने कह दिया, वो पत्थर की लकीर है। अगर किसी को मेरे उसूलों पर चलना मंज़ूर नहीं, तो मेरी राह अलग और तुम्हारी अलग, मैं आज ही यह चौखट छोड़कर चला जाऊँगा।”
कभी इन भारी-भरकम शब्दों की गूँज से इस हवेलीनुमा घर की दीवारें तक काँप उठती थीं। यह सिर्फ एक धमकी नहीं थी, बल्कि पंडित दीनानाथ चतुर्वेदी का वह हथियार था, जिसके आगे उनके बूढ़े माता-पिता से लेकर उनकी सहमी हुई पत्नी और दोनों बेटे हमेशा सिर झुका लेते थे। खानदान के इकलौते बेटे होने के कारण बचपन से ही उनका हर नखरा सिर-आँखों पर रखा गया था। दीनानाथ जी को हमेशा यही लगता रहा कि घर एक रियासत है और वे उसके निरंकुश राजा। अगर कोई उनकी बात को ज़रा भी काटने की कोशिश करता, तो उनका वही पुराना तकियाकलाम शुरू हो जाता था। पूरा परिवार उनके इस हिटलर मिज़ाज के सामने हाथ बाँधे खड़ा रहता था। अगर कोई एक शख्स था जिसके सामने उनकी आँखें कभी-कभार नरम पड़ती थीं, तो वह थीं उनकी लाडली बेटी, पल्लवी।
लेकिन आज पूरे तीन साल बाद जब पल्लवी अपने मायके की उसी दहलीज पर पहुँची, तो उसे अपनी आँखों और कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था।
पल्लवी की शादी दोनों भाइयों से पहले हो गई थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद उसकी माँ, जानकी देवी, एक असाध्य बीमारी के चलते अचानक दुनिया छोड़कर चली गईं। माँ के जाने के बाद मायके का सारा आधार ही खिसक गया था। उसके बाद दोनों भाइयों—अमित और सुमित—के विवाह हुए, लेकिन पल्लवी कभी दो-चार दिनों से ज्यादा नहीं रुक पाई थी। ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ और दूरी के कारण वह जब भी आती, एक औपचारिकता निभाकर लौट जाती। इस बार छोटे भाई के घर बेटे का जन्म हुआ था। पल्लवी ने मन बना लिया था कि वह पूरे पंद्रह-बीस दिन रहकर अपने बाबूजी के साथ समय बिताएगी।
गाड़ी से उतरते वक्त पल्लवी के दिल में एक अनजाना सा डर और संकोच था। उसे लग रहा था कि माँ के बिना बाबूजी का वही पुराना रौब, वही कड़कपन घर के माहौल को कितना भारी बनाए रखता होगा। पता नहीं दो अलग-अलग परिवारों से आई दोनों भाभियाँ बाबूजी के उस तानाशाही मिज़ाज को कैसे झेलती होंगी। कहीं भाइयों के दबाव में घुट-घुट कर तो नहीं जी रही होंगी? क्या वे बाबूजी को माँ जितना सम्मान और देखभाल दे पाती होंगी?
