रिश्तों का बाज़ार

आकाश और रिया के बीच दूरियां इतनी बढ़ गईं कि दोनों एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहने लगे। दोनों के बीच कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं था। एक दिन आकाश को रिया के फोन में उसके किसी पुराने दोस्त के साथ हुई कुछ ऐसी चैट्स मिल गईं जो उसे नागवार गुजरीं। उसने शराब के नशे में रिया से सवाल किए। रिया ने भी पलटकर आकाश के चरित्र और उसकी अय्याशियों पर ताने मार दिए। बहस इतनी बढ़ गई कि आकाश ने अपना आपा खो दिया और रिया पर हाथ उठा दिया। गुस्से और अपनी झूठी शान को लगी ठेस से तिलमिलाई रिया ने रात में ही पुलिस बुला ली।

शहर के सबसे पॉश इलाके में रहने वाली सावित्री देवी को लोग ‘सावित्री बुआ’ के नाम से जानते थे। वे शहर के बड़े-बड़े और अमीर घरानों में रिश्ते करवाने के लिए मशहूर थीं। उनके पास बड़े उद्योगपतियों, राजनेताओं और अफसरों के बच्चों के बायोडेटा की भरमार रहती थी। एक दिन उनके पास शहर के जाने-माने बिल्डर सेठ रमाकांत आए। रमाकांत जी ने अपनी तिजोरी का रुतबा दिखाते हुए सावित्री बुआ से कहा कि उन्हें अपने इकलौते बेटे आकाश के लिए एक ऐसी लड़की चाहिए जो उनके खानदान की नाक और ऊंची कर दे।

उसी सप्ताह, एक बड़े सरकारी ठेकेदार श्रीमान माथुर भी सावित्री बुआ के पास अपनी बेटी रिया के लिए एक योग्य वर की तलाश में आए थे। सावित्री बुआ ने दोनों परिवारों की मांगें सुनीं, कुंडलियां मिलवाईं, हैसियत का तराजू तौला और दोनों परिवारों की मुलाकात तय करवा दी। एक शानदार फाइव-स्टार होटल में दोनों परिवारों की मीटिंग हुई, बातें पक्की हुईं और चट मंगनी, पट ब्याह वाला सिलसिला शुरू हो गया।

शादी इतनी भव्य थी कि पूरे शहर में महीनों तक उसकी चर्चा रही। करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए। विदेशी फूलों से सजावट, दुनिया भर के पकवान, और नामी हस्तियों का जमावड़ा। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक गहरा अंधेरा पनप रहा था, जिसे उस वक्त किसी ने नहीं देखा।

शादी के कुछ महीनों तक तो सब कुछ एक खूबसूरत सपने जैसा लगा, लेकिन जल्द ही असलियत सामने आने लगी। आकाश, जिसे बचपन से ही सिर्फ पैसा कमाना और उसे उड़ाना सिखाया गया था, वह एक घमंडी और गैर-जिम्मेदार इंसान था। उसे अपनी नई नवेली पत्नी रिया से ज्यादा अपनी लेट-नाइट पार्टियों, शराब और अपने रईस दोस्तों में दिलचस्पी थी। वह अक्सर नशे में धुत्त होकर घर लौटता और रिया पर अपना रौब झाड़ता। बात-बात पर उसे नीचा दिखाना, उसके मायके वालों का मज़ाक उड़ाना और छोटी-छोटी बातों पर गालियां देना उसकी आदत बन चुकी थी।

दूसरी तरफ रिया भी कोई कम नहीं थी। उसे बचपन से ही हर सुख-सुविधा बिना मांगे मिली थी। उसे कभी किसी ने बड़ों का आदर करना या रिश्तों को सहेजना नहीं सिखाया था। रिया को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उसका पति क्या कर रहा है। वह सुबह देर से उठती, सास-ससुर को सीधे मुंह जवाब देती, और उनके सामने ही अपने कॉलेज के पुराने पुरुष मित्रों के साथ घंटों फोन पर हंस-हंस कर बातें करती। जब सास उसे घर के किसी काम या रीति-रिवाज के लिए टोकती, तो वह साफ कह देती कि “मैं इस घर में काम करने के लिए नहीं आई हूँ, मेरे पिता ने मुझे रानी बनाकर रखा था।”

