शादी के बाद सिद्धार्थ ने अपनी ज़िम्मेदारियाँ तो पूरी कीं, लेकिन वह अपना दिल अनुराधा को कभी नहीं दे पाया। उसने अनुराधा के साथ एक समझौता सा कर लिया था। उसे लगता था कि वह काव्या के सपनों को अनुराधा पर थोप कर अपनी कसक मिटा रहा है। काव्या का सपना था कि उसका पति उसे रोज शाम को अपने हाथों से बनी चाय पिलाए, वो भी नीले कप में। और सिद्धार्थ, पिछले पच्चीस सालों से यही करता आ रहा था। वह अनुराधा में काव्या को जीने की कोशिश कर रहा था।
शाम के ठीक छः बज चुके थे। बाहर हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सोंधी महक हवा में तैर रही थी। सिद्धार्थ अपने हाथ में एक पुरानी नीली सिरेमिक की प्याली लिए बालकनी में खड़ा था। प्याली से उठती इलायची की तेज़ महक बारिश की बूंदों के साथ मिलकर एक अजीब सा जादू पैदा कर रही थी। पच्चीस साल… पूरे पच्चीस साल हो गए थे इस सिलसिले को। रोज शाम छः बजे, सिद्धार्थ खुद अपने हाथों से इलायची वाली चाय बनाता और इस नीली प्याली में डालकर अपनी पत्नी, अनुराधा को देता।
अनुराधा, जो घर के कामों से अभी-अभी फुरसत पाकर सोफे पर बैठी ही थी, ने सिद्धार्थ को बालकनी से आते देखा। उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित, शांत और सौम्य मुस्कान थी। उसने अपने आंचल से माथे का पसीना पोंछा और सिद्धार्थ के हाथों से वह नीली प्याली ले ली।
“आज बारिश बहुत अच्छी हो रही है, है ना?” अनुराधा ने चाय का एक छोटा सा घूंट लेते हुए कहा।
सिद्धार्थ खामोश रहा। उसने बस हामी में सिर हिलाया और सामने कुर्सी पर बैठ गया। अनुराधा की आँखें चाय की प्याली पर थीं और सिद्धार्थ की आँखें अनुराधा पर। पच्चीस सालों के इस लंबे सफर में अनुराधा के बालों में चाँदी के तार चमकने लगे थे, चेहरे पर उम्र की लकीरें उभर आई थीं, लेकिन उसकी मुस्कान में आज भी वही ठहराव था जो शादी के पहले दिन था।
अनुराधा सिद्धार्थ के माता-पिता की पसंद थी। एक बहुत ही साधारण, घरेलू और संस्कारी लड़की। लेकिन सिद्धार्थ… सिद्धार्थ के मन के किसी गहरे कोने में आज भी ‘काव्या’ बसती थी। काव्या, जो उसके कॉलेज का प्यार थी। चुलबुली, बेबाक और बारिश में भीगने की शौकीन। काव्या को नीले रंग से बहुत प्यार था और उसे शाम के वक्त तेज़ इलायची वाली चाय पीने की आदत थी। किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, काव्या और सिद्धार्थ का सफर एक नहीं हो सका, और पारिवारिक दबाव में सिद्धार्थ की शादी अनुराधा से हो गई।
शादी के बाद सिद्धार्थ ने अपनी ज़िम्मेदारियाँ तो पूरी कीं, लेकिन वह अपना दिल अनुराधा को कभी नहीं दे पाया। उसने अनुराधा के साथ एक समझौता सा कर लिया था। उसे लगता था कि वह काव्या के सपनों को अनुराधा पर थोप कर अपनी कसक मिटा रहा है। काव्या का सपना था कि उसका पति उसे रोज शाम को अपने हाथों से बनी चाय पिलाए, वो भी नीले कप में। और सिद्धार्थ, पिछले पच्चीस सालों से यही करता आ रहा था। वह अनुराधा में काव्या को जीने की कोशिश कर रहा था।
आज बारिश कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गई थी। पुरानी यादों के भंवर में फंसा सिद्धार्थ अचानक अपनी जगह से उठा और अनुराधा के पास जाकर बैठ गया। अनुराधा ने आश्चर्य से उसे देखा।
“क्या हुआ? चाय अच्छी नहीं बनी क्या?” अनुराधा ने पूछा।
“अनु…” सिद्धार्थ का गला भर्राया हुआ था। “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”
अनुराधा ने अपनी नीली प्याली टेबल पर रख दी और पूरी तवज्जो के साथ सिद्धार्थ की तरफ घूमी। “कहिए न, सब ठीक तो है?”
