रामेश्वर जी ने एक व्यंग्यात्मक लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, “यही तो दुख है बेटा। दुनिया तुम्हें श्रवण कुमार समझ रही है, लेकिन तुम्हारे माता-पिता यहाँ प्यासे बैठे हैं। तुमने लिखा कि ‘स्वर्ग माता-पिता के चरणों में है’, लेकिन इस घर में कदम रखे तुम्हें आठ घंटे हो गए हैं, और तुमने एक बार भी झुककर अपनी माँ के पैर नहीं छुए। तुमने ‘क्वालिटी टाइम’ लिखा, लेकिन तुमने मुझसे दो मिनट बैठकर ये नहीं पूछा कि मेरा दिन कैसे कटता है। ये कैसा स्वर्ग है बेटा, जो सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देता है, लेकिन असलियत में उसकी कोई ज़मीन ही नहीं है?”
विवान को अपने पिता की बात थोड़ी चुभ गई। वह बचाव की मुद्रा में आते हुए बोला, “बाबूजी, आप लोग हमेशा मुझे गलत समझते हैं। ये आज का ट्रेंड है। दुनिया बहुत बदल गई है। सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है जहां हम अपनी खुशियां, अपनी जिंदगी लोगों के साथ बांटते हैं। इससे लोग हमसे जुड़ते हैं। आपको पता है, मेरे इस पोस्ट पर मेरे उन दोस्तों ने भी कमेंट करके आपको प्रणाम भेजा है, जिनसे मैं सालों से नहीं मिला।”
लखनऊ की एक पुरानी लेकिन बेहद खूबसूरत कॉलोनी में बसा ‘शांति-निकेतन’ आज सुबह से ही कुछ ज्यादा महक रहा था। घर की मालकिन, सावित्री देवी ने आज अपने हाथों से तरह-तरह के पकवान बनाए थे—खीर, पूड़ी, और कटहल की सब्जी। कारण बड़ा था; उनका इकलौता बेटा, विवान, पूरे सात महीने बाद दिल्ली से घर आ रहा था। घर के बरामदे में बिछी आराम कुर्सी पर बैठे विवान के पिता, रामेश्वर जी, बार-बार दरवाजे की तरफ देख रहे थे। उनकी आँखें अपने बेटे को गले लगाने के लिए तरस रही थीं।
तभी एक सफेद रंग की गाड़ी दरवाजे पर आकर रुकी। विवान गाड़ी से उतरा, लेकिन उसकी नज़रें सामने खड़े माता-पिता पर नहीं, बल्कि उसके हाथ में पकड़े स्मार्टफोन पर थीं। वह गाड़ी से उतरते ही फोन के कैमरे को अपनी तरफ घुमाकर कुछ रिकॉर्ड कर रहा था।
“हेल्लो इंस्टा फैम! फाइनली सात महीने बाद मैं अपने होमटाउन में हूँ। फीलिंग सो नॉस्टैल्जिक! देखिए, मेरे पीछे मेरे मॉम-डैड खड़े हैं,” विवान ने कैमरे में बोलते हुए कहा और फिर फोन को सावित्री और रामेश्वर जी की तरफ कर दिया।
सावित्री देवी ने झिझकते हुए पल्लू सिर पर लिया और एक फीकी सी मुस्कान दे दी। रामेश्वर जी चुपचाप अपनी जगह पर खड़े रहे। विवान ने जल्दी से एक और तस्वीर खींची और घर के अंदर चला गया। अंदर जाते ही वह सोफे पर बैठ गया और अपनी खींची हुई तस्वीरों को एडिट करके सोशल मीडिया पर अपलोड करने में व्यस्त हो गया। उसने कैप्शन लिखा, “धरती पर स्वर्ग माता-पिता के चरणों में है। क्वालिटी टाइम विद फैमिली!”
