मीरा अपनी बेटी का दुख समझ रही थी, लेकिन वह बेबस थी। उसने अपने आंसुओं को छिपाते हुए मीना को गले लगाया और कहा, “नहीं बेटा, ऐसा बिल्कुल नहीं है। दादी तुमसे भी बहुत प्यार करती हैं। लेकिन सार्थक अभी बहुत छोटा है ना, इसलिए उसका ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। तुम तो मेरी समझदार बेटी हो। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।”
मां की दी हुई सीख को मीना ने अपने दिल में उतार लिया था। उसने दादी के तिरस्कार को अपनी ताकत बना लिया। वह हर समय अपनी किताबों में खोई रहती। चाहे कितनी भी गर्मी हो या ठंड, मीना सुबह जल्दी उठकर पढ़ती। इसका नतीजा यह हुआ कि वह हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आने लगी। स्कूल के शिक्षक उसकी कुशाग्र बुद्धि और मेहनत की मिसालें दिया करते थे।
सर्दियों की एक सुनहरी सुबह थी। घर के बड़े से आंगन में धूप खिली हुई थी। कल्याणी देवी ने अपने विशेष गुरुजी, पंडित दीनानाथ को आदर सत्कार के साथ आंगन में बिछी चारपाई पर बिठाया था। चाय और मेवों की तश्तरी उनके सामने रखी थी। पंडित जी पूरे इलाके में अपने ज्योतिष ज्ञान के लिए मशहूर थे। कल्याणी देवी के लिए तो उनके मुंह से निकला हर शब्द पत्थर की लकीर हुआ करता था।
पंडित जी ने अपनी मोटी चश्मे की कमानी को उंगली से खिसकाया और सात साल की मासूम मीना की कुंडली और माथे की लकीरों को बड़े ध्यान से देखा। कुछ पल तक वो गंभीर रहे, फिर अपना सिर हिलाते हुए बोले, “कल्याणी जी, आप मेरी पुरानी यजमान हैं, इसलिए सच ही कहूंगा। बुरा मत मानिएगा, लेकिन इस बच्ची की ग्रह दशा कुछ खास अच्छी नहीं है। विद्या की रेखा तो इसके हाथ में ना के बराबर है। बहुत जोर मारेंगी तो मुश्किल से थोड़ी बहुत पढ़ाई कर पाएगी। इसकी किस्मत में चूल्हा-चौका और गृहस्थी ही लिखी है। इसके सितारे बहुत कमजोर हैं, जीवन में कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर पाएगी।”
यह सुनकर कल्याणी देवी का चेहरा थोड़ा उतरा, लेकिन पंडित जी ने तुरंत चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लाते हुए कहा, “पर हाँ, एक बड़ी खुशखबरी है। इसकी कुंडली में भाई का सुख बहुत प्रबल है। इस घर में जो अगला बच्चा जन्म लेगा, वह एक तेजस्वी पुत्र होगा। वह लड़का अपने साथ ‘राजयोग’ लेकर पैदा होगा। उसके आते ही आपके घर में धन-धान्य की बारिश होगी। वह बहुत ही मेधावी, आज्ञाकारी और अपने कुल का नाम रोशन करने वाला होगा। वह आपके बुढ़ापे की मजबूत लाठी बनेगा कल्याणी जी, बस आप अपने पोते का मुख देखने की तैयारी कीजिए।”
यह सुनते ही कल्याणी देवी की बांछें खिल गईं। उनकी आंखों में एक असीम खुशी चमक उठी। उन्होंने तुरंत पंडित जी के चरण स्पर्श किए और अपनी तिजोरी से निकालकर एक मोटी दक्षिणा उनके हाथों में रख दी। बोलीं, “पंडित जी, आपके मुंह में घी-शक्कर। बस मेरे घर का चिराग जल्दी से आ जाए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”
पास ही दरवाजे की ओट में खड़ी नन्ही मीना यह सब सुन रही थी। सात साल की बच्ची को ‘ग्रह’, ‘नक्षत्र’ और ‘राजयोग’ जैसे शब्द तो समझ नहीं आए, लेकिन उसे इतना जरूर समझ आ गया था कि पंडित जी उसकी बुराई कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वह कभी पढ़-लिख नहीं पाएगी। उसका बालमन आहत हो गया। वह वहां से दौड़ती हुई सीधे रसोईघर में गई, जहां उसकी मां मीरा दोपहर का खाना बना रही थी।
मीना ने अपनी मां की साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया और रुलांसी आवाज में बोली, “मां… ये किस्मत क्या होती है?”
