“उसके पास वो सब है जो मुझे चाहिए—शानो-शौकत, महंगी गाड़ियां और रुतबा। और तुम बेकार हो। साफ सुन लो, जिसके पास दौलत नहीं, उससे कोई समझदार लड़की प्यार नहीं कर सकती। पैसा ही सब कुछ होता है, समझे!”
उसी वक्त धनराज की चमचमाती खुली गाड़ी हॉर्न बजाते हुए आकर रुकी थी। कावेरी ने मुझे एक हिकारत भरी नजर से देखा और उस गाड़ी में जाकर बैठ गई थी। पीछे छोड़ गई थी केवल उड़ती हुई धूल, जिसने मेरी आंखों में नहीं, मेरी पूरी रूह में चुभन भर दी थी। उन शब्दों का जहर इतना गहरा था कि मैंने उस दिन के बाद फिर कभी किसी से अपने दिल की बात नहीं कही। मैंने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी भावनाएं, किताबों और प्रशासनिक सेवा की तैयारी की भट्टी में झोंक दीं। आज मैं इस मुकाम पर था, लेकिन भीतर कहीं वह टीस अब भी बाकी थी।
सुबह के दस बजे थे। जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय के मेरे वातानुकूलित कमरे में फाइलों का अंबार लगा हुआ था। खिड़की से छनकर आती धूप सीधे मेरी महोगनी की मेज पर पड़ रही थी। अभी मैं एक ग्रामीण कन्या विद्यालय के नए छात्रावास के बजट प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर ही रहा था कि मेरे निजी सहायक, रामरतन जी, धीरे से दरवाजा खोलकर भीतर आए। उनके चेहरे पर एक असीम चमक थी और हाथों में पीतल की एक सुंदर थाली, जिसमें ताजे कलाकंद सजे हुए थे।
“साहब, मुंह मीठा कीजिए,” रामरतन जी ने झुककर अभिवादन करते हुए थाली आगे बढ़ा दी। उनका बुंदेलखंडी लहजा हमेशा दिल को छू लेता था।
“अरे रामरतन जी, आज सुबह-सुबह किस बात का उत्सव है? कोई लॉटरी लगी है क्या?” मैंने पेन का ढक्कन बंद करते हुए मुस्कुराकर पूछा।
“साहब, ईश्वर की बड़ी कृपा हुई। बिटिया ने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण कर ली है। आपके मार्गदर्शन और आशीर्वाद से वह अब उप-कलेक्टर बनेगी।” उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलक आए थे।
“यह तो बेहद गौरव की बात है रामरतन जी! बहुत-बहुत बधाई,” मैंने अपनी जेब से दो हजार रुपये का नोट निकाला और उनकी हथेली पर रख दिया, “यह मेरी तरफ से बिटिया के लिए एक छोटा सा उपहार है।”
“नहीं-नहीं साहब! यह तो आपका बड़प्पन है, पर यह रकम मैं ऐसे नहीं ले सकता। आप खुद शाम को मैडम के साथ घर पधारें और बिटिया के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दें,” उन्होंने संकोच से कहा।
‘मैडम के साथ…’ यह सुनते ही मेरे सीने में एक पुरानी टीस, एक गहरा सन्नाटा बनकर गूंज गई। मेरी उम्र बयालीस पार कर चुकी थी, प्रशासनिक सेवा का एक प्रतिष्ठित अधिकारी था, शहर भर में मान-सम्मान था, मगर निजी जीवन की डायरी के सारे पन्ने आज भी खाली पड़े थे। जवानी के उस मोड़ पर लगे एक घाव ने मुझे उम्र भर के लिए अकेला कर दिया था।
मैंने बात संभालते हुए कलाकंद का एक छोटा सा टुकड़ा मुंह में रखा और जबरन मुस्कुराते हुए रुपये उनकी जेब में डाल दिए, “आप रखिए इसे, बिटिया के लिए कोई अच्छी सी कलम ले लीजिएगा। मैं शाम को आने की पूरी कोशिश करूंगा।”
रामरतन जी कृतज्ञता से हाथ जोड़कर बाहर निकल गए। तभी मेरे फोन की घंटी बजी। नगर के सबसे नामी कॉन्वेंट स्कूल के प्रिंसिपल का फोन था। शहर के कुछ रईसजादों ने मिलकर स्कूल के परीक्षा केंद्र में दूसरे छात्रों के साथ मारपीट की थी, पेपर लीक कराने का दबाव बनाया था और शिक्षकों से बेहद अभद्र व्यवहार किया था। मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में आ चुका था और जिलाधिकारी महोदय ने मुझे स्वयं इस प्रकरण की जांच कर तत्काल निष्कासन और दंडात्मक कार्रवाई के आदेश दिए थे।
