सुहासिनी देवी ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर स्वर में बोलीं, “राधिका, तुम्हें याद है सुबह तुमने शांति के साथ कैसा बर्ताव किया था? तुमने कहा था ना कि वह एक नौकरानी है, अनपढ़ है, उसे कोई तमीज नहीं है। उसने तुम्हारे बिखरे कमरे को समेटने की ही तो कोशिश की थी, तुम्हारी मदद ही करना चाहती थी, लेकिन तुमने कितने गंदे तरीके से उसे जलील करके कमरे से बाहर निकाल दिया था।”
सुहासिनी जी एक बेहद शांत, समझदार और सुलझी हुई महिला थीं। उनके घर में पिछले पांच सालों से शांति नाम की एक महिला काम कर रही थी। शांति उम्र में सुहासिनी जी की बहू राधिका से बड़ी थी और घर के हर काम—झाड़ू-पोछा, बर्तन से लेकर कपड़े धोने तक—में निपुण थी।
एक दिन सुबह-सुबह राधिका बहुत तनाव में थी। उसे ऑफिस में कोई बहुत जरूरी प्रेजेंटेशन देनी थी और रात भर जागने के कारण उसका सिर फटा जा रहा था। उसका कमरा पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था। कपड़े बिस्तर पर बिखरे थे, फाइलें सोफे पर पड़ी थीं और लैपटॉप की तारें फर्श पर उलझी हुई थीं। शांति अपने रोजमर्रा के काम के अनुसार राधिका के कमरे में सफाई करने आई। उसने सोचा कि राधिका के नहाने जाने तक वह जल्दी से कमरा समेट दे ताकि उसे कोई परेशानी न हो।
शांति ने जैसे ही सोफे से फाइलें उठाकर टेबल पर रखनी चाहीं, राधिका बाथरूम से बाहर आ गई। अपनी फाइलों को शांति के हाथ में देखकर राधिका का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे जरूरी कागजातों को हाथ लगाने की?” राधिका ने जोर से चिल्लाते हुए कहा।
शांति सकपका गई। “मेमसाब, मैं तो बस कमरा साफ कर रही थी। बहुत बिखरा हुआ था, सोचा समेट दूँ।”
“तुम्हें किसने कहा मेरे काम में दखल देने को? तुम एक अनपढ़ नौकरानी हो, तुम्हें क्या पता इन कागजातों की अहमियत! अगर एक भी पन्ना इधर-उधर हो गया तो तुम्हारा पूरा जीवन लग जाएगा इसकी भरपाई करने में। चुपचाप अपना झाड़ू-पोछा करो और निकलो यहाँ से। मुझे बिल्कुल पसंद नहीं कि कोई मेरे कमरे में इस तरह की हरकत करे।” राधिका ने शांति को लगभग धक्के देते हुए कमरे से बाहर कर दिया।
शांति की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन वह बिना कुछ कहे अपने काम में लग गई। सुहासिनी देवी ने बाहर दालान से यह सब देखा और सुना, लेकिन उस समय वे चुप रहीं। उन्हें पता था कि गुस्से में राधिका को समझाना दीवार से सिर टकराने जैसा है।
दिन बीत गया। राधिका ऑफिस से जब लौटी, तो उसकी हालत बहुत खराब थी। प्रेजेंटेशन तो अच्छी हो गई थी, लेकिन लगातार कंप्यूटर के सामने बैठने और तनाव के कारण उसे सर्वाइकल का भयंकर दर्द उठ गया था। उसकी गर्दन और कंधे इस कदर अकड़ गए थे कि उसका रो-रोकर बुरा हाल था। वह सीधे आकर अपने बिस्तर पर गिर पड़ी और दर्द से कराहने लगी।
सुहासिनी देवी जल्दी से उसके लिए गर्म पानी और दर्द निवारक दवा लेकर आईं, लेकिन दर्द इतना तेज था कि दवा का असर होने में समय लग रहा था। तभी शांति, जो रसोई में बर्तन साफ कर रही थी, राधिका के कराहने की आवाज सुनकर दौड़ी आई। राधिका की हालत देखकर शांति से रहा नहीं गया। वह तुरंत रसोई में गई, थोड़ा सा सरसों का तेल कटोरी में लिया, उसमें अजवाइन और लहसुन डालकर उसे गर्म किया।
शांति गर्म तेल की कटोरी लेकर राधिका के कमरे में आई। उसने सुहासिनी देवी से कहा, “माँ जी, आप रहने दीजिए। मेमसाब की नस चढ़ गई है, मैं अभी मालिश कर देती हूँ, आराम मिल जाएगा।”
