सुजाता की स्नेह भरी लेकिन सशक्त बातों ने सीमा के अंदर सोई हुई उस चिंगारी को फिर से हवा दे दी, जो डर और शर्मिंदगी के कारण बुझ गई थी। उसे अपनी भूल का एहसास हो गया। उसे समझ आ गया कि भागना और हार मान लेना किसी समस्या का समाधान नहीं है। सीमा ने अपने कांपते हुए हाथों से माँ को कसकर गले लगा लिया।
माँ के कंधे पर सिर रखकर सीमा फूट-फूट कर रोई, जैसे वह अपने अंदर का सारा डर, सारी घुटन आंसुओं के जरिए बाहर निकाल रही हो। रोते-रोते उसने कहा, “मुझे माफ कर दो माँ। मैं डर गई थी, मुझे लगा मेरी दुनिया खत्म हो गई है। लेकिन अब मैं समझ गई हूँ। माँ, मैं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ सकती हूँ… मैं उन लड़कों को उनके किए की सजा दिलवाऊंगी। जब तक आप मेरे साथ हो, मुझे दुनिया की कोई ताकत नहीं हरा सकती।”
सुजाता अपने ऑफिस की डेस्क पर बैठी एक महत्वपूर्ण फाइल पर काम कर रही थी। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मौसम में एक अजीब सी खामोशी थी। तभी अचानक सुजाता के फोन की रिंग बजी। स्क्रीन पर ‘सिटी अस्पताल’ का नंबर चमक रहा था। सुजाता ने अनमने ढंग से फोन उठाया, लेकिन दूसरी तरफ से जो आवाज आई, उसने सुजाता के पैरों तले जमीन खिसका दी।
“क्या आप सीमा की माँ बोल रही हैं? आपकी बीस वर्षीय बेटी ने आत्महत्या करने की कोशिश की है। उसकी हालत नाजुक है, कृपया तुरंत सिटी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में आ जाइए।”
फोन सुजाता के हाथ से छूटकर डेस्क पर गिर पड़ा। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और सांसें जैसे गले में अटक गईं। उसकी फूल सी बच्ची, सीमा , जो हमेशा मुस्कुराती रहती थी, ऐसा खौफनाक कदम कैसे उठा सकती है? सुजाता बदहवास हालत में ऑफिस से निकली और अस्पताल की तरफ भागी। रास्ते भर वह भगवान से प्रार्थना करती रही। उसके दिमाग में सीमा का हँसता हुआ चेहरा बार-बार आ रहा था।
अस्पताल पहुँचते ही वह पागलों की तरह रिसेप्शन की तरफ दौड़ी और अपनी बेटी के बारे में पूछा। नर्स ने उसे आईसीयू के पास वाले एक कमरे की तरफ इशारा किया। सुजाता कांपते कदमों से उस कमरे में दाखिल हुई। सामने का दृश्य देखकर उसका दिल चीत्कार कर उठा। सफेद चादरों के बीच सीमा बेहोशी की हालत में पड़ी थी। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ चुका था और उसकी कलाई पर सफेद पट्टी बंधी हुई थी, जिस पर खून के हल्के धब्बे अभी भी नजर आ रहे थे। ड्रिप की ट्यूब और मशीनों की आवाजों ने उस कमरे के माहौल को और भी डरावना बना दिया था।
कमरे के एक कोने में सीमा की सबसे करीबी सहेली, नेहा, रोते हुए बैठी थी। सुजाता को देखते ही नेहा भागकर उसके गले लग गई और फफक-फफक कर रोने लगी।
“क्या हुआ मेरी बच्ची को? मेरी सीमा ने ऐसा क्यों किया नेहा?” सुजाता ने रुंधे हुए गले से पूछा।
नेहा ने अपने आँसू पोंछते हुए कांपती आवाज में बताया, “आंटी, कॉलेज में पिछले कुछ दिनों से सीनियर लड़कों का एक ग्रुप सीमा को बहुत परेशान कर रहा था। वे उसे रास्ते में रोककर भद्दी-भद्दी बातें कहते, उसे चिढ़ाते और पूरे कॉलेज के सामने उसका मजाक उड़ाते थे। सीमा ने उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की, लेकिन उनकी हिम्मत बढ़ती गई। कल उन्होंने सीमा को कैंटीन में घेरकर बहुत जलील किया और उसकी झूठी बातें बनाकर पूरे कॉलेज में फैला दीं। सीमा अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी इज्जत और आत्मसम्मान सब खत्म हो गया है। इसी प्रताड़ना और शर्मिंदगी से दुखी होकर आज सुबह हॉस्टल के कमरे में उसने यह खौफनाक कदम उठा लिया।”
