साक्षात देवी के चरण

रंजना ने शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद आत्मीयता से समझाया, “शिखा, ईश्वर ने न कोई जाति बनाई है, न कोई वर्ण। मां भगवती किसी कुल या अमीरी-गरीबी की मोहताज नहीं हैं। जहां अभाव है, जहां भूख है, वहीं सेवा का सच्चा अर्थ है। जो पहले से ही तृप्त हैं, उन्हें और खिलाना केवल एक सामाजिक औपचारिकता हो सकती है; लेकिन जो भूखा है, उपेक्षित है, उसे सम्मानपूर्वक बैठाकर भोजन कराना ही सच्ची पूजा है। आशीर्वाद किसी के अमीर होने से नहीं मिलता, आशीर्वाद तो तब बरसता है जब किसी भूखे पेट को तृप्ति मिलती है और उसके अंतर्मन से दुआएं निकलती हैं। 

आश्विन मास की गुलाबी ठंड ने अभी-अभी दस्तक दी थी और शहर के हर कोने में दुर्गा पूजा व शारदीय नवरात्रि के भजनों की गूंज सुनाई दे रही थी। शिखा अपनी बड़ी बहन रंजना के घर भोपाल आई हुई थी। रंजना का घर हमेशा से संस्कारों और धार्मिक रीति-रिवाजों का गढ़ रहा था। घर के आंगन में सजी सुंदर रंगोली और पूजा कक्ष से आती धूप-दीप व हवन की सौंधी खुशबू पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना रही थी। अष्टमी की दोपहर का समय था। घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे थे और रसोई में महाप्रसाद की मीठी सुगंध धीरे-धीरे तैरने लगी थी।

शिखा और रंजना ड्राइंग रूम में बैठकर घर-परिवार की बातें कर रही थीं कि अचानक मुख्य लोहे के गेट पर कुछ हल्की-सी खटखटाहट और बच्चों की चहकती फुसफुसाहट सुनाई दी। रंजना के चेहरे पर एक कोमल मुस्कान तैर गई, जैसे वह उसी आहट का इंतजार कर रही थीं। उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और उठकर दरवाजे की ओर बढ़ चलीं। शिखा भी उत्सुकतावश अपनी बड़ी दीदी के पीछे-पीछे चल पड़ी कि इस दोपहर के पहर में कौन आया होगा।

दरवाजा खोलते ही शिखा के कदम ठिठक गए। बाहर गली के गेट के पास चार-पांच छोटी बच्चियां खड़ी थीं। उनके पैरों में घिसी हुई चप्पलें थीं, कुछ तो नंगे पैर ही थीं। उनके बाल थोड़े बिखरे थे और सूती फ्रॉकें कई जगह से धुल-धुल कर फीकी पड़ चुकी थीं, हालांकि वे पूरी तरह साफ थीं। उनमें से एक आठ-नौ साल की सांवली सी लड़की, जिसकी बड़ी-बड़ी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, रंजना को देखते ही खिलखिला उठी।

वह बिना किसी झिझक के बड़े अपनेपन से बोली, “बड़ी दीदी! कल नवमी है न? हम सब कब आएं? छोटी मुन्नी भी कह रही थी कि दीदी के घर पूड़ी और हलवा खाने चलना है। कितने बजे आना है?”

रंजना ने आगे बढ़कर उस बच्ची के सिर पर बेहद दुलार से हाथ फेरा और प्यार से बोलीं, “अरे वाह गुड्डी, मैं तो तुम्हें ही बुलाने वाली थी। तुम सब कल ठीक दस बजे अपनी पूरी टोली के साथ आ जाना। और हां, अपने साथ उस नन्हे गोलू को भी ले आना, भैरव बाबा के रूप में। याद रहेगा न?”

बच्ची खुशी से ताली बजाते हुए उछल पड़ी, “हाँ दीदी! हम सब सुबह ही कुएं पर नहाकर, अपनी सबसे अच्छी वाली फ्रॉक पहनकर ठीक दस बजे हाजिर हो जाएंगे!” इतना कहकर वे मासूम बच्चियां हंसती-खिलखिलाती हुई गली के नुक्कड़ की ओर दौड़ गईं।

शिखा यह पूरा दृश्य देखकर स्तब्ध रह गई थी। उसके चेहरे पर असमंजस और अस्वीकार्यता के भाव साफ झलक रहे थे। जैसे ही रंजना ने मुख्य द्वार बंद किया, शिखा से रहा नहीं गया। उसने कुछ हिचकिचाहट और कुछ तल्खी के साथ पूछा, “दीदी! ये कौन लड़कियां थीं? और यह कैसी अजीब बात है कि कन्याएं खुद चलकर दरवाजे पर पूछने आ रही हैं कि हमें कब खिलाओगी? क्या आपने इन्हें कल कन्या-भोज के लिए बुलाया है? दीदी, ये तो झुग्गी-झोपड़ी की बच्चियां लग रही हैं!”

