“माँ, आप मुझे पहचानती हैं?”
सामने बैठी वृद्धा ने कुछ क्षण उस लड़की को देखा। फिर मुस्कराकर बोलीं—
“बिल्कुल। तुम मेरी बेटी हो।”
लड़की की आँखों में आँसू आ गए।
“नहीं माँ… मैं आपकी बेटी नहीं हूँ।”
वृद्धा चुप हो गईं।
कमरे में कुछ देर तक सिर्फ दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।
लड़की ने मोबाइल की स्क्रीन उनकी ओर कर दी।
“मैं आपकी बेटी नहीं, आपकी बेटी की बनाई हुई एक कहानी हूँ।”
वृद्धा ने काँपते हाथों से मोबाइल लिया। स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा था। वीडियो में वही लड़की थी—कभी छोटी बच्ची, कभी कॉलेज की छात्रा, कभी माँ के साथ त्योहार मनाती हुई।
हर तस्वीर के नीचे एक तारीख थी।
हर तारीख के साथ एक कहानी।
और हर कहानी में वह वृद्धा उसकी माँ थी।
लेकिन सच कुछ और था।
नंदिनी ने अपनी माँ को हमेशा एक बहुत मजबूत महिला माना था।
उसकी माँ सुधा ने अकेले उसे पाला था। पिता का देहांत तब हो गया था जब नंदिनी सिर्फ छह वर्ष की थी। सुधा ने सिलाई करके, घरों में ट्यूशन पढ़ाकर और छोटी-छोटी बचत करके बेटी को पढ़ाया।
नंदिनी बड़ी हुई, नौकरी करने लगी और शहर में रहने लगी।
सुधा गाँव के पुराने मकान में अकेली रह गईं।
माँ-बेटी के बीच फोन पर रोज बातें होतीं।
कम से कम नंदिनी को ऐसा ही लगता था।
“माँ, आज आपने खाना खाया?”
“हाँ बेटी।”
“दवा ले ली?”
“हाँ।”
“आप अकेली तो नहीं महसूस करतीं?”
“नहीं रे, तू है न मेरे साथ।”
नंदिनी हँस देती।
उसे लगता, वह एक अच्छी बेटी है।
लेकिन कुछ महीनों से माँ की आवाज में अजीब-सी थकान आने लगी थी।
एक दिन नंदिनी ने पूछा—
“माँ, आप ठीक हैं?”
“हाँ।”
“सच?”
“बिल्कुल।”
“तो फिर आपकी आवाज ऐसी क्यों है?”
माँ कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“बेटी, कभी-कभी इंसान ठीक होते हुए भी ठीक नहीं होता।”
नंदिनी उस वाक्य का अर्थ नहीं समझी।
कुछ दिनों बाद नंदिनी अचानक गाँव पहुँच गई।
दरवाजा पड़ोस की विमला चाची ने खोला।
“अरे नंदिनी! तू?”
“माँ कहाँ हैं?”
विमला चाची ने उसे अजीब नजरों से देखा।
“अंदर हैं।”
नंदिनी कमरे में पहुँची तो उसकी माँ बिस्तर पर बैठी थीं।
बाल अस्त-व्यस्त थे।
सामने दवाइयाँ रखी थीं।
नंदिनी उनके पास बैठ गई।
“माँ, आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि आपकी तबीयत खराब है?”
सुधा ने उसे देखा।
“मैंने?”
“हाँ, आपने।”
“मैंने तो कुछ नहीं बताया।”
नंदिनी चौंक गई।
“लेकिन आप रोज मुझसे फोन पर बात करती हैं!”
सुधा ने धीरे से सिर हिलाया।
“मैं तुमसे बात करती हूँ?”
“हाँ माँ!”
“कब?”
अब नंदिनी के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने अपना फोन निकाला।
कॉल हिस्ट्री खोली।
पिछले तीन महीनों में लगभग हर दिन माँ के नंबर पर बीस-पच्चीस मिनट की बातचीत थी।
लेकिन सुधा के फोन में कोई ऐसी कॉल नहीं थी।
“यह कैसे हो सकता है?”
तभी पीछे से विमला चाची बोलीं—
“बेटी, यही तो मैं तुझे समझाने की कोशिश कर रही थी।”
“क्या?”
“तेरी माँ पिछले छह महीने से अपना फोन इस्तेमाल ही नहीं करतीं।”
नंदिनी के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।
उस रात उसने पूरी कॉल हिस्ट्री देखी।
हर कॉल उसी समय होती थी जब वह ऑफिस से लौटती थी।
हर बार आवाज माँ की होती थी।
“खाना खा लिया बेटी?”
“थक गई होगी।”
“अपने लिए भी थोड़ा समय निकाल।”
“तू बचपन में बहुत शरारती थी।”
“तुझे याद है, तू पहली बार स्कूल गई थी तो कितना रोई थी?”
