शाम का समय था।रिया और रोहित ने जैसे ही घर में प्रवेश किया,सुषमा की आँखों में चमक आ गई।आज उनकी शादी की पहली सालगिरह थी।दोनों ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर सुषमा के चरण स्पर्श किए।सुषमा ने दोनों को गले से लगा लिया और स्नेह से कहा,
“बहुत खुश रहो बच्चों,हमेशा एक-दूसरे का हाथ थामे रखना और हर परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ देना।”
रिया और रोहित ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर लगभग एक साथ बोल पड़े,
“माँ,आज हम सचमुच बहुत खुश हैं और इसके लिए हम दोनों आपके आभारी हैं। अगर उस दिन आपने हमें समझाया न होता,तो शायद आज हम इस तरह साथ न होते।” सुषमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई,लेकिन उसकी आँखों के सामने एक वर्ष पुरानी घटना चलचित्र की तरह घूम गई।
रिया और रोहित की सगाई को छह महीने हो चुके थे।दोनों की पसंद से ही रिश्ता तय हुआ था।इस दौरान वो कई बार मिले,एक-दूसरे को समझने की कोशिश की और भविष्य के अनेक सपने भी देखे।दोनों परिवारों में भी खुशी का माहौल था।शादी की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थीं। निमंत्रण-पत्र बँट चुके थे और घर में हर ओर विवाह की चहल-पहल थी।
लेकिन शादी से सात दिन पहले एक शाम दोनों ने अपने-अपने घरवालों के सामने एक ऐसा निर्णय रख दिया,जिसने सबको स्तब्ध कर दिया।रोहित ने गंभीर स्वर में कहा,
“माँ-पापा,हम दोनों ने बहुत सोच-समझकर फैसला किया है कि हम यह शादी नहीं कर सकते।” रिया ने उसकी बात आगे बढ़ाते हुए कहा,
“हमारे विचार बहुत अलग हैं। छोटी-छोटी बातों पर हमारी राय नहीं मिलती। हमें लगता है कि हम जीवनभर एक-दूसरे के साथ खुश नहीं रह पाएँगे।”
यह सुनकर दोनों परिवारों पर जैसे वज्रपात हो गया।शादी की तैयारियों और रिश्तेदारों की बातों से अधिक चिंता उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की थी।आखिर कुछ ही दिनों में ऐसा क्या हो गया कि साथ जीवन बिताने का सपना देखने वाले दो लोग अचानक अलग होने का फैसला कर बैठे?
सुषमा कुछ देर तक चुप रही।फिर उसने रिया और रोहित को अगले दिन अकेले अपने पास आने को कहा।
दोनों आए तो उनके चेहरों पर असमंजस और तनाव साफ दिखाई दे रहा था।सुषमा ने उन्हें अपने पास बैठाया और बहुत शांत स्वर में कहा,
“बच्चों,क्या तुम सचमुच इसलिए अलग होना चाहते हो कि तुम्हारे विचार अलग हैं?”
दोनों ने हाँ में सिर हिला दिया।
सुषमा मुस्कुराईं और बोलीं,
“तो क्या तुम्हें लगता है कि इस दुनिया में कोई दो व्यक्ति बिल्कुल एक जैसे विचार रखते होंगे? तुम्हारे पापा और मैं भी स्वभाव और सोच में एक जैसे नहीं हैं। कभी-कभी हमारी राय आज भी अलग होती है। तुम्हारे नाना-नानी भी अलग-अलग विचारों के हैं,फिर भी वर्षों से एक-दूसरे का साथ निभा रहे हैं।”
वो कुछ क्षण रुकी और फिर बोली,
“घर में भी क्या हमेशा तुम्हारी हर बात मुझसे,तुम्हारे पापा से या भाई-बहनों से मिलती है? नहीं ना! फिर भी हम साथ रहते हैं,क्योंकि हर रिश्ते में केवल अपनी बात मनवाना जरूरी नहीं होता,दूसरे की बात को समझना और उसका सम्मान करना भी जरूरी होता है।”
दोनों चुपचाप सुषमा की बातें सुनते रहे।
सुषमा ने रोहित की ओर देखते हुए कहा,
“अभी तुम दोनों रिश्ते को ‘मैं’ बनकर देख रहे हो..मेरी पसंद,मेरी सोच,मेरी आदत,मेरी इच्छा।लेकिन शादी के बाद जीवन ‘मैं’ से नहीं, ‘ ‘ हम ‘ से चलता है। जिस दिन तुम्हारी सोच में ‘मैं ‘ की जगह ‘हम’ आ जाएगा,बहुत-सी उलझनें अपने आप छोटी लगने लगेंगी।”
