मुक्ति का स्वाद

 आज सुबह रघुनाथ जी की हालत बहुत खराब थी। वे दर्द से कराह रहे थे और उनकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उन्होंने कांपते हाथों से विमला का हाथ पकड़ा और टूटी हुई आवाज़ में कहा, “विमला… मुझे जाने दे। पर इस कड़वाहट के साथ मत भेज… मेरा मुँह मीठा करवा दे… मेरी आत्मा भटकती रह जाएगी।”

उन शब्दों ने विमला के भीतर चल रहे द्वंद्व को शांत कर दिया। उसने तय कर लिया कि मौत तो वैसे भी आनी है, पर वह अपने पति को इस असहनीय मानसिक और आत्मिक पीड़ा के साथ विदा नहीं होने देगी। उसे पता था कि घर में पैसे का पूरा हिसाब विकास के पास रहता है और अगर उसने पैसे मांगे तो विकास तुरंत समझ जाएगा और उसे रोक देगा।

 बिस्तर पर लेटे रघुनाथ जी की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उनका शरीर, जो कभी अपनी मजबूती के लिए पूरे मोहल्ले में जाना जाता था, आज बीमारियों के जाल में उलझकर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। उन्हें अंतिम चरण की क्रॉनिक किडनी डिसीज़ थी और साथ ही शुगर का स्तर इतना अनियंत्रित हो चुका था कि शरीर के कई अंगों ने काम करना लगभग बंद कर दिया था।

पास ही रखी एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर उनकी पत्नी विमला बैठी थीं। उनकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे और बिखरे हुए सफेद बाल इस बात की गवाही दे रहे थे कि पिछले कई महीनों से उन्होंने ठीक से नींद का स्वाद नहीं चखा था। विमला की नज़रें लगातार अपने पति के चेहरे पर टिकी थीं, जो दर्द और एक अजीब सी बेचैनी से बार-बार सिकुड़ रहा था।

डॉक्टर अविनाश ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया था, “देखिए, अब चिकित्सा विज्ञान के पास कोई चमत्कार नहीं बचा है। इनकी हालत बहुत नाजुक है। इनका शुगर लेवल किसी भी कीमत पर बढ़ना नहीं चाहिए, वरना ये सीधे कोमा में जा सकते हैं। खाने में सिर्फ उबला हुआ पानी, फीका दलिया और सूप ही देना है। मीठे का एक कण भी इनके लिए ज़हर से कम नहीं है।”

रघुनाथ जी के बेटे, विकास और बहू अंजलि ने इस हिदायत को पत्थर की लकीर मान लिया था। वे अपने पिता से बहुत प्यार करते थे और उन्हें एक दिन भी और अपने बीच रोक कर रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। घर में मीठे का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित हो गया था। यहाँ तक कि रघुनाथ जी की नज़रों के सामने से फलों की टोकरी भी हटा दी गई थी।

लेकिन समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं थी। रघुनाथ जी एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन खाने-पीने के शौक में बिताया था। शहर के चौक वाले ‘तिवारी मिष्ठान भंडार’ के केसरिया पेड़े और रसमलाई उनकी जान हुआ करते थे। अब, अपनी ज़िंदगी की आखिरी घड़ियों में, जब उनके शरीर में दर्द के सिवा कुछ नहीं बचा था, उनके भीतर अपने उस पसंदीदा स्वाद के लिए एक भयानक तड़प उठ रही थी। यह तड़प किसी नशे की लत से कम नहीं थी।

बीते कई दिनों से रघुनाथ जी की मानसिक स्थिति भी बिगड़ने लगी थी। वे आधी रात को अचानक उठने की कोशिश करते, उनके हाथ हवा में कुछ टटोलते, और वे फटे हुए, सूखे होठों से बुदबुदाते, “विमला… एक पेड़ा… बस एक छोटा सा टुकड़ा। मेरा गला सूख रहा है, मुझे वो मिठास चाहिए।” जब उन्हें मना किया जाता या फीका पानी पिलाया जाता, तो वे एक छोटे बच्चे की तरह रोने लगते। बिस्तर की चादर को अपनी कमज़ोर मुट्ठियों में भींचकर वे ऐसी बेचैनी में छटपटाते कि देखने वाले की रूह कांप जाए।

विकास उन्हें समझाता, “पिताजी, डॉक्टर ने मना किया है। आप ठीक हो जाइए, फिर मैं खुद आपको तिवारी जी की दुकान ले चलूंगा।” लेकिन रघुनाथ जी जानते थे और विमला भी जानती थी कि अब कोई ‘ठीक होना’ नहीं लिखा है।

विमला का हृदय यह सब देखकर छलनी हो रहा था। पूरी ज़िंदगी उसने अपने पति को मीठा खाने से रोका था, उनसे झगड़े किए थे ताकि उनका स्वास्थ्य ठीक रहे। लेकिन आज, जब मौत सिरहाने बैठी थी, तो विमला को वह सब व्यर्थ लग रहा था। वह सोचती, “क्या फायदा ऐसी साँसों का जो इंसान को घुट-घुट कर, तड़प-तड़प कर मरने पर मजबूर कर दें? क्या हम अपने मोह में इनकी आत्मा को भी भूखा मार रहे हैं?”

