यह सुनते ही देवकी की आत्मा सिहर उठी। वह जोर से “कबीर!” चिल्लाते हुए नींद से जाग गई।
वह हांफ रही थी और उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। बाहर बारिश रुक चुकी थी और सुबह की पहली किरण कबीर के कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। देवकी वहीं बैठी रही और उस सपने के बारे में सोचने लगी। अचानक उसके मन में एक बिजली सी कौंध गई। उसे अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ। उसने महसूस किया कि वह अपने स्वार्थ और मोह में अंधी होकर अपने ही बच्चे की आत्मा को कष्ट दे रही है। जिस बेटे ने जिंदगी भर उसे खुशियां दीं, आज उसके जाने के बाद वह अपने दुखों के बोझ तले उसे भी दबा रही है।
शहर के एक शांत और हरे-भरे मोहल्ले में देवकी नाम की एक महिला रहती थी। देवकी का जीवन उनके बाइस वर्षीय बेटे कबीर के इर्द-गिर्द घूमता था। कबीर कोई आम लड़का नहीं था, वह एक बेहद प्रतिभाशाली चित्रकार था। जब कबीर बहुत छोटा था, तभी देवकी के पति का देहांत हो गया था। उसके बाद से देवकी ने अपना पूरा जीवन, अपनी सारी खुशियां और अपने सारे सपने कबीर की परवरिश में लगा दिए थे। कबीर भी अपनी माँ की इस तपस्या को भली-भांति समझता था। वह अपनी माँ से बेइंतहा प्यार करता था। उसके कैनवस पर उकेरा गया हर रंग, हर चित्र उसकी माँ के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए होता था। देवकी जब भी उदास होती, कबीर अपनी तूलिका (ब्रश) उठाता और एक ऐसी खूबसूरत पेंटिंग बना देता जिसे देखकर देवकी अपने सारे गम भूल जाती थी। कबीर अक्सर कहता था, “माँ, मेरी कला सिर्फ रंग नहीं है, यह तुम्हारी दी हुई जिंदगी की चमक है। मैं दुनिया का सबसे बड़ा आर्टिस्ट बनूंगा, सिर्फ तुम्हारे लिए।”
उनका छोटा सा घर हमेशा कबीर की हंसी, रंगों की महक और देवकी के बनाए लजीज पकवानों की खुशबू से महकता रहता था। कबीर की पहली बड़ी आर्ट एग्जीबिशन होने वाली थी, जिसके लिए वह दिन-रात मेहनत कर रहा था। देवकी की आंखों में अपने बेटे को सफलता के शिखर पर देखने का सपना पल रहा था। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। एग्जीबिशन से ठीक एक हफ्ता पहले, कबीर को अचानक सीने में तेज दर्द उठा। इससे पहले कि देवकी कुछ समझ पाती या उसे किसी बड़े अस्पताल ले जा पाती, रास्ते में ही कबीर ने अपनी माँ की गोद में हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं। डॉक्टरों ने बताया कि उसे एक गंभीर कार्डियक अरेस्ट हुआ था।
उस पल देवकी के लिए मानो पूरी दुनिया ही खत्म हो गई। जिस घर में कल तक रंगों और सपनों की बातें होती थीं, वहां अचानक एक खौफनाक सन्नाटा पसर गया। कबीर का जाना देवकी के लिए केवल एक बेटे का जाना नहीं था, बल्कि उसके जीवन के एकमात्र उद्देश्य का छिन जाना था। कबीर के अंतिम संस्कार के बाद देवकी पूरी तरह से टूट चुकी थी। वह एक जिंदा लाश में तब्दील हो गई थी। उसने लोगों से मिलना-जुलना, बात करना, यहाँ तक कि ठीक से खाना-पीना भी छोड़ दिया था।
दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदल गए, लेकिन देवकी का दुख कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। रिश्तेदार, पड़ोसी और कबीर के दोस्त उसे समझाने आते। वे कहते, “देवकी जी, जो होना था वह हो गया, अब आपको खुद को संभालना होगा। कबीर जहां भी होगा, आपको इस हाल में देखकर दुखी होगा।” लेकिन देवकी के कानों तक किसी की आवाज नहीं पहुंचती थी। वह बस शून्य में निहारती रहती। उसका पूरा दिन कबीर के कमरे में गुजरता। वह कबीर की अधूरी पेंटिंग्स, उसके बिखरे हुए रंग और उसके कपड़ों को सीने से लगाकर घंटों रोती रहती। उसकी आंखों से आंसुओं की नदियां बहती रहतीं, जो थमने का नाम ही नहीं लेती थीं।
एक दिन भारी बारिश हो रही थी। देवकी कबीर के कमरे में जमीन पर बैठी, उसकी एक पुरानी तस्वीर को गले से लगाए सिसक रही थी। रोते-रोते वह इतनी थक गई कि उसी ठंडी जमीन पर उसकी आंख लग गई। नींद में देवकी ने एक बहुत ही अजीब और अलौकिक स्वप्न देखा।
उसने देखा कि वह एक बेहद खूबसूरत और रोशनी से नहाई हुई घाटी में खड़ी है। वहां चारों तरफ मखमली घास, रंग-बिरंगे फूल और मोतियों की तरह चमकते झरने थे। वहां बहुत सारे युवा और मासूम लोग थे, जो बेहद खुश नजर आ रहे थे। उन सबके हाथों में जादुई कैनवस थे और वे हवा में अपने रंगों से खूबसूरत आकृतियां बना रहे थे। कोई आसमान में सितारे टांग रहा था, तो कोई बादलों को सतरंगी बना रहा था।
तभी देवकी की नजर एक कोने में उदास बैठे एक लड़के पर पड़ी। वह कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना कबीर था। देवकी का दिल खुशी और दर्द से भर आया। वह दौड़कर कबीर के पास गई। लेकिन कबीर को देखकर वह हैरान रह गई। जहां बाकी सभी लोग हवा में खूबसूरत रंग बिखेर रहे थे, वहीं कबीर का कैनवस बिल्कुल कोरा था। कबीर जब भी अपनी तूलिका (ब्रश) से कोई रंग अपने कैनवस पर लगाने की कोशिश करता, अचानक ऊपर से पानी की तेज बूंदें गिरतीं और उसके सारे रंगों को धोकर बहा ले जातीं। कबीर बार-बार कोशिश करता, लेकिन हर बार पानी का एक रेला आता और उसकी मेहनत पर पानी फेर देता।
देवकी से अपने बेटे की यह निराशा नहीं देखी गई। उसने रोते हुए पूछा, “कबीर! मेरे बच्चे! तू इतना उदास क्यों है? और ये तेरे रंगों को क्या हो रहा है? ये बार-बार पानी में क्यों धुल जा रहे हैं? तू भी दूसरों की तरह अपनी खूबसूरत दुनिया क्यों नहीं बना पा रहा?”
