गुलमोहर अपार्टमेंट्स की ग्यारहवीं मंजिल पर रहने वाली सिम्मी , शहर की उन चुनिंदा महिलाओं में से एक थी जिन्हें देखकर किसी को भी ईर्ष्या हो जाए। वह और उसकी तीन अन्य सहेलियाँ—रोशनी, शिखा और तान्या—पूरी सोसाइटी में आकर्षण का केंद्र थीं। उनकी ज़िंदगी किसी हॉलीवुड फिल्म के सीन जैसी लगती थी। वे जब भी सोसाइटी के क्लब हाउस में आतीं, तो उनके ठहाकों से पूरा हॉल गूंज उठता। वे कभी भी वीकेंड ट्रिप पर निकल जातीं, लेट नाइट पार्टीज़ करतीं, और उनके महंगे कपड़ों और बेबाक अंदाज़ को देखकर हर कोई हैरान रह जाता। उनके लिए उम्र मानो बस एक नंबर थी। चालीस और पैंतालीस के पार होने के बावजूद उनकी ऊर्जा बीस साल की लड़कियों जैसी थी।
उसी सोसाइटी की तीसरी मंजिल पर रहने वाली सुधा और उसकी सहेलियाँ—मीना और रश्मि—अक्सर बालकनी में खड़े होकर सिम्मी और उसके ग्रुप को निहारा करती थीं। सुधा एक साधारण गृहिणी थी। उसके पति, रमेश, एक सरकारी बैंक में अधिकारी थे। सुधा की ज़िंदगी सुबह छह बजे बच्चों के टिफिन बनाने से शुरू होती और रात को किचन समेटने पर खत्म होती। वह जब भी सिम्मी को देखती, तो उसके मन में एक अजीब सी कसक उठती।
“देख मीना, कैसे अपनी ज़िंदगी जी रही हैं ये लोग! ना बच्चों की फिक्र, ना पति का डर। और एक हम हैं, जिन्हें शाम को पार्क जाने के लिए भी दस बार सोचना पड़ता है,” सुधा ने एक दिन गहरी सांस लेते हुए कहा।
मीना ने भी हामी भरी, “सच कह रही हो सुधा। कल ही मैंने सिम्मी का सोशल मीडिया देखा, किसी महंगे रेस्तरां में अपने पति के साथ डिनर कर रही थी। और उसके घर की तस्वीरें तो देखो, जैसे कोई फाइव स्टार होटल हो। हम तो बस इस चूल्हे-चौके में ही अपनी ज़िंदगी गुज़ार देंगे।”
कहने को तो सुधा और उसकी सहेलियाँ सिम्मी के ग्रुप की आलोचना करती थीं कि वे कितनी लापरवाह हैं, लेकिन सच तो यह था कि उनके मन के किसी गहरे कोने में उसी आज़ादी को जीने की चाहत थी। वे भी चाहती थीं कि कभी सिम्मी उन्हें अपनी पार्टी में बुलाए। कभी वे भी उनके साथ बिना किसी परवाह के बारिश में भीगें। वे अक्सर सिम्मी से नज़दीकियां बढ़ाने की कोशिश करतीं। कभी लिफ्ट में मिलते ही उसकी साड़ी की तारीफ कर देतीं, तो कभी त्योहार पर उनके घर मिठाई भिजवा देतीं, लेकिन बात औपचारिक मुस्कुराहट से आगे नहीं बढ़ पाती थी। सुधा को लगता था कि सिम्मी की दुनिया एकदम परफेक्ट है—सुंदर, व्यवस्थित और खुशियों से भरी हुई।
दिन अपनी ही रफ्तार से बीत रहे थे। एक शाम आसमान में काले बादल छा गए और ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई। सुधा अपनी बालकनी में खड़ी होकर बारिश का आनंद ले रही थी, तभी उसने देखा कि सोसाइटी के गेट पर एक कैब रुकी और उसमें से सिम्मी उतरी। सिम्मी के हाथ में कई शॉपिंग बैग्स थे। बारिश तेज़ थी और वह जल्दी-जल्दी बिल्डिंग की तरफ भागने लगी। तभी अचानक, सीढ़ियों के पास काई लगी होने के कारण, सिम्मी का पैर बुरी तरह फिसला और वह ज़मीन पर गिर पड़ी।
सुधा ने यह देखा तो वह तुरंत अपनी छतरी लेकर नीचे भागी। जब वह वहाँ पहुँची, तो सिम्मी दर्द से कराह रही थी। उसके घुटने और टखने में गहरी चोट आई थी और वह खड़ी नहीं हो पा रही थी। आसपास कोई और नहीं था। सिम्मी का बाकी का ग्रुप शायद किसी और पार्टी में व्यस्त था।
“सिम्मी जी, आप ठीक तो हैं? लाइए, मेरा हाथ पकड़िए,” सुधा ने घबराते हुए कहा।
