सुलझती डोर, महकता आशियाना

 विवेक ने मुस्कुराते हुए पूछा कि क्या बात है मयंक, आज चेहरे पर यह बारह क्यों बजे हैं, क्या प्रोजेक्ट की डेडलाइन को लेकर कोई नई समस्या आ गई है। मयंक ने एक भारी सांस छोड़ते हुए अपनी दोनों हथेलियों से चेहरे को ढंक लिया और गहरी हताशा से भरी आवाज में बोला कि काश समस्या केवल दफ्तर के प्रोजेक्ट तक सीमित होती। वह तो सचमुच अपनी गृहस्थी से त्रस्त आ चुका है। उसका मन करता है कि सब कुछ छोड़कर कहीं दूर निकल जाए, कम से कम दस-पंद्रह दिनों के लिए किसी शांत पहाड़ पर अकेला रहे। मयंक के मुंह से अचानक यह भी निकल गया कि इससे तो बेहतर था कि उसने कभी विवाह का फैसला ही न लिया होता, कम से कम मानसिक शांति तो बची रहती।

विवेक ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे खिसकाई और बहुत ही संजीदगी से पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो बात शादी तक पछतावे के रूप में पहुँच गई। मयंक ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि घर में कदम रखते ही तनाव का साया शुरू हो जाता है। पत्नी स्वाति से हर छोटी बात पर तकरार हो जाती है। कभी बिजली का बिल समय पर भरने को लेकर, कभी घर की साफ-सफाई को लेकर, तो कभी दोनों जुड़वां बच्चों की पढ़ाई और उनकी आदतों को लेकर। दोनों के बीच बातचीत कम और तानों का आदान-प्रदान ज्यादा होने लगा है। घर अब घर नहीं, बल्कि तनाव का केंद्र बन गया है, जहाँ हर कोई एक-दूसरे पर उंगली उठाने के लिए तैयार बैठा रहता है। मयंक को समझ नहीं आ रहा था कि इस रोज-रोज की खटपट का अंत कैसे हो।

विवेक मयंक की तुलना में कुछ साल बड़ा था और अपने पारिवारिक जीवन में बेहद संतुलित और सुखी माना जाता था। उसने मयंक के कंधे पर हाथ रखा और बेहद आत्मीय भाव से कहा कि दोस्त, समस्या घर या विवाह में नहीं है, बल्कि समस्या हमारे उस नजरिए में है जिसे हम आदत बना लेते हैं। जब गृहस्थी की गाड़ी पटरी से उतरने लगे, तो भागने या छुट्टी लेने से कुछ हल नहीं होता, क्योंकि छुट्टियाँ खत्म होते ही वही समस्याएं फिर से मुंह बाए खड़ी मिलेंगी। जिंदगी की सबसे बड़ी खुशियां किसी दूर देश की सैर में या बहुत बड़े आयोजनों में नहीं मिलतीं, वे तो हमारे घर के भीतर ही बिखरी पड़ी होती हैं। बस हमें उन्हें देखने के लिए अपनी आंखों का चश्मा बदलना पड़ता है। रोज की उलझनों को अगले दिन का बोझ मत बनने दो। जो गिला-शिकवा आज उठा है, उसे आज ही संवाद से समाप्त करो और अगली सुबह की शुरुआत एक कोरे पन्ने की तरह नई ऊर्जा के साथ करो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कभी यह मत सोचो कि सामने वाला पहले सुधरे या पहले माफी मांगे; बदलाव की पहली पहल हमेशा खुद से करनी चाहिए।

विवेक की ये बातें मयंक के दिल में सीधे उतर गईं। उसने महसूस किया कि वह हमेशा स्वाति की कमियों को ही देखता रहा है, उसने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि उसकी खुद की दिनचर्या और व्यवहार परिवार के माहौल को कितना प्रभावित करते हैं। उस रात घर लौटने के बाद उसने शांति बनाए रखी। उसने न तो किसी बात पर टोक-टाक की और न ही रात को किसी बहस में उलझा। रात को बिस्तर पर जाते समय उसने ठान लिया कि कल सुबह से वह खुद को बदलेगा, शिकायत करने से पहले समाधान बनने की कोशिश करेगा।