कुछ ही देर में सुरक्षाकर्मी चारों आरोपी छात्रों को लेकर मेरे दफ्तर के बाहर बने प्रतीक्षा कक्ष में पहुंच गए। उनके पीछे-पीछे स्कूल प्रबंधन के प्रतिनिधि भी थे। मैंने चपरासी को आदेश दिया कि इन सभी के अभिभावकों को तुरंत सूचित किया जाए और किसी भी बाहरी सिफारिश को मेरे कमरे तक न आने दिया जाए।
आधे घंटे के भीतर पहले छात्र के पिता पहुंचे। वे एक साधारण सरकारी क्लर्क थे। अपने बेटे की इस हरकत पर उनका सिर शर्म से झुका हुआ था। वे कांपती आवाज में बोले, “साहब, मैं दिन-रात ईमानदारी की कमाई से इसे पढ़ा रहा हूं। अगर यह ऐसी संगत में रहेगा तो हमारा पूरा परिवार तबाह हो जाएगा। आप जो सजा देंगे, मुझे मंजूर है, बस इसकी जिंदगी बर्बाद होने से बचा लीजिए।”
मैंने उस पिता की बेबसी और ईमानदारी को देखा। छात्र को कड़ी चेतावनी दी गई, उससे लिखित में माफीनामा लिया गया और उसके पिता को समझाया कि वह बच्चे की संगत पर ध्यान दें। पिता ने हाथ जोड़कर अपने आंसू पोंछे और बेटे का कान पकड़कर बाहर ले गए।
कुछ देर बाद दो अन्य छात्रों की माताएं भी रोती-बिलखती पहुंचीं। दोनों ने अपने बेटों की नादानी को स्वीकार किया, स्कूल के नुकसान की भरपाई का शपथ पत्र दिया और भविष्य में कभी ऐसी पुनरावृत्ति न होने का भरोसा दिलाया। उन्हें भी अनुशासनहीनता के तहत दो महीने के लिए निलंबित करते हुए, सुधरने का एक अंतिम अवसर देकर भेज दिया गया।
अब चौथे लड़के की बारी थी, जिसका नाम कबीर था। जांच रिपोर्ट के अनुसार, पूरी गुंडागर्दी और तोड़फोड़ का मुख्य सूत्रधार यही लड़का था। स्कूल के गार्ड ने बताया था कि वह महंगी स्पोर्ट्स कार से स्कूल आता था और शिक्षकों तक को धमकाता था।
कमरे का दरवाजा खुला। एक महिला ने अंदर कदम रखा। कीमती शिफॉन की साड़ी, चेहरे पर गहरा मेकअप और हाथ में एक महंगा विदेशी पर्स। लेकिन जैसे ही उसकी नजर मेज के पीछे बैठे मुझ पर पड़ी, उसके कदम वहीं जड़वत हो गए। उसके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया, जैसे किसी ने उसकी रगों से सारा खून खींच लिया हो।
वह कावेरी थी।
बीस साल बाद भी वह चेहरा मेरी स्मृति से पूरी तरह मिटा नहीं था। वह वही कावेरी थी, जिसे मैंने अपने विश्वविद्यालय के दिनों में अपनी पूरी आत्मा से चाहा था।
मेरी आंखों के सामने अतीत का वह मनहूस दिन किसी जीवंत चलचित्र की तरह तैरने लगा।
वह विश्वविद्यालय की पुरानी लाइब्रेरी की सीढ़ियां थीं। मैं एक फटी हुई कॉलर वाली कमीज और घिसी हुई चप्पल पहने, हाथों में प्रतियोगी परीक्षाओं की पुरानी किताबें लिए खड़ा था। कावेरी परीक्षा के कुछ नोट्स लेने के बहाने मुझसे बातें करती थी, और मैं नादान उसे अपना सब कुछ समझ बैठा था।
“कावेरी, मैं दिन-रात पढ़ाई कर रहा हूं। एक बार मेरी नौकरी लग जाए, फिर मैं तुम्हारे पिताजी से बात करूंगा। मैं तुमसे सच में बहुत प्यार करता हूं,” मैंने बेहद मासूमियत और उम्मीद से कहा था।
कावेरी ने मुझे ऊपर से नीचे तक घृणा से देखा था। उसके होंठों पर एक क्रूर मुस्कान उभर आई थी। “प्यार? अपनी हैसियत देखी है तुमने मयंक? यह घिसी हुई साइकिल, हाथ में फटी किताबें और जेब में बस बस का किराया! तुम जैसे लड़के जिंदगी भर क्लर्क की कतार में धक्के खाते हैं। मेरे सपनों को पूरा करना तुम्हारी सात पुश्तों के बस की बात नहीं है।”
“लेकिन कावेरी, इंसान की नीयत और मेहनत भी तो कुछ होती है। वह जो धनराज है, वह सिर्फ अपने बाप की दौलत पर अय्याशी करता है, उसका अपना कोई वजूद नहीं है,” मैंने तड़पकर कहा था।
“उसके पास वो सब है जो मुझे चाहिए—शानो-शौकत, महंगी गाड़ियां और रुतबा। और तुम बेकार हो। साफ सुन लो, जिसके पास दौलत नहीं, उससे कोई समझदार लड़की प्यार नहीं कर सकती। पैसा ही सब कुछ होता है, समझे!”
