रिश्तों की संजीवनी

 सावित्री देवी खुलकर हंस पड़ीं। यह वही हँसी थी जिसे सुनने के लिए समीर और शिखा के कान तरस गए थे। आज उन्हें डॉ. भार्गव की बात का असली मतलब समझ में आ गया था। उन्होंने जान लिया था कि बुज़ुर्गों को सिर्फ आराम, दवा या नौकरों की जरूरत नहीं होती। उन्हें जरूरत होती है इस अहसास की कि वे आज भी परिवार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

उन्हें ज़िम्मेदारी से मुक्त करना उनका सम्मान नहीं, बल्कि उन्हें उनके अधिकार से वंचित करना है। प्यार और अपनापन सिर्फ देखभाल करने में नहीं है, बल्कि उन्हें यह महसूस कराने में है कि उनके बिना हमारा घर और हमारी ज़िंदगी, दोनों अधूरे हैं।

शहर के सबसे पॉश इलाके में बने अपने शानदार बंगले की बालकनी में बैठीं सावित्री देवी की निगाहें दूर आसमान में किसी शून्य को तलाश रही थीं। उनके चेहरे पर एक ऐसी खामोशी छा गई थी, जिसे देखकर लगता था जैसे उनके भीतर का जीवन कहीं बहुत गहरे जम सा गया है।

उनके पास हर वो सुख-सुविधा मौजूद थी, जिसकी कोई भी कल्पना कर सकता है। समय पर दवा देने के लिए एक प्रशिक्षित नर्स, खाना बनाने के लिए रसोइया और घर के अन्य कामों के लिए नौकर। उनका बेटा समीर एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और बहू शिखा भी एक कॉलेज में प्रोफेसर थी।

दोनों अपने-अपने कामों में बेहद व्यस्त रहते थे, लेकिन उन्होंने अपनी माँ की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद, पिछले कुछ महीनों से सावित्री देवी ने बोलना-चालना लगभग बंद कर दिया था।

समीर जब भी शाम को ऑफिस से लौटता, अपनी माँ के पास कुछ देर जरूर बैठता। वह उनसे दुनिया भर की बातें करता, उन्हें हंसाने की कोशिश करता, लेकिन सावित्री देवी बस हल्की सी एक सूखी मुस्कान दे देतीं और फिर से उसी शून्यता में खो जातीं। उनकी भूख लगभग खत्म हो चुकी थी।

जो सावित्री देवी कभी पूरे घर की धुरी हुआ करती थीं, जिनके हाथ के बने खाने की खुशबू से पूरा घर महकता रहता था, आज वे रसोइये के हाथ का बना पौष्टिक सूप भी दो घूंट से ज्यादा नहीं पी पाती थीं। उनका शरीर दिन-ब-दिन सूखता जा रहा था।

समीर और शिखा इस बात को लेकर बेहद चिंतित थे। उन्होंने शहर के सबसे बड़े डॉक्टरों को दिखाया, अनगिनत टेस्ट करवाए, लेकिन हर रिपोर्ट नॉर्मल आती। शारीरिक रूप से उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं थी, फिर भी वे भीतर ही भीतर किसी अदृश्य दीमक का शिकार हो रही थीं।

एक रविवार की सुबह, समीर बहुत परेशान होकर हॉल में बैठा था। शिखा उसके पास आई और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, “समीर, माँ की यह हालत अब मुझसे और नहीं देखी जाती। आज सुबह भी उन्होंने नाश्ते को हाथ तक नहीं लगाया। कल रात भी वे ठीक से नहीं सोईं।

मुझे तो डर लग रहा है कि कहीं वे पूरी तरह से डिप्रेशन में न चली जाएं। हमने उनके लिए सब कुछ किया, लेकिन न जाने हमसे कहाँ चूक हो रही है।” समीर ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपनी आँखें मलते हुए कहा, “मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा शिखा। पिताजी के जाने के बाद माँ ने खुद को कैसे भी करके संभाल लिया था।

वे घर के कामों में व्यस्त रहती थीं, तुम दोनों मिलकर रसोई संभालती थीं, लेकिन जब से मैंने उन्हें आराम देने के लिए ये सारे नौकर चाकर रखे हैं और उन्हें हर काम से मुक्त किया है, वे जैसे मुरझा सी गई हैं। मैं आज ही डॉ. भार्गव को घर बुलाता हूँ। वे सिर्फ एक डॉक्टर नहीं हैं, बल्कि पिताजी के बहुत पुराने और करीबी दोस्त भी हैं। शायद वे माँ की इस हालत का कोई कारण समझ सकें।”

डॉ. भार्गव दोपहर के समय उनके घर पहुंचे। वे बहुत ही अनुभवी और सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने सावित्री देवी के कमरे में जाकर करीब आधा घंटा उनके साथ बिताया। उन्होंने उनका ब्लड प्रेशर चेक किया, कुछ पुरानी बातें कीं और फिर बाहर आ गए। समीर और शिखा बड़ी उम्मीद से उनकी तरफ देख रहे थे।

