स्वाभिमान की कीमत

हरिशंकर जी अपनी जगह से उठे और अंकिता के सिर पर हाथ रखते हुए बोले, “बेटा, जब मेरे उस परिचित ने मुझे फोन पर यह बात बताई थी, तो उसने सोचा था कि मैं रिश्ता तोड़ दूंगा। लेकिन उसने जैसे ही कहा कि उस लड़की ने मालिक के बेटे को थप्पड़ मारा और पुलिस में शिकायत की, मेरे सीने में गर्व का ठिकाना नहीं रहा। मैंने उसी वक्त मन में सोच लिया था कि अगर यह बात सच है, तो मेरे घर की बहू इससे बेहतर कोई हो ही नहीं सकती! जो बेटी अपनी मर्यादा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए इतने बड़े रसूखदार के खिलाफ अकेली खड़ी हो सकती है, वह कल को मेरे पूरे परिवार का मान-सम्मान कभी झुकने नहीं देगी।”

शाम के धुंधलके में जब ड्राइंग रूम की खिड़की से हल्की ठंडी हवा अंदर आई, तो अंकिता ने अपने कांपते हाथों से साड़ी का पल्लू कसकर संभाला। सामने की मेज पर सजी नमकीन और मिठाइयों की प्लेटें ज्यों की त्यों धरी थीं। चाय की भाप अब ठंडी हो चुकी थी, लेकिन कमरे में पसरा सन्नाटा किसी भारी दबाव की तरह सीने पर बैठ रहा था।

अंकिता के पिता, दीनदयाल जी, अपनी पुरानी और धुल-धुल कर फीकी पड़ चुकी बंडी की जेब में हाथ डाले सिर झुकाए बैठे थे। उनकी पथराई आंखों में एक अजीब सी लाचारी तैर रही थी। माँ जानकी रसोई के पर्दे की ओट से बार-बार झांक रही थीं, उनका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। सामने सोफे पर शहर के प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यवसायी हरिशंकर जी, उनकी पत्नी सावित्री देवी और उनका बेटा राघव बैठे थे। राघव एक शांत, सुलझा हुआ और प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट था, जिसकी आंखों में एक ठहराव और सौम्यता साफ झलकती थी।

बातचीत बहुत सहज माहौल में शुरू हुई थी। अंकिता की सादगी, उसकी शिक्षा और बातचीत के सलीके ने हरिशंकर जी और सावित्री देवी का दिल पहली ही नजर में जीत लिया था। राघव ने भी अपनी रजामंदी में मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया था। दीनदयाल जी के चेहरे पर कई महीनों बाद एक गहरी राहत की लकीर उभरी थी। लेकिन तभी हरिशंकर जी ने अपनी चाय की प्याली मेज पर रखी, चश्मा ठीक किया और एक ऐसा सवाल पूछ लिया जिसने कमरे की पूरी हवा ही बदल दी।

“दीनदयाल जी, बेटी अंकिता हमें हर लिहाज से पसंद है। संस्कार, पढ़ाई-लिखाई और बातचीत का ढंग… सब कुछ लाजवाब है। राघव भी खुश है और हम भी। लेकिन एक बात है जो मेरे मन में खटक रही है और जब तक मैं उसे साफ न कर लूं, आगे बढ़ना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ होगा।” हरिशंकर जी की आवाज भारी और गंभीर थी।

दीनदयाल जी ने घबराकर पूछा, “जी… जी समधी जी, कहिए ना! कोई कमी रह गई हो तो…”

“कमी की बात नहीं है भाई साहब,” हरिशंकर जी ने हाथ उठाकर उन्हें रोका और सीधे अंकिता की ओर देखा। “अंकिता बेटा, आपके बायोडाटा और आपके पापा की बातों से हमें पता चला कि आप शहर के सबसे बड़े बिल्डर सिंघानिया ग्रुप में सीनियर अकाउंटेंट थीं। पैकेज बहुत शानदार था, रुतबा भी बड़ा था। फिर अचानक छह महीने पहले आपने वह नौकरी क्यों छोड़ दी? और नौकरी ही नहीं, जिस फ्लैट में आप अपनी मौसी के साथ शहर में रह रही थीं, सब समेटकर इस छोटे से कस्बे में अपने माता-पिता के पास क्यों लौट आईं? आपने रिजाइन लेटर में लिखा था—’पारिवारिक और व्यक्तिगत कारणों से’। पर सच तो यह है कि इतनी शानदार तरक्की छोड़कर कोई अचानक इस तरह वापस अपने गांव या छोटे कस्बे में नहीं लौटता। क्या बात थी बेटा?”