रंजना ने सहज भाव से मुस्कुराते हुए शिखा का हाथ पकड़ा और उसे सोफे पर बैठाते हुए बोली, “हाँ शिखा, ये पास की रेलवे पटरी के किनारे बसी बस्ती के मजदूरों की बेटियां हैं। कल नवमी के दिन मैं इन्हीं को कन्या-पूजन के लिए आमंत्रित करती हूँ।”

शिखा का माथा ठनका। उसने तुरंत अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा, “दीदी, लेकिन यह हमारे कुल के नियमों के बिल्कुल उलट है! हमारी दादी और माँ हमेशा कहती आई हैं कि कन्या-पूजन के लिए अच्छे, संभ्रांत और उच्च वर्ण के घरों की बच्चियों को पूरे मान-सम्मान के साथ, उनके घर जाकर नेवता देकर बुलाया जाता है। उनके घर हाथ जोड़कर विनती करनी पड़ती है तब जाकर वे अपनी बच्चियों को भेजते हैं। और यहां… ये खुद आकर मांग रही हैं! इनका रहन-सहन, इनका कुल… दीदी, शास्त्र और परंपराएं भी तो कोई चीज होती हैं! क्या ऐसे कन्या-भोज का पुण्य हमें मिलेगा?”

शिखा की बात सुनकर रंजना बिल्कुल भी नाराज नहीं हुईं। वे जानती थीं कि शिखा वही बोल रही है जो समाज ने पीढ़ियों से उसकी आंखों पर चश्मे की तरह चढ़ा रखा है। रंजना ने एक गहरी सांस ली, पानी का गिलास शिखा की ओर बढ़ाया और शांत स्वर में अपनी बात कहनी शुरू की।

“शिखा, तू जो कह रही है, चार साल पहले तक मैं भी हूबहू वैसा ही सोचती थी। हर नवरात्रि पर मेरी भी वही दौड़धूप होती थी। अष्टमी और नवमी की सुबह मैं अपनी सोसायटी के बड़े-बड़े फ्लैटों के चक्कर काटती थी। किसी पड़ोसन के घर जाकर हाथ जोड़ती कि अपनी बिटिया को आधे घंटे के लिए भेज दीजिए। पर वहां क्या होता था? कोई कहती कि मेरी बेटी अभी सोकर नहीं उठी है, कोई कहती कि वह पहले ही तीन घरों में खा चुकी है, उसका पेट भरा है, वह हलवा-पूड़ी नहीं खाती, उसे केवल चॉकलेट या पिज्जा पसंद है। कई बार तो बच्चियां थाली में आधा-अधूरा भोजन छोड़ देती थीं और हम जो उपहार उन्हें प्रेम से देते, वे उसे एक तरफ फेंककर कहती थीं कि यह खिलौना या टिफिन तो उनके पास पहले से है। उस पूरे पूजन में औपचारिकता तो भरपूर होती थी शिखा, लेकिन कहीं भी तृप्ति का वह भाव नहीं दिखता था जिसके लिए हम यह सब करते हैं।”

रंजना की आंखों में पुरानी यादें तैरने लगीं। वे खिड़की के बाहर देखते हुए आगे बोलीं, “फिर एक दिन मेरे जीवन की सोच ही बदल गई। तीन साल पहले की बात है, मैं चैत्र नवरात्रि के दौरान शहर के बड़े देवी मंदिर में दर्शन करने गई थी। मंदिर के गर्भगृह में लोग मां भगवती के चरणों में मेवे, सोने-चांदी के छत्र और छप्पन भोग अर्पित कर रहे थे। लेकिन जब मैं सीढ़ियों से नीचे उतरी, तो मैंने देखा कि चिलचिलाती धूप में, फटे कपड़ों में लिपटी दो छोटी बच्चियां मंदिर की सीढ़ियों पर गिरी जूठी पूड़ियों के टुकड़ों को बीनकर अपनी हथेली पर रख रही थीं और उन्हें बड़े चाव से खा रही थीं। उनके चेहरे पर भूख की गहरी कालिमा थी, लेकिन आंखों में एक टुकड़ा रोटी मिल जाने की बेबसी भरी चमक थी।”

