नौ साल का ‘सावन’ कोने में दुबक कर रो रहा था। दीनानाथ भारी कदमों से अंदर गए और सावन के सिर पर हाथ रखा। सावन ने अपनी डबडबाई आँखों से पिता की ओर देखा और मासूमियत से पूछ लिया, “बाबा, मेरे शरीर में ये अजीब से बदलाव क्यों हो रहे हैं? आज स्कूल में जब मैं लड़कों के साथ वॉशरूम गया, तो सब मुझे देखकर हंसने लगे और मुझे वहां से भगा दिया। जब मैं लड़कियों के पास बैठता हूँ तो वो भी मुझसे अजीब तरह से पेश आती हैं। बाबा, मैं क्या हूँ? क्या मैं कोई भूत हूँ जो सब मुझसे डरते हैं?”
ये शब्द दीनानाथ के सीने में किसी तेज़ खंजर की तरह उतरे। उन्हें अपनी स्वर्गीय पत्नी सुमति की याद आ गई। सुमति ने सावन को जन्म देते ही इस दुनिया से विदा ले ली थी। जाते-जाते उसने सावन को दीनानाथ के हाथों में सौंपकर कहा था, “मेरे हिस्से का प्यार भी इसे ही दीजियेगा।” लेकिन दीनानाथ भगवान से अक्सर यही सवाल करते थे कि, “हे ईश्वर, मैंने तो आपसे अपने बुढ़ापे का एक साधारण सा सहारा मांगा था, पर आपने मेरी पत्नी को भी छीन लिया और मुझे एक ऐसी संतान दी, जिसे यह जालिम समाज कभी अपनाएगा ही नहीं।” सावन जन्म से ही एक ऐसी शारीरिक विसंगति (किन्नर) के साथ पैदा हुआ था, जिसके चलते ना तो वह पूरी तरह से एक लड़का था और ना ही एक लड़की।
जैसे-जैसे सावन बड़ा हो रहा था, उसकी शारीरिक बनावट और हाव-भाव में ऐसे परिवर्तन आ रहे थे जो समाज की नज़रों में ‘सामान्य’ नहीं थे। आस-पड़ोस के लोग, रिश्तेदार यहाँ तक कि दीनानाथ के अपने भाई-बहन भी उन्हें ताने मारते थे। “दीनानाथ, यह बच्चा हमारे परिवार पर कलंक है। इसे हिजड़ों की टोली को सौंप दे, यही इसके लिए और हमारे लिए सही रहेगा। वर्ना समाज में क्या मुँह दिखाएगा?” लोगों की ये बातें दीनानाथ के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंजती थीं। लेकिन एक पिता का दिल अपने ही अंश को कैसे खुद से दूर कर सकता था? वे हर बार लोगों की बातों को अनसुना कर देते, लेकिन आज सावन के मासूम सवालों ने उन्हें निशब्द कर दिया था।
दीनानाथ को कोई सीधा जवाब नहीं सूझा। उन्होंने सावन का हाथ पकड़ा और उसे चुप कराते हुए घर के पीछे बहने वाली नदी के किनारे ले गए। शाम का ढलता सूरज नदी के पानी पर सुनहरा रंग बिखेर रहा था। किनारे पर कीचड़ के बीच एक बेहद खूबसूरत कमल का फूल खिला हुआ था। दीनानाथ ने उस फूल की ओर इशारा करते हुए सावन से पूछा, “बेटा, तुम्हें यह फूल कैसा लग रहा है?”
सावन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “बहुत सुंदर है बाबा, लेकिन यह इतने गंदे कीचड़ में क्यों खिला है? इसे तो किसी साफ बगीचे में होना चाहिए था।”
दीनानाथ ने सावन के दोनों कंधों को पकड़कर उसे अपने सामने खड़ा किया और उसकी आँखों में आँखें डालकर बोले, “यही तो बात है मेरे बच्चे! यह कमल इस कीचड़ में पैदा जरूर हुआ है, लेकिन इसकी पहचान इस कीचड़ से नहीं, बल्कि इसकी अपनी सुंदरता और इसकी अपनी महक से है। यह कीचड़ इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, बल्कि जब यह पूरी तरह खिलता है, तो भगवान के चरणों में चढ़ाया जाता है।”
सावन कुछ-कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। दीनानाथ ने आगे कहा, “सावन, दुनिया ने इंसानों को सिर्फ दो सांचों में बांट रखा है- स्त्री और पुरुष। लेकिन प्रकृति सिर्फ दो रंग नहीं जानती। उसने तुम्हें एक बहुत ही खास और अलग रंग देकर भेजा है। लोग तुम्हारे शरीर को देखकर तुम्हारा मज़ाक उड़ाते हैं क्योंकि उनकी सोच बहुत छोटी है। लेकिन बेटा, इंसान की असली पहचान उसका शरीर या उसका जेंडर नहीं होता, उसकी असली पहचान उसका कर्म, उसकी शिक्षा और उसका हौसला होता है। तुम मेरी जान हो, मेरा अंश हो, और मैं तुम्हें किसी और को नहीं सौंपूंगा। तुम जीवन भर मेरे साथ रहोगे और मैं तुम्हें इतना काबिल बनाऊंगा कि जो लोग आज तुम पर हंस रहे हैं, कल वही तुम्हारे सामने सिर झुकाकर खड़े होंगे।”
पिता की इन बातों ने सावन के अंदर जैसे एक नई ऊर्जा भर दी। उसके चेहरे की उदासी और मन का डर कहीं दूर छूमंतर हो गया। सावन ने नदी के पानी में एक पत्थर फेंका और जब पानी में गोल-गोल लहरें उठीं, तो वह खुशी से ज़ोर-ज़ोर से ताली बजाने लगा। किन्नर समाज में अक्सर इस ताली को लोग एक मज़ाक या मांग का प्रतीक मानते हैं, लेकिन आज सावन की वह ‘ताली’ दीनानाथ के लिए किसी घबराहट का कारण नहीं थी।
