सुहाग की निशानी: एक अनकहा बलिदान

मेरे बुटीक में पिछले पांच सालों से काम करने वाली रमा सिर्फ मेरी कर्मचारी नहीं, बल्कि मेरे परिवार के एक सदस्य जैसी हो गई थी। रमा के हाथों में जादू था। वह कपड़ों पर कढ़ाई का ऐसा बारीक और खूबसूरत काम करती थी कि बड़े-बड़े डिज़ाइनर भी उसकी कला के आगे फीके पड़ जाएं। वह सुबह नौ बजे बुटीक आ जाती और शाम के सात बजे तक बिना किसी शिकायत के, मशीन की तरह काम में जुटी रहती। रमा का स्वभाव बहुत शांत था, लेकिन उसकी गहरी, उदास आँखों में हमेशा एक अनकही पीड़ा तैरती रहती थी। वह बहुत कम बोलती थी, बस अपने काम से काम रखती।

रमा का पति, किशन, एक नंबर का शराबी और जुआरी था। जवानी के दिनों में जब उनकी शादी हुई थी, तब किशन एक कारखाने में अच्छी नौकरी करता था। लेकिन बुरी संगत और शराब की लत ने उसे न सिर्फ नौकरी से निकाल बाहर किया, बल्कि उसे एक ऐसा हैवान बना दिया जो अपनी ही पत्नी की मेहनत की कमाई पर पलने लगा। रमा दिन-रात खून-पसीना एक करके जो भी पैसे कमाती, किशन उसे डरा-धमका कर या मारपीट कर छीन लेता और शराब में उड़ा देता। कई बार तो रमा बुटीक में अपनी सूजी हुई आँखें और चेहरे पर पड़े नीले निशान लेकर आती। मेरे पूछने पर वह हमेशा यही कहकर बात टाल देती कि अंधेरे में दरवाज़े से टकरा गई थी या सीढ़ियों से फिसल गई थी। मुझे उसकी इस हालत पर बहुत तरस आता था, लेकिन मैं जानती थी कि हमारे समाज में एक औरत अपने पति की बुराई जल्दी किसी के सामने नहीं करती।

करीब दो साल पहले की बात है। एक दिन रमा मेरे पास आई और उसने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधी एक छोटी सी पोटली मेरे हाथ में रख दी। पोटली में पांच सौ रुपये थे। उसने बहुत ही संकोच और डर के साथ मुझसे कहा, “सुनीता दीदी, ये मेरे ओवरटाइम के पैसे हैं। आप इन्हें अपने पास रख लीजिए। घर ले जाऊंगी तो वो (किशन) छीन लेगा और शराब पी जाएगा।”

मैंने हैरानी से पूछा, “पर रमा, तू इन पैसों का क्या करेगी? अगर तुझे घर खर्च के लिए चाहिए तो मैं तुझे एडवांस दे सकती हूँ।”

रमा की आँखों में अचानक एक चमक आ गई, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने धीरे से कहा, “दीदी, जब मेरी नई-नई शादी हुई थी, तब मेरी सास ने मुझे सोने की दो भारी चूड़ियां दी थीं। वो चूड़ियां मेरे सुहाग की, मेरे सम्मान की निशानी थीं। लेकिन कुछ साल पहले किशन ने जुए में बहुत बड़ा कर्ज़ा कर लिया था। कर्ज़दार घर आकर गालियां देते थे। मेरी आबरू बचाने के लिए मुझे अपनी वो सुहाग की चूड़ियां उतार कर बेचनी पड़ीं। उस दिन से मेरी कलाइयां सूनी हैं। मैंने कसम खाई है कि मैं पाई-पाई जोड़कर अपने लिए वैसी ही सोने की चूड़ियां दोबारा बनवाऊंगी। आप मेरे ये पैसे अपने पास जमा करती रहिए। जब बीस हज़ार रुपये हो जाएंगे, तो मैं सुनार के यहाँ से अपने लिए चूड़ियां ले आऊंगी।”