उसी वक्त धनराज की चमचमाती खुली गाड़ी हॉर्न बजाते हुए आकर रुकी थी। कावेरी ने मुझे एक हिकारत भरी नजर से देखा और उस गाड़ी में जाकर बैठ गई थी। पीछे छोड़ गई थी केवल उड़ती हुई धूल, जिसने मेरी आंखों में नहीं, मेरी पूरी रूह में चुभन भर दी थी। उन शब्दों का जहर इतना गहरा था कि मैंने उस दिन के बाद फिर कभी किसी से अपने दिल की बात नहीं कही। मैंने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी भावनाएं, किताबों और प्रशासनिक सेवा की तैयारी की भट्टी में झोंक दीं। आज मैं इस मुकाम पर था, लेकिन भीतर कहीं वह टीस अब भी बाकी थी।
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि दीवार घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी।
कावेरी के कांपते हाथों से उसका महंगा पर्स छूटकर फर्श पर गिर पड़ा। उसकी सांसें फूल रही थीं। वह कुर्सी का सहारा लेकर धीरे से बैठ गई। वह एकटक मुझे देख रही थी, शायद अपनी आंखों पर विश्वास करने की कोशिश कर रही थी कि जिस लड़के को उसने ‘बेकार’ कहकर दुत्कारा था, आज उसी की मेज के सामने उसके बेटे का भविष्य दांव पर लगा था।
तभी बाहर से एक भारी, रोबीली आवाज गूंजी। कमरे का दरवाजा जोर से खुला। लगभग पचास साल का एक भारी-भरकम, स्थूल शरीर वाला व्यक्ति अंदर दाखिल हुआ। सफारी सूट, गले में सोने की दो-तीन मोटी जंजीरें और उंगलियों में पन्ना और पुखराज की चमकती अंगूठियां। यह धनराज था—चेहरे पर शराब और बेतहाशा दौलत की बदबूदार अकड़ साफ झलक रही थी।
“अरे इंस्पेक्टर हो या अफसर, जो भी हो तुम! मेरे बेटे कबीर को तुरंत छोड़ो। शहर में नए आए हो क्या? जानते नहीं मैं कौन हूं? पूरे शहर का ठेका कारोबार मेरे इशारे पर चलता है,” धनराज ने मेरी कुर्सी के सामने आते ही अपनी जेब से नोटों की गड्डियों से भरा एक मोटा लेदर का ब्रीफकेस मेज पर पटक दिया। “जितना जुर्माना लगाना है लगाओ, ये लो पैसे। लेकिन मेरे बेटे का नाम किसी सरकारी कागज पर नहीं आना चाहिए। पैसा फेंको, तमाशा देखो।”
उसी समय सुरक्षाकर्मी कबीर को लेकर भीतर आ गए। कबीर के चेहरे पर भी अपने बाप जैसी ही बेहूदा अकड़ थी।
“पापा, इन लोगों ने मुझे यहां बैठा रखा है, जबकि बाकी लड़कों को छोड़ दिया। इस मामूली अफसर की हिम्मत कैसे हुई मुझे रोकने की?” कबीर चिल्लाया।
मैंने शांत भाव से अपने चश्मे को ठीक किया। अपनी डायरी बंद की और सुरक्षा प्रभारी की ओर देखकर अत्यंत शांत लेकिन सख्त लहजे में कहा, “सुरक्षा अधिकारी, इस लड़के को तुरंत पुलिस कस्टडी में सौंपिए। इसके खिलाफ स्कूल की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सरकारी आदेश की अवहेलना करने, और अब इसके पिता द्वारा एक राजपत्रित अधिकारी को रिश्वत देने की कोशिश करने की नई धाराएं जोड़कर प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करवाई जाए।”
यह सुनते ही धनराज के होश उड़ गए। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, “तुम्हारी इतनी हिम्मत? तुम जानते नहीं मेरा रसूख…”
“अपनी जुबान को लगाम दीजिए श्रीमान धनराज!” मेरी आवाज पूरे कमरे में गूंज उठी। मेरे चेहरे की गंभीरता और आंखों की सख्ती ने उस अहंकारी व्यापारी को अपनी जगह पर सुन्न कर दिया।