पर जैसे ही पल्लवी ने घर में कदम रखा, उसे लगा मानो वह किसी दूसरे ही घर में आ गई हो।
सुबह के छह बजे थे। पल्लवी का कमरा बालकनी की तरफ खुलता था। वह अभी आँखें मलते हुए उठी ही थी कि दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। दरवाज़ा खुला और सामने बाबूजी खड़े थे। हाथ में सुंदर चीनी मिट्टी के कपों में भाप उड़ाती गरमा-गरम चाय की ट्रे थी। चेहरे पर एक सौम्य, सुकून भरी मुस्कान।
“अरे बाबूजी! आप? आप क्यों चाय बना रहे हैं? मुझे आवाज़ दे दी होती, मैं बना लेती,” पल्लवी हड़बड़ा कर उठी और उसने जल्दी से ट्रे अपने हाथ में ले ली। बचपन में तो बाबूजी ने खुद कभी पानी का एक लोटा तक नहीं उठाया था; ज़रा सी देर होती थी तो माँ पर बरस पड़ते थे।
दीनानाथ जी मंद-मंद मुस्कुराए, “अरे पल्लवी बेटा, बैठ आराम से। तू कितने दिनों बाद आई है, दो घूँट सुकून से पी। अब तो मुझे खुद ही सवेरे उठकर चाय बनाने की आदत हो गई है। अपने हाथ की अदरक वाली चाय का मज़ा ही कुछ और है। फिर सुबह-सुबह उठकर खाली बैठने से बेहतर है कि हाथ-पैर चलते रहें।”
तभी रसोई की तरफ से कुछ बर्तनों की खटपट सुनाई दी। पल्लवी ने चौंक कर कहा, “लगता है बड़ी भाभी जाग गई हैं, मैं ज़रा देखकर आती हूँ।”
“तू बैठ ना लाडली,” दीनानाथ जी ने बड़े प्यार से उसका हाथ पकड़कर वापस बिठा दिया। “बड़ी बहू को मैंने ही आवाज़ दी थी। सबकी चाय मैं सबके कमरों में देकर आ चुका हूँ।”
पल्लवी अवाक रह गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे याद आया कि जब माँ कभी तेज़ बुखार में खाट पकड़ लेती थीं, तब भी बाबूजी चाय की एक पत्ती तक नहीं छूते थे, बाहर से खाना मँगवा लिया जाता था या ननिहाल से किसी को बुलाना पड़ता था। और आज, वही बाबूजी पूरे घर को अपने हाथों से सुबह की चाय बाँट रहे थे!
पल्लवी चाय पीकर रसोई की तरफ गई। वहाँ बड़ी भाभी, रागिनी, खड़ी थीं। रागिनी सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं और सुबह की शिफ्ट में जाती थीं। छोटी भाभी, तूलिका, एक प्राइवेट फर्म में काम करती थीं लेकिन अभी-अभी माँ बनी थीं, इसलिए मातृत्व अवकाश पर थीं। सामान्य दिनों में घर का बँटवारा इस तरह था कि सुबह का मोर्चा रागिनी संभालती थीं और शाम को जब वह कोचिंग पढ़ाने जाती थीं, तब तूलिका घर देखती थीं। लेकिन अभी तूलिका आराम पर थीं, तो रागिनी पर काम का बोझ था।
तभी दीनानाथ जी रसोई में पहुँचे। उन्होंने आस्तीनें चढ़ा रखी थीं। “बहू रागिनी, मैंने आलू उबाल कर छील दिए हैं और पराठों के लिए आटा भी नरम गूँथ कर रख दिया है। तुम बस गरमा-गरम पराठे सेक लो, ताकि स्कूल के लिए देर न हो।”
रागिनी ने बहुत ही सहज और स्नेहिल मुस्कान के साथ कहा, “अरे वाह, शुक्रिया पापा जी! आपने तो मेरा आधा काम आसान कर दिया। मैं बस दस मिनट में नाश्ता मेज़ पर लगाती हूँ।”
‘पापा जी!’ पल्लवी के कानों में यह शब्द गूँज उठा। कभी ‘पापा’ या ‘डैडी’ जैसे आधुनिक शब्दों को सुनकर बिफर जाने वाले और ‘बाबूजी’ कहलाने पर अड़ जाने वाले उसके पिता, आज अपनी बहुओं से ‘पापा जी’ सुनकर इतने तृप्त और शांत कैसे दिख रहे थे?
