आज देव और कुमुद का चालीसवां वैवाहिक वर्षगांठ है। कुमुद अकेली बाहर गार्डेन में फूलों से सुखी पत्तियां छांट रही है।कल शाम में ही देव किसी जरुरी काम से बाहर चला गया ।
” अचानक कौन सा काम आ गया,कल हमारा चालीसवां वैवाहिक वर्षगांठ है, फिर चले जाना” कुमुद
देव को जल्दी-जल्दी अपने कपड़े लत्ते ठीक करते देख हैरानी से बोली।
” लौटकर बताता हूं” देव जल्दीबाजी में चला गया।
वर्षगांठ जैसे आया वैसे ही चला गया। देव का कोई अता-पता नहीं। मोबाइल भी स्वीच ऑफ। कुमुद ने भी हाय-तौबा नहीं मचाया क्योंकि अक्सर ही देव हफ्ते दो हफ्ते के लिए बाहर चला जाता है और पूछने पर इधर उधर की बातें करने लगता। सीधी-सादी पतिपरायण कुमुद घर-गृहस्थी में व्यस्त हो जाती।
लेकिन आज एक छोटी सी चिट्ठी ने कुमुद की दुनिया हिला दी ” अब मैं ज्यादा दिन अकेले नहीं रह सकती, मुझे आकर ले जाओ… तुम्हारी…।”
चिट्ठी पर नाम देव का और पता इसी घर का… “आखिर यह खत लिखने वाली कौन है?”
देव- कुमुद की एक शादीशुदा बेटी सात समंदर पार अपनी गृहस्थी में मस्त है। कभी-कभी भेंट करने आ जाती है।
” आप दोनों भी आ जाइए विदेश घूमने” बिटिया के आग्रह पर कुमुद से पहले देव झट से बोल उठता,” ना ना हमलोग कहां जायेंगे, तुम्हीं लोग आ जाया करो या अपनी मम्मी को ले जाओ।”
” भला मैं अकेले कैसे जा सकती हूं, तुम्हारे खाने-पीने का ध्यान कौन रखेगा” कुमुद भी कह उठती।
” मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है” देव चिढ़कर बोलता।
कुमुद इसे स्वाभाविक रूप में लेती। सरल मना कुमुद के हृदय में इस दो पंक्तियों की चिट्ठी ने उथल-पुथल मचा दी। इधर देव का कोई अता-पता नहीं।
अगले दिन दरवाजे की घंटी बजी। लगता है देव आ गये, कुमुद ने दौड़कर दरवाजा खोला उसे चिट्ठी की हकीकत जानने की उत्सुकता जो थी। सामने
एक बीस बाइस वर्ष का युवक खड़ा था गोरा चिट्टा, घुंघराले बाल, बायें गाल पर तिल छरहरा कद-काठी।
” आप, किससे मिलना है” अपरिचित युवक को देख कुमुद ने आश्चर्य से पूछा।
” जी मेरा नाम नील है…नील देव…यह देव साहब का घर है न… कहां हैं पापा…आप कौन हैं?” युवक ने बेबाकी से कहा।
” पापा कौन पापा, मैं देव साहब की पत्नी कुमुद देव हूं…”।
” मैं देव साहब का इकलौता बेटा हूं,आप पत्नी ऐसा कैसे हो सकता है…मेरी नियुक्ति इसी शहर में हुई है अतः मैं अपने पापा के साथ रहूंगा, मम्मी भी अगले हफ्ते आ जायेंगी” युवक भीतर घुसने लगा।
” इकलौता बेटा, तब मेरी इकलौती बेटी और मैं उनकी पत्नी कुमुद कौन हैं… अच्छा दादागिरी है” कुमुद को गुस्सा आ गया।
“इस तरह तुम दूसरे के घर में नहीं घुस सकते,यह घर मेरा और मेरे पति देव का है इस घर को हमने दो महीने पहले ही खरीदा है, तुम्हें जरुर कोई गलतफहमी हुई है…मेरी एक बेटी है जो विदेश में रहती है और हम दोनों पति-पत्नी यहां रहने आए हैं।” कुमुद ने कहा।
अब चौंकने की बारी उस युवक की थी।अभी नोंक-झोंक चल ही रहा था कि देव अपना बैग उठाये फाटक के भीतर दाखिल हुए।
” पापा, यह औरत आपको अपना पति बता रही है ” देव का चरणस्पर्श करते वह युवक तल्खी से बोला।
युवक को देखते ही देव के चेहरे का रंग उड़ गया,” अरे तुम…छोड़ो, पहले हमें भीतर तो आने दो।”
अगले ही दिन वह चिट्ठी वाली महिला भी आ धमकी,” देव कहां हो, मैं भी आ गई हूं, मुझे भी तुम्हारे और मुन्ने के साथ इस नये घर में रहना है ” आगंतुका निर्भिकता से बोली।
” आप,आप कौन हैं ” अब कुमुद का धैर्य जवाब दे दिया।
” मैं इला देव की पत्नी हमारा बेटा राहुल और आप कौन हैं।”
” हमारी शादी पिछले चालीस वर्ष पहले देव से हुई थी,हमारी बेटी है दामाद है…यह सब क्या है देव।”
इधर इला और राहुल भी देव से सवाल पूछने लगा।
” ओह आखिर भेद खुल ही गया आज सत्ताइस वर्षों से मैं दो-दो पत्नियों का घर-गृहस्थी चलाकर अपने को बहुत होशियार समझता था… लेकिन आज सच्चाई सामने आ गई।” देव ने सिर झुका लिया।
” तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया , आखिर ऐसा करके तुम्हें क्या मिला… मैं सुख सुहाग के दंभ में डूबी अपने-आप को संसार की सबसे भाग्यशाली स्त्री समझती थी ” कुमुद सिसकने लगी।
उधर इला और राहुल चीख चिल्लाकर देव को विश्वासघाती कह कोर्ट जाने की धमकी देने लगे।
और मिस्टर देव धूर्तता को अपनी ताकत समझने वाले न घर के रहे न घाट के।
मौलिक रचना -डाॅ उर्मिला सिन्हा रांची झारखंड 30/8/2026
विश्वासघात