राधिका बुरी तरह चौंक गई, “क्या बकवास कर रहे हो तुम? तुम क्यों उनके साथ जाओगे? तुम अपना घर छोड़कर उन.. उन बाहरी लोगों के साथ रहोगे?”
“बाहरी लोग? राधिका, जब मेरे पास सिर छिपाने को पक्की छत नहीं थी, तब इन्हीं बाहरी लोगों ने मुझे अपना घर दिया था। जब मेरे घर में अंधेरा था, तब इन्होंने मुझे अपने घर की रोशनी दी थी। यह बात मेरे एहसान की नहीं, मेरी जड़ों की है। मैं उन हाथों को अकेले कैसे छोड़ सकता हूँ, जिन्होंने मुझे तब संभाला था जब मैं कुछ नहीं था?” सुमित की आवाज में एक अजीब सी पीड़ा और भारीपन था।
तभी दरवाजे के बाहर एक हल्की सी आहट हुई। सुमित ने मुड़कर देखा तो मास्टर जी बेडरूम के दरवाजे पर खड़े थे। उनके हाथ में वह गीला गमछा था जिसे वे शायद समेटने आए थे। उनकी पुरानी, धुंधली आंखों में आंसू तैर रहे थे और उनके होठ हल्के-हल्के कांप रहे थे।
बेंगलुरु के भारी ट्रैफिक से जूझते हुए जब सुमित अपनी गाड़ी से उतरा, तो उसके चेहरे पर दिन भर की थकान साफ झलक रही थी। वह अपनी चौदहवीं मंजिल पर स्थित आलीशान फ्लैट की ओर जाने के लिए लिफ्ट का इंतजार कर रहा था, तभी उसकी सोलह साल की बेटी मायरा लिफ्ट से बाहर निकलती हुई मिली।
“पापा! आप आ गए? प्लीज आप अंदर जाकर देखिए, क्या तमाशा बना रखा है,” मायरा ने अपने चेहरे पर एक गहरी झुंझलाहट लाते हुए कहा।
“क्यों? क्या हो गया बेटा? तुम इतनी परेशान क्यों लग रही हो?” सुमित ने मायरा के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
“पापा, आपने मास्टर जी और उनकी पत्नी को हमारे घर में क्यों रुकने दिया? प्लीज आप उन्हें कल ही कहीं और शिफ्ट कर दीजिए। मेरा तो घर में रहना मुश्किल हो गया है।”
सुमित ने गहरी सांस ली, “बेटा, वे सिर्फ एक हफ्ते के लिए आए हैं। सावित्री ताई के घुटनों का ऑपरेशन है, उसके बाद वे वापस अपने शहर लौट जाएंगे। थोड़ा एडजस्ट कर लो।”
“नो पापा! नॉट एट ऑल। मैं अपने दोस्तों को घर नहीं बुला सकती। अजीब सी सरसों के तेल की महक आती है उनके कपड़ों से,” मायरा पैर पटकते हुए नीचे सोसाइटी के पार्क की तरफ चली गई।
सुमित भारी कदमों से अपने दरवाजे तक पहुंचा। बेल बजाई तो पत्नी राधिका ने दरवाजा खोला। राधिका का चेहरा भी किसी उबलते हुए ज्वालामुखी से कम नहीं लग रहा था।
दरअसल, तीन दिन पहले ही सुमित के गृह नगर बनारस से उसके पुराने पड़ोसी और बचपन के शिक्षक, जिन्हें सब ‘मास्टर जी’ कहते थे, अपनी पत्नी सावित्री के घुटनों के प्रत्यारोपण के लिए बेंगलुरु आए थे। सुमित ने ही जोर देकर उन्हें अपने घर रुकने के लिए कहा था। आज सुबह वह उन्हें एयरपोर्ट से लेकर आया था और फिर तुरंत उसे एक जरूरी मीटिंग के लिए ऑफिस जाना पड़ा।
सुमित ने घर के अंदर कदम रखा तो देखा कि मास्टर जी हॉल में बैठे सावित्री ताई के पैरों में कोई दर्द निवारक मरहम लगा रहे थे। उनका एक पुराना सा कपड़े का थैला और एक अटैची सेंटर टेबल के पास खुली पड़ी थी, जिसमें से कुछ पुराने एक्स-रे और मेडिकल रिपोर्ट्स बाहर झांक रही थीं। पास ही सोफे के किनारे पर मास्टर जी ने अपना गीला गमछा सुखाने के लिए डाल रखा था, जो राधिका के इटैलियन लेदर सोफे से बिल्कुल मेल नहीं खा रहा था।
सुमित को देखते ही मास्टर जी के झुर्रियों वाले चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान खिल उठी, “आ गए बेटा सुमित? आज तो बहुत थक गए होगे। डॉक्टर साहब से बात हुई तुम्हारी?”