सावित्री देवी पानी का गिलास लेकर आईं। विवान ने बिना उनकी तरफ देखे पानी पी लिया और उंगलियां फोन की स्क्रीन पर लगातार चलाता रहा। लगभग तीन घंटे बीत गए। विवान अपने कमरे में था, कभी लैपटॉप पर तो कभी फोन पर। रामेश्वर जी और सावित्री देवी बाहर बैठे बस इस इंतज़ार में थे कि बेटा बाहर आएगा और उनके पास बैठकर पूछेगा, “बाबूजी, आपके घुटनों का दर्द कैसा है? माँ, तुम्हारी आँखों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन कब करवाना है?” लेकिन विवान के पास इन सब के लिए समय ही नहीं था।
रात का खाना खाने के बाद, जब सावित्री देवी रसोई समेटने चली गईं, तब रामेश्वर जी घर के पीछे वाले छोटे से बगीचे में टहल रहे थे। विवान भी टहलता हुआ वहां आ गया। उसके हाथ में अभी भी फोन था और वह लगातार मुस्कुराते हुए कुछ टाइप कर रहा था।
रामेश्वर जी एक चबूतरे पर बैठ गए। उन्होंने गहरी सांस ली और बहुत ही शांत लेकिन उदास स्वर में कहा, “विवान, तुम खुश तो हो ना बेटा?”
विवान ने फोन से नज़रें हटाईं और आश्चर्य से अपने पिता को देखा, “हाँ बाबूजी, बिल्कुल! मैं बहुत खुश हूँ। मेरी नई प्रमोशन हुई है, और आज तो मैंने जो फोटो डाली है ना, उस पर अब तक दो हज़ार से ज्यादा लाइक्स आ चुके हैं। सब कह रहे हैं कि मैं कितना श्रवण कुमार जैसा बेटा हूँ जो अपने माता-पिता को इतना प्यार करता है।”
रामेश्वर जी ने एक व्यंग्यात्मक लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, “यही तो दुख है बेटा। दुनिया तुम्हें श्रवण कुमार समझ रही है, लेकिन तुम्हारे माता-पिता यहाँ प्यासे बैठे हैं। तुमने लिखा कि ‘स्वर्ग माता-पिता के चरणों में है’, लेकिन इस घर में कदम रखे तुम्हें आठ घंटे हो गए हैं, और तुमने एक बार भी झुककर अपनी माँ के पैर नहीं छुए। तुमने ‘क्वालिटी टाइम’ लिखा, लेकिन तुमने मुझसे दो मिनट बैठकर ये नहीं पूछा कि मेरा दिन कैसे कटता है। ये कैसा स्वर्ग है बेटा, जो सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देता है, लेकिन असलियत में उसकी कोई ज़मीन ही नहीं है?”
विवान को अपने पिता की बात थोड़ी चुभ गई। वह बचाव की मुद्रा में आते हुए बोला, “बाबूजी, आप लोग हमेशा मुझे गलत समझते हैं। ये आज का ट्रेंड है। दुनिया बहुत बदल गई है। सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है जहां हम अपनी खुशियां, अपनी जिंदगी लोगों के साथ बांटते हैं। इससे लोग हमसे जुड़ते हैं। आपको पता है, मेरे इस पोस्ट पर मेरे उन दोस्तों ने भी कमेंट करके आपको प्रणाम भेजा है, जिनसे मैं सालों से नहीं मिला।”
रामेश्वर जी की आँखों में एक अजीब सी खामोशी थी। उन्होंने कहा, “जिन लोगों से तुम सालों से नहीं मिले, उनके भेजे हुए प्रणाम का मैं क्या करूँगा बेटा? और तुम खुद सोचो, जिस बेटे ने सामने खड़े होकर अपने पिता को सम्मान नहीं दिया, उसका आभासी दुनिया का सम्मान मुझ तक कैसे पहुंचेगा? तुम अपनी खुशियां नहीं बांट रहे हो विवान, तुम सिर्फ दिखावा कर रहे हो। तुम लोगों को यह साबित करने में लगे हो कि तुम्हारी जिंदगी कितनी परफेक्ट है, जबकि अंदर से तुम सब एक अजीब सी दौड़ में हांफ रहे हो।”
