विश्वासघाती – बालेश्वर गुप्ता

चले गये ना,कहते थे जीवन भर साथ निभाऊंगा। तुम्हारे इतने भर कहने मात्र से सब घरबार,सब रिश्ते नाते छोड़ तुम्हारे साथ चली आई थी।बताओ,अब किसके सहारे और किसके लिए जिऊं? विलाप करती करती सरोज बेहोश हो गयी।

       तीस वर्ष पूर्व एक छोटे से कस्बे में एक प्रेम पुष्प विकसित हुआ था।तीस वर्ष  पहले,तब प्रेम होना या करना एक प्रकार से अनहोनी था,समाज को अस्वीकार्य था,पर प्रेम होना किसी भी काल में कभी रुका है?प्रेम ने क्या कभी किसी बंधन को स्वीकार किया है? रमेश और सरोज ने भी समाज के बंधन को तब स्वीकार नहीं किया। उन्होंने समझ लिया था,उनके मिलन को सामाजिक मान्यता नहीं मिलेगी,सो सब बंधनों को तोड़ एक दिन दोनों पंछी पिंजरे से निकल उड़ गए।

      शहर में आकर सबसे पहले रमेश ने सरोज से आर्यसमाज मंदिर में शादी कर उसकी मांग में सिंदूर भर दिया। सरोज गुमसुम थी,बोली रमेश तुम्हारी खातिर सब कुछ छोड़ आयी हूं,तुम तो मुझे नहीं छोड़ दोगे।भावुक हो रमेश ने उसको बाहों में भर लिया,सरोज मै भी तो सब कुछ छोड़ आया हूं,पर तुम्हे जीवन भर नहीं छोड़ूंगा।

       संघर्ष के दिन आ गए थे,कोई रोजगार नहीं था रमेश के पास।अपनी अंगूठी और गले की चेन बेचकर कुछ रुपयों का जुगाड़ किया और एक छोटा सा कमरा किराये पर ले लिया।अगले दिन से तलाश शुरू हुई किसी काम की,जिससे जीवन यापन हो सके।दो दिनों की मेहनत ने इतना तो किया कि एक बिल्डिंग जो निर्माणाधीन थी,उसमें मजदूरो के हिसाब किताब रखने का काम मिल गया साथ ही कुछ अग्रिम रूप में राशि भी।

       घर का चूल्हा जलने लगा था।रात्रि के वीराने में जब पास में लेटी सरोज सो जाती तो रमेश की आँखें सरोज को देख भर आती।उसे अपने संजोये सपने याद आ जाते।कोठी में नौकरों के बीच पलने वाला रमेश आज एक चाल नुमा कोठरी में पड़ा है। वहाँ होता तो क्या उसकी पत्नी पुरानी सी धोती में रहती,स्टोव पर खुद खाना बनाती?सोचते सोचते रमेश सरोज को बाहों में ले बुदबुदाता मै वे दिन जरूर वापस लाऊँगा,अपनी सरोज को रानी बनाऊंगा।

       रमेश ने अपने आपको अब केवल मजदूरों के हिसाब किताब रखने तक सीमित नहीं रखा,बल्कि पूरे समर्पण भाव से वह निर्माण कार्य के हर क्षेत्र को देखने लगा,और सहयोग भी करने लगा।व्यापारिक परिवार से संबंधित होने के कारण,वह व्यापार के हर कोण को समझता था।उसकी महत्ता को बिल्डर ने ताड़ लिया था।उसने धीरे धीरे प्रोजेक्ट का पूरा भार रमेश को सौंप दिया। मजदूरों का लेखा जोखा रखने वाला रमेश, अपनी मेहनत व लगन के बल पर अब प्रोजेक्ट मैनेजर बन गया था।अच्छा खासा वेतन मिलने लगा था।अब उसने एक फ्लैट किराए पर ले लिया था।सरोज को जिस रूप में वह देखना चाहता था,वह अब हर रंग उस तस्वीर में भरने लगा था।