सिम्मी की आँखों में आंसू थे। उसने किसी तरह सुधा का सहारा लिया। “मेरा पैर मुड़ गया है सुधा जी… दर्द बहुत तेज़ है। मेरे पति शहर से बाहर हैं, प्लीज़ मुझे मेरे फ्लैट तक छोड़ दीजिए।”
सुधा ने सिम्मी को सहारा दिया और उसे लिफ्ट तक ले आई। ग्यारहवीं मंजिल का बटन दबाते हुए सुधा के मन में एक अजीब सी हलचल थी। वह पहली बार सिम्मी के उस घर में जा रही थी, जिसे उसने केवल तस्वीरों में एक महल की तरह देखा था। उसे लगा कि दरवाज़ा खुलते ही किसी शानदार खुशबू, करीने से सजे हुए फर्नीचर और एक आदर्श घर का नज़ारा उसका स्वागत करेगा।
सिम्मी ने अपने पर्स से चाबी निकाली और कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला। जैसे ही दरवाज़ा खुला, सुधा अंदर का नज़ारा देखकर सन्न रह गई।
घर के अंदर का दृश्य किसी भयानक सपने जैसा था। ड्राइंग रूम में रखे महंगे इटालियन सोफे पर हज़ारों रुपये के कपड़े बुरी तरह से फेंके हुए थे। बीच में रखी कांच की खूबसूरत मेज़ पर बीती रात के जूठे गिलास, शराब की खाली बोतलें, और पिज्ज़ा के सूखे हुए टुकड़े पड़े थे। कमरे में एक अजीब सी सीलन और बासी खाने की बदबू आ रही थी। ज़मीन पर जूतों के निशान थे और पर्दों पर धूल की एक परत जमी थी।
सुधा ने बड़ी मुश्किल से सिम्मी को सोफे के एक खाली हिस्से पर बैठाया।
“सुधा जी… क्या आप मुझे थोड़ा पानी दे सकती हैं? और फ्रिज में शायद आइस पैक रखा होगा, मेरे पैर में बहुत सूजन आ रही है,” सिम्मी ने दर्द से कराहते हुए कहा।
सुधा तुरंत किचन की तरफ भागी। लेकिन किचन का हाल देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पूरा सिंक जूठे और बदबूदार बर्तनों से अटा पड़ा था। गैस स्टोव पर दूध उफन कर सूख चुका था और कई दिनों से साफ नहीं किया गया था। चॉपिंग बोर्ड पर सब्ज़ियों के सड़े हुए छिलके पड़े थे। सुधा ने जैसे-तैसे एक साफ़ गिलास ढूंढा, उसे धोया और आरओ से पानी लिया।
फिर वह आइस पैक लेने के लिए बड़े से डबल-डोर फ्रिज की तरफ बढ़ी। उसने सोचा कि इतने बड़े फ्रिज में तो हर चीज़ सलीके से रखी होगी। लेकिन जैसे ही उसने फ्रिज खोला, अंदर का नज़ारा और भी चौंकाने वाला था। फ्रिज लगभग खाली था। उसमें केवल कुछ महंगी चॉकलेट्स, कोल्ड ड्रिंक की बोतलें और फफूंदी लगा हुआ कुछ बचा हुआ खाना रखा था। आइस ट्रे पूरी तरह से सूखी पड़ी थी, बर्फ का एक टुकड़ा भी नहीं था।
सुधा को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसने फ्रिज बंद किया और बाहर आकर सिम्मी को पानी दिया।
“सिम्मी जी, फ्रिज में बर्फ तो नहीं है। मैं ऐसा करती हूँ, गैस पर थोड़ा पानी गर्म करके तौलिए से आपके पैर की सिकाई कर देती हूँ। किचन में कोई बर्तन मिलेगा जिसमें पानी गर्म कर सकूँ?” सुधा ने पूछा।
सिम्मी ने शर्मिंदगी से अपनी आँखें झुका लीं। उसके चेहरे से वह सारा गुरूर, वह सारी चकाचौंध गायब हो चुकी थी जो अक्सर सोसाइटी में दिखाई देती थी।
“रहने दीजिए सुधा जी… घर में शायद ही कोई साफ बर्तन हो। मेड तीन दिन से नहीं आई है और मुझे खुद काम करने की आदत नहीं है। मैं और मेरे पति ज़्यादातर बाहर ही खाना खाते हैं। घर तो बस हम सोने के लिए आते हैं,” सिम्मी की आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था।