नंदिनी की आँखें भर आईं।
आवाज बिल्कुल माँ जैसी थी।
शब्द भी वही थे।
यादें भी वही थीं।
लेकिन फोन माँ ने नहीं किया था।
किसी ने माँ की आवाज की नकल नहीं की थी।
किसी ने उनकी पुरानी रिकॉर्डिंग से आवाज तैयार की थी।
नंदिनी ने अपने एक तकनीकी विशेषज्ञ मित्र से बात की।
उसने सारी जानकारी देखकर कहा—
“यह किसी ने जानबूझकर किया है। किसी ने तुम्हारी माँ की पुरानी आवाजों को जोड़कर ऐसी बातचीत तैयार की है, जिससे तुम्हें लगे कि तुम रोज अपनी माँ से बात कर रही हो।”
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“लेकिन ऐसा कौन करेगा?”
मित्र ने कहा—
“जिसे पता हो कि तुम्हें क्या सुनना अच्छा लगता है।”
नंदिनी ने माँ का पुराना संदूक खोला।
उसमें कपड़ों के नीचे एक छोटी-सी डायरी रखी थी।
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“नंदिनी रोज फोन करती है। पता नहीं वह सचमुच मुझसे बात करती है या सिर्फ अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है। अब मैं उसे परेशान नहीं करना चाहती।”
अगले पन्ने पर—
“आज नंदिनी ने कहा कि वह बहुत व्यस्त है। मैंने कहा, कोई बात नहीं। बेटी व्यस्त है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका प्यार कम हो गया।”
फिर—
“आज फोन नहीं आया।”
और फिर—
“शायद मैं अपनी बेटी को खो नहीं रही हूँ। शायद वह धीरे-धीरे मेरी जरूरत से बाहर हो रही है।”
नंदिनी डायरी सीने से लगाकर रो पड़ी।
उसे अचानक समझ आया कि असली विश्वासघात किसी और ने नहीं किया था।
उसने खुद किया था।
उसने माँ की आवाज सुनना शुरू कर दिया था, माँ को सुनना नहीं।
वह रोज फोन करती थी, लेकिन बातचीत को एक आदत की तरह निभाती थी।
“खाना खाया?”
“दवा ली?”
“ठीक हो?”
इन तीन सवालों के बाद उसके पास समय नहीं होता था।
माँ ने कभी शिकायत नहीं की।
लेकिन किसी ने उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाया।
अगले दिन नंदिनी ने उस व्यक्ति को खोज निकाला जिसने उसकी माँ की आवाज का इस्तेमाल किया था।
वह कोई अजनबी नहीं था।
वह उसके अपने छोटे भाई का मित्र था, जो वर्षों से परिवार के संपर्क में था और नंदिनी के बारे में बहुत कुछ जानता था।
उसने कोई पैसा नहीं माँगा था।
उसका उद्देश्य और भी विचित्र था।
वह चाहता था कि नंदिनी को एहसास हो कि डिजिटल दुनिया इंसान को उसकी सबसे प्यारी चीज का भ्रम दे सकती है।
लेकिन नंदिनी ने उससे सिर्फ एक सवाल पूछा—
“तुमने मेरी माँ की आवाज क्यों चुराई?”
उसने कहा—
“क्योंकि तुम्हारे पास उनकी आवाज सुनने का समय था, उनसे मिलने का नहीं।”
नंदिनी के पास कोई जवाब नहीं था।
उसने अपना शहर नहीं छोड़ा।
अपनी नौकरी भी नहीं छोड़ी।
उसने बस अपनी जिंदगी की प्राथमिकताएँ बदल दीं।
अब माँ से फोन पर बात करने के बजाय वह सप्ताह में एक दिन गाँव जाती।
माँ के साथ बैठती।
उनकी पुरानी बातें सुनती।
एक ही कहानी दसवीं बार सुनकर भी मुस्कराती।
एक दिन सुधा ने पूछा—
“तू अब इतनी बार क्यों आ जाती है?”
नंदिनी ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“क्योंकि अब मुझे डर लगता है।”
“किस बात का?”
“कि कहीं आपकी असली आवाज सुनने के लिए मुझे किसी रिकॉर्डिंग की जरूरत न पड़ जाए।”
सुधा ने उसे देखा।
फिर उसके सिर पर हाथ रख दिया।
“पगली कहीं की।”
नंदिनी मुस्कराई।
लेकिन उसकी आँखों में आँसू थे।
उसे समझ आ चुका था—
विश्वासघात हमेशा किसी दूसरे का किया हुआ धोखा नहीं होता।
कभी-कभी हम अपने प्रिय व्यक्ति को समय देने के बजाय उसकी मौजूदगी का भ्रम पालते रहते हैं।
हम सोचते हैं कि फोन कर दिया, हाल पूछ लिया, संदेश भेज दिया—तो रिश्ता निभ गया।
लेकिन रिश्ते आवाज से नहीं, उपस्थिति से जीवित रहते हैं।
और उस दिन नंदिनी ने अपने जीवन का सबसे बड़ा सच जाना—
जिस माँ की आवाज पर वह महीनों भरोसा करती रही, वह आवाज झूठी थी;
लेकिन उस आवाज के पीछे छिपा अकेलापन बिल्कुल सच्चा था।
यही उसका सबसे बड़ा विश्वासघात था।
स्वरचित, मौलिक व अप्रकाशित रचना,
लक्ष्मी कनोडिया ‘अनिका’
खुर्जा, उत्तर प्रदेश
#विश्वास घात