नंदिनी को अब याद भी नहीं था कि वह आखिरी बार बिना किसी डर के कब जोर से हंसी थी।
कभी उसकी हँसी पूरे घर में गूँजती थी। छोटी-सी बात पर खिलखिला उठना, बारिश की बूँदों को हथेली पर रोकना, माँ से घंटों बतियाना और अपनी पसंद के गीत गुनगुनाना—ये सब उसके जीवन का हिस्सा हुआ करते थे। मगर शादी के बाद जैसे उसकी हँसी पर भी किसी ने अदृश्य ताला लगा दिया था।
वह घर में थी, मगर अपने भीतर कहीं बहुत दूर चली गई थी।
सुबह के सात बज रहे थे। आँगन में तुलसी के पास दिया जल रहा था और रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। नंदिनी ने खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखा। सामने वाली छत पर उसकी पड़ोसन अपनी छोटी बेटी के बाल संवार रही थी। बच्ची बार-बार सिर हिला रही थी और माँ हँसते हुए उसके बालों में रिबन बाँध रही थी।
नंदिनी के होंठों पर भी हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन अगले ही क्षण पीछे से आई आवाज ने उसकी मुस्कान छीन ली।
“नंदिनी! चाय अभी तक नहीं बनी?”
“बस बन ही रही है,” उसने धीमे से कहा।
“तुम्हारा ध्यान हमेशा न जाने कहाँ रहता है।”
नंदिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
शादी को आठ साल हो चुके थे। पति निखिल बुरा आदमी नहीं था। वह न नंदिनी पर हाथ उठाता था, न घर का खर्च रोकता था। बाहर वालों की नजर में तो वह आदर्श पति था। लेकिन नंदिनी जानती थी कि रिश्ते केवल मारपीट से नहीं घुटते।
कभी-कभी बहुत अधिक पूछताछ भी इंसान को भीतर से थका देती है।
“किससे फोन पर बात कर रही थीं?”
“मायके में इतनी देर क्या बात थी?”
“उस दिन पड़ोस में क्यों गई थीं?”
“मेरी माँ के सामने तुमने वह बात क्यों कही?”
“मेरी अनुमति के बिना अलमारी क्यों खोली?”
धीरे-धीरे नंदिनी ने अपनी हर बात के पहले सोचना शुरू कर दिया था—निखिल को बुरा तो नहीं लगेगा?
उसने अपनी पसंद के कपड़े पहनना कम कर दिया था। घर में अपनी पसंद की चीजें लाना बंद कर दिया था। यहाँ तक कि जब उसे कोई कहानी अच्छी लगती, तो वह चुपचाप पढ़ती और किताब वापस रख देती। उसे डर लगता कि निखिल पूछ न बैठे—“इतनी फुर्सत कब से मिलने लगी?”
नंदिनी की सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि घर में उसकी कोई निजी जगह नहीं थी।
उसका मोबाइल निखिल अक्सर बिना पूछे देख लेता। उसकी डायरी पढ़ लेता। मायके से आए संदेशों का जवाब भी कभी-कभी अपनी सुविधा के अनुसार देने को कहता।
एक दिन नंदिनी की माँ का फोन आया।
“बेटा, इस रविवार को आ जा। तेरी मामी भी आ रही हैं।”
नंदिनी ने खुशी से कहा, “हाँ माँ, मैं आऊँगी।”
लेकिन फोन रखते ही निखिल ने पूछा, “कहाँ जाना है?”
“माँ ने बुलाया है।”
“रविवार को?”
“हाँ।”
“नहीं जा पाओगी। उस दिन शर्मा जी के घर जाना है।”
नंदिनी कुछ क्षण चुप रही।
“लेकिन माँ बहुत दिनों से बुला रही हैं।”
निखिल ने सहजता से कहा, “तो क्या हुआ? शादी के बाद हर बात अपनी मर्जी से थोड़े ही होती है।”
यह वाक्य नंदिनी ने पहले भी कई बार सुना था।
उस रात वह देर तक जागती रही।
उसे पहली बार लगा कि शायद समस्या यह नहीं थी कि निखिल उसे रोकता था। समस्या यह थी कि उसने स्वयं को रोकना स्वीकार कर लिया था।
अगले दिन नंदिनी ने अपनी अलमारी साफ करते हुए एक पुराना डिब्बा निकाला। उसमें उसकी शादी से पहले की छोटी-छोटी चीजें रखी थीं—कुछ तस्वीरें, माँ की लिखी चिट्ठी, बचपन की सहेली का दिया हुआ एक छोटा-सा बुकमार्क और एक कागज पर लिखी चार पंक्तियाँ।
“अपने घर में रहना,
पर स्वयं को मत खोना।
रिश्ते निभाना,
पर अपनी आवाज मत खोना।”
ये पंक्तियाँ उसके पिता ने शादी के दिन उसके हाथ में रखी थीं।
नंदिनी की आँखें भर आईं।
उसे समझ आया कि उसने घर बचाने के नाम पर खुद को ही खो दिया था।
उसने उसी शाम निखिल से बात करने का फैसला किया।
“निखिल, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”
“हाँ, बोलो।”
“मैं इस घर में रहना चाहती हूँ, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ, लेकिन इस तरह नहीं कि मेरी हर पसंद तुम्हारी अनुमति की मोहताज हो।”
निखिल चौंका।
“मैंने तुम्हें ऐसा कब कहा?”