रमा की बात सुनकर मेरा गला भर आया। एक औरत, जिसे उसका पति रोज़ मारता-पीटता है, जिसे कभी प्यार या इज़्ज़त नहीं मिली, वो आज भी अपने सुहाग की निशानी को दोबारा पाने के लिए अपनी नींदें और अपना सुकून बेच रही थी। मैंने उसी दिन से रमा का एक अलग लिफाफा अपनी अलमारी में बना दिया। हर महीने रमा कभी पांच सौ, कभी हज़ार, तो कभी दो हज़ार रुपये उस लिफाफे में डालने के लिए मुझे दे देती। जैसे-जैसे लिफाफा भारी होता जा रहा था, रमा के चेहरे की रौनक भी बढ़ती जा रही थी। वो अक्सर खाली समय में अपनी सूनी कलाइयों को निहारती और मुस्कुरा देती। उसके लिए वो चूड़ियां सिर्फ सोने का टुकड़ा नहीं थीं, बल्कि उसका खोया हुआ आत्मसम्मान थीं, जिसे वो अपनी मेहनत से वापस खरीद रही थी।

समय बीतता गया। दो साल की कड़ी तपस्या और पाई-पाई जोड़ने के बाद, आख़िरकार वो दिन आ ही गया। कल शाम ही रमा ने मुझे अपने आख़िरी एक हज़ार रुपये दिए थे। अब उसके लिफाफे में पूरे बीस हज़ार रुपये जमा हो चुके थे। कल शाम बुटीक से जाते समय रमा बहुत खुश थी। उसने मुझसे कहा था, “दीदी, कल सुबह मैं जल्दी आ जाऊंगी। हम दोनों पास वाले सुनार की दुकान पर चलेंगे। मैंने डिज़ाइन पहले ही सोच रखा है।” मैंने भी उसे मुस्कुराकर विदा किया था और उसके इस सपने के पूरा होने पर मुझे भी बहुत ख़ुशी महसूस हो रही थी।

लेकिन अगली सुबह जो हुआ, उसने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया।

सुबह के करीब सात बज रहे थे। मैं अपने घर के काम निपटा ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने रमा खड़ी थी। उसकी हालत देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रमा के बाल बिखरे हुए थे, उसकी साड़ी कई जगह से कीचड़ में सनी थी, और उसकी आँखों से आंसुओं की धार ऐसे बह रही थी जैसे सावन की झड़ी लग गई हो। वह कांप रही थी और उसकी सांसें बुरी तरह फूल रही थीं।

“रमा! क्या हुआ? तू इस हालत में… सुबह-सुबह? क्या उस जानवर ने फिर से हाथ उठाया है तुझ पर?” मैंने घबराते हुए उसे अंदर खींचकर सोफे पर बिठाया और पानी का गिलास दिया।

रमा ने पानी का गिलास एक तरफ हटा दिया और मेरे पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई। वह सिसकते हुए और हाथ जोड़ते हुए बोली, “दीदी… सुनीता दीदी! मेरे… मेरे वो पैसे… जो आपके पास जमा हैं… बीस हज़ार रुपये… वो मुझे अभी दे दीजिए दीदी। मुझे तुरंत रुपयों की ज़रूरत है।”

मैं हैरान रह गई। “पैसे? पर रमा, वो तो हमने चूड़ियां लेने के लिए रखे थे न? आज तो हम सुनार के यहाँ जाने वाले थे। तुझे अचानक क्या हो गया है? क्या किशन को तेरे पैसों के बारे में पता चल गया है?”

रमा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। रोते-रोते उसने जो बताया, वो सुनकर मेरा दिल दहल गया।

“दीदी, कल रात वो बहुत ज़्यादा शराब पीकर घर आया था। आते ही उसने गालियां बकनी शुरू कर दीं और मुझसे पैसे मांगने लगा। जब मैंने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो वो मुझे पीटने लगा। मैं खुद को बचाने के लिए भाग रही थी। उसी झूमा-झटकी में उसका पैर आंगन की गीली ज़मीन पर फिसल गया। वो धड़ाम से गिरा और उसका सिर आंगन में रखे पत्थर के सिलबट्टे से ज़ोर से टकरा गया।” रमा हिचकियां लेते हुए बता रही थी। “दीदी, उसके सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा। वो वहीं बेहोश हो गया। आस-पड़ोस के लोगों की मदद से मैं उसे रात में ही सरकारी अस्पताल ले गई। डॉक्टर कह रहे हैं कि उसके सिर की नस फट गई है। खून बहुत बह गया है। उसका तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा, वरना वो नहीं बचेगा। ऑपरेशन और दवाइयों के लिए तुरंत बीस हज़ार रुपये जमा करने को कहा है। दीदी, मेरे पास इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। आप मुझे वो पैसे दे दीजिए।”