आकाश और रिया के बीच दूरियां इतनी बढ़ गईं कि दोनों एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहने लगे। दोनों के बीच कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं था। एक दिन आकाश को रिया के फोन में उसके किसी पुराने दोस्त के साथ हुई कुछ ऐसी चैट्स मिल गईं जो उसे नागवार गुजरीं। उसने शराब के नशे में रिया से सवाल किए। रिया ने भी पलटकर आकाश के चरित्र और उसकी अय्याशियों पर ताने मार दिए। बहस इतनी बढ़ गई कि आकाश ने अपना आपा खो दिया और रिया पर हाथ उठा दिया। गुस्से और अपनी झूठी शान को लगी ठेस से तिलमिलाई रिया ने रात में ही पुलिस बुला ली।

पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाती हुई सेठ रमाकांत के बंगले पर पहुंचीं। रिया ने आकाश और उसके परिवार पर घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और हत्या के प्रयास का केस दर्ज करवा दिया। रातों-रात दोनों परिवारों की इज्जत सड़क पर आ गई। आकाश को गिरफ्तार कर लिया गया और रिया अपने मायके लौट गई। अब दोनों परिवारों के बीच अदालती जंग शुरू हो गई। न्यूज़ चैनलों और अखबारों में उनके खानदान की धज्जियां उड़ने लगीं। जो लोग कल तक इनकी दौलत की कसमें खाते थे, आज वे इन पर हंस रहे थे।

मामला जब फैमिली कोर्ट में पहुंचा, तो दोनों पक्षों के वकीलों ने एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सेठ रमाकांत ने रिया को चरित्रहीन और लालची बताया, तो श्रीमान माथुर ने आकाश को शराबी और दरिंदा साबित करने की कोशिश की। जज साहब पिछले कई महीनों से इस हाई-प्रोफाइल केस को देख रहे थे और वे दोनों परिवारों के अहंकार और नफरत से भली-भांति वाकिफ हो चुके थे।

तारीख पर तारीख पड़ने के बाद, एक दिन श्रीमान माथुर ने कोर्ट में एक अजीब सी अर्जी लगाई। उन्होंने उस मध्यस्थ, यानी सावित्री बुआ को भी अदालत में तलब करने की मांग की, जिसने यह रिश्ता करवाया था। उनका तर्क था कि सावित्री बुआ ने जानबूझकर उनके साथ धोखा किया है और सारी सच्चाई छिपाकर उनकी बेटी की जिंदगी बर्बाद की है। सेठ रमाकांत ने भी इस बात का समर्थन किया।

जज साहब ने सावित्री बुआ को कोर्ट में हाजिर होने का समन भेज दिया। अगली पेशी पर सावित्री बुआ कटघरे में खड़ी थीं। उनके चेहरे पर कोई शिकन या डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सी शांति और आत्मविश्वास था।

जज साहब ने गंभीर स्वर में पूछा, “सावित्री जी, आप शहर की एक जानी-मानी महिला हैं। आप पर इन दोनों प्रतिष्ठित परिवारों ने आरोप लगाया है कि आपने पैसे के लालच में आकर सच्चाई छिपाई और इनके बच्चों का रिश्ता करवा कर दोनों घर बर्बाद कर दिए। आपको क्या कहना है?”

सावित्री बुआ ने एक गहरी सांस ली और पूरे कोर्ट रूम पर एक नजर डालते हुए शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, “जज साहब, मुझे इन दोनों परिवारों के बर्बाद होने का बहुत अफसोस है, लेकिन मुझ पर लगाया गया आरोप पूरी तरह से गलत है। सच तो यह है साहब, कि मैंने कोई ‘रिश्ता’ करवाया ही नहीं था।”

पूरे कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। जज साहब ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा, “क्या मतलब है आपका? आप खुद मान रही हैं कि आपने इनकी शादी करवाई थी, फिर आप कह रही हैं कि रिश्ता नहीं करवाया?”