रंजना का गला भर आया। उन्होंने अपनी भीगी आंखों को पल्लू से पोंछते हुए कहा, “शिखा, उस दिन मेरे दिल पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो। मैं सोचने लगी कि हम पत्थर की मूरत को छप्पन भोग लगाकर तृप्त करने का ढोंग करते हैं, और जिन जीवित कन्याओं में उसी मां जगदम्बा का अंश वास करता है, वे भूख से बिलखती हुई कचरे के पास खड़ी हैं। संपन्न घरों के बच्चे, जिन्हें रोज़ मेवे, फल, दूध और मनपसंद पकवान मिलते हैं, उन्हें हम जबरदस्ती थाली में हलवा परोसकर पुण्य कमाने का दिखावा करते हैं; जबकि इन भूखी मासूमों को हम तिरस्कार से दूर भगा देते हैं। उसी क्षण मेरे भीतर एक क्रांति हुई।”

शिखा चुपचाप अपनी दीदी का चेहरा देख रही थी। उसके भीतर का विरोध अब धीरे-धीरे संकोच और विस्मय में बदलने लगा था।

रंजना ने बात जारी रखी, “मंदिर से लौटते ही मैंने अपने घर में झाड़ू-पोछा करने वाली कमला से बात की। कमला वहीं पास की बस्ती में रहती है, उसके पति की बीमारी में मृत्यु हो चुकी है और वह मेहनत-मजदूरी करके अपने तीन बच्चों को पालती है। मैंने कमला से कहा कि कमला, क्या तुम कल अपनी दोनों बेटियों और बस्ती की कुछ और बच्चियों को मेरे घर कन्या-भोज के लिए भेज सकती हो? शिखा, तू विश्वास नहीं करेगी, मेरी बात सुनते ही कमला के हाथ से पोछा छूट गया। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह मेरे पैरों में झुकने लगी और कांपती आवाज में बोली—’मेमसाब! क्या सचमुच आप हमारे अछूत और गरीब बच्चों को अपनी पूजा में बैठाएंगी? हमारे बच्चे तो कभी किसी बड़े घर की दहलीज के भीतर कदम भी नहीं रख पाए।’ उस दिन मुझे समझ आया कि हमारे बनाए सामाजिक भेदभाव ने इन गरीबों के आत्मसम्मान को कितना कुचला है।”

“फिर क्या हुआ दीदी?” शिखा ने उत्सुकता से पूछा।

“अगले दिन सुबह नौ बजे ही कमला अपनी बेटियों और पड़ोस की सात और लड़कियों को लेकर आई। वे सब इतनी सज-धज कर आई थीं कि देखकर मेरी आंखें भर आईं। उनके कपड़े भले ही पुराने और कई जगह से रफू किए हुए थे, लेकिन वे एकदम धुले हुए और साबुन की महक से महक रहे थे। उनके गीले बालों में करीने से तेल लगाकर चोटियां गूंथी गई थीं और आंखों में थोड़ा-थोड़ा काजल लगा था। जब मैंने चांदी की परात में गुनगुना पानी लेकर उनके नन्हे, धूल-धूसरित पैरों को धोना शुरू किया, तो वे मासूम लड़कियां सकुचाने लगीं। उनके पैरों को छूते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए शिखा। मुझे लगा कि सदियों की रूढ़ियों की मैल आज इन आंसुओं से धुल रही है।”