सिद्धार्थ ने एक गहरी सांस ली। आज वह उस बोझ को उतार फेंकना चाहता था जिसे वह पच्चीस सालों से ढो रहा था।
“अनु, तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि मैं रोज तुम्हें इसी नीली प्याली में इलायची की चाय क्यों पिलाता हूँ? मैंने कभी तुमसे पूछा ही नहीं कि तुम्हें क्या पसंद है, तुम क्या पीना चाहती हो। मैं बस मशीन की तरह रोज यह चाय बनाता रहा और तुम बिना कोई सवाल किए पीती रहीं।”
अनुराधा मुस्कुराई, बहुत ही हल्की सी मुस्कान। “इसमें पूछने वाली क्या बात है? पति के हाथों से बनी चाय में प्रेम होता है, और प्रेम का कोई स्वाद या रंग नहीं होता।”
सिद्धार्थ की आँखें छलक आईं। “नहीं अनु… तुम गलत समझ रही हो। इस चाय में मेरा प्रेम नहीं, मेरा स्वार्थ था। मेरी एक बहुत बड़ी भूल थी। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ।”
अनुराधा चुप रही, उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। जैसे वह किसी तूफ़ान के आने का इंतज़ार कर रही हो और उसके लिए पहले से तैयार हो।
“अनु, मेरी ज़िंदगी में शादी से पहले कोई थी… काव्या। उसे इलायची की चाय और नीला रंग बहुत पसंद था। मैं उसे भूल नहीं पाया। मुझे माफ कर दो अनु, मैं सच में बहुत बुरा इंसान हूँ। मैंने पच्चीस साल तुम्हारे साथ बिताए, तुमने इस घर को, मेरे माता-पिता को, हमारे बच्चों को अपना खून-पसीना देकर सींचा, और मैं? मैं इस नीली प्याली में उस काव्या को ढूंढता रहा जो मेरे अतीत का हिस्सा थी। मैंने तुम्हारी पूरी ज़िंदगी एक ऐसे साए के साथ बांध दी जो कभी था ही नहीं। मैंने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि तुम्हें इलायची की महक पसंद भी है या नहीं। मैं बस एक भ्रम में जीता रहा और तुम्हें उस भ्रम का हिस्सा बनाए रखा। क्या तुम मुझे इस धोखे के लिए कभी माफ कर पाओगी?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ बाहर गिरती बारिश की आवाज़ आ रही थी। सिद्धार्थ का सिर झुका हुआ था। उसे लग रहा था जैसे अनुराधा अभी टूट जाएगी, रोएगी, या शायद उसे छोड़कर चली जाएगी।
अनुराधा ने बहुत ही शांति से अपना हाथ बढ़ाया और सिद्धार्थ के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
“मैं जानती थी।”
ये तीन शब्द सिद्धार्थ के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजे। उसने झटके से सिर उठाया। “क्या? तुम… तुम जानती थीं?”
अनुराधा ने गहरी सांस ली और फिर से उसी सौम्य मुस्कान के साथ बोली, “हाँ सिद्धार्थ। मैं हमारी शादी के पहले ही महीने से जानती थी। एक दिन आपकी पुरानी डायरी सफाई करते हुए मेरे हाथ लग गई थी। उसमें काव्या का ज़िक्र था, उसकी पसंद का ज़िक्र था, और उस नीली प्याली का भी।”
सिद्धार्थ अवाक रह गया। “फिर… फिर तुमने मुझे कभी रोका क्यों नहीं? तुमने कभी मुझसे सवाल क्यों नहीं किया? तुम पच्चीस सालों तक चुपचाप मेरी दी हुई यह इलायची की चाय पीती रहीं? क्यों अनु, क्यों?”
