सुलोचना झेंप गई और मेहमानों के सामने अपनी इज्जत बचाते हुए धीरे से फुसफुसाई, “तू पागल हो गई है शिखा? तमाशा मत बना। तुझे पता है न कि हमारे उनके बीच कोई रिश्ता नहीं है। वे लोग नहीं आएंगे। तू चुपचाप रस्म के लिए बैठ जा।”
“रिश्ता कैसे नहीं है माँ?” शिखा की आँखों से आंसू छलक पड़े, “खून का रिश्ता किसी के कहने से टूट थोड़ी जाता है। जब मैंने बचपन में पहला कदम चाचा की उंगली पकड़ कर रखा था, जब मेरे स्कूल का सारा काम मेरी छोटी माँ करती थीं, तब तो रिश्ते बहुत गहरे थे। चंद पैसों और झूठे अहम के लिए आप लोगों ने दीवार खींच ली, लेकिन मेरे दिल से मेरी छोटी माँ और चाचा को कैसे निकालोगी? मैं खुद उन्हें लेने जा रही हूँ।”
माघ महीने की उस सर्द और खुशनुमा सुबह में शहर के सबसे नामी रिसॉर्ट में चारों तरफ रौनक बिखरी हुई थी। गेंदे के पीले फूलों और आम के पत्तों से सजे मंडप की छटा देखते ही बन रही थी। शहनाई की मीठी धुन पूरे वातावरण में गूंज रही थी और मेहमानों की हंसी-ठिठोली से पूरा माहौल उत्सव में डूबा हुआ था। आज शहर के जाने-माने व्यापारी रघुवीर जी की इकलौती और लाडली बेटी शिखा की हल्दी और मेहंदी की रस्म थी। घर की औरतें ढोलक की थाप पर मंगल गीत गा रही थीं, और शिखा की माँ, सुलोचना, मेहमानों की खातिरदारी में व्यस्त थीं। लेकिन इस सारे कोलाहल और उल्लास के बीच, शिखा की आँखें बार-बार रिसॉर्ट के मुख्य द्वार की तरफ उठ जाती थीं। उसके चेहरे पर सजी मुस्कान के पीछे एक अजीब सी बेचैनी और अधूरापन था।
उसी शहर के दूसरे कोने में, एक पुराने लेकिन सलीके से सजे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। यह घर रघुवीर जी के छोटे भाई, करमवीर का था। करमवीर और उनकी पत्नी रमा अपने दालान में बैठे चुपचाप सुबह की चाय पी रहे थे, लेकिन दोनों के ही गले से चाय का एक घूंट भी नीचे नहीं उतर रहा था। आज उन दोनों की भी आँखें नम थीं। आखिर शिखा, जिसे रमा ने अपनी कोख से जायी बेटी से भी बढ़कर प्यार दिया था, आज उसके हाथ पीले होने वाले थे। पाँच साल पहले तक यह परिवार एक ही छत के नीचे रहता था। रघुवीर और करमवीर के बीच राम-लक्ष्मण जैसा प्रेम था, और रमा तो शिखा के लिए उसकी ‘छोटी माँ’ थी। शिखा ने चलना, बोलना, और यहां तक कि जिद करना भी अपनी छोटी माँ से ही सीखा था।
लेकिन फिर समय ने करवट ली। व्यापार के विस्तार और पारिवारिक संपत्ति को लेकर कुछ ऐसी गलतफहमियां पैदा हुईं कि दोनों भाइयों के बीच एक अदृश्य लेकिन मजबूत दीवार खड़ी हो गई। सुलोचना के कानों के कच्चेपन और ईर्ष्या ने इस आग में घी का काम किया। छोटी-छोटी बातों पर होने वाले तानों और क्लेश ने अंततः परिवार को दो हिस्सों में बांट दिया। करमवीर, जो अपने बड़े भाई का बेहद सम्मान करता था, चुपचाप अपना हिस्सा लेकर अलग हो गया। सालों बीत गए, दोनों परिवारों के बीच बोलचाल तक बंद हो गई। शिखा, जो उस वक्त कॉलेज में थी, इस बंटवारे से सबसे ज्यादा टूट गई थी।
रिसॉर्ट में हल्दी की रस्म शुरू होने का समय हो गया था। पंडित जी ने वेदी पर कलश स्थापित करते हुए कहा, “कन्या को बुलवाइए, मूहूर्त निकला जा रहा है। और हां, रस्म के अनुसार कन्या के चाचा-चाची को भी बुला लीजिए, क्योंकि पहला हल्दी का लेप उन्हें ही लगाना होता है।”
पंडित जी की बात सुनते ही सुलोचना के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने बात संभालते हुए कहा, “पंडित जी, शिखा के चाचा-चाची तो शहर से बाहर हैं, वो नहीं आ पाएंगे। आप रस्म शुरू करवाइए, मेरी बहन और बहनोई यह रस्म पूरी कर देंगे।”
