एक बेटे का एहसास

रमाकांत जी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उन्हें लगा जैसे किसी ने उन्हें सरेआम नंगा कर दिया हो। उनका सिर झुक गया और आँखों से आंसू बहने लगे। “बेटा… वो… समाज की रस्में… हमारी इज्जत…” उनके मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे।

विक्रम आगे बढ़ा और उसने रमाकांत जी के दोनों हाथ पकड़ लिए। “पिताजी, इज्जत इन सोने की जंजीरों में नहीं होती। क्या अंजलि मेरी पत्नी नहीं है? क्या मैं इस घर का बेटा नहीं हूँ? आप मुझे दामाद मानकर आज भी एक बाहरी इंसान की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जिस पिता ने अपनी जिंदगी भर की कमाई, अपनी सबसे कीमती अमानत, अपनी बेटी मुझे सौंप दी, क्या उससे मुझे किसी और उपहार की उम्मीद करनी चाहिए?”

रमाकांत जी फफक-फफक कर रो पड़े। सुभद्रा भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थीं।

विक्रम ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और रमाकांत जी के हाथ में रख दिया। “मैं जाते ही सेठ हीरालाल के पास गया था। मैंने वो कंगन वापस छुड़वा लिए हैं और उनका पिछला कर्ज भी चुकता कर दिया है। यह कंगन माँ जी के हैं और इन्हीं के हाथों में अच्छे लगते हैं।”

शहर के एक पुराने और साधारण से मोहल्ले में मास्टर रमाकांत जी का छोटा सा घर था। रमाकांत जी एक सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक थे। जिंदगी भर ईमानदारी और उसूलों की चादर ओढ़कर उन्होंने अपने परिवार का पालन-पोषण किया था। उनकी पत्नी, सुभद्रा, एक बहुत ही समझदार और घरेलू महिला थीं। दोनों ने अपनी इकलौती बेटी, अंजलि, को बड़े लाड़-प्यार से पाला था। अंजलि पढ़ाई में होशियार थी और घर के कामों में भी निपुण थी। जब अंजलि शादी के लायक हुई, तो रमाकांत जी ने उसके लिए एक सुयोग्य वर की तलाश शुरू कर दी। काफी खोजबीन के बाद उनकी मुलाकात विक्रम और उसके परिवार से हुई। विक्रम एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था। परिवार बहुत सुलझा हुआ और आधुनिक विचारों वाला था। उन्होंने दहेज के नाम पर एक रुपये की भी मांग नहीं की थी।

शादी तय हो गई और रमाकांत जी ने अपनी हैसियत से बढ़कर शादी में खर्च किया। उनका मानना था कि ‘लड़की वाले’ होने के नाते समाज में उनकी नाक नीची नहीं होनी चाहिए। मेहमानों की खातिरदारी, महंगे टेंट, तरह-तरह के पकवान और विक्रम के परिवार के लिए महंगे उपहारों में रमाकांत जी की जिंदगी भर की जमा-पूंजी पल भर में खर्च हो गई। इतना ही नहीं, शादी की शानो-शौकत बनाए रखने के लिए उन्हें अपने एक दूर के रिश्तेदार और स्थानीय साहूकार से मोटा कर्ज भी लेना पड़ा था। शादी तो बहुत धूमधाम से निपट गई, और पूरे मोहल्ले में रमाकांत जी की वाहवाही भी हुई, लेकिन उस वाहवाही की कीमत उन्हें हर रात की नींद गंवाकर चुकानी पड़ रही थी।

शादी को तीन महीने बीत चुके थे। अब सावन का महीना आने वाला था और परंपरा के अनुसार, अंजलि और विक्रम को सावन के पहले सोमवार को रमाकांत जी के घर आना था। शादी के बाद दामाद का यह पहला आधिकारिक दौरा था। घर में खुशी का माहौल तो था, लेकिन रमाकांत जी के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंची हुई थीं।

रात का समय था। रमाकांत जी अपने कमरे में बैठे एक पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहे थे। चश्मे के पीछे से उनकी थकी हुई आँखें हिसाब-किताब मिलाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। सुभद्रा ने कमरे में प्रवेश किया और उनके पास बैठ गईं।

“क्या सोच रहे हैं आप? कल बच्चे आ रहे हैं और आपका चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है?” सुभद्रा ने चिंता भरे स्वर में पूछा।