सावित्री बुआ की आवाज अब थोड़ी तेज और तल्ख हो गई, “जी हां जज साहब, क्योंकि वो रिश्ता था ही नहीं, वो तो एक ‘सौदा’ था। एक ऐसा व्यापारिक समझौता (Corporate Deal), जिसमें दोनों पार्टियों ने अपनी-अपनी शर्तें रखी थीं और मैंने बस उन शर्तों को मैच करके डील पक्की करवा दी थी। कृपया मुझे अपनी बात विस्तार से रखने की इजाजत दें।”

जज साहब ने सिर हिलाकर अनुमति दी।

सावित्री बुआ ने सेठ रमाकांत की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “साहब, जब ये रमाकांत जी मेरे पास आए थे, तो इन्होंने मुझसे क्या कहा था, जानते हैं? इन्होंने कहा था- ‘सावित्री जी, लड़की एकदम गोरी और लंबी होनी चाहिए। किसी बड़े कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ी हो ताकि हमारी हाई-सोसाइटी की पार्टियों में हमारे साथ खड़ी अच्छी लगे। लड़की इकलौती हो तो और भी अच्छा है, और शादी में इतना दहेज आना चाहिए कि पूरा शहर देखता रह जाए। मुझे लड़की की शक्ल और उसके बाप के रुतबे से मतलब है।’ क्या इन्होंने एक बार भी मुझसे पूछा था कि लड़की संस्कारी है या नहीं? क्या इन्होंने पूछा था कि उसमें बड़ों का आदर करने का गुण है या नहीं? नहीं साहब, इन्हें एक ट्रॉफी चाहिए थी, जो इन्हें मिल गई।”

फिर सावित्री बुआ श्रीमान माथुर की तरफ मुड़ीं, “और ये माथुर साहब! जब ये मेरे पास अपनी बेटी का बायोडेटा लेकर आए, तो इनकी शर्तें क्या थीं? ‘बुआ जी, लड़का चाहे जैसा हो, बस करोड़ों की प्रॉपर्टी होनी चाहिए। लड़का अपनी कंपनी का मालिक हो। लड़के का परिवार छोटा हो ताकि मेरी बेटी को किसी सास-ससुर की चिक-चिक न सुननी पड़े। शादी के बाद मेरी बेटी को अलग फ्लैट मिलना चाहिए और उसे अपनी मनमर्जी की जिंदगी जीने की आजादी होनी चाहिए।’ जज साहब, क्या इन्होंने मुझसे एक बार भी कहा था कि लड़का पढ़ा-लिखा हो, मेहनती हो, शराबी न हो, और महिलाओं का सम्मान करने वाला हो? क्या इन्होंने ऐसी मांग रखी थी कि वो घर एक संयुक्त परिवार हो जहां इनकी बेटी को सबका प्यार मिले? नहीं जज साहब! इन्हें एक ऐसा एटीएम मशीन चाहिए था जो इनकी बेटी के नखरे उठा सके।”

सावित्री बुआ की बातें कोर्ट रूम में किसी हथौड़े की तरह गूंज रही थीं। रमाकांत और माथुर, दोनों के सिर शर्म से झुक गए थे।

सावित्री बुआ ने आगे कहा, “जज साहब, जब बीज ही बबूल का बोया गया था, तो उसमें से आम कैसे निकलते? अगर इन लोगों को वाकई कोई ‘रिश्ता’ करना होता, तो माथुर साहब मुझसे कहते- ‘सावित्री जी, लड़का बेशक बहुत अमीर न हो, लेकिन संस्कारी हो, अपनी मेहनत से कमाता हो। उसका भरा-पूरा परिवार हो जहां मेरी बेटी एक बहू बनकर नहीं, बल्कि एक बेटी बनकर जाए। जिस घर में चाहे करोड़ों की गाड़ियां न हों, लेकिन शांति, सम्मान और खुशियां हों।’