तभी भीड़ को चीरती हुई शिखा वहां आ खड़ी हुई। उसने पीले रंग का खूबसूरत लहंगा पहना हुआ था, लेकिन उसके चेहरे पर हल्दी की चमक से ज्यादा एक दृढ़ संकल्प की आभा थी। उसने सुलोचना की आँखों में देखते हुए साफ शब्दों में कहा, “नहीं माँ, मेरी हल्दी की रस्म मेरे चाचा-चाची के बिना शुरू नहीं होगी। अगर वे नहीं आएंगे, तो मैं इस हल्दी पर नहीं बैठूंगी।”
सुलोचना झेंप गई और मेहमानों के सामने अपनी इज्जत बचाते हुए धीरे से फुसफुसाई, “तू पागल हो गई है शिखा? तमाशा मत बना। तुझे पता है न कि हमारे उनके बीच कोई रिश्ता नहीं है। वे लोग नहीं आएंगे। तू चुपचाप रस्म के लिए बैठ जा।”
“रिश्ता कैसे नहीं है माँ?” शिखा की आँखों से आंसू छलक पड़े, “खून का रिश्ता किसी के कहने से टूट थोड़ी जाता है। जब मैंने बचपन में पहला कदम चाचा की उंगली पकड़ कर रखा था, जब मेरे स्कूल का सारा काम मेरी छोटी माँ करती थीं, तब तो रिश्ते बहुत गहरे थे। चंद पैसों और झूठे अहम के लिए आप लोगों ने दीवार खींच ली, लेकिन मेरे दिल से मेरी छोटी माँ और चाचा को कैसे निकालोगी? मैं खुद उन्हें लेने जा रही हूँ।”
इससे पहले कि रघुवीर या सुलोचना कुछ कह पाते, शिखा मंडप से पलट गई और रिसॉर्ट के बाहर खड़ी अपनी कार में बैठ गई। उसके इस कदम से पूरे समारोह में सन्नाटा छा गया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।
इधर, रमा अपनी पुरानी यादों में खोई हुई शिखा के बचपन की एक तस्वीर को सीने से लगाए सुबक रही थी। तभी उनके दरवाजे पर एक कार के रुकने की आवाज आई और अगले ही पल दरवाजे की घंटी बजी। करमवीर ने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने शिखा को दुल्हन के जोड़े में खड़ा देखकर वे सन्न रह गए। शिखा की आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक अधिकार भरा गुस्सा था।
“तू… तू यहां कैसे मेरी बच्ची?” करमवीर की आवाज भर्रा गई।
रमा भी भागती हुई दरवाजे पर आई और शिखा को देखते ही उसने उसे अपने सीने से लगा लिया। रमा की सालों की ममता आंसुओं के रूप में बह निकली। शिखा भी अपनी छोटी माँ के गले लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी।
“छोटी माँ, तुम लोग कितने निष्ठुर हो। मेरी शादी हो रही है और तुम लोग यहां इस तरह बैठे हो? क्या तुम्हारा मुझ पर कोई हक नहीं है? क्या तुम भूल गए कि तुमने ही मुझे गोद में खिलाया है? मैं तुम्हारी भी तो बेटी हूँ।” शिखा ने रमा के आंसू पोंछते हुए कहा।
“पगली… तुझसे कैसी शिकायत,” रमा ने शिखा का माथा चूमते हुए कहा, “तू तो हमारी जान है। लेकिन बेटा, तेरा यहां आना ठीक नहीं है। तेरे पापा और माँ क्या सोचेंगे? मेहमान भी आ गए होंगे। तू जा बेटा, हमारी दुआएं हमेशा तेरे साथ हैं।”
“नहीं चाची,” शिखा ने करमवीर का हाथ पकड़ते हुए जिद्द भरे स्वर में कहा, “मैं उन्हें बता कर आई हूँ। जब तक आप और चाचा मेरे साथ नहीं चलेंगे, मेरे माथे पर हल्दी नहीं लगेगी। मेरी शादी का मंडप सूना रहेगा। पापा अपने अहम को नहीं छोड़ सकते, तो मैं भी अपने चाचा-चाची को नहीं छोड़ सकती।”