“जी मास्टर जी, मैंने अस्पताल में सारी औपचारिकताएं पूरी कर दी हैं। परसों सुबह ताई को एडमिट करना है,” सुमित ने पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
तभी अंदर के कमरे से राधिका ने सुमित को आवाज दी। सुमित जैसे ही बेडरूम में गया, राधिका ने दरवाजा लगभग बंद करते हुए धीमी लेकिन बेहद तीखी आवाज में अपना गुस्सा जाहिर किया।
“तुमने बिना सोचे-समझे इन लोगों को यहां क्यों बुला लिया सुमित? क्या तुम्हें हमारा लाइफस्टाइल नहीं पता? बाथरूम में जाकर देखो, गीले पैरों के निशान पूरे ड्राई एरिया में छपे हुए हैं। वॉश बेसिन पर साबुन का पानी गिरा पड़ा है। कमोड का इस्तेमाल तक ठीक से नहीं किया है इन्होंने। क्या मैं अब दिन भर इनके पीछे-पीछे सफाई करती फिरूंगी? एकदम गंवार हैं दोनों!”
सुमित ने राधिका को शांत करने की कोशिश की, “राधिका, वे उम्रदराज हैं और एक छोटे शहर से आते हैं। उन्हें यहां के मॉडर्न फिटिंग्स की आदत नहीं है। तुम या मायरा उन्हें प्यार से समझा देते।”
“मैं क्यों समझाऊं? और क्या-क्या समझाऊं? यह हमारा घर है, कोई धर्मशाला नहीं। हम दोनों वर्किंग हैं, हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम किसी की तीमारदारी करें। तुम कल के कल इनके लिए कोई और व्यवस्था करो। मैंने किसी का ठेका नहीं ले रखा है, समझे तुम?” राधिका की आवाज में एक अल्टीमेटम था।
राधिका की बातें सुनकर सुमित सन्न रह गया। उसकी आंखों के सामने रातों-रात पच्चीस साल पुराना वह वक्त तैर गया, जब वह बनारस की तंग गलियों में एक खपरैल वाले कच्चे मकान में रहता था। सुमित के पिताजी एक मामूली क्लर्क थे और घर की आर्थिक स्थिति हमेशा डवांडोल रहती थी। उनकी गली में इकलौता पक्का और दो मंजिला मकान मास्टर रघुनाथ जी का था।
सुमित को याद आया जब उसकी बड़ी बहन की शादी तय हुई थी। बरसात का मौसम था और उनके कच्चे घर की छत टपक रही थी। सुमित के पिता मेहमानों के ठहरने को लेकर बहुत परेशान थे। तब मास्टर जी ने खुद आगे बढ़कर अपने पूरे पक्के घर की चाबियां सुमित के पिता के हाथ में रख दी थीं। पंद्रह दिनों तक मास्टर जी और सावित्री ताई खुद दालान में सोए थे और उन्होंने अपना पूरा घर, अपना टीवी, अपना फ्रिज सब कुछ बारातियों और मेहमानों के लिए खोल दिया था।
इतना ही नहीं, सुमित जब इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा था, तब उनके घर में बिजली काट दी गई थी क्योंकि बिल जमा नहीं हुआ था। मास्टर जी ने सुमित को अपने घर के इन्वर्टर की रोशनी में महीनों तक पढ़ाया था। सावित्री ताई सुमित के लिए रात को अपने हाथों से पराठे बनाकर लाती थीं ताकि वह भूखा न सोए। उनकी खुद की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने मोहल्ले के हर बच्चे, खासकर सुमित, को अपने बच्चों से भी ज्यादा प्यार दिया था। आज सुमित जिस मुकाम पर था, उसमें मास्टर जी की उस निस्वार्थ मदद की एक बहुत बड़ी नींव थी।
“कहाँ खो गए? मैं कुछ कह रही हूँ सुमित!” राधिका की तेज आवाज ने सुमित को वर्तमान में खींच लिया। “इन्हें कल ही यहां से भेजो।”
सुमित ने एक गहरी सांस ली। उसने राधिका की तरफ एक शांत लेकिन दृढ़ नजरों से देखा और अपना फोन निकालकर अपने एक मित्र को कॉल लगाया, जिसका एक सर्विस अपार्टमेंट शहर के दूसरे हिस्से में था।
“हेलो समीर, तुम्हारा जो व्हाइटफील्ड वाला सर्विस अपार्टमेंट है, वो मुझे पंद्रह-बीस दिनों के लिए चाहिए,” सुमित ने फोन पर कहा।
“हां सुमित, वह तो खाली है। लेकिन तुम्हें क्यों चाहिए? तुम्हारा तो खुद का इतना बड़ा पेंटहाउस है,” समीर ने हैरानी से पूछा।
“हां दोस्त, घर तो बहुत बड़ा है मेरा… पर शायद इस घर के लोगों का दिल बहुत छोटा हो गया है, जिसमें मेरे अपने लोगों के लिए दो गज की जगह नहीं है। तुम बस वह फ्लैट आज रात के लिए तैयार करवा दो, किराया मैं तुम्हें एडवांस में ट्रांसफर कर रहा हूँ।”
राधिका आंखें फाड़े सुमित को देख रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि सुमित ने उसकी बात मानकर इतनी जल्दी फ्लैट बुक कर दिया। उसने सोचा कि सुमित मास्टर जी को वहां भेज देगा।
फोन रखने के बाद सुमित ने राधिका से कहा, “तुम और मायरा आराम से इस घर में रहो। कल से, बल्कि आज रात से ही, जब तक ताई का ऑपरेशन ठीक से नहीं हो जाता और वे पूरी तरह स्वस्थ होकर बनारस वापस नहीं लौट जाते, मैं भी उन्हीं के साथ उस सर्विस अपार्टमेंट में रहूंगा।”
राधिका बुरी तरह चौंक गई, “क्या बकवास कर रहे हो तुम? तुम क्यों उनके साथ जाओगे? तुम अपना घर छोड़कर उन.. उन बाहरी लोगों के साथ रहोगे?”
