रिश्तों का आइना

अंजलि की आंखों से अब आंसुओं की धार बह निकली। ये आंसू दर्द के नहीं, बल्कि पछतावे के थे। उसे अपनी सोच पर, अपने उस शक पर घिन आने लगी जो उसने आभासी दुनिया के उस कचरे को देखकर अपने मन में पाला था। जो परिवार उसके लिए अपनी जान छिड़कता है, जो सासू मां उसे बेटी से बढ़कर मानती हैं, जो ननद उसके लिए सरप्राइज प्लान कर रही थी, उसने उन्हें एक सीरियल की वैम्प समझ लिया था। उसे समझ आ गया कि सोशल मीडिया की वो चमकती स्क्रीन असल ज़िंदगी का आइना नहीं होती। वहां बेचे जाने वाले ड्रामे और विवाद सिर्फ चंद लाइक्स और व्यूज के लिए होते हैं, उनका वास्तविकता के उन प्यारे रिश्तों से कोई लेना-देना नहीं होता जो निस्वार्थ भाव से जुड़े होते हैं।

लखनऊ के एक भरे-पूरे और चहकते हुए आंगन से विदा होकर अंजलि जब रोहन के जीवन में आई, तो मानो पूरे घर में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया था। रोहन के माता-पिता, उसकी छोटी बहन दीपिका  और छोटा भाई सुमित, सभी अंजलि के खुशमिजाज स्वभाव के दीवाने हो गए थे। अंजलि भी इस परिवार में इस कदर घुल-मिल गई थी जैसे शक्कर दूध में। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, घर का हर कोना अंजलि की हंसी से गूंजता रहता था। सासू मां तो मोहल्ले भर में अपनी बहू की तारीफें करते नहीं थकती थीं। उनका मानना था कि अंजलि के कदम उनके घर के लिए बहुत शुभ हैं, और उनकी यह बात तब और भी सच साबित हो गई जब शादी के महज तीन महीने बाद ही रोहन को एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी में प्रमोशन के साथ बेंगलुरु ट्रांसफर का ऑफर मिल गया।

पूरे घर में जश्न का माहौल था। हालांकि, बेटे और बहू के दूर जाने का दुख भी था, लेकिन रोहन के सुनहरे भविष्य के आगे वह दुख छोटा पड़ गया। बेंगलुरु जैसे महानगर में शिफ्ट होने की बात सोचकर अंजलि की आंखों में भी ढेरों सपने तैरने लगे थे। एक नया शहर, अपना एक छोटा सा आशियाना और रोहन का साथ, सब कुछ किसी खूबसूरत फिल्म जैसा लग रहा था।

शुरुआती दिनों में मदद के लिए सासू मां ने दीपिका  को उनके साथ बेंगलुरु भेज दिया। बेंगलुरु के एक शानदार हाई-राइज अपार्टमेंट की पंद्रहवीं मंजिल पर उनका नया घर था। दीपिका  के रहने तक सब कुछ बहुत खुशनुमा रहा। दोनों ननद-भाभी मिलकर घर सजातीं, नई-नई डिशेज बनातीं और वीकेंड पर रोहन के साथ शहर घूमने निकल जातीं। लेकिन यह रौनक चंद हफ्तों की ही मेहमान थी। दीपिका  के कॉलेज की परीक्षाएं करीब आ गईं और उसे वापस लखनऊ लौटना पड़ा। दीपिका  के जाते ही उस बड़े से फ्लैट में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया।

रोहन का नया प्रोजेक्ट बहुत चुनौतीपूर्ण था। सुबह आठ बजे जो वह लैपटॉप बैग लेकर निकलता, तो रात के नौ या कभी-कभी दस भी बज जाते। शुरुआत में अंजलि ने खुद को घर के कामों में व्यस्त रखने की कोशिश की। वह बड़े चाव से रोहन के लिए नाश्ता और लंच बॉक्स तैयार करती, घर को चमका कर रखती, लेकिन दोपहर होते-होते उसके पास करने के लिए कुछ नहीं बचता। बालकनी से नीचे दौड़ती भागती गाड़ियों को देखना और रोहन के आने का इंतजार करना ही उसकी दिनचर्या बन गई। यह अकेलापन उसे धीरे-धीरे काटने लगा था।

