सुमन की आंख से एक आंसू ढुलककर गाल पर आ गिरा। उसने आईने की तरफ इशारा करते हुए कहा, “क्या आपको दिख नहीं रहा? मेरे चेहरे की ये झुर्रियां, ये ढलती जवानी… मुझे तो खुद से नफरत होने लगी है। मैं अब पहले जैसी खूबसूरत नहीं रही।”
निखिल ने मुस्कुराते हुए सुमन का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसकी हथेलियों पर गृहस्थी के काम-काज की वजह से हल्की सख्ती आ गई थी। निखिल ने बहुत कोमलता से कहा, “सुमन, तुम जिन्हें झुर्रियां कह रही हो, मैं उन्हें कुछ और देखता हूं।”
कमरे के भीतर शाम की मद्धिम धूप खिड़की के शीशों से छनकर ड्रेसिंग टेबल पर बिखर रही थी। घड़ी की टिक-टिक दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीखों को तेजी से पीछे छोड़ती हुई लग रही थी। ड्राइंग रूम की ओर से निखिल की आवाज गूंजी, “सुमन, क्या अभी तक तैयारी नहीं हुई? भाई साहब के बेटे की शादी का रिसेप्शन है, हमें वक्त पर पहुंचना होगा। तुम तो जानती हो बड़े भैया वक्त के कितने पाबंद हैं!”
सुमन ने अपनी मैरून रंग की रेशमी साड़ी का पल्लू कंधे पर टिकाते हुए धीरे से कहा, “बस आ रही हूं, पांच मिनट दीजिए।”
पर सुमन के पैर वहीं ठिठक गए थे। उसने बहुत बरसों बाद अपने चेहरे को इतने ध्यान से और इतने सन्नाटे में देखा था। ड्रेसिंग टेबल के बड़े से आईने में उसकी नजर अचानक अपनी आंखों के किनारों पर ठहर गई। वहां बारीक, महीन रेखाएं अपना जाल बुन चुकी थीं। माथे पर भी दो गहरी लकीरें साफ उभर आई थीं। उसने कांपती उंगलियों से अपने गालों को छुआ। त्वचा में पहले जैसी कसावट नहीं थी, हल्की सी ढलान आ गई थी।
सुमन का दिल अचानक एक अनजानी सी उदासी से घिर गया। उसे याद ही नहीं आया कि उसने आखिरी बार कब फुर्सत से खुद को आईने में देखा था। चौबीस बरस पहले जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, तो उसका रंग-रूप देखकर मोहल्ले की औरतें तारीफ करते नहीं थकती थीं। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, चमकती त्वचा और खिलखिलाती हंसी सबको मोह लेती थी। लेकिन उन चौबीस सालों में जिंदगी का पहिया इतनी तेजी से घूमा कि वह खुद को ही भूल बैठी।
सुबह पांच बजे उठकर बाबूजी के लिए गुनगुना पानी और काढ़ा तैयार करना, मां जी के घुटनों के दर्द की मालिश, बच्चों के स्कूल के टिफिन, निखिल के दफ्तर की फाइलें, नाश्ता, कपड़े, राशन, रिश्तेदारों की खातिरदारी और रात को सबकी थाली परोसने के बाद बची-खुची रोटियों से पेट भरना—यही तो उसकी दिनचर्या बन गई थी। वह कब एक अल्हड़, खिलखिलाती लड़की से जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी अधेड़ औरत बन गई, उसे खबर ही न हुई।
सुमन ने जल्दी से क्रीम की डिब्बी उठाई और उन रेखाओं को छुपाने के लिए चेहरे पर थपथपाने लगी। उसकी आंखों में नमी तैर आई। मन ही मन वह खुद से बातें करने लगी, “हे भगवान, मैं इतनी बदल गई? ये झुर्रियां, ये आंखों के नीचे के काले घेरे… मैं तो अपनी उम्र से भी दस साल बड़ी नजर आने लगी हूं। पार्टी में सब मुझे देखेंगे तो क्या कहेंगे? निखिल के दफ्तर के लोग भी आएंगे, वे सोचेंगे कि निखिल की पत्नी कितनी बेतरतीब और बूढ़ी लगती है।”
तभी दरवाजे का पर्दा हटाकर निखिल कमरे में दाखिल हुआ। उसने गहरे नीले रंग का सूट पहन रखा था, हाथ में घड़ी बांधते हुए वह मुस्कुराया, “सुमन, क्या बात है? आज इतना वक्त लग रहा है? कहीं खुद को ही नजर लगाने का इरादा तो नहीं है?”
