“माँ…” साकेत का गला थोड़ा भर्राया हुआ था। “पिछले कुछ सालों में मैंने दुनिया भर के व्यंजन खाए। मुझे लगने लगा था कि मुझे अब हमारे घर का वो सादा खाना कभी पसंद नहीं आएगा। मुझे लगता था कि मैं आगे बढ़ गया हूँ। पर आज तुम्हारी बनाई इस दाल-रोटी ने मुझे एहसास दिलाया है कि मैं कितना गलत था। इस खाने में जो शांति है, जो रूह को तृप्त करने वाली बात है, वो दुनिया के किसी मेन्यू में नहीं है। आज मेरा तन और मन दोनों तृप्त हो गए। तुमने सच में मेरे भीतर के उस बच्चे को जगा दिया है जो तुम्हारे हाथ के खाने के लिए तरसता था। तुम सचमुच अन्नपूर्णा हो माँ!”
बेंगलुरु जैसे तेज रफ्तार वाले महानगर में रहते हुए, साकेत की जिंदगी भी उसी रफ्तार के सांचे में ढल चुकी थी। वह एक बड़ी आईटी कंपनी में सीनियर पोस्ट पर था। उसकी सुबह विदेशी कॉफी की चुस्कियों के साथ शुरू होती और रात किसी महंगे रेस्तरां के इटैलियन या मेक्सिकन खाने के साथ खत्म होती। पैसे और पद की कोई कमी नहीं थी, इसलिए साकेत ने अपने आलीशान अपार्टमेंट में एक पेशेवर शेफ, सुशांत को काम पर रखा हुआ था। सुशांत कॉन्टिनेंटल से लेकर पैन-एशियन तक हर तरह का खाना बनाने में माहिर था। साकेत को अब इसी तरह के ‘गॉरमे’ (gourmet) और डाइट-कॉन्शस खाने की आदत पड़ चुकी थी। क्विनोआ सलाद, एवोकाडो टोस्ट और ग्रिल्ड साल्मन उसके रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा बन गए थे। उसे लगता था कि यही बेहतरीन जीवनशैली है।
कुछ दिन पहले साकेत की माँ, सुमित्रा देवी, बनारस से उसके पास रहने आई थीं। सुमित्रा देवी एक ठेठ भारतीय माँ थीं, जिनका आधा जीवन रसोई की आंच के सामने अपने परिवार को गरम-गरम रोटियां खिलाने में बीता था। बेंगलुरु के इस कांच और कंक्रीट के जंगल में आते ही, उन्होंने साकेत के बदलते हुए तौर-तरीकों को बहुत करीब से देखा। जब उन्होंने पहली बार रसोई में जाकर बेटे के लिए कुछ बनाने की इच्छा जताई, तो साकेत ने तुरंत उन्हें रोक दिया।
“माँ, तुम यहाँ बनारस की गर्मी और घर के कामों से आराम पाने आई हो, रसोई में खटने के लिए नहीं,” साकेत ने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था। “और फिर सुशांत है ना यहाँ। उसे दुनिया भर का खाना बनाना आता है। तुम्हें जो खाना हो, बस उसे ऑर्डर दे देना। तुमने जीवन भर हमारे लिए चूल्हे के सामने पसीना बहाया है, अब मैं नहीं चाहता कि तुम इस उम्र में भी रसोई में ही उलझी रहो। तुम बस टीवी देखो, घूमो-फिरो और आराम करो।”
सुमित्रा देवी ने अपने बेटे की बात मान तो ली, लेकिन एक माँ का मन कहाँ मानता है। जब सुशांत फैंसी प्लेटिंग करके खाना परोसता, तो सुमित्रा देवी दो-चार कौर खाकर उठ जातीं। साकेत को लगता कि शायद माँ को अभी इन नए स्वादों की आदत नहीं है, लेकिन उसने कभी यह नहीं सोचा कि उसे खुद अपने घर के असली स्वाद की कितनी कमी खल रही है। वह खुद को आधुनिक और सेहतमंद मानकर सुशांत के बनाए उबले और बेक किए हुए व्यंजनों को चाव से खाता रहा।
तभी अचानक एक दिन सुशांत के गाँव से कोई जरूरी बुलावा आ गया और उसे एक हफ्ते की छुट्टी पर जाना पड़ा। साकेत के लिए यह कोई बड़ी परेशानी नहीं थी। उसने सोचा, “आजकल फूड डिलीवरी ऐप्स का जमाना है, दुनिया भर का खाना एक क्लिक पर दरवाजे पर आ जाता है।”
पहले दो दिन साकेत ने शहर के सबसे महंगे और नामी होटलों से खाना मंगवाया। कभी थाई करी, तो कभी लेबनीज प्लेटर। सुमित्रा देवी चुपचाप वही खा लेतीं जो बेटा मँगवाता। लेकिन तीसरे दिन, साकेत का पेट भारी-भारी सा लगने लगा। लगातार बाहर का, प्रिजर्वेटिव्स और अजीबोगरीब सॉस से भरा खाना खाकर उसका शरीर बगावत करने लगा था। सुबह उठते ही उसे एसिडिटी महसूस हो रही थी और मुँह का स्वाद बिल्कुल कसैला हो गया था।