“बाबूजी, आप इसे दिखावा क्यों कहते हैं?” विवान ने थोड़ी खीझ के साथ कहा, “हम आधुनिक समाज में जी रहे हैं। हमारे पास हर चीज़ का एक्सेस है। हमें किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती, हमारे पास गूगल है, एआई है। हमें हर चीज़ का जवाब तुरंत मिल जाता है। हमारी जनरेशन ज्यादा स्मार्ट है, हम बहुत सारे लोगों से एक साथ कनेक्टेड हैं।”
रामेश्वर जी ने हामी भरते हुए सिर हिलाया। “मैं मानता हूँ बेटा कि तुम लोग तकनीकी रूप से बहुत आगे हो। गूगल तुम्हें दुनिया भर की जानकारी दे सकता है। वह तुम्हें बता सकता है कि किस बीमारी की क्या दवा है, किस जगह का रास्ता किधर से जाता है। वह दुनिया के हर रिश्ते की परिभाषा बता सकता है। लेकिन…”
रामेश्वर जी थोड़ा रुके, उनकी आवाज़ में अब एक पिता का दर्द छलक रहा था, “लेकिन विवान, क्या गूगल यह बता सकता है कि जब तुम छोटे थे और तुम्हें बुखार आता था, तो तुम्हारी माँ रात-रात भर तुम्हारे सिरहाने बैठकर कैसे जागती थी? माँ की ममता, उसके हाथ की बनी रोटियों की मिठास, और उसके प्यार से सिर सहलाने का अनुभव तुम किसी भी वेबसाइट से डाउनलोड नहीं कर सकते। उसके लिए तुम्हें फोन किनारे रखकर अपनी माँ की गोद में सिर रखना ही पड़ेगा।”
विवान खामोश हो गया। वह अपने पिता की आँखों में देख रहा था, जहां शिकायत नहीं, बल्कि एक गहरी चिंता थी।
रामेश्वर जी ने अपनी बात जारी रखी, “तुम कहते हो तुम कनेक्टेड हो। लेकिन सच तो ये है कि तुम सबसे ज्यादा अकेले हो। तुमने पिछले महीने एक नई और महंगी गाड़ी खरीदी। तुमने उसकी तस्वीरें डालीं। सौ लोगों ने ‘कांग्रेचुलेशन’ लिखा। लेकिन क्या उनमें से एक भी व्यक्ति उस गाड़ी में तुम्हारे साथ सफर करने के लिए तुम्हारे पास मौजूद था? नहीं ना! तुम वह गाड़ी, वह नया सोफा, वह महंगे कपड़े खरीद कर किसे दिखा रहे हो? उन लोगों को जिन्हें तुम्हारी असली जिंदगी से कोई लेना-देना ही नहीं है!”
विवान के पास कोई जवाब नहीं था। उसका फोन अभी भी उसके हाथ में था, जिसकी स्क्रीन बार-बार नोटिफिकेशन्स से रोशन हो रही थी, लेकिन अब उसे वह चमक चुभने लगी थी।
“ये जो तुम्हारी आभासी दुनिया है ना बेटा,” रामेश्वर जी ने समझाते हुए कहा, “ये एक ऐसा तिलिस्म है जो तुम्हें असली रिश्तों से दूर कर रहा है। तुम्हें लगता है कि लाइक्स और कमेंट्स ही तुम्हारी अहमियत तय करते हैं। लेकिन असली रिश्ते लाइक्स से नहीं बनते। वे त्याग से, समर्पण से, एक-दूसरे का दर्द समझने से और साथ बैठकर समय बिताने से बनते हैं।”
रामेश्वर जी ने विवान की बहन का ज़िक्र करते हुए कहा, “पिछले महीने रक्षाबंधन था। तुमने अपनी बहन अंजलि के साथ बचपन की एक फोटो डालकर बहुत लंबा-चौड़ा इमोशनल पोस्ट लिखा था—’माई बेस्ट सिस्टर, मिस यू’। लेकिन सच्चाई क्या है? तुम पिछले तीन साल से राखी पर घर नहीं आए। तुमने उसे फोन तक नहीं किया था, सिर्फ एक व्हाट्सएप मैसेज कर दिया था। क्या गूगल तुम्हें भाई-बहन का वो प्यार दे सकता है जब कलाई पर राखी बंधवाते हुए एक भाई अपनी बहन के माथे को चूमता है? रिश्ते डाउनलोड नहीं होते विवान, उन्हें इस आधुनिकता के शोर को चीर कर महसूस करना पड़ता है, उन्हें अपनाना पड़ता है।”
