स्वाभिमान की महक

वक्त किसी नदी की तरह अपनी रफ़्तार से बहता चला गया। समय के साथ परिवार की डालियाँ अलग होने लगीं। ननदें अपने-अपने ससुराल चली गईं, देवर अपने परिवारों को लेकर अलग-अलग शहरों में अपनी रोजी-रोटी की तलाश में निकल गए। सास-ससुर ने भी अपनी लंबी उम्र पूरी करके दुनिया को अलविदा कह दिया। कुछ ही सालों में, वह घर जहाँ कभी बीसों लोगों की चहल-पहल थी, अब सिमटकर चार लोगों का रह गया—शांति देवी, महेंद्र जी (जो अब शहर लौट आए थे) और उनके दोनों बच्चे।

हाथ में पाँच-पाँच सौ रुपये के पाँच करारे नोट पकड़े शांति देवी बरामदे की पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी एकटक उन्हें निहार रही थीं। पच्चीस सौ रुपये। कहने को तो आज के इस डिजिटल और चमक-दमक वाले दौर में यह रकम शायद किसी बड़े मॉल के एक बिल जितनी भी न हो, लेकिन शांति देवी की हथेलियों में रखे ये नोट केवल कागज़ के टुकड़े नहीं थे। यह उनके पसीने की कमाई थी, उनके स्वाभिमान का प्रमाण था और उस अटूट विश्वास का प्रतीक था कि इंसान जब तक चाहे, अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा रह सकता है।

लोग अक्सर कहते हैं कि उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचकर, जब बाल सफेद हो जाएँ, चेहरे पर झुर्रियों का जाल बिछ जाए और हड्डियों में पहले जैसी फुर्ती न रहे, तो इंसान को खामोशी से किसी कोने में बैठ जाना चाहिए। कहते हैं कि तब ज़िंदगी के संघर्ष खत्म हो जाते हैं। पर शांति देवी के चेहरे पर एक मंद मुस्कान तैर गई। कौन कहता है कि संघर्ष खत्म हो जाता है? संघर्ष तो साँसों की तरह जीवन का अभिन्न अंग है। उम्र और वक्त के साथ इसका रूप बदलता रहता है—कभी यह जिम्मेदारियों का विशाल समंदर बनकर सामने आता है, तो कभी अपनी पहचान बनाए रखने की शांत लहर। जो लोग इसे खत्म मान लेते हैं, वे शायद ज़िंदगी से हार मान चुके होते हैं या फिर उनके भीतर जीवन जीने का वह चार्म, वह उत्साह ही नहीं बचता।

शांति देवी उन लोगों में से कभी नहीं रहीं। उन्होंने ज़िंदगी को हमेशा सीने से लगाया था, हर मोड़ पर, हर इम्तिहान में।

आज से लगभग पैंतीस साल पहले जब वे इस परिवार में ब्याह कर आई थीं, तो घर क्या था, ज़िम्मेदारियों का एक भरा-पूरा जहान था। बड़ा संयुक्त परिवार, पुरानी मान्यताओं में बंधे सास-ससुर, तीन ननदें और दो देवर। शांति देवी ने घूँघट की ओट से जब उस घर की चौखट को पहली बार देखा था, तो घबराई ज़रूर थीं, पर उनके कदम डगमगाए नहीं। सुबह चार बजे से चूल्हे के सामने बैठना, सबके लिए चाय-नाश्ते से लेकर रात के बर्तनों तक, सास-ससुर की हर ज़रूरत का बिन कहे ध्यान रखना और सबकी अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना। उसी दौरान उनके पति, महेंद्र जी, सरकारी और निजी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में दिन-रात जुटे थे। शांति देवी ने कभी अपनी थकान का इज़हार नहीं किया। वे चुपचाप महेंद्र जी के कमरे में गर्म चाय का प्याला रख आतीं, ताकि उनकी पढ़ाई में कोई खलल न पड़े।

फिर एक-एक करके ननदों के हाथ पीले हुए, देवरों की शादियाँ हुईं। शांति देवी ने हर ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर इस तरह उठाया जैसे यह उनका अपना ही काम हो। ईश्वर की कृपा हुई और कुछ वर्षों में उनके आँगन में भी दो प्यारे-प्यारे बच्चों—एक बेटा और एक बेटी—की किलकारियाँ गूँज उठीं। बच्चों के जन्म के बाद ज़ाहिर था कि वे घर के बाकी कामों में पहले जितना वक्त नहीं दे पाती थीं। लेकिन संयुक्त परिवार की खूबसूरती यही थी कि किसी ने कभी कोई ताना नहीं मारा। उनकी अविवाहित बची एक छोटी ननद और छोटे देवर ने बच्चों को पलकों पर बिठा लिया। सास-ससुर ने पोते-पोती की परवरिश में अपना पूरा प्यार उंडेल दिया।

