नेकी की खनकती चूड़ियां

 सावित्री के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कांपती आवाज में कहा, “जब धीरज अस्पताल में थे, तो वेयरहाउस वालों ने बिना कोई मुआवजा दिए उनकी जगह किसी दूसरे नौजवान लड़के को काम पर रख लिया। पिछले डेढ़ महीने से मेरे पति बिस्तर पर लाचार पड़े हैं। उनके इलाज और दवाओं में हमारी सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई। मकान मालिक पिछले तीन दिनों से दरवाजे पर आकर किराए के लिए तकादा कर रहा है। घर में सिर्फ दो दिन का आटा बचा है, दूध वाले का हिसाब बाकी है। दीदी, जिस घर में शाम को बच्चों के निवाले के लाले पड़े हों, वहां की औरत अपने हाथों में कांच की चूड़ियां कैसे सजा सकती है? मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं बची है।”

दुपहर की तपती धूप धीरे-धीरे ढल रही थी और ग्यारह नंबर वाली गली के पुराने नीम के पेड़ के नीचे एक फेरीवाले की गूंजती हुई आवाज सन्नाटे को तोड़ रही थी। “कांच की खनकती चूड़ियां ले लो… सुहाग के रंग, लाल, हरी और सुनहरी चूड़ियां ले लो… आ गया फिरोजाबाद के कारीगरों का हुनर सीधे आपकी दहलीज पर!”

सावित्री उस वक्त अपने छोटे से रसोईघर में शाम की चाय के लिए पानी चढ़ा रही थी। चूड़ी वाले की खनखनाहट और मीठी आवाज जब कानों में पड़ी, तो एक पल के लिए उसका हाथ रुक गया। हर स्त्री की तरह उसे भी हरी और लाल चूड़ियों का बेहद शौक था। मन में एक गहरी हूक उठी कि बाहर जाकर देखे तो सही कि आज कौन-कौन से नए रंग गली में बिखरे हैं। उसने चूल्हे की आंच एकदम धीमी की और जंग लगी खिड़की से चुपके से गली की तरफ झांकने लगी।

गली में नीम के पेड़ के नीचे चूड़ी वाले ने अपनी बड़ी सी टोकरी जमीन पर सजा रखी थी। मखमली गद्दियों पर सजी कांच की चमकदार चूड़ियां धूप में चमक रही थीं। ठीक उसी समय सामने वाले बड़े से दो मंजिला मकान से मालती शर्मा बाहर निकलती दिखाई दीं। मालती जी स्वभाव से बेहद जिंदादिल, खुले दिल वाली और मोहल्ले में सबकी चहेती थीं। उनके पति सरकारी स्कूल में उप-प्राचार्य थे और घर में किसी चीज की कोई तंगी नहीं थी। मालती जी गली में आने वाले हर छोटे-मोटे फेरीवाले, सब्जी वाले और खिलौने वाले की हमेशा कद्र करती थीं।

मालती जी ने टोकरी के पास बैठकर तुरंत अपने और अपनी बहू के लिए आठ दर्जन चूड़ियां अलग करवा लीं। उनकी देखा-देखी आसपास के तीन-चार घरों की महिलाएं भी वहां जुट गईं। कोई नीली चूड़ियां छांट रही थी, तो कोई लाख के कड़े पसंद कर रही थी। तभी मालती जी की नजर ऊपर खिड़की के पीछे खड़ी सावित्री पर पड़ी। सावित्री खिड़की के पर्दे की ओट से बड़ी हसरत भरी नजरों से उस सजी हुई टोकरी को निहार रही थी।

मालती जी ने तुरंत हाथ हिलाते हुए ऊंची आवाज में कहा, “अरे सावित्री बहू! ऊपर खिड़की में क्या छिपी हो? जरा नीचे तो आओ! देखो कितने प्यारे रंग लाया है भैया। करवा चौथ और अहोई अष्टमी का त्योहार सिर पर है, अभी से शगुन की चूड़ियां खरीद कर रख लो। बाद में भीड़-भाड़ वाले बड़े बाजारों में यही चीजें तिगुने दामों में मिलती हैं। आओ, दो दर्जन अपने लिए भी छांट लो!”