रंजना के चेहरे पर एक दिव्य तेज दिखाई देने लगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “जब मैंने उन्हें आसन पर बैठाकर गर्मागर्म पूड़ियां, चना और हलवा परोसा, तो उन्होंने जिस आदर और तृप्ति के साथ उस भोजन को ग्रहण किया, वह देखने लायक था। एक-एक कौर खाते हुए उनके चेहरे पर जो संतुष्टि और आनंद की चमक थी, वह मैंने आज तक किसी अमीर घर के बच्चे के चेहरे पर नहीं देखी थी। उन्होंने एक दाना भी थाली में बर्बाद नहीं किया। पेट भरने के बाद जब मैंने उन्हें विदाई में नए फ्रॉक, बालों की सुंदर रिबन, रंग-बिरंगी चूड़ियां और कुछ दक्षिणा दी, तो उन बच्चियों की आंखों में जो कृतज्ञता और उल्लास था, उसने मेरे पूरे घर को आलोकित कर दिया। जब उन्होंने हाथ जोड़कर मेरे सिर पर हाथ रखा, तो मुझे स्पष्ट लगा कि साक्षात मां जगदम्बा ने मुझे अपनी गोद में समेट लिया हो। उस दिन जो असीम मानसिक शांति और आत्मिक संतोष मुझे मिला, वह लाखों मंत्रों के जाप से भी कभी नहीं मिला था।”

रंजना ने शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद आत्मीयता से समझाया, “शिखा, ईश्वर ने न कोई जाति बनाई है, न कोई वर्ण। मां भगवती किसी कुल या अमीरी-गरीबी की मोहताज नहीं हैं। जहां अभाव है, जहां भूख है, वहीं सेवा का सच्चा अर्थ है। जो पहले से ही तृप्त हैं, उन्हें और खिलाना केवल एक सामाजिक औपचारिकता हो सकती है; लेकिन जो भूखा है, उपेक्षित है, उसे सम्मानपूर्वक बैठाकर भोजन कराना ही सच्ची पूजा है। आशीर्वाद किसी के अमीर होने से नहीं मिलता, आशीर्वाद तो तब बरसता है जब किसी भूखे पेट को तृप्ति मिलती है और उसके अंतर्मन से दुआएं निकलती हैं। इसीलिए, अब हर साल ये बच्चियां पूरे अधिकार और अपनेपन से यहां आती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि यह घर उनका तिरस्कार नहीं करता, बल्कि उन्हें साक्षात देवी मानकर उनका सत्कार करता है।”

दीदी की बातें सुनकर शिखा के मन का सारा मैल, सारी रूढ़िवादिता एक ही झटके में बह गई। उसकी आंखों में पश्चाताप और ज्ञान के मिले-जुले आंसू छलक आए। उसने अपनी दीदी के हाथ अपने हाथों में ले लिए और रुंधे गले से बोली, “दीदी, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं शास्त्रों के शब्दों को तो रटती रही, लेकिन उनके वास्तविक मर्म को कभी समझ ही नहीं पाई। आपने मुझे धर्म का वह सच्चा स्वरूप दिखाया है जो किताबों से परे सीधे मानवता से जुड़ता है। कल की नवमी पर कन्याओं के पैर मैं अपने हाथों से धोऊंगी और उनके लिए खीर-हलवा भी मैं ही बनाऊंगी।”

रंजना ने प्यार से शिखा को गले से लगा लिया।

अगली सुबह जब घड़ी में दस बजे, तो घर की घंटी बजी। दरवाजे पर वही नन्ही बच्चियां खड़ी थीं—बालों में लाल रिबन लगाए, साफ-सुथरी फ्रॉक पहने और चेहरों पर मासूम मुस्कान लिए। उनके साथ छोटा सा बालक गोलू भी तिलक लगाए खड़ा था। शिखा ने दौड़कर दरवाजा खोला और दोनों हाथ जोड़कर, झुककर बोली, “आइए मातेश्वरी, आपका यह घर बेसब्री से इंतजार कर रहा था।”

उस दिन घर के आंगन में जब उन कन्याओं के ठहाके गूंजे और उनके नन्हे हाथों ने भोजन के बाद शिखा और रंजना के सिर पर आशीर्वाद स्वरूप हाथ रखे, तो धूप की हर किरण में ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात मां दुर्गा अपनी नौ शक्तियों के साथ मुस्कुरा रही हों। परंपराएं जब करुणा का आभूषण पहनती हैं, तभी वे सचमुच पावन बनती हैं।

पाठकों के लिए एक विचारणीय प्रश्न:

क्या हमारे धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ का असली उद्देश्य केवल सदियों पुरानी लकीर पीटना और औपचारिकता निभाना है, या फिर समाज के उपेक्षित, जरूरतमंद और भूखे चेहरों पर सच्ची मुस्कान लाना ही ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना है? कन्या-पूजन के इस नए और संवेदनशील दृष्टिकोण पर आपकी क्या राय है? अपने अनमोल विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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