फिर सुषमा ने पास रखे गमले की ओर इशारा किया। उसमें एक छोटा-सा पौधा लगा था।
“देखो,शादी भी इस पौधे की तरह होती है।दो अलग-अलग घरों में पले-बढ़े,अलग संस्कारों और आदतों वाले दो लोग जब एक साथ जीवन शुरू करते हैं,तो उनका रिश्ता भी एक नन्हे पौधे जैसा होता है। उसे प्यार का पानी, विश्वास की धूप और समझदारी की देखभाल चाहिए।और हाँ,उसे कभी-कभी समझौते की खाद भी देनी पड़ती है। समझौता हारना नहीं होता बच्चों,बल्कि रिश्ते को बचाने और उसे खूबसूरत बनाने की समझदारी होती है।अगर हर बार दोनों यही सोचें कि केवल मेरी बात सही है, तो रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता।”
रिया की आँखें नम हो गईं।उसने धीरे से कहा,
“लेकिन माँ,अगर हर बार एक ही व्यक्ति को झुकना पड़े तो?” सुषमा ने तुरंत उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा,
“तब वह समझौता नहीं,अन्याय होता है बेटा।सच्चे रिश्ते में केवल एक व्यक्ति नहीं झुकता,दोनों थोड़ा-थोड़ा झुकते हैं।दोनों अपनी कुछ आदतें बदलते हैं,दोनों एक-दूसरे की कमियों को स्वीकारते हैं और दोनों ही रिश्ते को बचाने की कोशिश करते हैं।”
रिया और रोहित एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
“मतभेद होना बुरा नहीं है,मनभेद होना बुरा है।विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन दिलों में दूरी नहीं आनी चाहिए। एक-दूसरे को बदलने की कोशिश करने के बजाय पहले समझने की कोशिश करो।”सुषमा ने प्यार से समझाते हुए कहा।
उस दिन रोहित और रिया बहुत देर तक बातें करते रहे।उन्होंने महसूस किया कि जिन छोटी-छोटी बातों को वे अपने रिश्ते की सबसे बड़ी कमजोरी समझ रहे थे,शायद वे एक-दूसरे को समझने का अवसर भी बन सकती थीं।कुछ देर बाद रोहित ने रिया की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा,
“शायद हम दोनों बहुत जल्दी हार मान रहे थे।”
रिया की आँखों में हल्की मुस्कान तैर गई।उसने रोहित का हाथ थाम लिया।
तय समय पर रिया और रोहित की शादी हुई।शुरुआत में मतभेद फिर भी हुए।कभी रोहित को अपनी बात बदलनी पड़ी, तो कभी रिया को। कभी एक ने चुप रहकर दूसरे को समझा,तो कभी दूसरे ने पहल करके बात संभाल ली।धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा,कि खुशहाल जीवन का अर्थ मतभेदों का न होना नहीं,बल्कि मतभेदों के बावजूद साथ बने रहना है।
आज,शादी के एक वर्ष बाद,दोनों सुषमा के सामने खड़े थे…पहले से कहीं अधिक समझदार और एक-दूसरे के करीब।
रिया और रोहित ने सुषमा का हाथ पकड़ते हुए कहा,
“माँ,अब समझ में आता है कि उस दिन आपने हमें अलग होने से नहीं रोका था,आपने हमें साथ निभाना सिखाया था।आपने हमें बताया, कि रिश्ते अपनी शर्तों पर नहीं,एक-दूसरे की भावनाओं को समझकर निभाए जाते हैं।”
सुषमा जी ने दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बस यही याद रखना बच्चों,जीवन में हर बार जीतना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी थोड़ा-सा झुक जाना ही रिश्ते को टूटने से बचा लेता है।”
दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।
रिया और रोहित को साथ देखकर सुषमा मन ही मन सोचने लगी..रिश्तों में समझौता किसी की हार नहीं होता,बल्कि दो दिलों की वह जीत होता है,जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ मिलकर हमेशा के लिए ‘हम’ बन जाते हैं।
कमलेश आहूजा
#”समझौता ”