“यह शिक्षा विभाग का दफ्तर है, आपकी शराब की भट्टी या पैसों की मंडी नहीं। जिन लड़कों को मैंने छोड़ा, उनके माता-पिता अपने बच्चों के अपराध पर शर्मिंदा थे। उनके भीतर संस्कार और कानून का डर था। वे अपनी औलाद को सुधारना चाहते थे। लेकिन आप? आप अपनी इस अंधी दौलत के अहंकार से अपने ही बेटे के गुनाहों को खरीद रहे हैं। आपने इसे संसाधन तो दिए, मगर संस्कार नहीं दिए। इसे दौलत दी, पर इंसानियत नहीं सिखाई। आज अगर इसे कानून का सबक नहीं सिखाया गया, तो कल यह किसी निर्दोष की जान लेने से भी पीछे नहीं हटेगा।”
मेरे एक-एक शब्द ने उस कमरे में खड़े हर व्यक्ति को हिलाकर रख दिया। धनराज की सारी हेकड़ी पल भर में हवा हो गई। उसे समझ आ गया कि सामने कोई ऐसा इंसान बैठा है जिसे उसकी करोड़ों की दौलत डिगा नहीं सकती।
तभी एक चीख जैसी सिसकी गूंजी।
कावेरी अपनी कुर्सी से उठकर तेजी से मेरी मेज के पास आ गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी। उसने कांपते हाथों को जोड़ लिया। उसके सारे बनावटी ठाठ-बाट, सारा घमंड, सब मिट्टी में मिल चुका था।
“मयंक… नहीं, साहब… मुझे माफ कर दीजिए! मेरे बच्चे की जिंदगी बचाइए!” कावेरी फफक-फफक कर रो पड़ी। “मैं जानती हूं कि मैंने आपके साथ जो किया, उसकी कोई माफी नहीं है। मैंने दौलत के अंधेपन में सच और स्वाभिमान को ठुकरा दिया था। आज ईश्वर ने मुझे मेरे ही कर्मों की सजा दी है। मेरी दौलत ने मेरे ही बेटे को एक हैवान बना दिया। लेकिन एक मां के नाते भीख मांगती हूं, इसका भविष्य बर्बाद मत कीजिए। इसे जेल मत भेजिए। यह सुधर जाएगा साहब, मैं वादा करती हूं!”
कावेरी की झुकी हुई गर्दन, उसके बहते हुए आंसू और उसकी वह याचना… उस एक पल में, बीस साल पहले मेरे सीने में धधकी वह आग हमेशा के लिए शांत हो गई। जिस कड़वाहट को मैं इतने सालों से अपने भीतर ढो रहा था, वह अचानक कपूर की तरह उड़ गई।
मुझे एहसास हुआ कि नफरत का जवाब नफरत नहीं हो सकता। यदि मैं आज अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके अपने पुराने अपमान का बदला लेता, तो मुझमें और उस दिन की कावेरी में क्या फर्क रह जाता? एक सच्चे अधिकारी और एक स्वाभिमानी मनुष्य की असली विजय बदले में नहीं, बल्कि न्याय और सुधार में होती है।
मैंने गहरी सांस ली। कबीर की ओर देखा, जो अब अपनी मां को इस तरह गिड़गिड़ाते देखकर कांप रहा था। पहली बार उस लड़के की आंखों में अपनी मां के आंसुओं को देखकर एक गहरा अपराधबोध तैरता नजर आया। उसका घमंड भी अपनी मां की लाचारी देखकर चकनाचूर हो चुका था।
“कावेरी जी, शांत हो जाइए और बैठिए,” मैंने अत्यंत शालीनता से कहा। “मैं यहां किसी से व्यक्तिगत बदला लेने के लिए नहीं बैठा हूं। मेरा काम बच्चों का भविष्य बर्बाद करना नहीं, उन्हें सही राह दिखाना है।”
मैंने धनराज की ओर देखा, जिसका सिर भी अब शर्म से झुक चुका था।
“धनराज जी, अपना यह पैसों का बैग उठाइए। पैसा सम्मान नहीं खरीद सकता, और न ही यह आपकी औलाद के गुनाहों का कफन बन सकता है। अगर सच में अपने बेटे से प्यार करते हैं, तो इसे अपनी मेहनत का आदर करना सिखाइए।”
फिर मैंने कबीर को अपने पास बुलाया। लड़का सहमते हुए आगे आया।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, “कबीर, आज तुमने देखा कि तुम्हारे इस झूठे घमंड ने तुम्हारी मां को कहां लाकर खड़ा कर दिया? जिस मां को रानी बनाकर रखना चाहिए था, वह तुम्हारे कुकर्मों की वजह से हाथ जोड़कर रो रही है। क्या यही तुम्हारी मर्दानगी है? क्या दौलत का यही इस्तेमाल होता है?”