गली में खड़ी दूसरी पड़ोसनों ने भी सहमति में सिर हिलाया। मालती जी ने उस चूड़ी वाले के पसीने से भीगे कुर्ते और उसके थके हुए चेहरे को देखकर भावुक होते हुए सभी महिलाओं से कहा, “हम सब मॉल और बड़े-बड़े एसी शोरूमों में जाकर बिना मोलभाव किए हजारों रुपये लुटा आती हैं। वहां हमें बिल भरने में गर्व महसूस होता है। पर सोचो, ये गरीब फेरीवाले कितनी मेहनत से अपनी पीठ पर इतना भारी बोझ उठाए गली-गली घूमते हैं। अगर हम इन जैसे मेहनती लोगों से दो पैसे का सामान खरीद लेंगी, तो हमारी जेब पर कोई पहाड़ नहीं टूटेगा, लेकिन इनके घर का चूल्हा जरूर जल उठेगा।”

खिड़की से झांकती सावित्री का गला रुंध आया। उसने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाते हुए ऊपर से ही हाथ जोड़कर कहा, “दीदी, आज रहने दीजिए। दूध उबलने के लिए रखा है और मुझे कपड़े भी समेटने हैं। मैं फिर कभी ले लूंगी।”

मालती जी कोई कच्ची खिलाड़ी नहीं थीं। उन्होंने सावित्री की आवाज में छिपी झिझक और आंखों में तैरती नमी को भांप लिया। उन्होंने नीचे खड़ी महिलाओं से कहा, “तुम लोग अपनी-अपनी पसंद निकालो, मैं जरा सावित्री को हाथ पकड़कर नीचे लेकर आती हूं। त्योहार का शगुन तो सबको करना चाहिए।”

मालती जी तुरंत सीढ़ियां चढ़कर सावित्री के फ्लैट के दरवाजे पर पहुंच गईं और घंटी बजा दी। दरवाजा खुलते ही सावित्री ने सकुचाते हुए मालती जी को भीतर आने का न्योता दिया। छोटा सा एक कमरा, जिसमें जरूरत का बहुत सीमित सामान करीने से सजा हुआ था। दीवारों पर सीलन की गंध थी, जो घर की तंगहाली को साफ बयां कर रही थी। सावित्री ने प्लास्टिक की एक कुर्सी आगे बढ़ाते हुए कहा, “दीदी, आप बैठिए, मैं आपके लिए पानी लाती हूं।”

मालती जी ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपने पास सोफे के किनारे बिठा लिया और नरमी से पूछा, “सावित्री, तू मुझसे नजरें क्यों चुरा रही है? पिछले कुछ हफ्तों से देख रही हूं कि तू घर से बाहर नहीं निकलती, किसी से मिलती-जुलती नहीं। क्या बात है? अगर कोई बात है तो अपनी इस बड़ी बहन से साझा कर।”

मालती जी का अपनत्व भरा स्पर्श पाते ही सावित्री का सब्र का बांध टूट गया। उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसने अपने आंचल से मुंह ढक लिया। मालती जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए ढांढस बंधाया, “रो मत पगली, मुझे बता क्या परेशानी है?”

सावित्री ने सिसकते हुए कहना शुरू किया, “दीदी, आपको तो पता है कि मेरे पति धीरज एक निजी वेयरहाउस में माल ढुलाई और पैकिंग का काम करते थे। महीने के बमुश्किल बारह हजार रुपये मिलते थे। उसी से हम अपने दो छोटे बच्चों की स्कूल की फीस, घर का तीन हजार रुपये किराया, बिजली-पानी का बिल और राशन का खर्च खींचतान कर पूरा करते थे। धीरज दिन-रात काम में जुटे रहते थे, कभी इतवार को भी आराम नहीं करते थे ताकि कुछ ओवरटाइम मिल जाए।”

सावित्री ने एक लंबी सांस ली और आगे बताया, “पिछले महीने गोदाम में भारी लोहे की पेटी उठाते समय उनका पैर फिसल गया। पेटी सीधे उनकी कमर और रीढ़ पर आ गिरी। मालिक ने उन्हें फौरन अस्पताल तो पहुंचाया, लेकिन कुछ ही दिनों में अपने हाथ खड़े कर दिए। डॉक्टर ने कहा है कि उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई है और उन्हें कम से कम दो-तीन महीने पूरी तरह बिस्तर पर आराम करना होगा। भारी वजन उठाना तो अब उनके लिए नामुमकिन सा हो गया है।”

सावित्री के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कांपती आवाज में कहा, “जब धीरज अस्पताल में थे, तो वेयरहाउस वालों ने बिना कोई मुआवजा दिए उनकी जगह किसी दूसरे नौजवान लड़के को काम पर रख लिया। पिछले डेढ़ महीने से मेरे पति बिस्तर पर लाचार पड़े हैं। उनके इलाज और दवाओं में हमारी सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई। मकान मालिक पिछले तीन दिनों से दरवाजे पर आकर किराए के लिए तकादा कर रहा है। घर में सिर्फ दो दिन का आटा बचा है, दूध वाले का हिसाब बाकी है। दीदी, जिस घर में शाम को बच्चों के निवाले के लाले पड़े हों, वहां की औरत अपने हाथों में कांच की चूड़ियां कैसे सजा सकती है? मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं बची है।”