कमरे में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि दीवार पर लटकी पुरानी घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह गूंजने लगी। दीनदयाल जी की सांसें अटक गईं। उन्होंने अंकिता की ओर एक याचना भरी नजर से देखा, जिसका साफ मतलब था—’कुछ भी बहाना बना दो बेटी, कह दो कि तबीयत खराब थी, कह दो कि घर की याद आ रही थी… बस यह रिश्ता मत बिगड़ने देना।’ जानकी जी ने पर्दे के पीछे से अपने होंठ दबा लिए। हर किसी को पता था कि अगर सच सामने आया, तो यह प्रतिष्ठित परिवार तुरंत उठकर चला जाएगा। समाज में लड़की के चरित्र और उसकी परिस्थितियों पर उंगलियां उठते देर नहीं लगती।

अंकिता का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसकी आंखों के सामने छह महीने पुरानी वो काली रात तैर गई।

सिंघानिया ग्रुप के मालिक का इकलौता बेटा, विशाल सिंघानिया, जो कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट था। उस रात कंपनी के एनुअल फंक्शन के बाद उसने अंकिता को जरूरी फाइलों के बहाने अपने केबिन में रोका था। शराब के नशे में धुत होकर उसने अंकिता का हाथ पकड़ने की कोशिश की थी और कहा था, “अंकिता, तुम्हारी सैलरी दुगनी हो जाएगी, कंपनी की तरफ से एक लग्जरी फ्लैट मिल जाएगा, बस मेरी खास दोस्त बन जाओ।”

उस पल अंकिता की रगों में खौलता हुआ खून उसके चेहरे पर उतर आया था। उसने एक पल की भी झिझक के बिना विशाल के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया था। तमाचे की गूंज से केबिन दहल गया था। विशाल ने तिलमिलाकर उसे बर्बाद करने की धमकी दी थी। अंकिता ने उसी रात इस्तीफा टेबल पर फेंका, अगले दिन सुबह सीधे पुलिस स्टेशन जाकर विशाल के खिलाफ छेड़छाड़ और धमकी की लिखित शिकायत दर्ज कराई, और अपना सारा सामान बांधकर अपने माता-पिता के पास लौट आई थी।

बाद में सिंघानिया परिवार ने अपने रसूख और पैसे के दम पर केस को दबाने की पूरी कोशिश की, पुलिस पर दबाव बनाया और अंकिता के परिवार को बदनाम करने की धमकियां दीं। दीनदयाल जी ने हाथ-पैर जोड़कर मामले को आगे न बढ़ाने की मिन्नतें की थीं ताकि बेटी की जान और इज्जत बची रहे। समाज में यही बात फैली थी कि अंकिता ने ‘निजी कारणों’ से नौकरी छोड़ दी, लेकिन सच तो अंकिता के सीने में अंगारे की तरह दहक रहा था।

“बेटा, आप कुछ बोल नहीं रहीं?” हरिशंकर जी ने दोबारा टोका। उनकी नजरें अंकिता के चेहरे के एक-एक भाव को पढ़ रही थीं।

राघव भी चुपचाप अंकिता को देख रहा था, उसकी नजरों में कोई संदेह नहीं बल्कि एक गहरी जिज्ञासा थी।

अंकिता ने अपनी हथेलियों को भींचा। उसके भीतर एक द्वंद्व छिड़ गया। क्या वह झूठ बोल दे? कह दे कि माँ की तबीयत खराब थी इसलिए आना पड़ा? अगर वह झूठ बोल देती, तो शायद यह शादी आज ही पक्की हो जाती। राघव जैसा सुलझा हुआ जीवनसाथी और इतना अच्छा परिवार मिलना किसी भी लड़की के लिए सौभाग्य की बात थी। लेकिन अगर झूठ की बुनियाद पर यह रिश्ता टिका, तो वह खुद से कभी नजरें कैसे मिला पाएगी? क्या अपने स्वाभिमान की रक्षा करना कोई अपराध था? क्या एक गलत इंसान का विरोध करना ऐसा पाप था जिसे जिंदगी भर छिपाना पड़े?