राधिका दर्द के मारे कुछ भी बोलने या विरोध करने की स्थिति में नहीं थी। शांति ने अपने खुरदुरे लेकिन अनुभवी हाथों से राधिका की गर्दन, कंधों और पीठ की धीरे-धीरे मालिश करनी शुरू की। उसके हाथों के स्पर्श में एक अजीब सी गर्माहट और वात्सल्य था। शुरुआत में राधिका को थोड़ा दर्द हुआ, लेकिन जैसे-जैसे शांति के हाथ चल रहे थे, राधिका की अकड़ी हुई नसें ढीली पड़ने लगीं। वह दर्द जो उसे पागल कर रहा था, धीरे-धीरे छूमंतर होने लगा। लगभग आधे घंटे की लगातार मालिश के बाद राधिका को इतना सुकून मिला कि उसकी आँख लग गई।
रात को जब राधिका की नींद खुली, तो उसका दर्द लगभग खत्म हो चुका था। वह उठकर बाहर हॉल में आई। सुहासिनी देवी वहीं सोफे पर बैठकर कोई किताब पढ़ रही थीं।
“अब कैसा है तुम्हारा दर्द राधिका?” सुहासिनी देवी ने चश्मा उतारते हुए पूछा।
“अब बहुत आराम है मम्मी जी। सच में, उस मालिश ने तो जादू सा कर दिया।” राधिका ने सुकून भरी सांस लेते हुए कहा।
सुहासिनी देवी ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर स्वर में बोलीं, “राधिका, तुम्हें याद है सुबह तुमने शांति के साथ कैसा बर्ताव किया था? तुमने कहा था ना कि वह एक नौकरानी है, अनपढ़ है, उसे कोई तमीज नहीं है। उसने तुम्हारे बिखरे कमरे को समेटने की ही तो कोशिश की थी, तुम्हारी मदद ही करना चाहती थी, लेकिन तुमने कितने गंदे तरीके से उसे जलील करके कमरे से बाहर निकाल दिया था।”
राधिका चुपचाप अपनी सासू माँ की बात सुन रही थी।
सुहासिनी देवी ने आगे कहा, “तुमने उसका इतना तिरस्कार किया, लेकिन फिर भी आज जब तुम दर्द से तड़प रही थी, तो वही शांति अपना काम छोड़कर तुम्हारे दर्द को कम करने के लिए दौड़ी चली आई। आज उसके उन खुरदुरे और गंदे हाथों के छुअन से तुम्हें बुरा नहीं लगा? आज तुम्हें उसका अनपढ़ होना याद नहीं आया? बल्कि आज तुम्हें उसके उसी स्पर्श से आराम महसूस हुआ, इसलिए तुम चुपचाप मालिश करवाती रहीं।”
सुहासिनी जी के इन शब्दों ने राधिका के भीतर तक वार किया। उसे अपनी सुबह की हरकत पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि उसकी आँखें भर आईं। उसे एहसास हुआ कि उसका रुतबा, उसकी पढ़ाई-लिखाई और उसकी बड़ी नौकरी उसे एक अच्छा इंसान नहीं बना पाई, जबकि एक साधारण सी कामवाली बाई ने इंसानियत का सबसे बड़ा सबक उसे सिखा दिया था।
राधिका ने अपनी नजरें झुका लीं और रुंधे हुए गले से बोली, “आप बिल्कुल सही कह रही हैं मम्मी जी। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अपने तनाव और अहंकार में यह भूल गई थी कि जो हमारे घर को संभालते हैं, वे भी इंसान हैं और उनकी भी इज्जत होती है। जब वह हमारे दर्द को अपना समझकर हमारी तकलीफ दूर कर सकती है, तो मेरा भी यह फर्ज बनता है कि मैं उसके साथ सम्मान और प्यार से पेश आऊँ। मैं कल सुबह ही शांति से माफी माँगूंगी और अब से कभी उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं करूँगी।”
राधिका की बातों में एक सच्चा पश्चाताप और शर्मिंदगी साफ झलक रही थी। सुहासिनी देवी के चेहरे पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान आ गई।
तभी रसोई के दरवाजे के पास खड़ी शांति, जो रात का काम खत्म करके घर जाने की तैयारी कर रही थी, यह सब सुन रही थी। राधिका के मुँह से अपने लिए सम्मान के ये शब्द सुनकर शांति का हृदय गदगद हो गया। उसकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसे लगा जैसे आज उसे उसकी बरसों की मेहनत का सबसे बड़ा ईनाम मिल गया हो। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछे और चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान लिए अपने घर की ओर निकल पड़ी। आज वह सिर्फ एक नौकरानी नहीं, बल्कि इस घर के परिवार का एक अहम हिस्सा महसूस कर रही थी।
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