कबीर फूट-फूट कर रोने लगा। वह घुटनों के बल बैठ गया और अपनी मां के आंचल को पकड़कर बोला, “मुझे माफ कर दो मां! मुझे माफ कर दीजिए सर! मैं कसम खाता हूं, आज के बाद कभी किसी के साथ बदतमीजी नहीं करूंगा। कभी अपनी गाड़ी या पैसों का घमंड नहीं दिखाऊंगा।”
कमरे का वातावरण एकदम बदल चुका था। उस कमरे में अब कोई अहंकारी रईस नहीं था, बल्कि एक सुधरने को बेताब परिवार था।
मैंने फाइल पर अंतिम आदेश लिखा: “कबीर को इस सत्र के लिए स्कूल के सभी खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से निष्कासित किया जाता है। साथ ही, उसे अगले छह महीने तक हर रविवार किसी अनाथालय या वृद्धाश्रम में जाकर चार घंटे की अनिवार्य सामाजिक सेवा देनी होगी, ताकि वह जीवन और समाज के वास्तविक संघर्ष को समझ सके। यदि उसकी ओर से एक भी शिकायत आई, तो उसका निष्कासन स्थायी कर दिया जाएगा।”
कावेरी ने हाथ जोड़कर सिर झुका लिया। उसकी आंखों में केवल पश्चाताप और मेरे लिए एक असीम कृतज्ञता थी। धनराज ने चुपचाप अपना बैग उठाया और बिना कुछ कहे, अपने सुबकते हुए बेटे का हाथ थामकर कमरे से बाहर निकल गया।
जाते-जाते कावेरी दरवाजे पर एक पल के लिए रुकी। उसने मुड़कर मुझे देखा। उसकी आंखों में कोई पुराना अधिकार नहीं था, बस एक ऐसा मौन नमन था जिसने यह स्वीकार कर लिया था कि जीवन की सच्ची दौलत बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार और क्षमाशीलता में होती है।
कमरे का दरवाजा बंद हो गया।
मैं अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर टिक गया। खिड़की से आती हवा अब पहले से कहीं ज्यादा हल्की और सुकून देने वाली लग रही थी। बीस साल पुराना वह भारी बोझ, वह घुटन और वह अकेलापन, सब कुछ अचानक छूमंतर हो गया था। मेरे होंठों पर एक सहज, शांत मुस्कान तैर गई।
शाम के पांच बज चुके थे। मैंने अपनी मेज समेटी, फाइलों को करीने से रखा और बाहर खड़े रामरतन जी को आवाज दी, “रामरतन जी, गाड़ी तैयार करवाइए। आज शाम आपकी बिटिया के घर चलना है, उसे अपनी नई शुरुआत के लिए ढेर सारा आशीर्वाद जो देना है।”
आपके विचार हमारे लिए बेहद अनमोल हैं:
जीवन में कभी न कभी हम सभी का सामना ऐसे लोगों से होता है जो दौलत के गुरूर में मानवीय रिश्तों और भावनाओं को कुचल देते हैं। आपके अनुसार, क्या मयंक ने कावेरी और उसके बेटे को माफ करके और सुधरने का मौका देकर सही किया? क्या बदले की भावना से बड़ा क्षमा का भाव होता है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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