शिखा की बातों ने करमवीर और रमा के दिलों को बुरी तरह झकझोर दिया था। एक युवा लड़की के इस असीम प्रेम और समझदारी के आगे उनकी सारी झिझक, सारे गिले-शिकवे बेमानी लगने लगे थे। शिखा एकाएक कितनी बड़ी और परिपक्व लगने लगी थी। उसके प्रेम और वात्सल्य भरे अधिकार ने सालों से जमी नफरत की बर्फ को एक झटके में पिघला दिया था। सच ही कहा गया है कि अपनों का प्यार उस तेज बहाव की तरह होता है, जो बड़े-बड़े पहाड़ों का सीना चीर कर अपना रास्ता बना ही लेता है। कोई भी नफरत की दीवार, परिवार के अटूट स्नेह और खून के रिश्तों की गर्माहट से ज्यादा मजबूत नहीं हो सकती।
आखिरकार, शिखा की जिद्द के आगे करमवीर और रमा को झुकना पड़ा। जब शिखा अपने चाचा-चाची का हाथ पकड़कर रिसॉर्ट के मंडप में वापस लौटी, तो सबकी निगाहें उन पर टिक गईं। शिखा के चचेरे भाई-बहन (करमवीर के बच्चे) भी उसके पीछे-पीछे आ गए थे।
रघुवीर और सुलोचना अपनी जगह पर बुत बने खड़े थे। जब रघुवीर ने अपने छोटे भाई को सालों बाद इस तरह देखा, तो उनके भीतर का कठोर आवरण टूटकर बिखरने लगा। उन्हें याद आ गया कि कैसे करमवीर बचपन में उनके पीछे-पीछे दौड़ता था, कैसे उसने हमेशा बड़े भाई के हर फैसले को सिर झुकाकर माना था। सुलोचना भी रमा के उस निश्छल चेहरे को देखकर आत्मग्लानि से भर गई थी। उसे महसूस हुआ कि उसकी छोटी सी ईर्ष्या ने परिवार को कितना बड़ा घाव दिया था।
शिखा ने दोनों को मंडप के पास लाकर खड़ा किया और अपनी माँ से कहा, “माँ, देखिए, मैं अपनी छोटी माँ और चाचा को ले आई। अब मैं हल्दी लगवाने के लिए तैयार हूँ।”
अचानक रघुवीर की आँखों से आंसू बह निकले। वे आगे बढ़े और उन्होंने अपने छोटे भाई करमवीर को जोर से गले लगा लिया। दोनों भाइयों के आंसू एक-दूसरे के कंधों को भिगो रहे थे। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर मेहमान की आँखें छलक आईं।
“मुझे माफ कर दे छोटे,” रघुवीर रुंधे हुए गले से बोले, “पैसों की अंधी दौड़ और झूठी शान ने मुझे अंधा कर दिया था। मैं भूल गया था कि खून के रिश्ते इन दुनियावी चीजों से बहुत ऊपर होते हैं। जाने-अनजाने मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया है। लेकिन आज मेरी बेटी ने मेरी आँखें खोल दीं। याद रख, बंद मुट्ठी ही सवा लाख की होती है। परिवार के बिना इंसान कुछ भी नहीं।”
सुलोचना भी रमा के पास गई और उसके दोनों हाथ पकड़कर पश्चात्ताप भरे स्वर में रोते हुए बोली, “मुझे भी माफ कर दे रमा। मेरी ईर्ष्या और नासमझी ने मुझे विवेकहीन बना दिया था। मैंने सिर्फ तेरा घर नहीं तोड़ा, बल्कि अपना घर भी उजाड़ दिया था। शिखा ने आज मुझे असली रिश्तों की कीमत समझा दी है। कहो तो मैं तुम्हारे पैर पड़कर माफी मांग लूं…”
रमा ने सुलोचना को बीच में ही रोकते हुए गले से लगा लिया और कहा, “दीदी, आप बड़ी हैं, शर्मिंदा मत कीजिए। जो बीत गया उसे भूल जाइए। आज हमारी बेटी का सबसे बड़ा दिन है, चलिए सब मिलकर उसे हल्दी लगाते हैं।”
शिखा मुस्कुराती हुई वेदी पर बैठ गई। सबसे पहले करमवीर और रमा ने उसके गालों पर हल्दी का लेप लगाया। उसके बाद रघुवीर और सुलोचना ने उसे आशीर्वाद दिया। पूरा मंडप जो कुछ देर पहले एक तनाव में डूबा था, अब खुशियों, हंसी और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। शिखा के छोटे चचेरे भाई-बहनों ने आकर उसके गले में बाहें डाल दीं और जीजाजी के जूते चुराने की योजनाएं बनाने लगे।
आज सिर्फ शिखा की हल्दी की रस्म पूरी नहीं हुई थी, बल्कि सालों से टूटे हुए एक परिवार के जख्मों पर भी प्यार और माफी की हल्दी लग चुकी थी। नफरत हार गई थी और एक बेटी का निश्छल प्रेम जीत गया था।
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