रमाकांत जी ने एक गहरी सांस ली और डायरी बंद करते हुए बोले, “सुभद्रा, विक्रम पहली बार हमारे घर आ रहा है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार सब देखने आएंगे कि हमने दामाद की कैसी खातिरदारी की है। सावन का त्योहार है, उसे खाली हाथ कैसे विदा कर सकते हैं? एक अच्छी घड़ी, कुछ सोने की अंगूठी, और उसके परिवार के लिए महंगे कपड़े तो देने ही पड़ेंगे। पर… पर मेरे पास अब एक भी पैसा नहीं बचा है। बैंक खाते में सिर्फ घर खर्च लायक पैसे हैं।”

सुभद्रा का चेहरा भी उतर गया। वह जानती थीं कि शादी के कर्ज की ईएमआई भरते-भरते उनके पति की कमर टूट चुकी है। “तो फिर क्या करेंगे? क्या हम उन्हें ऐसे ही साधारण तरीके से विदा कर देंगे? समाज क्या कहेगा? विक्रम के माता-पिता क्या सोचेंगे कि कैसे भिखारियों के घर में अपनी बेटी ब्याह दी?” सुभद्रा के स्वर में घबराहट थी।

रमाकांत जी ने अपने पसीने से भीगे माथे को रुमाल से पोंछते हुए कहा, “नहीं, मैं अपनी अंजलि का सिर नीचा नहीं होने दूंगा। मैंने सोचा है कि कल सुबह सेठ हीरालाल के पास जाऊंगा। उनसे कुछ और पैसे उधार ले लूंगा। अगले साल जब मेरा प्रोविडेंट फंड मिलेगा, तो सारा कर्ज एक साथ चुका दूंगा।”

“लेकिन आप पहले ही उन पर काफी कर्जदार हैं। क्या वो बिना किसी गारंटी के और पैसे देंगे?”

रमाकांत जी ने नजरें झुका लीं और धीमी आवाज में बोले, “तुम्हारे वो आखिरी दो सोने के कंगन जो तुम्हारी माँ ने तुम्हें दिए थे… अगर तुम बुरा न मानो, तो क्या मैं उन्हें कुछ दिनों के लिए सेठ के पास गिरवी रख सकता हूँ?”

सुभद्रा की आँखों में आंसू आ गए, लेकिन एक माँ का दिल अपनी बेटी की झूठी शान के आगे मजबूर था। उसने बिना कुछ कहे अलमारी खोली और अपने वो कंगन रमाकांत जी के हाथों में रख दिए।

अगली सुबह, अंजलि और विक्रम घर आ गए। घर में फिर से रौनक लौट आई थी। अंजलि अपनी माँ के साथ रसोई में तरह-तरह के पकवान बनाने में लग गई, और विक्रम बाहर बैठक में मोहल्ले के लोगों से मिलने-जुलने लगा। दोपहर का भोजन बहुत ही आनंदमय रहा। विक्रम ने अपनी सादगी और मीठे व्यवहार से सबका दिल जीत लिया।

शाम होने को आई थी। विक्रम को रात की ट्रेन से वापस अपने शहर लौटना था। रमाकांत जी चुपके से घर के पिछले दरवाजे से निकले और सेठ हीरालाल की दुकान की तरफ चल दिए। उन्होंने कंगन गिरवी रखे और बदले में पचास हजार रुपये लेकर एक बड़े ज्वेलरी शोरूम में गए। वहां से उन्होंने विक्रम के लिए एक महंगी सोने की चेन और अंजलि की सास के लिए एक कीमती बनारसी साड़ी खरीदी।

जब रमाकांत जी हाथ में वो चमचमाते हुए पैकेट लेकर घर लौटे, तो उन्हें लगा जैसे उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी जंग जीत ली हो। उन्होंने राहत की सांस ली कि कम से कम अब समाज में उनकी इज्जत बची रहेगी।

रात को विदाई का समय आ गया। अंजलि की आँखें नम थीं। सुभद्रा ने आरती उतारी और विक्रम के माथे पर तिलक लगाया। तभी रमाकांत जी आगे आए। उनके हाथों में वो महंगे उपहारों वाले पैकेट थे। उन्होंने कांपते हाथों से वो पैकेट विक्रम की तरफ बढ़ाए।

“बेटा विक्रम, यह हमारा पहला सावन है तुम्हारे साथ। यह एक छोटा सा आशीर्वाद है हमारी तरफ से, इसे रख लो,” रमाकांत जी ने चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाते हुए कहा।

