पेंशन – वीणा सिंह

मायके की गलियों में विचरण करती आज मंदिर चली आई..

वर्षों बाद आज शोभा चाची मंदिर में मिल गई.. बहुत मुश्किल से पहचान पाई.. वक्त अपने साथ खूबसूरती स्वस्थ्य शरीर कमनियता और फुर्ती भी समेट के आगे बढ़ जाता है.. शोभा चाची का रहन सहन पहले और आज में जमीन आसमान का अंतर आ गया है..

कलफ वाली चटक सीधे पल्ले की साड़ी माथे पर मरून रंग की चवन्नी बराबर बिंदी माथे पर सिंदूर की दक दक करती गहरी चौड़ी रेखा.. गले में मोटी सी सोने की दप दप  करती चेन  कान में बड़ा सा टॉप्स  एक अंगूठी गोरा रंग बड़ा सा जुड़ा कुल मिला कर अभिजात्य वर्ग का लुक व्यक्तित्व में झलकता.. बुलंद दंभ भरी आवाज….

चाचा इतिहास के प्रोफेसर थे… मुझे अच्छी तरह से याद है सरकार के तरफ से एक स्कीम आया था उस समय एक फॉर्म भरना था जिसमें दो ऑप्शन थे एक आप आजीवन पेंशन लीजिए या फिर एकमुश्त मोटी रकम मिल जाएगी.. फ्रोफेसर कॉलोनी में ये चर्चा गर्म थी…

फिर अंत में सभी लोग पेंशन वाला विकल्प हीं चुना सिर्फ शोभा चाची के पति कमलकांत चाचा के छोड़कर.. चाची छत पर गर्मी से परेशान हो बैठी फ्लैट की महिलाओं के बीच#veena singh #अचानक जा कर ये टॉपिक छेड़ दिया.. ठसक से बोली बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कर नौकरी कर रहा है और छोटा बेटा बीपीएससी की तैयारी कर रहा है.. वो निकाल हैहीं लेगा.. बेटी है नहीं…

दोनों बेटा श्रवण कुमार है.. शानदार घर बनवाएंगे एक मुश्त मोटी रकम मिलेगी तो… पेंशन मेरे दोनों लाल है.. पलकों पर रखते हैं मुझे.. और फिर शोभा चाची घर बनाकर फ्लैट से चली गई.. गृह प्रवेश में सबको बुलाया और घर दिखाया बड़े अकड़ से..

      वक्त गुजरता गया हमारी शादी हो गई.. घर गृहस्थी में व्यस्त हो गई.. कभी कभी शोभा चाची का समाचार मिल जाता.. ठसक निकल गई है सारी.. छोटा बेटा बीपीएससी नहीं निकाल पाया… स्टेट बैंक में क्लर्क है अभी…#वीणा#

                          चाची हाथ पकड़ कर बैठा ली.. कैसी हो बिटिया…. मैने चाची के इस रूप की कल्पना नहीं की थी.. साधारण साड़ी दबा हुआ रंग बड़े जुड़े का स्थान पतली सी चोटी ने ले लिया था.. माथे पर छोटी सी बिंदी.. कान गला सब सुना.. कैसी हैं चाची… आंखों के कोरो से आंसू बह चले..

चाची के दोनों श्रवणकुमार अब बीबी भक्त हो गए हैं.. पेंशन नहीं लेकर इन लोगों ने अपने हाथ काट लिए हैं.. चाचा चाची दोनों बीपी शुगर के मरीज हैं.. #veena singh #चाची को दिल की बीमारी भी है.. चाचा एक मॉल में काम कर रहे हैं.. पंद्रह हजार रुपए मिलते हैं.. उनके साथी लोग एक लाख पेंशन उठा रहे हैं..

बहु और बेटा रोज कलह करते हैं पापा क्यों मॉल में काम करते हैं.. हमारी समाज में इज्जत जाती है.. मुंह दिखाने के लायक नहीं छोड़ेंगे पापा.. मां तुम हीं उन्हें समझाओ..

उन्हें खाना कपड़ा किस चीज की कमी है.. मैं बोलती हूं आने दो आज बताती हूं.. बेटा बहु सो जाते हैं जब ये देर रात मॉल से लौटते हैं तो गरम रोटी बनाती हूं दोनों बैठ कर खाते हैं…मैं इनसे कहती हूं कुछ भी हो जाए ये काम मत छोड़ना . इसी पैसे से अपने मन का कुछ कर लेते हैं.. दवा के

Veena singh लिए बेटे बहु के पास हाथ नहीं फैलाना पड़ता है.. हाथ में दो पैसे रहते हैं जो हमारे अपने हैं… मन बहुत भारी और व्यथित हो गया.. चाची अपना ख्याल रखियेगा कहकर वापस आ गई पर मन और मस्तिष्क गहरे झंझावातों  से भर गया.. पैसा अब रिश्तों पर इतना भारी पड़ गया है.. हम भी धीरे धीरे उसी ओर बढ़ रहे है हमारा क्या होगा,.. हमने तो उतने पैसे भी नहीं जोड़े हैं.. विचारों को झटका और मन को समझाया जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए…

                        #स्वलिखित सर्वाधिकार सुरक्षित #

Veena singh

#वक्त का पहिया 

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