डॉ. भार्गव ने सोफे पर बैठते हुए चश्मा उतारा और बहुत ही गंभीर स्वर में बोले, “समीर बेटा, तुम्हारी माँ को कोई शारीरिक बीमारी नहीं है। उनके शरीर को किसी दवा की जरूरत नहीं है, बल्कि उनकी आत्मा को एक सहारे की जरूरत है। और वो सहारा कोई लकड़ी की बैसाखी या कोई नर्स नहीं है।”

समीर ने उलझन भरे स्वर में पूछा, “मैं कुछ समझा नहीं अंकल। हमने तो माँ की हर जरूरत का ख्याल रखा है। उन्हें कोई तकलीफ नहीं है।”

डॉ. भार्गव मुस्कुराए और बोले, “यही तो समस्या है बेटा! तुमने उनकी हर तकलीफ तो दूर कर दी, लेकिन अनजाने में तुमने उनसे उनका ‘वजूद’ भी छीन लिया। याद करो वो समय, जब तुम्हारे पिताजी जीवित थे। तुम्हारी माँ सुबह पाँच बजे उठ जाती थीं। पूरे घर का नाश्ता बनाना, तुम्हारे पिताजी के कपड़े निकालना, तुम्हारे लिए टिफिन तैयार करना। उस समय उन्हें लगता था कि यह घर उनके बिना एक दिन भी नहीं चल सकता। वे इस घर की मालकिन थीं, एक बहुत ही महत्वपूर्ण इंसान। लेकिन आज? आज उनके पास करने के लिए क्या है? सुबह नर्स उन्हें उठाती है, नौकर उन्हें चाय देता है, रसोइया खाना बनाता है। तुमने उन्हें पूरी तरह से आराम दे दिया है, लेकिन बुज़ुर्गों के लिए यह ‘आराम’ एक बहुत बड़ी सज़ा बन जाता है। उन्हें लगने लगता है कि अब वे किसी काम के नहीं रहे, परिवार को अब उनकी कोई जरूरत नहीं है। यही ‘अनावश्यक’ होने का अहसास तुम्हारी माँ को अंदर ही अंदर खा रहा है। इंसान तब तक जिंदा रहता है, जब तक उसे लगता है कि किसी को उसकी जरूरत है। तुमने उनका शरीर तो बचा लिया, लेकिन उनका आत्मविश्वास मार दिया।”

डॉ. भार्गव की बातें सुनकर समीर और शिखा सन्न रह गए। उन्हें अहसास हुआ कि अपनी तरफ से सुविधा देने के चक्कर में उन्होंने अपनी माँ को एक मेहमान बनाकर रख दिया था। डॉ. भार्गव उठते हुए बोले, “बाकी तुम दोनों बहुत समझदार और पढ़े-लिखे बच्चे हो। मैं कोई दवा नहीं लिख रहा हूँ। तुम्हें खुद ही अपनी माँ की इस बीमारी का इलाज खोजना होगा। उन्हें वो अहसास वापस लौटाओ कि वे आज भी इस घर के लिए उतनी ही जरूरी हैं, जितनी पहले थीं।”

डॉक्टर के जाने के बाद दोनों पति-पत्नी गहरी सोच में डूब गए। शिखा ने कुछ देर बाद समीर की आँखों में देखते हुए कहा, “समीर, मुझे लगता है कि मुझे पता है हमें क्या करना है। आप बस कल सुबह का इंतजार कीजिए।”

अगली सुबह, जब सावित्री देवी अपनी बालकनी में बैठी अपनी उसी पुरानी उदासी में डूबी हुई थीं, अचानक उनके कमरे का दरवाजा जोर से खुला। शिखा लगभग भागते हुए अंदर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे, माथे पर पसीना था और चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट और गुस्सा था।

“माँ जी! यह महाराज (रसोइया) भी न, पता नहीं खुद को क्या समझता है! आज मेरे कॉलेज के डीन और कुछ बहुत खास मेहमान लंच पर आने वाले हैं। मैंने उसे कल ही बता दिया था कि बहुत बढ़िया शाही पनीर, दाल मखनी और पुलाव बनाना है। और अभी-अभी उसका फोन आया है कि वह गाँव जा रहा है, उसकी पत्नी बीमार है। अब मैं क्या करूँ? मुझे तो वो पुराने पारंपरिक मसाले वाले खाने बनाने आते भी नहीं हैं। बाहर का खाना डीन सर खाते नहीं हैं। मेरी तो कॉलेज में नाक कट जाएगी माँ जी! समीर भी बहुत गुस्सा कर रहे हैं मुझ पर।” शिखा ने लगभग रोने वाले स्वर में कहा।

सावित्री देवी ने शिखा को इस तरह परेशान देखा, तो उनकी आँखों की वो शून्यता अचानक से गायब हो गई। जो माँ महीनों से चुपचाप बैठी रहती थी, उसके अंदर की वो पुरानी और अनुभवी गृहिणी अचानक जाग उठी। उन्होंने तुरंत शिखा का हाथ पकड़ा और दृढ़ता से बोलीं, “अरे पगली! इसमें इतना घबराने की क्या बात है? तू रोना बंद कर। मेहमान कितने बजे आने वाले हैं?”