समय बिताने के लिए अंजलि ने अपने स्मार्टफोन का सहारा लिया। उसने इंटरनेट पर वीडियो और रील्स देखना शुरू कर दिया। शुरुआत में वह कुकिंग और होम डेकोर के वीडियो देखती थी, लेकिन न जाने कैसे सोशल मीडिया के एल्गोरिदम ने उसे पारिवारिक राजनीति, सास-बहू के झगड़े और ‘टॉक्सिक रिश्तों’ वाले वीडियो और वेब सीरीज की तरफ धकेल दिया। वह घंटों उन काल्पनिक और अति-नाटकीय कहानियों में डूबी रहती, जहां हर सास अपनी बहू के खिलाफ साजिश रचती है और हर ननद अपनी भाभी की खुशियों से जलती है। ‘सास के तानों का कैसे दें जवाब’, ‘ननद की चालाकियों से कैसे बचें’, ऐसे वीडियो देखते-देखते अंजलि के अवचेतन मन में एक अजीब सा ज़हर घुलने लगा।

जो अंजलि लखनऊ से एक प्यार भरा दिल लेकर आई थी, वह अब हर रिश्ते को शक की निगाह से देखने लगी। सासू मां जब भी फोन करके पूछतीं कि “बहू, आज खाने में क्या बनाया है? रोहन का ध्यान रख रही हो न?” तो पहले जिस बात में अंजलि को उनका प्यार और फिक्र नज़र आती थी, अब वही बात उसे ‘दखलअंदाजी’ और ‘रोब जमाना’ लगने लगी। उसे लगने लगा कि सासू मां सिर्फ अपने बेटे की फिक्र करती हैं, उसे तो सिर्फ एक नौकरानी समझती हैं।

एक दिन दीपिका  ने रोहन को फोन किया और अपने एक नए प्रोजेक्ट के लिए कुछ पैसों की मांग की। रोहन ने बिना सोचे तुरंत पैसे ट्रांसफर कर दिए। यह बात जब अंजलि को पता चली, तो उसके दिमाग में उन वीडियोज़ की बातें घूमने लगीं कि ‘कैसे ननदें अपने मायके का पैसा चूसती हैं’। उसने रोहन से इस बात पर बहस कर ली। रोहन हैरान था कि जो अंजलि दीपिका  को सगी बहन से बढ़कर मानती थी, वह अचानक पैसों को लेकर इतनी छोटी बात कैसे कर सकती है। बात आई-गई हो गई, लेकिन अंजलि के मन की कड़वाहट कम नहीं हुई।

अंजलि का व्यवहार पूरी तरह से बदल चुका था। रोहन जब थका-हारा ऑफिस से लौटता, तो उसे घर में शांति मिलने के बजाय अंजलि के ताने सुनने को मिलते। अंजलि उसे लखनऊ वालों की बुराइयां गिनाती रहती। वह चिड़चिड़ी और बात-बात पर गुस्सा करने वाली महिला बन गई थी। फोन पर भी वह अपने ससुराल वालों से बहुत रूखेपन से बात करने लगी थी। सासू मां और ससुर जी को भी महसूस होने लगा था कि उनकी बहू बदल गई है, लेकिन वे इसे नए शहर की थकान और एडजस्टमेंट का नाम देकर टाल देते थे।

त्योहारों का मौसम आया तो रोहन के माता-पिता और दीपिका  ने बेंगलुरु आने का फैसला किया। वे अंजलि और रोहन को सरप्राइज देना चाहते थे। जब वे लोग अचानक दरवाजे पर पहुंचे, तो रोहन तो खुशी से उछल पड़ा, लेकिन अंजलि के चेहरे पर एक अजीब सी सिकुड़न आ गई। उसे लगा कि ये लोग उसकी आज़ादी छीनने और उस पर नज़र रखने आए हैं। घर में सासू मां का रसोई में आकर काम में हाथ बंटाना अंजलि को अपने साम्राज्य में घुसपैठ लगने लगा। दीपिका  का अपने भाई के साथ बैठकर हंसी-मज़ाक करना उसे एक गहरी साजिश लगने लगी। उसे लगता कि ये तीनों मिलकर उसके खिलाफ कोई योजना बना रहे हैं।

एक दिन दोपहर में, जब रोहन ऑफिस में था, अंजलि की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। उसे तेज बुखार आ गया और पेट में असहनीय दर्द होने लगा। दर्द के मारे वह बिस्तर पर तड़प रही थी। जब सासू मां ने उसकी चीख सुनी, तो वे बदहवास होकर कमरे में दौड़ी आईं। उन्होंने तुरंत दीपिका  को आवाज़ लगाई। दीपिका  ने बिना एक पल गंवाए रोहन को फोन किया और पड़ोसियों की मदद से एंबुलेंस बुलाई।