मीरा ने गैस धीमी की और अपनी बेटी की तरफ हैरानी से देखा, “क्या हुआ मेरी बच्ची? अचानक यह सवाल क्यों पूछ रही हो?”
मीना की आंखों से आंसू छलक पड़े, “मां, वो बाहर वाले पंडित जी दादी से कह रहे थे कि मेरी किस्मत बहुत खराब है। मैं कभी पढ़ाई नहीं कर पाऊंगी और मेरी जल्दी शादी हो जाएगी। मां, क्या मैं बहुत गंदी हूं? मैं शादी नहीं करूंगी मां, मुझे तो बहुत पढ़ाई करनी है, मुझे तो डॉक्टर बनना है।”
यह सुनते ही मीरा के सीने में जैसे किसी ने खंजर उतार दिया हो। उसका खून खौल उठा। उसका मन किया कि अभी बाहर जाकर उस ढोंगी पंडित को खूब खरी-खोटी सुनाए जो एक नन्ही बच्ची के मन में जहर घोल रहा है। लेकिन इस घर में कल्याणी देवी का दबदबा था, और मीरा एक संस्कारी बहू होने के नाते अपनी मर्यादा नहीं लांघ सकती थी। उसने अपने गुस्से के घूंट को पिया और जमीन पर बैठकर मीना को अपने सीने से लगा लिया।
उसने मीना के आंसू पोंछते हुए बहुत ही प्यार से कहा, “मेरी गुड़िया, मेरी बात ध्यान से सुनो। किस्मत वो नहीं होती जो कोई बाहर वाला तुम्हारे हाथ देखकर बता दे। किस्मत तो वो होती है जो हम अपने हाथों से बनाते हैं। वो पंडित जी बिल्कुल झूठ बोल रहे हैं। भगवान ने हमें ये हाथ सिर्फ लकीरें दिखाने के लिए नहीं, बल्कि मेहनत करने के लिए दिए हैं। जब तुम खूब मन लगाकर पढ़ाई करोगी, दिन-रात मेहनत करोगी और अपने लक्ष्य को हासिल करने की ठान लोगी, तो तुम्हारी किस्मत तुम्हारे सामने सिर झुका लेगी। तुम खुद अपनी किस्मत लिखोगी।” मीरा ने मीना का माथा चूमा और उसे समझा-बुझाकर शांत किया। मां की बातों ने मीना के मन में एक नया आत्मविश्वास जगा दिया था।
पंडित जी की भविष्यवाणी के ठीक ग्यारह महीने बाद मीरा ने एक बेटे को जन्म दिया। पूरे घर में बधाइयां बज उठीं। कल्याणी देवी तो खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थीं। उन्होंने पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बंटवाईं। उस लड़के का नाम रखा गया ‘सार्थक’। सार्थक के आते ही घर का पूरा माहौल बदल गया। कल्याणी देवी दिन-रात बस अपने पोते की ही बलैयां लेती रहतीं। वे उसे नजर के काले टीके लगातीं, उसके लिए महंगे से महंगे खिलौने लातीं।
धीरे-धीरे कल्याणी देवी का सारा ध्यान सार्थक पर केंद्रित हो गया, और मीना उनके लिए जैसे अदृश्य हो गई। पहले जो दादी मीना को कहानियां सुनाती थीं, अब वे उसे अपने पास फटकने भी नहीं देती थीं। मीना यह सब देखकर बहुत उदास रहने लगी। एक दिन वह रोते हुए अपनी मां के पास आई और बोली, “मम्मी, दादी अब मुझसे बिल्कुल प्यार नहीं करतीं। वो सिर्फ सार्थक को ही प्यार करती हैं, उसी को सारी चॉकलेट देती हैं। क्या मैं अब उन्हें अच्छी नहीं लगती?”