“माँ जी, दोपहर एक बजे तक आ जाएंगे। अब तो सिर्फ तीन घंटे बचे हैं।” शिखा ने अपनी घबराहट का नाटक जारी रखते हुए कहा।

“बहुत समय है। तू चल मेरे साथ रसोई में। मैं बताती हूँ कि क्या और कैसे करना है। मेरी बहू की नाक कोई ऐसे ही थोड़ी काट सकता है।” यह कहते हुए सावित्री देवी अपने बिस्तर से उठीं। उनकी चाल में महीनों बाद एक अजीब सी फुर्ती आ गई थी।

रसोई में पहुँचते ही सावित्री देवी ने कमान अपने हाथों में ले ली। “शिखा, तू जल्दी से प्याज और टमाटर काट। मैं तब तक खड़े मसाले निकालती हूँ। वो नीचे वाले डिब्बे में तेजपत्ता और बड़ी इलायची रखी है, वो निकाल कर दे।” उनकी आवाज़ में एक अधिकार था, एक ऐसा रुतबा था जो पिछले कई महीनों से कहीं खो गया था। शिखा उनके हर निर्देश का पालन कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों के कोरों में खुशी के आँसू थे। उसने छुपकर हॉल में खड़े समीर की तरफ देखा। समीर भी दरवाजे की ओट से अपनी माँ को वापस अपने उसी पुराने और ऊर्जावान रूप में देखकर भावुक हो रहा था।

रसोई में छौंक की खुशबू फैलने लगी थी। सावित्री देवी खुद अपने हाथों से कड़छी चला रही थीं। “अरे शिखा, शाही पनीर में थोड़ा सा काजू का पेस्ट भी डालना पड़ता है, तभी तो ग्रेवी में वो बात आती है जो बाहर के खाने में नहीं होती। जा, जल्दी से मिक्सी में काजू पीस ला।” वे लगातार काम कर रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर थकान की एक लकीर तक नहीं थी। बल्कि, उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक आ गई थी जैसे किसी मुरझाए हुए पौधे को अचानक से पानी मिल गया हो।

ठीक एक बजे तक शानदार खाना बनकर तैयार हो गया। डाइनिंग टेबल पर जब तरह-तरह के पकवान सजे, तो घर खुशबू से महक उठा। (हालाँकि मेहमानों के आने वाली बात सिर्फ एक नाटक थी, समीर ने अपने कुछ दोस्तों को ही मेहमान बनाकर बुला लिया था ताकि माँ को शक न हो)। खाना खाने के बाद सभी ने सावित्री देवी के हाथों के बने खाने की जमकर तारीफ की।

शाम को जब मेहमान चले गए, तो सावित्री देवी सोफे पर आराम से बैठी थीं। उनके चेहरे पर एक सुकून और आत्मसंतुष्टि का भाव था। समीर उनके पास आया और बोला, “माँ, आज अगर आप नहीं होतीं तो शिखा की तो आज बहुत बेइज्जती हो जाती। आपके हाथ के खाने का जादू आज भी कम नहीं हुआ है। सच कहूँ तो माँ, हम आपके बिना कुछ नहीं कर सकते।”

सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए समीर के सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “अरे पागल, मैं हूँ न। जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, तुम बच्चों को किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है। कल से उस महाराज रसोइये को बोल देना कि सब्जियां काटने में भले ही मदद कर दे, लेकिन छौंक मैं ही लगाऊंगी।”

शिखा भी वहां आ गई और उसने माँ के गले लगकर कहा, “जी माँ जी, मुझे तो आपके हाथ का ही खाना खाना है।”

सावित्री देवी खुलकर हंस पड़ीं। यह वही हँसी थी जिसे सुनने के लिए समीर और शिखा के कान तरस गए थे। आज उन्हें डॉ. भार्गव की बात का असली मतलब समझ में आ गया था। उन्होंने जान लिया था कि बुज़ुर्गों को सिर्फ आराम, दवा या नौकरों की जरूरत नहीं होती। उन्हें जरूरत होती है इस अहसास की कि वे आज भी परिवार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्हें ज़िम्मेदारी से मुक्त करना उनका सम्मान नहीं, बल्कि उन्हें उनके अधिकार से वंचित करना है। प्यार और अपनापन सिर्फ देखभाल करने में नहीं है, बल्कि उन्हें यह महसूस कराने में है कि उनके बिना हमारा घर और हमारी ज़िंदगी, दोनों अधूरे हैं।

उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह से बदल गया। सावित्री देवी अब सुबह जल्दी उठतीं, पूजा पाठ करतीं और रसोई में शिखा का मार्गदर्शन करतीं। उनका डिप्रेशन, उनकी बीमारी और उनका अकेलापन, सब कुछ जैसे छूमंतर हो गया था। अब वे सिर्फ एक बुज़ुर्ग महिला नहीं थीं, बल्कि उस घर की वही मजबूत नींव थीं, जिस पर पूरे परिवार की खुशियों की इमारत खड़ी थी।

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 लेखिका : सपना त्यागी (मऊ )

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