दीनानाथ उस ताली की गूंज में अपने बच्चे का एक सुनहरा भविष्य सुन रहे थे। उन्हें सावन की उस ताली में किसी बड़े अस्पताल के मुख्य सर्जन, किसी जिले के सख्त आईएएस ऑफिसर या किसी महान वैज्ञानिक के सम्मान में बजने वाली तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी। उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपने बच्चे को समाज की इन संकीर्ण दीवारों से निकालकर शिक्षा और कामयाबी के उस खुले आसमान में छोड़ेंगे, जहाँ जेंडर की कोई सीमा नहीं होती। दीनानाथ ने प्यार से सावन के सिर पर हाथ फेरा। उनका दिल अब किसी चट्टान की तरह मजबूत हो चुका था। उन्होंने मन ही मन ठान लिया था कि वे अपने सावन को एक ऐसा इंसान बनाएंगे, जिसका नाम सुनते ही लोगों को किसी के स्त्री या पुरुष होने का ख्याल नहीं, बल्कि एक महान व्यक्तित्व का अहसास होगा।
समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा। दीनानाथ ने सावन को समाज के तीखे तानों और कड़वी नज़रों से बचाकर शिक्षा के एक ऐसे मार्ग पर ला खड़ा किया, जहाँ सिर्फ उसकी मेहनत और प्रतिभा बोलती थी। सावन के लिए यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। स्कूल से लेकर मेडिकल कॉलेज तक की सीढ़ियां चढ़ते हुए, कदम-कदम पर उसे लोगों की हीन भावना, पक्षपात और मज़ाक का सामना करना पड़ा। लेकिन हर बार जब भी वह भीतर से टूटता, उसे अपने पिता की ‘कमल के फूल’ वाली बात और उनकी आँखों में चमकता सुनहरे भविष्य का सपना याद आ जाता। दीनानाथ ने भी अपनी दिन-रात की मेहनत और खून-पसीने की सारी कमाई सावन की पढ़ाई पर लगा दी। उन्होंने दुनिया की परवाह किए बिना सावन को वो हर सुविधा दी, जो एक होनहार छात्र को चाहिए थी।
और फिर वह गौरवशाली दिन भी आया, जब सावन की अथक मेहनत और एक पिता के अटूट त्याग ने समाज की छोटी सोच पर एक करारा तमाचा जड़ा। सावन अब सिर्फ सावन नहीं रहा था, वह अब ‘डॉक्टर सावन’ बन चुका था। जिस समाज ने उसे किन्नर कहकर बचपन में दुत्कार दिया था, आज वही समाज उसकी मेडिकल डिग्री और उसकी काबिलियत के आगे नतमस्तक था।
मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सावन ने किसी बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल में लाखों की नौकरी करने के बजाय अपने ही कस्बे में एक क्लीनिक खोलने का फैसला किया। पिता दीनानाथ के कांपते, लेकिन गर्व से भरे हाथों से फीता काटकर ‘सुमति केयर क्लीनिक’ का उद्घाटन हुआ। सावन का यह क्लीनिक कोई आम क्लीनिक नहीं था, बल्कि यह इंसानियत और सेवा का एक सच्चा मंदिर था। सावन ने यह अटल नियम बना रखा था कि वह अपने क्लीनिक में रोज़ाना आने वाले गरीब और असहाय मरीजों का मुफ्त में इलाज करेगा। जो लोग दवा का खर्च नहीं उठा सकते थे, सावन अपनी जेब से उन्हें दवाइयां खरीद कर देता था। उसके हाथों में जैसे कोई जादू था; उसकी मीठी बोली, अपनत्व और ममता से भरा स्पर्श ही मरीजों का आधा दर्द दूर कर देता था।
अब सावन के क्लीनिक के बाहर मरीजों की लंबी कतारें लगती थीं। जिन लोगों ने कभी सावन को अपशगुनी कहकर अपने बच्चों के साथ खेलने तक नहीं दिया था, आज वे ही हाथ जोड़े ‘डॉक्टर साहब’ कहकर उससे अपने परिवार के इलाज की गुहार लगाते नज़र आते थे।
एक दिन दीनानाथ क्लीनिक के बाहर कोने में रखी बेंच पर बैठे यह सब देख रहे थे। अंदर सावन एक गरीब बुजुर्ग महिला का मुफ्त इलाज कर रहा था और वह महिला रोते हुए उसे ढेरों दुआएं दे रही थी। यह दृश्य देखकर दीनानाथ की आँखों से खुशी और गर्व के आँसू छलक पड़े। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। आज उन्हें गहराई से महसूस हुआ कि उन्होंने समाज से बगावत करके जो फैसला लिया था, वह कितना सही था।
दीनानाथ ने आसमान की तरफ देखा और नम आँखों से मुस्कुराते हुए मन ही मन अपनी स्वर्गीय पत्नी से कहा, “सुमति, देख तुम्हारा सावन आज सच में समाज के लिए एक फरिश्ता बन गया है।” आज दीनानाथ का यह दृढ़ विश्वास और भी पक्का हो गया था कि यदि बच्चे को सही शिक्षा, बिना शर्त प्यार और अटूट हौसला दिया जाए, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका जेंडर क्या है। लड़का हो, लड़की हो या कोई किन्नर, अच्छे संस्कार और उच्च शिक्षा ही इंसान का असली वजूद तय करते हैं। डॉक्टर सावन ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया था कि इंसानियत, करुणा और कामयाबी किसी भी शारीरिक ढांचे या जेंडर की मोहताज नहीं होती।
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