नंदिनी ने पहली बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “तुमने कभी एक साथ नहीं कहा। रोज थोड़ा-थोड़ा करके कहा है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“मेरा फोन मेरी निजी चीज है। मेरी डायरी मेरी है। मेरी माँ से बात करने के लिए मुझे अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए। अगर मैं पड़ोस की सहेली से मिलने जाऊँ तो उसका मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हें नजरअंदाज कर रही हूँ।”
निखिल कुछ कहने वाला था, लेकिन नंदिनी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“मैं तुमसे लड़ नहीं रही। मैं अपना रिश्ता बचाना चाहती हूँ। लेकिन ऐसा रिश्ता जिसमें एक व्यक्ति मालिक और दूसरा अनुयायी हो, उसे निभाते-निभाते इंसान भीतर से खत्म हो जाता है।”
निखिल चुप रहा।
नंदिनी ने आगे कहा, “अगर मेरी कोई गलती है तो बताओ। मैं सुधारूँगी। लेकिन मेरी हर साँस पर सवाल मत करो। मुझे अपनी माँ से मिलने, अपनी सहेली से बात करने, अकेले कुछ देर बैठने और अपनी पसंद की चीजें करने का अधिकार चाहिए।”
उस रात कोई निर्णय नहीं हुआ।
अगले कुछ दिन भी आसान नहीं थे।
निखिल कई बार पुरानी आदतों के अनुसार सवाल करता, लेकिन अब नंदिनी हर बार चुप नहीं रहती।
“मैं माँ से बात कर रही हूँ, थोड़ी देर बाद फोन रख दूँगी।”
“मैं आज अपनी सहेली से मिलने जा रही हूँ।”
“यह मेरी डायरी है, इसे पढ़ने से पहले मुझसे पूछना।”
शुरुआत में निखिल को ये बातें बुरी लगीं। उसे लगा नंदिनी बदल गई है।
लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि नंदिनी बदली नहीं थी—वह सिर्फ अपने भीतर लौट रही थी।
एक रविवार नंदिनी अकेली मायके चली गई।
आठ साल बाद पहली बार।
माँ ने दरवाजे पर उसे देखा तो गले लगा लिया।
“इतने दिनों बाद अकेली आई है?”
नंदिनी मुस्कुरा दी।
“हाँ माँ, आज मन हुआ कि मैं बेटी बनकर घर आऊँ।”
माँ की आँखें नम हो गईं।
उस दिन नंदिनी ने महसूस किया कि आज़ादी हमेशा घर छोड़ने का नाम नहीं होती।
कभी-कभी आज़ादी उसी घर में अपने लिए एक खिड़की खोल लेने का नाम होती है।
कुछ महीने बाद घर का वातावरण बदलने लगा। निखिल अब फोन देखने से पहले पूछता। नंदिनी की माँ से बात करने पर उसे कोई आपत्ति नहीं होती। रविवार को कभी नंदिनी मायके चली जाती तो कभी निखिल के साथ बाहर निकल जाती।
एक शाम दोनों बालकनी में बैठे थे।
निखिल ने कहा, “नंदिनी, शायद मैं तुम्हें प्यार करते-करते तुम्हें बाँधने लगा था।”
नंदिनी ने धीमे से मुस्कुराकर कहा, “और मैं रिश्ता बचाते-बचाते खुद को खोने लगी थी।”
दोनों कुछ देर चुप रहे।
सामने वाली छत पर वही छोटी बच्ची खेल रही थी। हवा में उसके रिबन लहरा रहे थे।
नंदिनी ने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे वर्षों से बंद किसी कमरे की खिड़की खुल गई हो।
उसे अपना घर छोड़ना नहीं पड़ा था।
बस उस घर में अपने होने की जगह वापस लेनी पड़ी थी।
और उस दिन उसे समझ आया—घुटन भरे रिश्ते से आज़ादी हमेशा रिश्ते से बाहर निकलने में नहीं होती।
कभी-कभी रिश्ते को बचाने के लिए भी उसमें से घुटन निकालनी पड़ती है।
अप्रकाशित व मौलिक रचना
सर्वथा लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’
खुर्जा, उत्तर प्रदेश