अनुराधा की आँखों में अब हल्की सी नमी थी। “क्योंकि मैं आपसे प्रेम करती थी, सिद्धार्थ। और प्रेम किसी पर अधिकार जताना नहीं होता। जब मैं इस घर में आई, तो मैंने देखा कि आप एक टूटे हुए इंसान हैं। आप कोशिश कर रहे थे सब कुछ ठीक करने की, लेकिन आपका दिल कहीं और था। अगर मैं उस वक़्त आपसे काव्या को छीनने की कोशिश करती, तो आप शायद मुझसे हमेशा के लिए दूर हो जाते।
“रही बात इस चाय की…” अनुराधा ने टेबल पर रखी नीली प्याली को देखा, “मुझे इलायची से सख्त नफरत है। मुझे सादी अदरक वाली चाय पसंद है। लेकिन जब आप पहली बार मुझे अपने हाथों से यह चाय बनाकर लाए थे, तो आपकी आँखों में जो एक सुकून था, एक ठहराव था, वह मेरे लिए इस दुनिया की किसी भी चीज़ से बढ़कर था। मुझे लगा कि अगर इस एक कप चाय से आपके अंदर का खालीपन थोड़ा सा भी भरता है, तो मैं ज़िंदगी भर यह कड़वाहट पीने के लिए तैयार हूँ। मुझे काव्या से कोई ईर्ष्या नहीं हुई, बल्कि मुझे उस पर तरस आता था कि उसे आपका वो रूप देखने को नहीं मिला जो मेरे पास था। आप मेरे बच्चों के पिता हैं, मेरे सुख-दुख के साथी हैं। यादें किसी की बपौती नहीं होतीं सिद्धार्थ, उन्हें मिटाया नहीं जा सकता। लेकिन जो वर्तमान आप मुझे दे रहे थे, उसमें आपका सम्मान और आपका समर्पण सच्चा था। मेरे लिए उतना ही काफी था।”
सिद्धार्थ के गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली। वह पच्चीस सालों तक खुद को एक महान प्रेमी समझता रहा जो अपनी प्रेमिका की यादों को ज़िंदा रखे हुए था, लेकिन आज उसे अहसास हुआ कि असली प्रेम तो वो था जो अनुराधा ने किया था। बिना किसी शर्त, बिना किसी मांग, और बिना किसी शिकायत के। उसने खुद को मिटाकर सिद्धार्थ के भ्रम को ज़िंदा रखा था ताकि सिद्धार्थ खुश रह सके।
सिद्धार्थ ने अनुराधा के दोनों हाथ चूम लिए और फूट-फूट कर रो पड़ा। “मुझे माफ कर दो अनु… मुझे माफ कर दो। मैं इतना अंधा कैसे हो गया था? मैं एक कांच के टुकड़े को हीरा समझकर पूजता रहा, जबकि असली हीरा तो मेरे पास, मेरे सामने मौजूद था। मैं तुम्हारा कर्ज कभी नहीं चुका पाऊंगा।”
अनुराधा ने सिद्धार्थ के आँसू पोंछे और कहा, “कर्ज तो व्यापार में होते हैं सिद्धार्थ, रिश्तों में तो सिर्फ अहसास होते हैं।”
सिद्धार्थ ने उठकर वह नीली प्याली उठाई और उसे बालकनी के बाहर फेंक दिया। छपाक की आवाज़ के साथ प्याली के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
“कल शाम से, हम दोनों सिर्फ अदरक वाली चाय पिएंगे… हमारी अपनी चाय,” सिद्धार्थ ने अनुराधा को गले लगाते हुए कहा।
अनुराधा की आँखों से भी अब खुशी के आँसू छलक पड़े थे। आज पच्चीस सालों के बाद, उस घर में बारिश की महक कुछ अलग ही थी। आज उसमें कोई पुरानी कसक या किसी की अधूरी याद नहीं थी, बल्कि एक नए और सच्चे प्रेम की शुरुआत की सोंधी खुशबू थी। एक ऐसा प्रेम जो अब तक खामोश था, लेकिन आज उसने हर शब्द, हर जज़्बात को अपने भीतर समेट लिया था।
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