रामेश्वर जी की बातें तीर की तरह विवान के सीने में उतर रही थीं। “बेटा, विज्ञान तुम्हें हर सुख-सुविधा दे सकता है—बेहतरीन गैजेट्स, तेज़ गाड़ियां, दुनिया भर की जानकारी। लेकिन विज्ञान तुम्हें वो भावनाएं नहीं दे सकता जो एक इंसान को इंसान बनाती हैं। सादगी, अपनत्व, सम्मान और मधुरता किसी ऐप का हिस्सा नहीं हैं, ये एक जीवित इंसान के गुण हैं। सोशल मीडिया ने तुम्हें एक ऐसी लत लगा दी है जहां तुम दूसरों के लिए जी रहे हो। अगर तुम कोई अच्छा खाना भी खाते हो, तो पहले दुनिया को दिखाते हो। तुम किसी भूखे को खाना भी खिलाते हो, तो पहले उसकी फोटो खींचते हो। तुमने अपनी संवेदनाओं का बाज़ारीकरण कर दिया है।”
पिता की आवाज़ अब थोड़ी भर्रा गई थी, “मैं इसलिए नाराज नहीं हूँ कि तुम नए ज़माने के हो। मैं इसलिए डरता हूँ विवान, क्योंकि ये अकेलापन, ये आभासी दुनिया की मृगतृष्णा एक दिन तुम्हारी सोच को, तुम्हारे अंदर के प्रेम को और तुम्हारे जीवन की असल खुशी को पूरी तरह निगल जाएगी। जब तुम्हें सच में किसी के कंधे की जरूरत होगी रोने के लिए, तब तुम्हारे पास हजारों फॉलोवर्स तो होंगे, लेकिन एक भी ऐसा हाथ नहीं होगा जो तुम्हारे आंसू पोंछ सके। इसलिए बेटा, दिखावे की इस दुनिया से बाहर निकलो और असल जिंदगी जीना सीखो।”
इतना कहकर रामेश्वर जी उठ खड़े हुए और धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ बढ़ गए।
पीछे चबूतरे पर बैठा विवान सन्न रह गया था। रात का सन्नाटा गहरा गया था और झींगुरों की आवाज़ गूंज रही थी। उसने अपने हाथ में पकड़े उस चौकोर चमकदार डिब्बे को देखा जिसे वह अपनी दुनिया समझ बैठा था। उसे अचानक अपने पिता की हर एक बात में एक भयानक सच्चाई नज़र आने लगी। उसे याद आया कि जब वह खुश होता था तो एक इमोजी भेज देता था, जब दुखी होता था तो एक उदास स्टेटस लगा देता था। लेकिन उसने आखिरी बार अपने किसी दोस्त के गले लग कर अपनी तकलीफ कब बांटी थी, उसे याद ही नहीं था। वह असल में कितना अकेला हो गया था।
विवान ने फोन की स्क्रीन लॉक की। उसने मन ही मन फैसला किया कि अब वह अपनी जिंदगी को इस छोटी सी स्क्रीन से बाहर निकालेगा। वह उठा और तेज़ कदमों से अपने माता-पिता के कमरे की तरफ गया। दरवाज़ा आधा खुला था। रामेश्वर जी बिस्तर पर लेट रहे थे और सावित्री देवी उनके पैरों पर दर्द का तेल मल रही थीं।
विवान ने अंदर कदम रखा। उसने अपना फोन पास रखी एक मेज पर उल्टा करके रख दिया। वह चुपचाप अपनी माँ के पास गया, उनके हाथ से तेल की शीशी ली और अपने पिता के पैरों के पास बैठ गया। रामेश्वर जी ने हैरानी से उसे देखा। विवान की आँखों में आंसू थे।
“मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी,” विवान ने रुंधे हुए गले से कहा, “मैं सच में रास्ता भटक गया था। लेकिन अब मैं वापस आ गया हूँ। असल दुनिया में। आपके पास।”
सावित्री देवी ने प्यार से विवान के सिर पर हाथ फेरा और उसे अपने सीने से लगा लिया। रामेश्वर जी के होंठों पर एक सच्ची और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उस रात विवान ने कोई फोटो अपलोड नहीं की, कोई स्टेटस अपडेट नहीं किया। लेकिन उस रात, बहुत सालों बाद, उसने अपनी जिंदगी की सबसे सुकून भरी नींद ली, क्योंकि आज वह असल में अपने घर लौट आया था।
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