रसोई में आलू छीलते हुए दीनानाथ जी धीरे से रागिनी से कह रहे थे, “बहू, छोटी बहू को रात में बच्चा तंग करता है, उसे नौ बजे तक सोने देना। मैंने उसके लिए दूध ढक कर रख दिया है।”
पल्लवी दूर खड़ी सब देख रही थी। उसके मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था। कभी उसे भाभियों की किस्मत पर थोड़ी ईर्ष्या होती कि जो प्यार, जो नरमी उसकी माँ को अपनी पूरी ज़िंदगी में नसीब नहीं हुई, वह आज इन बहुओं को कितनी सहजता से मिल रही थी। और दूसरी तरफ माँ के लिए एक बेपनाह दर्द उमड़ रहा था। काश, माँ आज जीवित होतीं और अपने पति का यह रूप देख पातीं!
शाम ढलते ही रागिनी कोचिंग चली गई। घर में अब तूलिका अपने बच्चे को लेकर बैठी थी। दीनानाथ जी बच्चे को गोद में लेकर दालान में टहल रहे थे और तूलिका से बड़ी आत्मीयता से बातें कर रहे थे। “तूलिका बेटा, रागिनी आज सुबह कह रही थी कि तुम्हें दलिया में थोड़ा मेवे का पाउडर डालकर खाना चाहिए। मैंने मिक्सी में पीस कर रख दिया है, दूध में उबाल कर पी लेना।”
तूलिका ने आदर से कहा, “जी पापा जी, आप बैठ जाइए, मैं बच्चे को ले लेती हूँ, आपके हाथ दुखने लगेंगे।”
“अरे नहीं-नहीं, अपने पोते को खिलाने में कैसी थकान!” दीनानाथ जी हँस पड़े।
पल्लवी से अब और चुप नहीं रहा गया। रात को जब खाना खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए और दीनानाथ जी दालान में आरामकुर्सी पर बैठे थे, पल्लवी उनके पास जाकर बैठ गई। उसने दीनानाथ जी का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“बाबूजी, मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या देख रही हूँ। आप… आप इतना कैसे बदल गए? वो दहाड़ मारने वाले बाबूजी, जिनकी एक हुंकार से पूरा घर काँप जाता था, आज इतने शांत, इतने सहयोगी और इतने सरल कैसे हो गए? क्या आपको कभी गुस्सा नहीं आता? क्या यह वही घर है जहाँ आपकी मर्जी के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता था?”
दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर एक हल्की सी उदासी और उसके पीछे छिपा हुआ गहरा ज्ञान तैर गया। वे थोड़ी देर खामोश रहे, फिर एक हल्का सा ठहाका लगाया, जिसमें खुशी कम और अपने गुज़रे कल का पछतावा ज्यादा था।
“मुझे मालूम था लाडली, तू यही सोच रही होगी। तू सोच रही होगी कि कभी शेर बनकर पूरे घर पर हुक्म चलाने वाला तेरा बाप आज इतना भीगी बिल्ली कैसे बन गया, है ना?”