इसी बीच महेंद्र जी को एक दूर-दराज के शहर में एक निजी कंपनी में नौकरी मिल गई। आमदनी सीमित थी और जिम्मेदारी बहुत बड़ी। शांति देवी चाहतीं तो पति के साथ उस शहर में जाकर एक छोटा सा अलग आशियाना बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने संयुक्त परिवार में ही रहने का फैसला किया। “आप जाइए, अपना काम संभालिए। यहाँ बाबूजी और माँ जी हैं, घर के लोग हैं। मैं यहीं रहकर सब संभालूँगी।” महेंद्र जी हर त्योहार या छुट्टियों में घर आते, और शांति देवी बिना किसी शिकायत के उस बड़े घर की रीढ़ बनी रहीं।

वक्त किसी नदी की तरह अपनी रफ़्तार से बहता चला गया। समय के साथ परिवार की डालियाँ अलग होने लगीं। ननदें अपने-अपने ससुराल चली गईं, देवर अपने परिवारों को लेकर अलग-अलग शहरों में अपनी रोजी-रोटी की तलाश में निकल गए। सास-ससुर ने भी अपनी लंबी उम्र पूरी करके दुनिया को अलविदा कह दिया। कुछ ही सालों में, वह घर जहाँ कभी बीसों लोगों की चहल-पहल थी, अब सिमटकर चार लोगों का रह गया—शांति देवी, महेंद्र जी (जो अब शहर लौट आए थे) और उनके दोनों बच्चे।

लोग सोचते थे कि परिवार छोटा हो गया तो जिम्मेदारियाँ भी कम हो गई होंगी, लेकिन शांति देवी जानती थीं कि ऐसा नहीं था। पहले काम बाँटने वाले कई हाथ थे, अब अकेले ही सब कुछ संभालना था। पर शांति देवी ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने महेंद्र जी को सहारा दिया, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में कोई कसर नहीं छोड़ी।

देखते ही देखते दोनों बच्चे बड़े हो गए, उच्च शिक्षा हासिल की और दोनों ने अच्छी कंपनियाँ ज्वाइन कर लीं। बदलते ज़माने के साथ दोनों ने अपनी-अपनी पसंद से अपने जीवनसाथी चुने। शांति देवी और महेंद्र जी ने बिना किसी संकोच के खुले दिल से बच्चों के फैसलों का सम्मान किया और धूमधाम से उनकी शादियाँ कीं। घर में एक बार फिर नए लोगों का आगमन हुआ, नई बहुएँ आईं, घर की रौनक लौट आई।

लेकिन वक्त हमेशा एक नया इम्तिहान लेकर आता है। आज का दौर उस पुराने संयुक्त परिवार जैसा नहीं था। नई बहुएँ पढ़ी-लिखी, महत्वाकांक्षी और कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाली थीं। सुबह आठ बजे वे लैपटॉप बैग टांगकर निकल जातीं और रात को आठ बजे थकान से चूर होकर लौटतीं। घर का माहौल पहले जैसा बिल्कुल नहीं रहा था। कभी-कभार विचारों का टकराव होता, कभी रहन-सहन को लेकर खटपट होती। पहले-पहल तो शांति देवी का मन भी थोड़ा आहत होता था कि इतनी मेहनत से जिस घर को उन्होंने सींचा, वहाँ अब छोटी-छोटी बातों पर असहजता क्यों है।

पर शांति देवी ने समझदारी का रास्ता चुना। उन्होंने समझ लिया कि हर पीढ़ी का अपना एक मिज़ाज होता है। उन्होंने ‘चार बातें सुनकर, चार बातें अनसुनी करना’ सीख लिया। जब कभी कोई ग़लतफ़हमी होती, तो वे मुँह फुलाकर बैठने के बजाय शाम को चाय की मेज़ पर बैठकर सहजता से बात कर लेतीं। बहुओं के पास उनके साथ बैठकर गपशप करने का वक्त नहीं होता था, तो शांति देवी ने इसका भी कभी मलाल नहीं किया। उन्होंने समझा कि दफ्तर का तनाव और काम का दबाव आज की पीढ़ी को कितना थका देता है। वे खुद आगे बढ़कर बहुओं के आने से पहले घर का काम समेट लेतीं ताकि उन पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

पर इस सब के बीच एक और बहुत बड़ा सच था, जिसने शांति देवी और महेंद्र जी को भीतर से थोड़ा सोचने पर मजबूर कर दिया था। महेंद्र जी की पूरी नौकरी निजी कंपनियों में ही बीती थी, जहाँ कोई सरकारी पेंशन या भविष्य की बड़ी फंडिंग नहीं थी। जो कुछ जमा-पूँजी उन्होंने अपनी ज़िंदगी भर की मेहनत से जोड़ी थी, वह बच्चों की उच्च शिक्षा, बड़े शहरों में उनकी पढ़ाई के खर्च और फिर दोनों की शादियों में पूरी तरह खर्च हो चुकी थी।

अब हालत यह थी कि रोजमर्रा की छोटी-मोटी दवाइयों, फल या खुद के छोटे-मोटे निजी खर्चों के लिए भी उन्हें सोचना पड़ता था। बच्चे कमाने लगे थे, वे पैसा देने से मना भी नहीं करते थे, लेकिन शांति देवी का स्वाभिमानी मन यह गवाही नहीं देता था कि साठ साल की उम्र में वे अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए हर महीने बच्चों के सामने हाथ फैलाएँ। वे किसी पर बोझ बनकर नहीं जीना चाहती थीं। उन्हें यह कतई गवारा नहीं था कि हर पचास रुपये के खर्च का हिसाब उन्हें किसी के सामने रखना पड़े।

