शहर के पुराने हिस्से में एक आलीशान हवेली थी—‘शांति निवास’। कभी इस हवेली के नाम से ही पूरे शहर में उसके मालिक सेठ हरदयाल की पहचान थी। अनाज का बड़ा कारोबार था। गोदाम भरे रहते, तिजोरियाँ धन से और आँगन मेहमानों से भरा रहता।
हरदयाल को अपने धन पर बड़ा गर्व था। वह अक्सर कहा करते, “पैसा हो तो दुनिया आपकी मुट्ठी में होती है।”
उनका इकलौता बेटा वरुण पिता से बिल्कुल अलग था। वह पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहता था, लेकिन हरदयाल उसे अपना कारोबार सौंपना चाहते थे।
एक दिन वरुण ने कहा, “बाबूजी, धन हमेशा साथ नहीं रहता। समय बदलते देर नहीं लगती।”
हरदयाल हँस पड़े।
“समय? समय तो मेरे इशारे पर चलता है। मेरे पास इतना धन है कि सात पीढ़ियाँ बैठकर खाएँगी।”
वरुण चुप हो गया।
कुछ वर्षों तक सब कुछ वैसा ही चलता रहा। फिर अचानक बाजार में भारी मंदी आ गई। हरदयाल के कई व्यापारिक साझेदारों ने धोखा दिया। एक के बाद एक गोदाम बिकते गए। बैंक का कर्ज बढ़ता गया। जिस हवेली में कभी महँगी गाड़ियों की कतार लगती थी, वहाँ अब सन्नाटा पसरा रहने लगा।
हरदयाल को पहली बार महसूस हुआ कि पैसा सचमुच हमेशा किसी की मुट्ठी में नहीं रहता।
इसी बीच वरुण ने शहर छोड़कर दूसरे शहर में नौकरी शुरू कर दी। उसने मेहनत की और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। कुछ वर्षों बाद वह सफल व्यवसायी बन गया।
समय का पहिया घूम चुका था।
अब हरदयाल की हालत बहुत खराब थी। उम्र बढ़ चुकी थी और बीमारी ने शरीर को कमजोर कर दिया था। जिन लोगों की मदद के लिए कभी उन्होंने अपना खजाना खोला था, उनमें से अधिकांश अब उन्हें पहचानने से भी कतराते थे।
एक बरसाती शाम दरवाजे पर दस्तक हुई।
हरदयाल ने कमजोर आवाज में पूछा, “कौन?”
दरवाजा खुला।
सामने वरुण खड़ा था।
पिता की आँखें भर आईं।
“तुम…?”
वरुण उनके पास बैठ गया और उनका हाथ थाम लिया।
हरदयाल बोले, “मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी बेटा। मुझे लगता था धन ही सबसे बड़ा सहारा है। आज समझ आया कि समय से बड़ा कोई नहीं।”
वरुण मुस्कुराया।
“बाबूजी, समय किसी का दुश्मन नहीं होता। वह बस हमें हमारे कर्मों का परिणाम दिखाता है।”
उस दिन वरुण अपने पिता को अपने साथ शहर ले गया। अच्छे अस्पताल में उनका इलाज कराया और उन्हें अपने घर में रखा।
कुछ महीनों में हरदयाल की तबीयत सुधरने लगी।
एक दिन वरुण उन्हें अपने कार्यालय ले गया। वहाँ कर्मचारियों की एक बैठक चल रही थी। एक कर्मचारी से गलती हो गई। हरदयाल ने देखा कि वरुण ने उसे डाँटने के बजाय समझाया।
उन्होंने पूछा, “तुमने इसे नौकरी से निकाला क्यों नहीं?”
वरुण ने कहा, “क्योंकि गलती इंसान से होती है। अगर हर गलती पर इंसान को छोड़ दिया जाए, तो सुधार का अवसर किसे मिलेगा?”
हरदयाल देर तक बेटे को देखते रहे।
उन्हें याद आया कि उन्होंने जीवन भर लोगों को केवल उनकी उपयोगिता से आँका था। किसी गरीब ने मदद माँगी तो उसे दुत्कार दिया, किसी छोटे व्यापारी ने सलाह दी तो उसका मजाक उड़ाया। आज वही जीवन उन्हें आईना दिखा रहा था।
कुछ दिन बाद उन्होंने वरुण से कहा, “मैं अपनी बची हुई संपत्ति का एक हिस्सा उन लोगों के लिए देना चाहता हूँ, जिन्हें कभी मैंने नजरअंदाज किया था।”
वरुण ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों?”
हरदयाल बोले, “क्योंकि अब समझ आया है कि संपत्ति तिजोरी में बंद रखने से बड़ी नहीं होती, किसी के जीवन में रोशनी लाने से बड़ी होती है।”
समय बीतता गया।
हरदयाल ने शहर में एक छोटा-सा विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवाया। जिन मजदूरों ने कभी उनके गोदामों में काम किया था, उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया। धीरे-धीरे लोगों के मन में उनके लिए फिर सम्मान पैदा होने लगा।
एक शाम वे उसी पुरानी हवेली के सामने खड़े थे। हवेली अब पहले जैसी भव्य नहीं थी, लेकिन उसकी दीवारों पर इतिहास की कई परतें थीं।
हरदयाल ने मुस्कुराकर कहा, “वरुण, देखो, वक्त का पहिया कितना अजीब है। कभी मैं इस हवेली का मालिक था और समय को अपना गुलाम समझता था। आज समय ने मुझे सिखा दिया कि असली मालिक वही है।”
वरुण ने पिता के कंधे पर हाथ रखा।
सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे उतर रहा था। अँधेरा फैल रहा था, मगर दूर आसमान पर सुबह की हल्की-सी आभा दिखाई देने लगी थी।
हरदयाल समझ चुके थे—वक्त का पहिया कभी रुकता नहीं। सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख आता है। इंसान के हाथ में केवल उसके कर्म होते हैं।
और यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है—
समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लोग बदलते हैं; लेकिन अच्छे कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते।
#बेटियाँ-,in
#वक्त का पहिया
लेखिका: डॉ.आभा माहेश्वरी
अलीगढ