“नहीं बाबूजी, मेरा वो मतलब नहीं था…” पल्लवी झेंप गई।
“नहीं बेटा, तू सच कह रही है,” दीनानाथ जी की आवाज़ भारी हो गई। “इंसान को बदलना पड़ता है पल्लवी। अगर उसे ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में सचमुच जीना है, अपनों के बीच रहकर सुकून की साँस लेनी है, तो अपनी झूठी अकड़ को उतार फेंकना ही पड़ता है। गलती मेरी ही थी। मैंने अपनी जवानी और अपने पौरुष के दंभ में कभी किसी को अपने करीब आने ही नहीं दिया। तेरे दोनों भाई बचपन से ही मुझसे इतना खौफ खाते थे कि कभी अपने दिल की बात नहीं कह पाए। आज वे बड़े हो गए हैं, कमाते हैं, पर उनके पास न मेरे लिए वक्त है और न ही वो मुझसे खुलकर बात कर पाते हैं।”
दीनानाथ जी की आँखों में नमी तैर आई। उन्होंने आगे कहा, “तेरी विदाई हो गई और फिर अचानक तेरी माँ चली गई। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि मैं उस भरे-पूरे मकान में कितना अकेला, कितना लाचार और कितना खोखला था। कोई मुझसे बात करने वाला नहीं था। सब मेरा आदर करते थे, पर डर के मारे। उस अकेलेपन ने मुझे इस कदर तोड़ दिया था कि कई बार रात के सन्नाटे में मुझे अपने जीवन को ही समाप्त कर लेने के काले विचार आने लगे थे।”
पल्लवी सिहर उठी। उसने बाबूजी का हाथ कसकर थाम लिया।
“फिर एक दिन,” दीनानाथ जी बोले, “तेरी माँ की बरसी के कुछ दिनों बाद, मैं बहुत उदास था। मैंने तेरी माँ की पुरानी लोहे की अलमारी खोली। उसकी साड़ियों के बीच, एक कोने में मुझे एक नीली जिल्द वाली डायरी मिली। तेरी माँ को जब भी मैं अपनी तानाशाही से चुप करा देता था, जब भी मैं उस पर चिल्लाता था, वो बेचारी रोते हुए उस डायरी में अपने दिल का दर्द लिख लेती थी। उस पूरी डायरी में वही बातें थीं जो वो मुझसे कहना चाहती थी, पर मेरे डर से कभी नहीं कह पाई। तू रुक, मैं तुझे पढ़कर सुनाता हूँ।”
दीनानाथ जी उठे और अपने कमरे से एक पुरानी, थोड़ी मुड़ी हुई डायरी ले आए। उन्होंने चश्मा लगाया और कांपती उंगलियों से उसका आखिरी पन्ना खोला।
“यह संदेश तेरी माँ ने अपनी ज़िंदगी के आखिरी दिनों में, जब उसे अपनी बीमारी का अहसास हो गया था, मेरे नाम लिखा था। सुन…” दीनानाथ जी का गला रुंध गया, पर उन्होंने पढ़ना शुरू किया:
‘सुनिए, आप बुरे इंसान नहीं हैं। आपके दिल में परिवार के लिए प्यार है, लेकिन आपको वक्त के साथ बदलना नहीं आया। बचपन का लाड़-प्यार, जवानी का घमंड और इस पुरुष प्रधान सोच के घेरे में आपने खुद को इस कदर कैद कर लिया है कि आपको लगता है सिर्फ आपका हुक्म ही सही है। ‘मुझे ना सुनना पसंद नहीं है’ और ‘मैं घर छोड़ दूँगा’ जैसी धमकियों ने आपको अपनों से बहुत दूर कर दिया है।
आपके इस मिज़ाज को आपके माँ-बाप ने सहा, मैंने अपनी पूरी उम्र सिर झुकाकर इसे स्वीकार किया, और बच्चों ने भी डर-डर कर इसमें जीना सीख लिया। लेकिन याद रखिए, कल को घर में बहुएँ आएँगी। वे दूसरे घरों की बेटियाँ हैं, आज के नए ज़माने की हैं। वे आपके इस डर और तानाशाही को स्वीकार नहीं करेंगी। मान लीजिए, किसी दिन आपने गुस्से में कह दिया कि ‘जो मैंने कह दिया वही होगा, वरना मैं घर छोड़कर चला जाऊँगा’… और उस दिन किसी बहू ने सहजता से कह दिया, ‘ठीक है बाबूजी, जैसी आपकी मर्जी, जाइए’… तब आप कहाँ जाएँगे? आपकी उस झूठी ठसक का क्या होगा?