मैं अवाक रह गई। मेरे अंदर जैसे गुस्से का एक ज्वालामुखी फट पड़ा। मैं रमा को झकझोरते हुए चिल्लाई, “तू पागल हो गई है रमा? तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? वो आदमी, जिसने तुझे ज़िंदगी भर खून के आंसू रुलाए, जिसने तेरी हर ख़ुशी छीनी, जो तुझे जानवरों की तरह पीटता है… आज तू उसी आदमी को बचाने के लिए अपने वो पैसे लुटाने जा रही है, जो तूने अपना पेट काटकर, अपनी नींदें उड़ाकर जोड़े थे? ये बीस हज़ार रुपये सिर्फ कागज़ के टुकड़े नहीं हैं रमा, ये तेरा वो सपना है जिसे तूने दो साल तक अपनी आँखों में पाला है! अपनी उन सोने की चूड़ियों के लिए तूने कितनी रातें भूखे रहकर काटी हैं! उसे मरने दे उसके कर्मों की सज़ा में, तू क्यों अपनी ज़िंदगी की इकलौती ख़ुशी उसके इलाज में फूंक रही है?”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सिर्फ रमा के रोने की आवाज़ आ रही थी। उसने अपने आंसुओं को अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछा। उसकी लाल हो चुकी आँखों में अब एक अजीब सा ठहराव था। उसने बहुत ही शांत, लेकिन एक ऐसी गहरी आवाज़ में जवाब दिया, जिसने मेरे सारे सवालों और मेरे आधुनिक ज्ञान को एक पल में चकनाचूर कर दिया।

“दीदी,” रमा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, “आप सच कह रही हैं। उसने मुझे ज़िंदगी भर सिर्फ दर्द दिया है। उसने मेरी कोई इज़्ज़त नहीं की। लेकिन दीदी… औरत के लिए सोने की चूड़ियां, सिंदूर, मंगलसूत्र—ये सब क्या हैं? ये सब सुहाग की निशानियां ही तो हैं न? ये तभी तक हाथों में खनकती हैं और माथे पर चमकती हैं, जब तक सिर पर सुहाग का साया होता है। दीदी, जब मेरा सुहाग ही इस दुनिया में नहीं रहेगा, तो मैं उन सोने की चूड़ियों को पहनकर क्या करूंगी? वो चूड़ियां मेरे किस काम की रह जाएंगी? जब मेरी मांग ही सूनी हो जाएगी, तो इन सूनी कलाइयों में सोने का बोझ लादकर मैं किसे दिखाऊंगी?”

रमा के उन शब्दों ने मुझे भीतर तक मौन कर दिया। मेरे पास उसकी इस बात का कोई जवाब नहीं था। मैंने देखा कि एक औरत का दिल कितना बड़ा, कितना गहरा और कितना विशाल होता है। वो औरत, जिसे समाज कमज़ोर समझता है, जो दिन-रात प्रताड़ना सहती है, लेकिन जब बात उसके सुहाग, उसके परिवार और उसके वजूद पर आती है, तो वो अपनी सबसे कीमती चीज़, अपने सबसे बड़े सपने को भी बिना किसी अफ़सोस के वेदी पर चढ़ा देती है।

मैं चुपचाप उठी, अपनी अलमारी खोली और वो लिफाफा निकालकर रमा के हाथों में रख दिया। पैसे मुट्ठी में भींचते हुए रमा तुरंत अस्पताल की तरफ भाग गई। मैं उसे जाते हुए देखती रही। मुझे उस दिन महसूस हुआ कि असली सोना वो नहीं जो सुनार की दुकान पर मिलता है, बल्कि असली सोना तो रमा जैसी औरतों का चरित्र और उनका वो समर्पण है, जिसे दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। उसने अपने सपने को मारकर अपने सुहाग को जीवनदान दिया था।

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#सुहाग की निशानी: एक अनकहा बलिदान

मूल  लेखक : राम मूरत ‘ राही ‘ इन्दौर  – मध्यप्रदेश

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