और रमाकांत जी मुझसे कहते- ‘सावित्री जी, हमें कोई दहेज या बड़ी कोठी वाली लड़की नहीं चाहिए। लड़की बेशक साधारण घर की हो, लेकिन उसके अंदर वो संस्कार हों जो हमारे घर को जोड़ कर रख सके। वो धनवान न सही, लेकिन गुणवान हो। जो बड़ों का सम्मान करे और मुश्किल वक्त में परिवार के साथ खड़ी रहे।’

जज साहब, अगर इन्होंने ऐसी मांगें रखी होतीं, और तब मैं कोई गलत इंसान इनके पल्ले बांध देती, तो मैं गुनहगार होती। लेकिन आज के समाज में लोग ‘रिश्ते’ कम और ‘सौदे’ ज्यादा कर रहे हैं। जिस शादी की नींव ही पैसे, लालच और दिखावे पर रखी गई हो, उसका अंत ऐसा ही होता है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। असली दोषी ये माता-पिता हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को सिर्फ भौतिक सुख-सुविधाएं दीं, लेकिन जीवन जीने के मूल्य और संस्कार देना भूल गए। इन जैसी मानसिकता वाले लोगों को खुद अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।”

सावित्री बुआ की बात खत्म होते ही कोर्ट रूम में पिन ड्रॉप साइलेंस (गहरी शांति) छा गया। कोई वकील कुछ नहीं बोल पा रहा था। आकाश और रिया, जो इतने दिनों से एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे, वे भी बुआ की कड़वी लेकिन सच्ची बातों को सुनकर निशब्द थे। उन्हें अपनी गलतियों और अपने खोखले जीवन का अहसास हो रहा था।

जज साहब गहरी सोच में डूब गए। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और एक लंबी सांस लेते हुए कहा, “सावित्री जी, आपकी बातों ने आज इस अदालत की ही नहीं, बल्कि मेरी भी आंखें खोल दी हैं। आपके इन शब्दों ने मेरे हृदय में भी एक गहरी चुभन पैदा कर दी है। सच कहूं तो एक पिता के रूप में मैं भी कहीं न कहीं डर गया हूँ। मैंने भी अपने बच्चों को दुनिया की हर आधुनिक सुख-सुविधा दी है, उन्हें बड़े स्कूलों में पढ़ाया है, लेकिन क्या मैंने उन्हें वे संस्कार दिए हैं जो एक अच्छा इंसान बनने के लिए जरूरी हैं? शायद आज की अंधी दौड़ में हम सभी कहीं न कहीं चूक रहे हैं।”

जज साहब ने दोनों परिवारों की तरफ देखते हुए फैसला सुनाया, “अदालत सावित्री जी को इस मामले से पूरी तरह से बरी करती है। और जहां तक आकाश और रिया की बात है, इस रिश्ते में कोई जान बाकी नहीं है। अदालत इन्हें छह महीने का समय देती है, ताकि ये अपने गिरेबान में झांक सकें और अगर फिर भी सुलह नहीं होती, तो कानूनी रूप से इन्हें अलग कर दिया जाएगा। लेकिन मैं दोनों परिवारों से कहना चाहूंगा कि आपने जो ये ‘सौदा’ किया था, उसका नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं हुआ है, बल्कि आपने अपने बच्चों की जिंदगी और समाज में अपनी इज्जत दोनों गंवा दी हैं।”

कोर्ट की कार्यवाही खत्म हो चुकी थी, लेकिन उस दिन वहां मौजूद हर व्यक्ति एक बड़ा सबक लेकर घर लौट रहा था। सब समझ चुके थे कि घर ईंट और पत्थरों से नहीं, बल्कि संस्कारों, त्याग और प्यार से बनते हैं, और जहां ये नहीं होते, वहां बड़े से बड़ा महल भी एक दिन ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।

आप सभी से एक सवाल: क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में शादियां वास्तव में एक व्यापार बनती जा रही हैं? अपनी राय हमें जरूर बताएं।

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