अगली सुबह जब अलार्म बजा, तो मयंक आम दिनों की तरह उसे बंद करके दोबारा सोने के बजाय सीधे बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। आमतौर पर उसकी सुबह आठ बजे तक अलार्म से लड़ते हुए बीतती थी, जिसके बाद घर में हाहाकार मच जाता था। मयंक की देर से उठने की आदत के चलते स्वाति को अकेले ही रसोई संभालनी पड़ती थी, बच्चों के स्कूल बैग तैयार करने होते थे और साथ ही मयंक के दफ्तर के कपड़े, मोज़े और फाइलों को ढूंढकर उसके हाथों में थमाना पड़ता था। उस हड़बड़ाहट में मयंक चिढ़ जाता, बच्चों पर चिल्ला पड़ता और स्वाति पर नाश्ता देर से लगाने का आरोप मढ़ देता। सुबह का वह पहला घंटा पूरे दिन के लिए घर के माहौल में जहर घोल देता था।

लेकिन आज दृश्य बिल्कुल अलग था। स्वाति जब रसोई में पानी गर्म करने पहुंची, तो उसने देखा कि मयंक पहले ही नहा-धोकर तैयार खड़ा था और रसोई के स्लैब पर रखे कपों को सजा रहा था। स्वाति को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अचरज से मयंक की ओर देखा, पर कुछ बोली नहीं, शायद उसे लगा कि यह किसी तूफान से पहले की शांति है। मयंक ने आगे बढ़कर मुस्कुराते हुए कहा कि आज की अदरक वाली चाय वह खुद बनाएगा। स्वाति चुपचाप एकटक उसे देखती रह गई। दोनों ने बालकनी में खड़े होकर शांति से चाय की चुस्कियां लीं। वर्षों बाद दोनों बिना किसी ताने या शिकायत के सुबह की ताजी हवा में एक साथ खड़े थे।

चाय के बाद मयंक ने स्वाति से कहा कि वह आराम से नाश्ता और बच्चों के टिफिन तैयार करे, बच्चों को जगाने और तैयार करने की जिम्मेदारी आज उसकी है। मयंक दोनों बच्चों के कमरे में गया, उन्हें प्यार से सहलाकर जगाया, उनके कपड़े तैयार किए और हँसते-खेलते उनका होमवर्क बैग में लगवाया। घर में जो रोज सुबह चीख-पुकार मचती थी, आज उसकी जगह बच्चों की मासूम हँसी गूंज रही थी। समय इतनी सहूलियत से बीता कि मयंक को आराम से बैठकर गर्म नाश्ता करने और अखबार के पन्ने पलटने का भरपूर अवसर मिला। स्वाति के चेहरे पर भी वह तनाव और माथे की सिलवटें नहीं थीं, जो रोज सुबह की आपाधापी में दिखाई देती थीं। जब मयंक दफ्तर के लिए निकलने लगा, तो उसने स्वाति की आँखों में एक अनकही राहत और कृतज्ञता की चमक देखी।

सकारात्मक सुबह का प्रभाव मयंक के पूरे दिन के काम पर पड़ा। जब मन शांत और प्रसन्न होता है, तो जटिल से जटिल कार्य भी सहज लगने लगते हैं। दफ्तर में उसने अपनी टीम के साथ बहुत धैर्य से काम किया और जो प्रेजेंटेशन कई दिनों से अटकी हुई थी, उसे समय से पहले पूरा कर लिया। उसके बॉस ने भी उसके बदले हुए व्यवहार और काम की गति की सराहना की।