मीरा अपनी बेटी का दुख समझ रही थी, लेकिन वह बेबस थी। उसने अपने आंसुओं को छिपाते हुए मीना को गले लगाया और कहा, “नहीं बेटा, ऐसा बिल्कुल नहीं है। दादी तुमसे भी बहुत प्यार करती हैं। लेकिन सार्थक अभी बहुत छोटा है ना, इसलिए उसका ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। तुम तो मेरी समझदार बेटी हो। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।”
मां की दी हुई सीख को मीना ने अपने दिल में उतार लिया था। उसने दादी के तिरस्कार को अपनी ताकत बना लिया। वह हर समय अपनी किताबों में खोई रहती। चाहे कितनी भी गर्मी हो या ठंड, मीना सुबह जल्दी उठकर पढ़ती। इसका नतीजा यह हुआ कि वह हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आने लगी। स्कूल के शिक्षक उसकी कुशाग्र बुद्धि और मेहनत की मिसालें दिया करते थे।
दूसरी तरफ, कल्याणी देवी के अंधे लाड़-प्यार ने सार्थक को पूरी तरह से बिगाड़ दिया था। ‘राजयोग’ लेकर पैदा हुआ सार्थक बहुत ही जिद्दी, घमंडी और शरारती हो गया था। वह किसी की बात नहीं सुनता था। अगर मीरा कभी उसे उसकी गलतियों पर डांटने या सुधारने की कोशिश करती, तो कल्याणी देवी तुरंत बीच में आ जातीं और मीरा को ही डांटने लगतीं। “खबरदार जो मेरे पोते को कुछ कहा! इसके तो सितारे ही बुलंदी पर हैं। ये कोई साधारण बच्चा नहीं है। तुम इसे डराकर इसकी किस्मत मत बिगाड़ो।”
कल्याणी देवी की शह पाकर सार्थक की हिम्मत और बढ़ जाती। उसे शहर के सबसे महंगे और नामी स्कूल में दाखिला दिलवाया गया। लेकिन सार्थक का मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था। वह स्कूल में बच्चों से झगड़ा करता, पढ़ाई के समय खेलता रहता और होमवर्क कभी पूरा नहीं करता। स्कूल से आए दिन उसकी शिकायतें घर आने लगीं। हर महीने पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में शिक्षकों से उसकी खराब प्रगति के बारे में सुनना पड़ता था। लेकिन कल्याणी देवी हर बार शिक्षकों को ही दोष देतीं कि वे उनके होनहार पोते को समझ नहीं पा रहे हैं।
समय अपनी रफ्तार से बीतता गया। मीना अब दसवीं कक्षा में पहुंच गई थी। उसकी मेहनत और लगन में कोई कमी नहीं आई थी। वहीं सार्थक पांचवीं कक्षा में ही दो बार फेल हो चुका था। घर का वह बच्चा, जिसके बारे में कहा गया था कि वह राजयोग लेकर आएगा और कुल का नाम रोशन करेगा, अब घर के लिए एक चिंता का विषय बन गया था। वह चोरी-छिपे पैसे निकालने लगा था और गलत संगत में पड़ने लगा था।
बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम का दिन था। घर में अजीब सी खामोशी थी। तभी फोन की घंटी बजी। मीरा ने फोन उठाया। दूसरी तरफ से स्कूल की प्रिंसिपल बोल रही थीं। फोन रखते ही मीरा की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने पूरे घर को पुकार कर कहा, “मां जी, सुनिए! मेरी मीना ने पूरे राज्य में टॉप किया है। उसे सरकार की तरफ से आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति मिलेगी।”
कल्याणी देवी अवाक रह गईं। उनके सामने एक तरफ वह पोती खड़ी थी जिसके बारे में कहा गया था कि वह कभी पढ़ नहीं पाएगी, और आज उसने पूरे राज्य में उनका नाम रोशन कर दिया था। और दूसरी तरफ उनका लाडला पोता सार्थक था, जिसे आज ही स्कूल से अनुशासनहीनता के कारण निकाल दिया गया था।
कल्याणी देवी को आज वह पुरानी सुनहरी सुबह याद आ गई। उन्हें समझ आ गया कि पंडित जी की वो पोथी, वो पंचांग और वो भविष्यवाणी सब झूठी थी। किस्मत किसी के कहने या माथे की लकीरों से नहीं बनती, बल्कि वो मीरा जैसी मां के दिए संस्कारों और मीना जैसी बेटी की अटूट मेहनत से बनती है। आज राजयोग किसी ग्रह में नहीं, बल्कि मीना के हाथों की उस कलम में था, जिससे उसने अपनी तकदीर खुद लिखी थी।
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# तकदीर का पन्ना
मूल लेखिका : मंगला श्रीवास्तव