कबीर ने अपनी उदास आंखें उठाईं और अपनी माँ की तरफ देखा। उसकी आंखों में दर्द था। उसने कहा, “माँ, मैं यहाँ अपनी नई दुनिया को रंगों से सजाना चाहता हूँ। मैं यहाँ भी तुम्हारे लिए खुशियों की पेंटिंग बनाना चाहता हूँ। लेकिन मैं जब भी रंग भरता हूँ, तुम वहां धरती पर इतना रोती हो कि तुम्हारे आंसुओं की बारिश यहाँ सैलाब बनकर आ जाती है और मेरे सारे रंगों को धो देती है। माँ, तुम्हारे ये कभी ना रुकने वाले आंसू मुझे यहाँ भी चैन से रहने नहीं दे रहे। जब तक तुम वहां खुद को इस दर्द की कैद में रखोगी, मैं यहाँ कभी मुस्कुरा नहीं पाऊंगा। मेरी कला, मेरी शांति, सब तुम्हारे आंसुओं में डूब जाती है।”
यह सुनते ही देवकी की आत्मा सिहर उठी। वह जोर से “कबीर!” चिल्लाते हुए नींद से जाग गई।
वह हांफ रही थी और उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। बाहर बारिश रुक चुकी थी और सुबह की पहली किरण कबीर के कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। देवकी वहीं बैठी रही और उस सपने के बारे में सोचने लगी। अचानक उसके मन में एक बिजली सी कौंध गई। उसे अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ। उसने महसूस किया कि वह अपने स्वार्थ और मोह में अंधी होकर अपने ही बच्चे की आत्मा को कष्ट दे रही है। जिस बेटे ने जिंदगी भर उसे खुशियां दीं, आज उसके जाने के बाद वह अपने दुखों के बोझ तले उसे भी दबा रही है।
देवकी ने अपने आंसू पोंछे। उसने फैसला किया कि अब वह कबीर को और रुलाएगी नहीं। वह उठी, कमरे की खिड़कियां खोलीं और ताजी हवा को अंदर आने दिया। उसने कबीर के बिखरे हुए रंगों को सहेजा और उस कैनवस को साफ किया।
उस दिन के बाद से मोहल्ले वालों ने देवकी में एक बहुत बड़ा बदलाव देखा। उसने फिर से समाज में आना-जाना शुरू कर दिया। देवकी ने अपनी जमापूंजी से एक छोटा सा कला केंद्र खोला, जिसका नाम उसने ‘कबीर आर्ट अकैडमी’ रखा। उसने बस्ती के गरीब और अनाथ बच्चों को मुफ्त में चित्रकारी सिखाना शुरू कर दिया। वह कबीर के बचे हुए रंगों से उन बच्चों के जीवन में रंग भरने लगी।
जब वे छोटे-छोटे बच्चे अपनी टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों से कुछ बनाते और देवकी को दिखाते, तो देवकी को उनमें अपना कबीर नजर आता। अब देवकी रोती नहीं थी, बल्कि मुस्कुराती थी। उसे पता था कि उसकी हर मुस्कान के साथ, उस दूसरी दुनिया में कबीर का कैनवस और भी खूबसूरत होता जा रहा है। उसने कबीर की यादों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया था।
दोस्तों, जीवन का सबसे कड़वा सच यही है कि जो जन्म लेता है, उसे एक दिन यह दुनिया छोड़नी ही पड़ती है। किसी बेहद करीबी और अपने को खोने का दुख शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, यह ऐसा घाव है जो जिंदगी भर पूरी तरह नहीं भरता। लेकिन हमें यह समझना होगा कि हमारे अपनों को हमारी आंसुओं की नहीं, बल्कि हमारी हिम्मत की जरूरत होती है। जब हम उनके बिना भी जिंदगी को सार्थकता और सकारात्मकता के साथ जीते हैं, तब जाकर उनकी आत्मा को सच्ची शांति मिलती है। हमारे आंसू उन्हें रोकते हैं, जबकि हमारी मुस्कान उन्हें मुक्त करती है।
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