सुमन ने अपनी गर्दन नीचे झुका ली और उंगलियों से फाउंडेशन को रगड़ते हुए बुझे मन से कहा, “मुझ जैसे ढलते चेहरे पर अब किसकी नजर लगेगी? न मेरी, न किसी और की। नजर तो उन पर लगती है जो सुंदर दिखते हैं।”
निखिल के कदम थम गए। उसने पहली बार सुमन की आवाज में छिपा भारीपन और उदासी महसूस की। वह धीमे कदमों से आगे बढ़ा और सुमन के पीछे खड़ा हो गया। आईने में उसने सुमन के झुके हुए चेहरे को देखा। निखिल ने उसके कंधों पर हौले से हाथ रखा और पूछा, “सुमन, ऐसा क्यों कह रही हो? क्या बात तुम्हें इतनी परेशान कर रही है?”
सुमन की आंख से एक आंसू ढुलककर गाल पर आ गिरा। उसने आईने की तरफ इशारा करते हुए कहा, “क्या आपको दिख नहीं रहा? मेरे चेहरे की ये झुर्रियां, ये ढलती जवानी… मुझे तो खुद से नफरत होने लगी है। मैं अब पहले जैसी खूबसूरत नहीं रही।”
निखिल ने मुस्कुराते हुए सुमन का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसकी हथेलियों पर गृहस्थी के काम-काज की वजह से हल्की सख्ती आ गई थी। निखिल ने बहुत कोमलता से कहा, “सुमन, तुम जिन्हें झुर्रियां कह रही हो, मैं उन्हें कुछ और देखता हूं।”
“क्या देखते हैं आप?” सुमन ने सजल नेत्रों से पूछा।
“मैं इनमें तुम्हारा त्याग और समर्पण देखता हूं,” निखिल ने बेहद आत्मीयता से कहना शुरू किया। “यह जो आंखों के पास की लकीरें हैं न, ये उन रातों की गवाह हैं जब हमारा बेटा रोहन तेज बुखार में तप रहा था और तुम पूरी-पूरी रात जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती थीं। यह माथे की रेखाएं तुम्हारे उस संघर्ष की निशानी हैं जब मेरे कारोबार में भारी नुकसान हुआ था और तुमने अपने सारे गहने बिना एक पल सोचे मेरे हाथ में रख दिए थे, ताकि मेरी लाज बच सके। तुमने कभी अपनी ख्वाहिशों को आगे नहीं रखा, हमेशा पूरे परिवार की खुशी को अपनी प्राथमिकता बनाया।”
सुमन का गला रुंध गया। वह कुछ कहना चाहती थी, पर लफ्ज होंठों पर आकर ठहर गए। उसने धीरे से कहा, “लेकिन निखिल, उम्र के इस पड़ाव पर चेहरे का यह हाल देखकर डर लगता है। मन में वहम बैठ जाता है कि कहीं… कहीं आपका प्यार मेरे लिए कम तो नहीं हो जाएगा? पुरुष तो हमेशा आकर्षण की तलाश में रहते हैं।”
निखिल जोर से हंस पड़ा, फिर उसने अपना कोट का बटन खोलकर अपना पेट हल्का सा आगे करते हुए कहा, “अच्छा, तो यह बात है! जरा मुझे देखो। मेरे सिर के बाल आधे उड़ चुके हैं, सफेद बाल दाढ़ी में साफ झांक रहे हैं, तोंद निकल आई है और चश्मे का नंबर हर साल बढ़ रहा है। तो क्या तुम मुझसे प्यार करना छोड़ दोगी? क्या तुम मुझे कम चाहने लगी हो?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं! आपके लिए तो मेरी भावनाएं कभी बदल ही नहीं सकतीं,” सुमन ने तड़पकर कहा।
“तो फिर तुम मेरे प्यार को इतना सतही कैसे समझ सकती हो सुमन?” निखिल ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा। “प्यार केवल बीस-बाईस साल की उम्र के चिकने चेहरे या छरहरे बदन से नहीं होता। वह तो महज शारीरिक आकर्षण होता है, जो वक्त के साथ हवा में उड़ जाता है। सच्चा प्यार तो तब परवान चढ़ता है जब दो लोग एक-दूसरे की आत्मा से जुड़ जाते हैं। तन की सुंदरता तो मौसम की तरह होती है, आज खिली हुई है तो कल ढल जाएगी। लेकिन मन की सुंदरता, संस्कार और अपनेपन की महक कभी कम नहीं होती।”