समय रहते खुद को बदलिए। घर डराने से नहीं, प्यार और सहयोग से चलता है। अगर आप झुकना नहीं सीखेंगे, तो एक दिन बिल्कुल अकेले रह जाएँगे और यह हवेली आपको निगल जाएगी। अभी भी देर नहीं हुई है, रिश्तों को सींचना सीखिए। आगे आप खुद समझदार हैं…’
डायरी की वो पंक्तियाँ खत्म होते ही दीनानाथ जी की आँखों से आँसू टपक कर पन्नों पर गिर पड़े। पल्लवी भी अपने आँसुओं को रोक नहीं पाई।
दीनानाथ जी ने डायरी को अपनी छाती से लगा लिया। “पल्लवी, उस दिन मैं एक बच्चे की तरह घंटों उस कमरे में रोया। तेरी माँ जीते-जी मुझे समझाती रही, पर मैं अपनी हठधर्मी में अंधा बना रहा। वह जाते-जाते मेरी आँखें खोल गई। उसने मुझे समझा दिया कि अगर मुझे इस घर में एक बुज़ुर्ग की तरह पूजे जाने के बजाय एक पिता की तरह प्यार पाना है, तो मुझे अपनी इस अकड़ की अर्थी निकालनी होगी।”
“बाबूजी…” पल्लवी की आवाज़ भर्रा गई।
“खुद को बदलना आसान नहीं था लाडली,” दीनानाथ जी मुस्कुराए, एक ऐसी मुस्कान जो आत्मा को छू जाए। “पैंसठ साल की उम्र में अपनी पुरानी आदतों को छोड़ना पहाड़ तोड़ने जैसा था। लेकिन मैंने तय किया कि जिस सम्मान की हकदार तेरी माँ थी और मैं उसे नहीं दे पाया, उस पाप का प्रायश्चित मैं अपनी बहुओं को बेटी का प्यार देकर करूँगा। अगर मैं आज भी नहीं बदलता, तो ऊपर जाकर तेरी माँ को क्या मुँह दिखाता? मुझे इस बात का मलाल तो ज़िंदगी भर रहेगा कि मैं उसके सामने नहीं बदल सका, लेकिन मुझे संतोष है कि वह जहाँ भी होगी, आज अपने इस बदले हुए परिवार को देखकर मुस्कुरा रही होगी।”
दीनानाथ जी ने पल्लवी के सिर पर हाथ फेरा, “आज जब मैं बहुओं की मदद करता हूँ, तो मुझे कोई शर्म नहीं आती। आज वे मुझसे डरती नहीं हैं, वे मुझसे प्यार करती हैं। मेरे दोनों बेटे अब मुझसे आँखें चुराकर नहीं निकलते, वे मुझसे सलाह लेते हैं। मैंने अपना हुक्म खो दिया पल्लवी, पर मैंने अपना पूरा परिवार वापस पा लिया।”
पल्लवी ने अपने बाबूजी को कसकर गले से लगा लिया। उस रात दालान में कोई कड़क मिज़ाज शासक नहीं था, बल्कि एक ऐसा पिता था जिसने अपनी ईगो की बलि देकर अपने घर को एक सच्चा स्वर्ग बना दिया था। पल्लवी को अब अपनी माँ के लिए दुख नहीं था, उसे गर्व था अपनी उस माँ पर, जिसने जाते-जाते भी अपने मौन शब्दों से एक उजड़ते हुए रिश्ते को नई ज़िंदगी बख्श दी थी।
अगली सुबह जब धूप आँगन में फैली, तो पूरा घर हँसी-ठिठोली से गूँज रहा था। दीनानाथ जी अपने पोते को गोद में लिए दोनों बहुओं के साथ बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। सचमुच, वक्त के साथ ढल जाना ही जीवन का सबसे खूबसूरत सच है।
प्रिय पाठकों,
क्या परिवार के बड़े-बुजुर्गों को अपनी पुरानी मान्यताओं और अहंकार को छोड़कर नई पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए? क्या आपको लगता है कि झुकना कमज़ोरी नहीं, बल्कि रिश्तों को बचाए रखने की सबसे बड़ी ताकत है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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