“बाहरी लोग? राधिका, जब मेरे पास सिर छिपाने को पक्की छत नहीं थी, तब इन्हीं बाहरी लोगों ने मुझे अपना घर दिया था। जब मेरे घर में अंधेरा था, तब इन्होंने मुझे अपने घर की रोशनी दी थी। यह बात मेरे एहसान की नहीं, मेरी जड़ों की है। मैं उन हाथों को अकेले कैसे छोड़ सकता हूँ, जिन्होंने मुझे तब संभाला था जब मैं कुछ नहीं था?” सुमित की आवाज में एक अजीब सी पीड़ा और भारीपन था।
तभी दरवाजे के बाहर एक हल्की सी आहट हुई। सुमित ने मुड़कर देखा तो मास्टर जी बेडरूम के दरवाजे पर खड़े थे। उनके हाथ में वह गीला गमछा था जिसे वे शायद समेटने आए थे। उनकी पुरानी, धुंधली आंखों में आंसू तैर रहे थे और उनके होठ हल्के-हल्के कांप रहे थे।
कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। राधिका ने भी नजरें झुका लीं। सुमित तेजी से आगे बढ़ा, “मास्टर जी… आप… आपने हमारी बातें सुन लीं?”
मास्टर जी ने अपने आंसुओं को रोकते हुए सुमित के सिर पर हाथ फेरा। उनके चेहरे पर एक असीम शांति और गर्व का भाव था।
“सुमित बेटा, मुझे आज तुम पर बहुत गर्व हो रहा है। शहर की इस चकाचौंध में भी तुमने अपनी मिट्टी की महक और अपने संस्कारों को मरने नहीं दिया। तुमने साबित कर दिया कि मेरा आशीर्वाद सही हाथों में गया है,” मास्टर जी की आवाज भर्राई हुई थी, लेकिन उसमें एक शिक्षक का रौब भी था। “पर बेटा, अगर हो सके तो हमें आज ही उस दूसरे मकान में छोड़ आओ।”
सुमित की आंखों से भी आंसू छलक पड़े, “मास्टर जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं…”
मास्टर जी ने सुमित को बीच में ही रोक दिया, “नहीं बेटा, तुम हमें हमारे हक और हमारे सम्मान से नहीं रोक सकते। हम उस मकान में जरूर जाएंगे, लेकिन एक शर्त पर। उस मकान का किराया हम खुद देंगे।”
सुमित ने हड़बड़ाते हुए कहा, “यह आप क्या कह रहे हैं मास्टर जी? ताई का इतना बड़ा ऑपरेशन है, उसमें बहुत खर्च होगा और मैं…”
मास्टर जी ने सुमित के कंधे को मजबूती से थाम लिया और एक ऐसी बात कही जो सुमित और राधिका दोनों के दिलों को चीर गई।
“बेटा सुमित, बुढ़ापे के लिए हमने सिर्फ इलाज के पैसे नहीं बचाए हैं… हमने उतना पैसा बचा कर रखा है, जिससे हम आखिरी सांस तक अपना स्वाभिमान बचा सकें। हमारी जरूरतें कम हैं, पर हमारा आत्मसम्मान बहुत बड़ा है। तुम बस हमें वहां छोड़ आओ।”
मास्टर जी की इन बातों के आगे सुमित के पास कोई शब्द नहीं बचे थे। राधिका, जिसे अपने महंगे सोफे और साफ बाथरूम का बहुत घमंड था, आज एक साधारण से बुजुर्ग के स्वाभिमान के आगे बहुत छोटी और बोनी महसूस कर रही थी। उसे अपनी सोच पर शर्म आ रही थी, लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका था। सुमित ने मास्टर जी का थैला उठाया और बिना राधिका की तरफ देखे, उन्हें लेकर उस घर से बाहर निकल गया। राधिका बस दरवाजे पर खड़ी उन जाते हुए कदमों को देखती रह गई, जो शायद अब कभी उस घर में लौट कर नहीं आने वाले थे।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या राधिका का व्यवहार सही था या सुमित ने जो फैसला लिया वह एक सच्चे बेटे और एक इंसान के रूप में सही था? क्या आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और दिखावे में हम अपने बुजुर्गों और उनके द्वारा किए गए त्याग को सच में भूलते जा रहे हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखक : विनय कुमार मिश्रा