अंकिता ने एक गहरी सांस ली। उसने अपना सिर उठाया और सीधी नजरों से हरिशंकर जी की ओर देखा। उसकी आंखों में डर की जगह एक अजब सा तेज था।

“अंकल जी,” अंकिता की आवाज बिल्कुल साफ और अडिग थी, “मैंने अपने इस्तीफे में जो लिखा था, वह पूरा सच नहीं था। पूरा सच यह है कि मैंने नौकरी अपनी मर्जी से नहीं छोड़ी, बल्कि मुझे वो माहौल छोड़ना पड़ा क्योंकि वहां मेरे आत्मसम्मान की बोली लगाई जा रही थी।”

दीनदयाल जी ने हड़बड़ाकर कहा, “अरे अंकिता… बेटी, ये क्या कह रही हो…”

“नहीं बाबूजी, मुझे बोलने दीजिए,” अंकिता ने नम्रता से पर दृढ़ता के साथ अपने पिता को रोका। फिर वह हरिशंकर जी की तरफ मुड़ी, “अंकल जी, उस कंपनी के मालिक के बेटे ने मेरे साथ बदतमीजी करने की कोशिश की थी। उसने मुझे पैसों और प्रमोशन का लालच देकर अपनी मर्यादा लांघने को कहा। मैंने उसके मुंह पर थप्पड़ मारा और उसी वक्त नौकरी छोड़ दी। सिर्फ नौकरी ही नहीं छोड़ी, मैंने थाने जाकर उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई।”

कमरे में बैठे सभी लोग सन्न रह गए। जानकी जी की आंखों से आंसू छलक पड़े।

अंकिता रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “उसके परिवार ने बहुत रसूखदार होने के नाते केस को कमजोर करने की कोशिश की और हमारे परिवार को धमकियां दीं। बाबूजी डर गए थे, इसलिए हम सब यह शहर छोड़कर यहां चले आए। मुझे पता है कि हमारे समाज में ऐसी बात सुनने के बाद लोग लड़की को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। लोग सोचते हैं कि ताली दोनों हाथों से बजती है या फिर लड़की ने ही कोई छूट दी होगी। मुझे यह भी मालूम है कि यह सच जानने के बाद शायद कोई भी संभ्रांत परिवार मुझे अपने घर की बहू नहीं बनाएगा। आप लोग बहुत अच्छे हैं, और मैं चाहती तो कोई भी झूठा बहाना बनाकर आपसे शादी कर सकती थी। लेकिन जो रिश्ता झूठ की बुनियाद पर बने, उस रिश्ते में मैं कभी खुश नहीं रह सकती। मेरे लिए मेरा स्वाभिमान और सच किसी भी रिश्ते से बड़ा है। अगर आपको लगता है कि मैंने गलत किया, तो आप बेशक यह रिश्ता ठुकरा सकते हैं। मुझे कोई गिला नहीं होगा।”

इतना कहकर अंकिता ने अपनी आंखें नीची कर लीं। उसके गालों पर आंसुओं की एक पतली लकीर उतर आई थी, लेकिन उसका सिर गर्व से तना हुआ था। वह अपनी कुर्सी से उठी और हाथ जोड़कर अंदर जाने के लिए मुड़ गई।

“रुकिए अंकिता जी,” एक शांत और गंभीर आवाज कमरे में गूंजी।

यह आवाज राघव की थी। अंकिता के कदम वहीं ठिठक गए। उसने मुड़कर देखा। राघव अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ था। उसके चेहरे पर एक गहरी चमक थी।

राघव ने अपने पिता की ओर देखा और फिर अंकिता की तरफ मुखातिब होकर बोला, “पापा, अगर आपकी इजाजत हो तो मैं कुछ कहूं?”

हरिशंकर जी के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया, “बेशक राघव, आज फैसला तुम्हारा ही है।”

राघव आगे बढ़ा और अंकिता के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया। “अंकिता जी, जब हम यहां आ रहे थे, तो रास्ते में हमारे एक परिचित का फोन पापा के पास आया था। वे भी उसी सिंघानिया ग्रुप में काम करते हैं। उन्होंने पापा से कहा कि जिस लड़की के घर आप रिश्ता लेकर जा रहे हैं, उसने अपने पुराने दफ्तर में बहुत बड़ा बखेड़ा खड़ा किया था, पुलिस बुलाई थी और वह बड़े ‘झगड़ालू’ मिजाज की है। उन्होंने पापा को सलाह दी थी कि ऐसी लड़की से दूर ही रहें।”