आज सुबह रघुनाथ जी की हालत बहुत खराब थी। वे दर्द से कराह रहे थे और उनकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उन्होंने कांपते हाथों से विमला का हाथ पकड़ा और टूटी हुई आवाज़ में कहा, “विमला… मुझे जाने दे। पर इस कड़वाहट के साथ मत भेज… मेरा मुँह मीठा करवा दे… मेरी आत्मा भटकती रह जाएगी।”

उन शब्दों ने विमला के भीतर चल रहे द्वंद्व को शांत कर दिया। उसने तय कर लिया कि मौत तो वैसे भी आनी है, पर वह अपने पति को इस असहनीय मानसिक और आत्मिक पीड़ा के साथ विदा नहीं होने देगी। उसे पता था कि घर में पैसे का पूरा हिसाब विकास के पास रहता है और अगर उसने पैसे मांगे तो विकास तुरंत समझ जाएगा और उसे रोक देगा।

दोपहर को जब विकास ऑफिस गया हुआ था और बहू अंजलि अपने कमरे में सो रही थी, विमला ने अलमारी खोली। एक छोटे से मखमली डिब्बे में उसके शादी के समय की एक भारी चांदी की पायल रखी थी। यह पायल रघुनाथ जी ने ही अपनी पहली कमाई से उसके लिए बनवाई थी। विमला ने पायल निकाली, उसे अपनी साड़ी के पल्लू में छुपाया और दबे पांव घर से बाहर निकल गई।

वह सीधे मोहल्ले के सुनार के पास गई। सुनार ने जब पायल देखी तो वह हैरान रह गया, “अरे चाची, यह तो बहुत पुरानी और भारी पायल है, इसे क्यों बेच रही हो?” विमला ने बस इतना कहा, “ज़रूरत है बेटा, तू बस इसके बदले जो पैसे बनते हैं, दे दे।”

पैसे लेकर विमला के कदम सीधे चौक की तरफ मुड़ गए। तिवारी मिष्ठान भंडार से उसने रघुनाथ जी के पसंदीदा केसरिया पेड़ों का एक डिब्बा लिया। डिब्बे की सोंधी-सोंधी महक उसके नथुनों से टकराई तो उसकी अपनी आँखें भर आईं। उसे याद आ गया कि कैसे बरसों पहले रघुनाथ जी हर दीवाली पर ऐसे ही डिब्बे लेकर घर आते थे और पूरे घर में खुशियां छा जाती थीं।

घर लौटकर विमला ने रसोई में जाकर एक साफ प्लेट निकाली। उसने दो पेड़े प्लेट में रखे और उन्हें लेकर रघुनाथ जी के कमरे में गई। उसने कमरे का दरवाज़ा अंदर से हल्का सा खिसका दिया ताकि कोई अचानक अंदर न आ जाए।

रघुनाथ जी आँखें मूंदे पड़े थे, उनकी सांसें तेज़ थीं। विमला ने उनके सिरहाने बैठकर उनके माथे पर हाथ फेरा। “सुनिए…” विमला की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।

रघुनाथ जी ने धीरे से अपनी थकी हुई आँखें खोलीं। विमला ने अपने हाथ से पेड़े का एक छोटा सा टुकड़ा तोड़ा और उनके सूखे होठों के करीब ले गई। केसर और मावे की वह परिचित महक जैसे ही रघुनाथ जी की सांसों में घुली, उनके बेजान शरीर में जैसे एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई। उनकी धुंधली आँखों में अविश्वास और एक तरल चमक तैर गई। उन्होंने विमला की आँखों में देखा, जहाँ कोई डांट या रोक-टोक नहीं थी, बल्कि एक अथाह, गहरा और खामोश प्यार था।

विमला ने अपने कांपते हाथों से वह टुकड़ा उनके मुँह में रख दिया। रघुनाथ जी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके चेहरे की सारी सिकुड़न, सारा दर्द, सारी बेचैनी जैसे उस मिठास के साथ ही पिघलने लगी। उनके होठों के कोनों पर एक बेहद हल्की, लेकिन बहुत ही सुकून भरी मुस्कान खिल उठी। विमला की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली जो उसकी गालों को भिगोती हुई साड़ी के पल्लू तक जा रही थी। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं बोला गया, लेकिन उस खामोशी में एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता, विदाई का दर्द और एक जन्म-जन्मांतर का अटूट प्रेम गूंज रहा था। विमला जानती थी कि इसके परिणाम क्या हो सकते हैं, लेकिन अपने जीवनसाथी को शांति से विदा करने के लिए वह यह पाप भी अपने सिर लेने को तैयार थी।

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