विक्रम ने उन पैकेटों को देखा और फिर रमाकांत जी की आँखों में झांका। उसने पैकेट लेने से विनम्रतापूर्वक इंकार करते हुए अपने हाथ पीछे कर लिए।

रमाकांत जी घबरा गए। “क्या हुआ बेटा? कोई कमी रह गई क्या? मैं जानता हूँ हमारी हैसियत बहुत बड़ी नहीं है, पर यह हमने बड़े प्यार से…”

“पिताजी, मुझे पता है यह आपने बड़े प्यार से लिया है, लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता,” विक्रम ने शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा।

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सुभद्रा और अंजलि भी हैरान रह गईं।

विक्रम ने आगे कहा, “पिताजी, आज दोपहर जब आप बाजार गए थे, तो मैं अंजलि के लिए कुछ फल लेने बाहर निकला था। मैंने आपको सेठ हीरालाल की दुकान से निकलते हुए देखा। मुझे शक हुआ तो मैंने वहां के एक दुकानदार से पूछा। मुझे पता चल गया कि आपने माँ जी के कंगन गिरवी रखकर ये पैसे जुटाए हैं।”

रमाकांत जी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उन्हें लगा जैसे किसी ने उन्हें सरेआम नंगा कर दिया हो। उनका सिर झुक गया और आँखों से आंसू बहने लगे। “बेटा… वो… समाज की रस्में… हमारी इज्जत…” उनके मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे।

विक्रम आगे बढ़ा और उसने रमाकांत जी के दोनों हाथ पकड़ लिए। “पिताजी, इज्जत इन सोने की जंजीरों में नहीं होती। क्या अंजलि मेरी पत्नी नहीं है? क्या मैं इस घर का बेटा नहीं हूँ? आप मुझे दामाद मानकर आज भी एक बाहरी इंसान की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जिस पिता ने अपनी जिंदगी भर की कमाई, अपनी सबसे कीमती अमानत, अपनी बेटी मुझे सौंप दी, क्या उससे मुझे किसी और उपहार की उम्मीद करनी चाहिए?”

रमाकांत जी फफक-फफक कर रो पड़े। सुभद्रा भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थीं।

विक्रम ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और रमाकांत जी के हाथ में रख दिया। “मैं जाते ही सेठ हीरालाल के पास गया था। मैंने वो कंगन वापस छुड़वा लिए हैं और उनका पिछला कर्ज भी चुकता कर दिया है। यह कंगन माँ जी के हैं और इन्हीं के हाथों में अच्छे लगते हैं।”

“लेकिन बेटा, यह तुम क्या कर रहे हो? हम तुम्हारे कर्जदार कैसे बन सकते हैं?” रमाकांत जी ने घबराते हुए कहा।

विक्रम मुस्कुराया और उसने रमाकांत जी को गले लगा लिया। “मैं आपका बेटा हूँ पिताजी, और बेटे कभी कर्ज नहीं देते, वो तो बस अपना फर्ज निभाते हैं। आपको समाज के दिखावे और इस झूठी शान के लिए खुद को तिल-तिल कर मारने की जरूरत नहीं है। हमारी असली खुशी आपकी खुशी और शांति में है। मुझे आपसे सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहिए, कोई सोने की चेन नहीं।”

उस दिन रमाकांत जी ने महसूस किया कि उन्होंने विक्रम के रूप में सिर्फ एक दामाद ही नहीं, बल्कि एक सच्चा बेटा पा लिया है। उनकी बरसों की थकान और चिंता आंसुओं के जरिए बह गई। उन्होंने विक्रम को सीने से लगा लिया और मन ही मन तय कर लिया कि अब वो कभी भी इस समाज के खोखले दिखावे की खातिर अपनी रातों की नींद और अपना आत्मसम्मान दांव पर नहीं लगाएंगे। विक्रम और अंजलि जब विदा हुए, तो रमाकांत जी के हाथ खाली थे, लेकिन उनका मन दुनिया की सबसे अनमोल दौलत से भरा हुआ था—एक सच्चे रिश्ते की गर्माहट से।

प्रिय पाठकों,

क्या हमारे समाज में शादी-ब्याह और त्योहारों के नाम पर होने वाला यह दिखावा सही है? कितने ही पिता समाज की झूठी शान के लिए जीवन भर कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। अगर आप विक्रम की जगह होते, तो क्या करते? क्या दामाद को भी बेटे की तरह परिवार की परेशानियों को अपना नहीं समझना चाहिए? अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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 मूल लेखक : विनय कुमार मिश्रा

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