सुधा वहीं पास पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गई। वह सिम्मी को देख रही थी। वह सिम्मी , जिसे देखकर वह और उसकी सहेलियाँ अपनी ज़िंदगी को कोसती थीं। वह सिम्मी , जिसकी सोशल मीडिया की तस्वीरें देखकर उन्हें लगता था कि असली ज़िंदगी तो ये लोग जी रहे हैं।
सिम्मी शायद सुधा की आँखों के भाव पढ़ चुकी थी। उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े। “आप सोच रही होंगी ना सुधा जी कि मैं बाहर से कितनी खुशमिज़ाज और स्टाइलिश दिखती हूँ, लेकिन मेरा घर अंदर से कितना खोखला है? सच यही है। मेरे पति के पास मेरे लिए समय नहीं है, वे सिर्फ पैसा कमाना जानते हैं। मुझे भी इस अकेलेपन से भागने के लिए अपनी उन दोस्तों का सहारा लेना पड़ता है, जिन्हें सिर्फ पार्टी और दिखावे से मतलब है। आज मैं यहाँ दर्द में तड़प रही हूँ, लेकिन मेरी उन ‘तथाकथित’ पक्की सहेलियों में से किसी ने एक बार फोन करके भी नहीं पूछा कि मैं बारिश में सही-सलामत घर पहुँची या नहीं।”
सिम्मी फफक कर रो पड़ी। “यह घर सिर्फ दीवारों का एक ढांचा है सुधा जी। यहाँ ना तो रिश्तों की गर्माहट है, ना ही सुकून का एक पल। कभी-कभी जब मैं रात को लौटती हूँ, तो यह खाली और बिखरा हुआ घर मुझे खाने को दौड़ता है। मैं बाहर सिर्फ इसलिए इतना हंसती हूँ ताकि कोई मेरे अंदर का यह खोखलापन ना देख ले।”
सुधा स्तब्ध थी। उसके सामने एक इंसान का पूरा आवरण उतर चुका था। उसने सिम्मी के आंसू पोंछे, अपने दुपट्टे से उसका पैर बांधा ताकि उसे थोड़ा आराम मिले, और फिर अपने फ्लैट से जाकर कुछ दर्द निवारक गोलियां और एक आइस पैक लाकर उसे दिया। सिम्मी को आराम से लिटाने के बाद, सुधा अपने घर की ओर चल दी।
जब सुधा ने अपने घर का दरवाज़ा खोला, तो सामने का नज़ारा देखकर उसके चेहरे पर एक गहरी शांति और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। घर छोटा था, लेकिन हर चीज़ अपनी जगह पर सलीके से रखी हुई थी। किचन से ताज़ी बनी हुई दाल और सब्ज़ी की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। उसके पति रमेश सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे और उन्होंने सुधा को देखते ही कहा, “कहाँ रह गई थी? बारिश तेज़ है, मैंने तुम्हारे लिए चाय बनाकर थर्मस में रख दी है, जल्दी से पी लो।”
सुधा की आँखों में आंसू आ गए। उसने दौड़कर अपने पति को गले लगा लिया। वह उस दिन समझ चुकी थी कि दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते हैं। जिस ‘ऊंची दुकान’ को देखकर वह ललचा रही थी, उसके ‘पकवान’ असल में कितने फीके और बासी थे। सोशल मीडिया की वह नकली दुनिया, वे झूठी मुस्कुराहटें और वे ठहाके असल में एक बहुत गहरे अकेलेपन को छिपाने का पर्दा भर थे।
उस रात सुधा ने सुकून की सांस ली। उसे अपनी साधारण, लेकिन प्यार और अपनेपन से भरी ज़िंदगी से अब कोई शिकायत नहीं थी। उसे एहसास हो गया था कि असली खुशी महंगे कपड़ों या बड़ी पार्टियों में नहीं, बल्कि उस घर में होती है जहाँ आपको इंतज़ार करने वाले लोग हों, जहाँ आपके लौटकर आने पर चाय का एक गर्म प्याला आपका स्वागत करे, और जहाँ चीज़ें भले ही कम हों, लेकिन सुकून भरपूर हो। अब उसे कभी भी किसी और की तरह बनने की चाहत नहीं रही, क्योंकि वह जान चुकी थी कि वह जो है और जैसी है, वही सबसे बेहतरीन है।
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मूल लेखिका : रेणु अग्रवाल