     इसी बीच रमेश और सरोज के बीच एक और जीवन का पदार्पण हो गया,मुन्ना का।दोनों की जीवन रेखा बन गया मुन्ना।उनका सब प्यार,उनकी सब सोच, भविष्य मुन्ना हो गया।

        समय गुजरता जा रहा था,रमेश को बिल्डर ने अपना पार्टनर बना लिया था।अब रमेश के पास सब कुछ था,मुन्ना को पढ़ने के लिए उसने विदेश भेज दिया था।रमेश अपनी सरोज और मुन्ना को हर खुशी देना चाहता था।रमेश के पास अब एक बड़ा आलीशान फ्लैट था, जिसके बाहर प्लेट लगी थी सरोजालय.

      पर मुन्ना विदेश गया तो वापस नहीं लौटा,वही उसने शादी कर ली,और वही नौकरी ढूंढ ली।कह दिया, पापा-आप के और मम्मी के साथ शैली नहीं रह पायेगी,इसलिए हम भारत वापस नहीं आ पायेंगे। पापा वैसे तो आपको कोई जरूरत नहीं है,सबकुछ आपके पास है,फिर भी आप जो कहेंगे मै यहां से भिजवा दिया करूंगा।

         जीवन संघर्ष में कभी भी हार न मानने वाला रमेश  अपने मुन्ना के इन शब्दों से टूट गया।क्या हमने मुन्ना से ये चाहा था?सरोज रमेश के मनोभाव समझ रही थी,आखिर पूरे जीवन संघर्ष में वह रमेश की सहभागी थी।मुन्ना ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा,जहां उसके मम्मी पापा भी खड़े हैं।

       मुन्ना के भविष्य में अपना भविष्य देखने वाले रमेश और सरोज हतप्रभ थे।रमेश बोला सरोज अरे हम भी तो अपने मां और पिता को छोड़ चले आए थे,आज हमारा अतीत शायद सामने आ गया है,ऐसे ही मुन्ना चला गया।पर सरोज हमने तो अपने मां बाप से आशीर्वाद मांगा था ना,जब उन्होंने बिल्कुल मना कर दिया तभी तो हम आए थे,फिर सरोज बाद में क्या हमने उनका आशीर्वाद नहीं लिया था।सरोज सब समझ रही थी,पर कहे तो क्या कहे,उसकी आंखों से ही कहां आंसू थम रहे थे,बस वह रमेश के सीने पर सिर रख फफक पड़ी।

        उस रात सोते समय बार बार रमेश के सामने मुन्ना का हंसता हुआ चेहरा आ जाता,उसकी शरारते याद करते करते रमेश के चेहरे पर मुस्कान छलक पड़ती,दूसरे ही क्षण याद आता अरे मुन्ना तो सात समुन्द्र पार है,वो अब नहीं आयेगा।सोचते सोचते रमेश की आँख लग गयी।रमेश सोया तो ऐसा सोया,फिर उठा ही नहीं।सरोज ने जब रमेश को निश्चल पाया तो चीख पड़ी,चले गए ना,कहते थे जीवन भर साथ निभाऊंगा। विश्वासघाती निकले तुम।ऐसे ही मुझे अकेली छोड़ तुम भला कैसे जा सकते हो?बताओ ना किसके लिए जिऊं?कहते कहते सरोज पछाड़ खा एक ओर गिर पड़ी।किसी को पता भी नहीं चला कि रमेश भले ही उसे छोड़ गया हो,पर सरोज उसे कैसे छोड़ती,वह भी रमेश के साथ चल दी।

      कस्बे से कुछ रिश्ते दार, शहर के मित्रगण और उसके साथ काम करने वाले सहकर्मी एकत्रित हो गए थे,और वे दो दो अर्थी तैयार करने में व्यस्त थे।पता नहीं मुन्ना को किसी ने सूचित भी किया था या नहीं।

    बालेश्वर गुप्ता, नोएडा

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