सावित्री का यह दर्दनाक सच सुनकर मालती जी का कलेजा दहल उठा। उन्हें समझ आया कि जिस हंसी-खुशी के पीछे वे दुनिया को देख रही थीं, उसके ठीक बगल में लाचारी का कितना गहरा समंदर बह रहा था। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने चमड़े के पर्स की चेन खोली। पर्स से उन्होंने दो हजार रुपये के नोट निकाले और बिना किसी हिचक के बड़े प्यार से सावित्री की मुट्ठी में बंद कर दिए।

सावित्री ने चौंक कर अपने हाथ पीछे खींचने चाहे, “नहीं-नहीं दीदी! मैं आपसे ऐसे पैसे नहीं ले सकती। यह तो खैरात जैसा लगेगा।”

मालती जी ने उसके हाथों को कसकर दबाते हुए डांटने के अंदाज में कहा, “पगली, तूने मुझे दीदी कहा है न? क्या बहन अपनी छोटी बहन के आड़े वक्त में काम नहीं आ सकती? यह खैरात नहीं, तेरी इस बहन की तरफ से एक अमानत है। जब धीरज बाबू भले-चंगे हो जाएं और उनकी कोई नई, सुरक्षित नौकरी लग जाए, तब धीरे-धीरे करके मुझे यह पाई-पाई लौटा देना। पर अभी घर का राशन ला और बच्चों की जरूरत पूरी कर। और हां, इस बात की भनक मोहल्ले में किसी तीसरे कान को नहीं लगनी चाहिए। स्वाभिमान किसी भी दौलत से बड़ा होता है, और मैं तेरी खुद्दारी पर आंच नहीं आने दूंगी।”

सावित्री की आंखों में अब कृतज्ञता और सम्मान के आंसू थे। मालती जी ने उसका हाथ पकड़ा और बोलीं, “अब अपने आंसू पोंछ, मुंह धो और मेरे साथ नीचे चल। तू मेरे साथ वहां से अपने लिए चूड़ियां लेगी, ताकि किसी को जरा सा भी शक न हो कि तू भीतर से कितनी टूटी हुई है।”

जब सावित्री और मालती जी नीचे पहुंचीं, तो गली की दूसरी महिलाओं ने हंसते हुए कहा, “वाह मालती जी! मान गए आपको, आखिर आप सावित्री को खींच ही लाईं!”

सावित्री ने धीमे से मुस्कुराते हुए टोकरी में से अपने लिए सौ रुपये की सादी लाल और सुनहरी चूड़ियां चुन लीं। उसका मन भीतर से हल्का हो गया था।

चूड़ी वाले ने अपना गमछा झाड़ते हुए मालती जी और बाकी औरतों के सामने दोनों हाथ जोड़ दिए। उसकी आंखों के कोरों में नमी चमक उठी थी। वह रुंधे हुए गले से बोला, “माई जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! अगर आज आप सब इतनी चूड़ियां न खरीदतीं, तो शायद आज की रात भी मेरे बच्चों को भूखे पेट सोना पड़ता। पिछले चार दिनों से तेज धूप में सुबह से शाम तक घूमता रहा, लेकिन मुश्किल से बीस रुपये की बोहनी हुई थी। लोग अब हम जैसे रेहड़ी-पटरी वालों की तरफ देखते भी नहीं हैं, सब दुकानों की चकाचौंध में खो गए हैं। आप जैसी देवी समान बहनों के दम पर ही हम गरीबों की गृहस्थी चलती है।”

फेरीवाले ने अपनी टोकरी को सिर पर उठाया और भारी मन से लेकिन होठों पर राहत की मुस्कान लिए गली से बाहर की ओर बढ़ गया। बाकी पड़ोसने भी अपनी-अपनी चूड़ियों के डिब्बे संभालते हुए खुश होकर अपने घरों की तरफ लौट गईं।

मालती जी ने सावित्री के कंधे को हल्के से थपथपाया, उसे प्यार भरी विदाई दी और अपने घर की सीढ़ियां चढ़ गईं। सावित्री अपने हाथ में चूड़ियों की छोटी सी पुड़िया थामे वहीं खड़ी रही। उसने मुट्ठी में दबे रुपयों को देखा और फिर ऊपर खुले आसमान की ओर निहारा। उसकी आंखों से एक बूंद टपक कर उन लाल चूड़ियों पर जा गिरी। उसने मन ही मन सोचा कि दुनिया चाहे कितनी भी स्वार्थी क्यों न हो जाए, पर जब तक मालती दीदी जैसे संवेदनशील और परोपकारी लोग इस धरती पर मौजूद हैं, तब तक इंसानियत कभी हार नहीं सकती।

जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती इसी में है कि हम केवल अपनी खुशियों का जश्न न मनाएं, बल्कि अपने आसपास खामोशी से आंसुओं को पी रहे लोगों के दर्द को भी समझें। कभी-कभी हमारी जरा सी समझदारी और मदद किसी की उजड़ती हुई दुनिया को फिर से संवारने की उम्मीद बन जाती है।

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मूल लेखक : नेकराम

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