निखिल ने सुमन को आईने के बिल्कुल सामने खड़ा कर दिया और बोला, “जरा इस आईने में अपने चेहरे को मेरी नजरों से देखो। जब मां जी की तबीयत खराब होती है, तो वे अपनी सगी बेटियों से पहले तुम्हारा नाम पुकारती हैं, क्योंकि उन्हें तुम्हारी सेवा पर पूरा भरोसा है। बाबूजी आज भी किसी जरूरी फैसले को लेने से पहले तुम्हारी राय मांगते हैं। बच्चे अपनी हर परेशानी सबसे पहले तुम्हारे साथ साझा करते हैं। हमारे रिश्तेदार जब भी किसी बहू की मिसाल देते हैं, तो तुम्हारी शालीनता और मीठी वाणी की कसमें खाते हैं। इंसान का रूप-रंग तो भगवान की बनाई एक बाहरी चादर है, असली पहचान तो उसके कर्म और व्यवहार से होती है। तुम इस घर की रीढ़ हो, मेरी ताकत हो।”
सुमन की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली, लेकिन इस बार उन आंसुओं में उदासी नहीं, बल्कि सुकून और आत्मसम्मान का समंदर हिलोरें ले रहा था।
निखिल ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और सुमन के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, “इन झुर्रियों से मुझे कोई शिकायत नहीं है। यह हमारे पच्चीस साल के सुख-दुख, साथ चलने, हंसने-रोने और एक-दूसरे पर अटूट विश्वास की अमिट दास्तान हैं। इन्हें मेकअप के मोटे पर्दों के पीछे छुपाने की जरूरत नहीं है। यह तो तुम्हारा आभूषण हैं, जिन पर तुम्हें गर्व होना चाहिए। मेरे लिए तुम आज भी उतनी ही हसीन और अनमोल हो, जितनी उस दिन थीं जब पहली बार लाल जोड़े में तुमने मेरे घर की दहलीज लांघी थी।”
निखिल की इन बातों ने सुमन के अंतर्मन के सारे संशयों, सारे भयों और हीनभावना को एक झटके में धो दिया। उसे महसूस हुआ कि उम्र का बढ़ना कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक सुंदर और परिपक्व यात्रा है। उसने अपने हाथ से वह क्रीम और फाउंडेशन नीचे रख दिया।
उसने एक हल्की सी बिंदी अपने माथे पर सजाई, होठों पर सहज मुस्कान बिखेरी और निखिल की ओर देखकर शरमाते हुए बोली, “अब ऐसे क्या देख रहे हैं? आपने ही तो कहा था कि देर हो रही है, चलिए वरना बड़े भैया सच में नाराज हो जाएंगे।”
निखिल मुस्कुरा दिया। जब दोनों कमरे से बाहर निकले, तो सुमन का चेहरा किसी कॉस्मेटिक की चमक से नहीं, बल्कि भीतर से उपजे आत्मविश्वास और पति के सच्चे प्रेम के उजाले से दमक रहा था।
जीवन का असली सौंदर्य चेहरे की बेदाग त्वचा में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता, रिश्तों के प्रति समर्पण और जीवन भर निभाए गए प्रेम में छिपा होता है। उम्र का ढलना प्रकृति का नियम है, लेकिन उस ढलती उम्र में जब अपनों का सच्चा साथ और सम्मान मिलता है, तो हर झुर्री गर्व का पदक बन जाती है।
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लेखिका : कृतिका भण्डारी