शाम को घर लौटते समय मयंक को स्वाति की एक पुरानी और सबसे वाजिब शिकायत याद आई। स्वाति अक्सर कहती थी कि मयंक जिस रास्ते से दफ्तर से घर आता है, ठीक उसी रास्ते पर ताजी सब्जियों और फलों का सबसे बड़ा बाजार पड़ता है, लेकिन वह कभी दो मिनट रुककर सब्जियां नहीं लाता। इस वजह से स्वाति को शाम को बच्चों को घर पर अकेला छोड़कर या उन्हें साथ घसीटते हुए थैला लेकर बाजार जाना पड़ता था, जिससे वह अत्यधिक थक जाती थी। इसके बाद जब कभी मयंक घर में कोई सब्जी न होने पर सवाल उठाता, तो विवाद और बढ़ जाता था।

आज मयंक ने अपनी गाड़ी को सीधे उस शाम की मंडी के पास रोक दिया। उसने गाड़ी से उतरकर इत्मीनान से ताजी हरी सब्जियां, बच्चों की पसंद के मौसमी फल और स्वाति की पसंद के पके हुए मीठे अमरूद खरीदे। जब मयंक ने घर की घंटी बजाई और स्वाति ने दरवाजा खोला, तो मयंक के दोनों हाथों में सब्जियों और फलों से भरे थैले देखकर उसके चेहरे के भाव देखने लायक थे। स्वाति की आँखों में फैली हैरानी धीरे-धीरे एक बेहद कोमल और सच्ची मुस्कान में बदल गई। उसने तुरंत आगे बढ़कर मयंक के हाथ से थैले लिए, पानी का ठंडा गिलास उसके हाथ में थमाया और बड़े स्नेह से पूछा कि आज दफ्तर में काम का बहुत ज्यादा दबाव तो नहीं था।

यह वही घर था जहाँ कल शाम तक शिकायतों का अंबार लगा रहता था। यदि कोई आम दिन होता, तो सुबह की कड़वाहट की गूंज शाम तक बनी रहती और घर का माहौल भारी रहता। लेकिन आज शाम की चाय के साथ घर में एक अलौकिक शांति और मिठास घुली हुई थी। दोनों बच्चे भी ड्राइंग रूम के कालीन पर बैठकर आराम से अपनी चित्रकला में मग्न थे, क्योंकि उन्हें अपने माता-पिता के बीच वह आत्मीय संवाद दिखाई दे रहा था जो बच्चों को सबसे ज्यादा सुरक्षा का अहसास कराता है।

चाय खत्म करके जब स्वाति गुनगुनाते हुए रात के भोजन की तैयारी के लिए रसोई की ओर बढ़ी, तो मयंक ने मुड़कर उसे देखा। उसके मन में विवेक के शब्द बार-बार गूंजने लगे। उसने मन ही मन सोचा कि सचमुच सुख और शांति कहीं बाहर की दुनिया में खोजने से नहीं मिलते। वे तो हमारे अपने छोटे-छोटे प्रयत्नों, हमारे आचरण और हमारी समझदारी में छिपे होते हैं। एक छोटी सी पहल, थोड़ा सा सहयोग और अपने अहंकार को किनारे रखकर परिवार के लिए खड़ा होना—बस इतना ही तो चाहिए होता है एक बिखरते हुए रिश्ते को नई खुशबू से भरने के लिए। मयंक ने राहत की सांस ली और उसे लगा कि आज कई महीनों बाद उसका घर सचमुच एक आशियाना बन पाया था।

पाठकों के लिए एक विचारणीय प्रश्न:

क्या आपको भी लगता है कि हमारे पारिवारिक जीवन में आने वाले अधिकतर तनाव किसी बड़ी वजह से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे-छोटे तालमेल की कमी और अहंकार के कारण होते हैं? क्या कभी आपने खुद पहल करके किसी बिगड़ते रिश्ते को संवारा है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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लेखिका : निधि सहाय

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