अस्पताल में अंजलि को फूड पॉइजनिंग और डिहाइड्रेशन के कारण भर्ती करना पड़ा। जब अंजलि को थोड़ा होश आया, तो उसने अपनी आंखें खोलीं। उसने देखा कि उसकी सासू मां उसके सिरहाने बैठी हैं, उनके हाथ में एक रुद्राक्ष की माला है और उनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे हैं। वे भगवान से सिर्फ अपनी बहू की सलामती की दुआ मांग रही थीं। दीपिका  अस्पताल के चक्कर काट-काट कर दवाइयां ला रही थी और रोहन बाहर डॉक्टर से बात कर रहा था।

उस रात अंजलि अस्पताल के बिस्तर पर लेटी-लेटी सब कुछ सुन और देख रही थी। सासू मां ने रोहन से कहा, “बेटा, तू ऑफिस के चक्कर में मेरी बच्ची का बिल्कुल ध्यान नहीं रखता। देख कितनी कमज़ोर हो गई है मेरी अंजलि। ये शहर इसके लिए नया है, वो दिन भर घर में अकेली रहती है। तुझे उसके साथ ज्यादा वक्त बिताना चाहिए। हम तो कुछ दिन के मेहमान हैं, पर उसका अपना तो सिर्फ तू ही है यहां।”

दीपिका  ने भी रोहन को डांटते हुए कहा, “हां भइया, भाभी ने ही हमेशा हमारा इतना ख्याल रखा है और आप उन्हें ऐसे अकेले छोड़ देते हो। मैं तो अपने कॉलेज के असाइनमेंट के लिए जो पैसे आपसे लिए थे, उसी से भाभी के लिए एक खूबसूरत सी साड़ी लाई हूं, सोचा था उन्हें सरप्राइज दूंगी, पर ये सब हो गया।”

अंजलि की आंखों से अब आंसुओं की धार बह निकली। ये आंसू दर्द के नहीं, बल्कि पछतावे के थे। उसे अपनी सोच पर, अपने उस शक पर घिन आने लगी जो उसने आभासी दुनिया के उस कचरे को देखकर अपने मन में पाला था। जो परिवार उसके लिए अपनी जान छिड़कता है, जो सासू मां उसे बेटी से बढ़कर मानती हैं, जो ननद उसके लिए सरप्राइज प्लान कर रही थी, उसने उन्हें एक सीरियल की वैम्प समझ लिया था। उसे समझ आ गया कि सोशल मीडिया की वो चमकती स्क्रीन असल ज़िंदगी का आइना नहीं होती। वहां बेचे जाने वाले ड्रामे और विवाद सिर्फ चंद लाइक्स और व्यूज के लिए होते हैं, उनका वास्तविकता के उन प्यारे रिश्तों से कोई लेना-देना नहीं होता जो निस्वार्थ भाव से जुड़े होते हैं।

अगले दिन जब अंजलि को छुट्टी मिली और वह घर लौटी, तो उसने सबसे पहला काम किया अपने फोन से उन सभी नेगेटिव एप्लिकेशंस और चैनल्स को अनसब्सक्राइब और डिलीट करना। उसने रोते हुए अपनी सासू मां और दीपिका  के गले लगकर माफी मांगी। हालांकि, उसने उन्हें अपनी उस गंदी सोच के बारे में नहीं बताया, लेकिन उसने यह ज़रूर कहा कि वह अकेलेपन में कुछ चिड़चिड़ी हो गई थी। सासू मां ने मुस्कुराते हुए उसके माथे को चूमा और कहा, “अरे पगली, अपनों से भी कोई माफी मांगता है भला? तू बस जल्दी से ठीक हो जा, फिर हम सब मिलकर मैसूर घूमने चलेंगे।”

अंजलि ने महसूस किया कि उसने एक बहुत बड़ी खाई में गिरने से खुद को बचा लिया था। उसने तय किया कि वह अब कभी भी किसी तीसरे इंसान, चाहे वह असली हो या फोन की स्क्रीन के अंदर, उसके विचारों को अपने परिवार के प्यार पर हावी नहीं होने देगी। उस दिन के बाद, उस पंद्रहवीं मंजिल के फ्लैट में फिर से वही लखनऊ वाली हंसी और चहक लौट आई थी, जो कभी इंटरनेट के शोर में कहीं दब गई थी। अंजलि अब एक नई और सकारात्मक शुरुआत कर चुकी थी, जहां शक के लिए कोई जगह नहीं थी, बल्कि सिर्फ विश्वास और अपनों का अटूट प्यार था।

क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि फोन की स्क्रीन पर दिखने वाली दुनिया हमारी असल ज़िंदगी के रिश्तों पर हावी हो रही है? क्या कभी किसी सुनी-सुनाई बात ने आपके किसी प्यारे रिश्ते में दरार डालने की कोशिश की है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट्स में ज़रूर साझा करें।

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