उस दिन रविवार था। साकेत अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, तभी उसे बाहर से खाना ऑर्डर करने की याद आई। उसने ऐप खोला, लेकिन किसी भी रेस्टोरेंट का मेन्यू देखकर उसकी भूख नहीं जगी। तभी उसे अचानक दाल में पड़ते हींग और जीरे के तड़के की एक जोरदार और जानी-पहचानी खुशबू आई। वह खुशबू इतनी तेज और सम्मोहक थी कि साकेत का ध्यान लैपटॉप की स्क्रीन से पूरी तरह हट गया। वह खुशबू उसे बेंगलुरु के उस हाई-टेक अपार्टमेंट से खींचकर सीधे बनारस के उस पुराने घर के आंगन में ले गई, जहाँ बचपन में स्कूल से लौटते ही वह इसी खुशबू को सूँघकर रसोई की तरफ दौड़ पड़ता था।
साकेत ने उठकर देखा तो सुमित्रा देवी रसोई में थीं। उन्होंने बिना साकेत को बताए ही रसोई की कमान संभाल ली थी। साकेत जब तक कुछ बोलता, माँ ने डाइनिंग टेबल पर एक थाली सजा दी।
थाली में कोई विदेशी सलाद या इटैलियन पास्ता नहीं था। वहाँ तांबे के कटोरे में गरमागरम पीली मूंग-मसूर की दाल थी, जिस पर देसी घी, हींग, साबुत लाल मिर्च और जीरे का छौंक लगा था। साथ में सूखी आलू-गोभी की साधारण सी सब्जी, और तवे से सीधी उतरी हुई, घी से चुपड़ी हुई मुलायम रोटियां थीं।
“माँ… तुमने क्यों तकलीफ की? मैं कुछ ऑर्डर कर ही रहा था,” साकेत ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, हालांकि उसकी आँखें थाली पर ही टिकी थीं।
“तकलीफ कैसी बेटा? जीवन भर जिस काम में सुख मिला है, वो आज तकलीफ कैसे हो सकता है। दो दिन से देख रही हूँ, बाहर का वो डिब्बे वाला खाना खाकर तेरा चेहरा उतर गया है। अब चुपचाप बैठ और खा ले,” माँ ने प्यार से डांटते हुए कहा।
साकेत अनमने ढंग से कुर्सी पर बैठ गया। उसने जैसे ही रोटी का पहला टुकड़ा तोड़कर दाल में डुबोया और अपने मुँह में रखा, उसकी आँखें अपने आप बंद हो गईं। वह साधारण सी दाल-रोटी नहीं थी; वह एक ऐसा स्वाद था जिसमें बरसों की ममता, फिक्र और निस्वार्थ प्रेम घुला हुआ था। घी की सोंधी महक और माँ के हाथों का वो जादुई स्पर्श, जिसने साकेत की सुन्न हो चुकी स्वाद कलिकाओं में जैसे जान फूंक दी।
पिछले कई सालों में जाने कितने फाइव-स्टार होटलों में खाने वाला साकेत, जो खाते समय हमेशा अपने फोन या काम में व्यस्त रहता था, आज बिल्कुल शांत था। उसका सारा ध्यान सिर्फ और सिर्फ उस भोजन पर था। वह सोच रहा था कि वह कितनी बड़ी मूर्खता कर रहा था! कैसे उसने इस अमृत जैसे भोजन को ‘पुराने जमाने’ का मानकर नकार दिया था। दुनिया का कोई भी शेफ, कोई भी महंगी रेसिपी इस स्वाद की बराबरी नहीं कर सकती।
खाना खत्म करने के बाद, साकेत ने अपनी उंगलियां चाटते हुए एक गहरी साँस ली। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी और चेहरे पर वो सुकून, जो उसे पिछले कई सालों में कभी महसूस नहीं हुआ था।
“माँ…” साकेत का गला थोड़ा भर्राया हुआ था। “पिछले कुछ सालों में मैंने दुनिया भर के व्यंजन खाए। मुझे लगने लगा था कि मुझे अब हमारे घर का वो सादा खाना कभी पसंद नहीं आएगा। मुझे लगता था कि मैं आगे बढ़ गया हूँ। पर आज तुम्हारी बनाई इस दाल-रोटी ने मुझे एहसास दिलाया है कि मैं कितना गलत था। इस खाने में जो शांति है, जो रूह को तृप्त करने वाली बात है, वो दुनिया के किसी मेन्यू में नहीं है। आज मेरा तन और मन दोनों तृप्त हो गए। तुमने सच में मेरे भीतर के उस बच्चे को जगा दिया है जो तुम्हारे हाथ के खाने के लिए तरसता था। तुम सचमुच अन्नपूर्णा हो माँ!”
सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक शांत, वात्सल्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने साकेत के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, बाजार का खाना पैसे और पेशे से बनता है, वो जीभ को तो बदलता स्वाद दे सकता है, लेकिन घर का खाना प्यार, अपनेपन और फिक्र से बनता है। तृप्ति मसालों से नहीं, बल्कि उस नीयत से मिलती है जिसके साथ भोजन परोसा जाता है।”
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी, लेकिन अपार्टमेंट के भीतर का माहौल उस गरमागरम भोजन की तरह ही सुकून से भर गया था। खाना साधारण था, लेकिन उस दिन दो दिल पूरी तरह से तृप्त थे।
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मूल लेखिका : रेणु अग्रवाल