यह सुनकर दीनदयाल जी का कलेजा बैठ गया। उन्हें लगा कि अब सब कुछ खत्म हो गया। वे हाथ जोड़कर खड़े हो गए, “साहब, मेरी बच्ची बेकसूर है… भगवान के लिए…”

“दीनदयाल जी, बैठ जाइए,” हरिशंकर जी ने बड़े प्यार से दीनदयाल जी का हाथ पकड़कर उन्हें वापस सोफे पर बिठाया।

राघव ने अंकिता की आंखों में देखते हुए कहा, “अंकिता जी, पापा ने आपसे यह सवाल इसलिए नहीं पूछा था कि उन्हें कोई शक था। पापा सिर्फ यह देखना चाहते थे कि जिस समाज में सच बोलने पर अक्सर चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है, क्या उस समाज के डर से आप झूठ का सहारा लेंगी? क्या आप एक अच्छा रिश्ता बचाने के लिए अपने उस साहस को नकार देंगी जो आपने उस दरिंदे को थप्पड़ मारते वक्त दिखाया था?”

अंकिता ने अचरज से राघव को देखा। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

हरिशंकर जी अपनी जगह से उठे और अंकिता के सिर पर हाथ रखते हुए बोले, “बेटा, जब मेरे उस परिचित ने मुझे फोन पर यह बात बताई थी, तो उसने सोचा था कि मैं रिश्ता तोड़ दूंगा। लेकिन उसने जैसे ही कहा कि उस लड़की ने मालिक के बेटे को थप्पड़ मारा और पुलिस में शिकायत की, मेरे सीने में गर्व का ठिकाना नहीं रहा। मैंने उसी वक्त मन में सोच लिया था कि अगर यह बात सच है, तो मेरे घर की बहू इससे बेहतर कोई हो ही नहीं सकती! जो बेटी अपनी मर्यादा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए इतने बड़े रसूखदार के खिलाफ अकेली खड़ी हो सकती है, वह कल को मेरे पूरे परिवार का मान-सम्मान कभी झुकने नहीं देगी।”

सावित्री देवी भी आगे आईं और उन्होंने अंकिता को अपने गले से लगा लिया। उनकी आंखों में ममता के आंसू थे। “बेटा, आज के जमाने में लोग समझौता कर लेते हैं या चुपचाप सहकर घुटते रहते हैं। तुमने जो हिम्मत दिखाई, वह कोई विरली बेटी ही दिखा सकती है। और सबसे बड़ी बात, तुमने हमसे कुछ नहीं छिपाया। चाहते तो तुम भी कोई झूठी कहानी गढ़ सकती थीं।”

हरिशंकर जी ने दीनदयाल जी की ओर देखा, जिनकी आंखों से अब खुशी के आंसू बह रहे थे।

“दीनदयाल भाई साहब, आप धन्य हैं कि आपने ऐसी शेरनी जैसी बेटी को पाला-पोसा है। हमें आपकी बेटी बिना किसी शर्त, पूरे मान-सम्मान के साथ मंजूर है। अगर आपको हमारा राघव और हमारा परिवार पसंद हो, तो क्या हम इस रिश्ते को पक्का समझें?”

कमरे का भारीपन अब एक असीम आनंद और सुकून में बदल चुका था। पर्दे के पीछे खड़ी जानकी जी ने हाथ जोड़कर भगवान का धन्यवाद किया। अंकिता ने जब राघव की ओर देखा, तो राघव ने मुस्कुराते हुए हल्के से सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो—’तुम्हारे सच ने मेरा दिल जीत लिया।’

अंकिता को आज समझ आया कि सच बोलना भले ही तात्कालिक रूप से कठिन लगे, भले ही वह कुछ समय के लिए आपसे सब कुछ छीनता हुआ दिखे, लेकिन जब सच का फल मिलता है, तो वह इंसान को आत्मसम्मान के उस मुकाम पर खड़ा कर देता है जहां पूरी दुनिया सिर झुकाकर सम्मान देती है। सच की राह कांटों भरी जरूर होती है, लेकिन मंजिल हमेशा उजाले से भरी होती है।

अगर आपको किसी मोड़ पर अपने स्वाभिमान और एक आसान झूठ के बीच किसी एक को चुनना पड़े, तो आप क्या चुनेंगे? क्या हमारे समाज में आज भी सच बोलने वाली बेटियों को वही सम्मान मिलता है जिसकी वे हकदार हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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