“महेंद्र जी, हाथ पर हाथ धरकर बैठने से कुछ नहीं होगा,” एक दिन शांति देवी ने शाम को छत पर टहलते हुए अपने पति से कहा।

“पर शांति, अब इस उम्र में हम क्या कर सकते हैं? शरीर भी पहले जैसा नहीं रहा,” महेंद्र जी ने लाचारी भरे स्वर में कहा था।

“उम्र तो सिर्फ एक संख्या है। जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, तब तक किसी के आगे झोली क्यों फैलाना? संघर्ष उम्र के साथ बदलता है, पर खत्म नहीं होता। मैं खाली बैठकर अपने ही ख्यालों में घुटने वालों में से नहीं हूँ। मैं कुछ करूँगी।”

शांति देवी ने अपनी पुरानी अधूरी ख्वाहिशों और अपनी ताकतों को टटोलना शुरू किया। वे बचपन से ही कढ़ाई, बुनाई और बच्चों को पढ़ाने में बहुत होशियार थीं। उन्होंने मोहल्ले के छोटे बच्चों को अपने घर के दालान में शाम को एक घंटे ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। साथ ही, उन्हें अचार और पारंपरिक मसालों की बेहतरीन समझ थी। उन्होंने शुद्ध और स्वादिष्ट घर का बना अचार और पापड़ तैयार करके आसपास की महिलाओं को बताना शुरू किया।

शुरू-शुरू में कॉलोनी के कुछ लोगों ने बातें भी बनाईं, “देखो तो, बेटे-बहू इतना कमाते हैं, और यह बूढ़ी औरत इस उम्र में ट्यूशन पढ़ा रही है, अचार बेच रही है।” लेकिन शांति देवी ने इन बातों पर कभी कान नहीं दिया। उनकी बहुओं ने जब यह देखा, तो पहले वे झिझकीं, पर जब उन्होंने देखा कि शांति देवी इस काम से कितनी खुश, ऊर्जावान और संतुष्ट रहती हैं, तो उन्होंने भी अपनी सास का पूरा सहयोग करना शुरू कर दिया। बहुओं ने ऑफिस के सहकर्मियों के बीच शांति देवी के हाथ के बने मसालों और अचार की तारीफ की, जिससे उन्हें अच्छे-खासे ऑर्डर मिलने लगे।

आज जब शाम को एक बच्चे की माँ ने आकर शांति देवी के हाथ में ट्यूशन की पहली फीस के रूप में वे पाँच-पाँच सौ के पाँच नोट रखे थे, तो शांति देवी की आँखें नम हो गई थीं।

वे बरामदे में बैठी उन नोटों को सहला रही थीं। यह रकम सिर्फ ढाई हज़ार रुपये नहीं थी, यह उनके आत्मसम्मान की चाबी थी। अब उन्हें महेंद्र जी के ब्लड प्रेशर की गोलियाँ लाने के लिए, या अपने पोते-पोती के लिए उनकी पसंद की टॉफी और किताबें खरीदने के लिए किसी का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा। वे अपने और अपने पति के छोटे-मोटे खर्चे खुद उठाने में पूरी तरह सक्षम थीं।

महेंद्र जी कमरे से बाहर आए और शांति देवी के हाथ में वे नोट और उनके चेहरे पर वह अद्भुत आत्मविश्वास देखकर मुस्कुरा दिए। “तो आज मैडम जी अपने दम पर अपनी गृहस्थी का बजट संभाल रही हैं?” उन्होंने मज़ाक में कहा।

शांति देवी खिलखिलाकर हँस पड़ीं। “हाँ जी! और सुनिए, आज शाम की चाय के साथ गरमा-गरम पकौड़े मेरी तरफ से होंगे। अपनी कमाई का जो स्वाद होता है ना, उसकी बराबरी दुनिया की कोई दौलत नहीं कर सकती।”

शाम की ढलती हुई धूप में शांति देवी का चेहरा एक अलग ही आभा से दमक रहा था। उन्होंने साबित कर दिया था कि स्वाभिमान से जीने की कोई उम्र तय नहीं होती। ज़िंदगी कभी खत्म नहीं होती जब तक आपके भीतर कुछ करने का जज़्बा ज़िंदा है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के हर पड़ाव को जिया था—एक समर्पित बहू बनकर, एक त्यागी माँ बनकर और आज, एक आत्मनिर्भर और सम्मानित बुज़ुर्ग बनकर।

प्रिय पाठकों,

आपको क्या लगता है? क्या बुढ़ापे में माता-पिता को अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए भी बच्चों पर ही निर्भर रहना चाहिए, या फिर शांति देवी की तरह अपनी क्षमता अनुसार आत्मनिर्भर रहकर अपनी ज़िंदगी को एक नया मकसद देना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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