नेहा की बातें सुनकर सुजाता का दिल दर्द और गुस्से से भर गया। वह एक तरफ इस बात से खुश थी कि उसकी बेटी की जान बच गई है और डॉक्टर ने उसे खतरे से बाहर बता दिया है, लेकिन दूसरी तरफ उन लड़कों की हरकत पर उसका खून खौल रहा था। मगर इस वक्त गुस्सा करने से ज्यादा जरूरी सीमा को संभालना था। सुजाता चुपचाप सीमा के सिरहाने बैठ गई और अपनी बेटी के ठंडे हाथों को अपने हाथों में लेकर उसके होश में आने का इंतजार करने लगी।
कुछ घंटों की लंबी और घुटन भरी खामोशी के बाद, सीमा की उंगलियों में हल्की सी हरकत हुई। उसने धीरे-धीरे अपनी भारी पलकें खोलीं। सामने अपनी माँ को आंसुओं से भरी आँखों से देखते हुए सीमा को अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ। वह नजरें चुराने लगी। उसे लगा कि उसकी माँ अब उस पर बहुत गुस्सा करेगी, उसे डांटेगी कि उसने इतनी बड़ी बेवकूफी क्यों की।
लेकिन सुजाता ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने बड़े ही प्यार से सीमा के माथे को चूमा और उसके बालों में हाथ फेरते हुए एक बहुत ही शांत और गहरी आवाज में कहना शुरू किया, “मेरी बच्ची, जीवन की परीक्षा में इतनी जल्दी हार नहीं मानते। जिंदगी कोई फूलों की सेज नहीं है जहाँ तुम्हें हमेशा अच्छी चीजें ही मिलेंगी। यह दुनिया बहुत कठोर है, और यहाँ कदम-कदम पर ऐसे लोग मिलेंगे जो तुम्हें गिराना चाहेंगे, तुम्हें तोड़ना चाहेंगे। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम खुद ही अपनी जिंदगी खत्म कर लें?”
सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे, वह सुजाता की तरफ देखकर सिसकने लगी।
सुजाता ने उसके आँसू पोंछते हुए आगे कहा, “बेटा, जब कोई तुम्हें कमजोर करने की कोशिश करे, तो उसका जवाब खुद को मिटाकर नहीं दिया जाता। इंसान को अपने अस्तित्व की लड़ाई हमेशा खुद लड़नी पड़ती है। तुम्हारा वजूद, तुम्हारा आत्मसम्मान इतना सस्ता नहीं है कि सड़क चलते कुछ लड़कों की भद्दी बातों से खत्म हो जाए। मन की इसी कमजोरी ने तुम्हें अंदर तक हिला दिया था, इसीलिए तुमने इतना बड़ा और गलत कदम उठाया। लेकिन याद रखो सीमा , यह जीवन बहुत कीमती है। यह सिर्फ तुम्हारा नहीं, मेरा भी जीवन है। इसका सम्मान करो। जो लड़के तुम्हारी कमजोरी पर हँस रहे थे, तुम्हारी मौत पर वे जीत जाते। क्या तुम उन्हें जीतने देना चाहती थी?”
सुजाता की स्नेह भरी लेकिन सशक्त बातों ने सीमा के अंदर सोई हुई उस चिंगारी को फिर से हवा दे दी, जो डर और शर्मिंदगी के कारण बुझ गई थी। उसे अपनी भूल का एहसास हो गया। उसे समझ आ गया कि भागना और हार मान लेना किसी समस्या का समाधान नहीं है। सीमा ने अपने कांपते हुए हाथों से माँ को कसकर गले लगा लिया।
माँ के कंधे पर सिर रखकर सीमा फूट-फूट कर रोई, जैसे वह अपने अंदर का सारा डर, सारी घुटन आंसुओं के जरिए बाहर निकाल रही हो। रोते-रोते उसने कहा, “मुझे माफ कर दो माँ। मैं डर गई थी, मुझे लगा मेरी दुनिया खत्म हो गई है। लेकिन अब मैं समझ गई हूँ। माँ, मैं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ सकती हूँ… मैं उन लड़कों को उनके किए की सजा दिलवाऊंगी। जब तक आप मेरे साथ हो, मुझे दुनिया की कोई ताकत नहीं हरा सकती।”
कमरे में जो कुछ देर पहले तक मौत जैसी खामोशी और निराशा थी, वह अब विश्वास, साहस और एक नई उम्मीद की रोशनी से भर गई थी। सुजाता जानती थी कि असली लड़ाई तो अब शुरू होगी—कॉलेज जाना, शिकायत दर्ज कराना, समाज के तानों का सामना करना—लेकिन उसे यह भी यकीन था कि अब उसकी बेटी कभी कमजोर नहीं पड़ेगी।
दोस्तों, समाज में कई बार युवा ऐसी मानसिक प्रताड़ना का शिकार होकर गलत कदम उठा लेते हैं। ऐसी स्थिति में परिवार के साथ और विश्वास की बहुत आवश्यकता होती है। आपको क्या लगता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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# जिंदगी की लौ
मूल लेखिका : आभा दवे